दो दशकों में ख़सरा के सर्वाधिक मामले दर्ज – दो लाख से ज़्यादा की मौत

ख़सरा बीमारी के कारण वर्ष 2019 में दो लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है और पिछले 23 सालों में सबसे ज़्यादा मामले दर्ज किये गये हैं. गुरुवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और बीमारियों पर नियन्त्रण के लिये अमेरिकी विभाग (CDC) की साझा रिपोर्ट दर्शाती है कि एक दशक में वैक्सीन की पर्याप्त कवरेज में विफलता की वजह से ख़सरा के मामलों में तेज़ी देखी गई है.

वर्ष 2016 में ख़सरा के कारण होने वाली मौतों में ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली थी लेकिन 2019 में उसकी तुलना में 50 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.
यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के सभी क्षेत्रीय कार्यालयों के तहत आने वाले देशों में मामलों में बढ़ोत्तरी आई है और विश्व में साढ़े आठ लाख से ज़्यादा मामले दर्ज किये गये हैं.
इस वर्ष कम मामले देखने को मिले है लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण टीकाकरण प्रयासों को झटका लगा है.
स्वास्थ्य सेवाओं में आये व्यवधान के कारण 26 देशों में 9 करोड़ से ज़्यादा लोगों को ख़सरा की खुराक ना मिल पाने का जोखिम है – इनमें से कुछ ऐसे देश हैं जहाँ ख़सरा फैल रहा है.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की कार्यकारी निदेशक हेनरीएटा फ़ोर ने आगाह किया है कि कोरोनावायरस संकट से पहले दुनिया ख़सरे के संकट से जूझ रही थी और यह अभी टला नहीं है.
“कोविड-19 महामारी के कारण स्वास्थ्य प्रणालियों पर बोझ है लेकिन एक घातक बीमारी के ख़िलाफ़ हमारी लड़ाई को दूसरे की भेंट नहीं चढ़ाया जाना चाहिये.”
ख़सरा की पूरी तरह रोकथाम की जा सकती है लेकिन सफलता के लिये समय रहते 95 फ़ीसदी बच्चों को ख़सरा वैक्सीन की दो खुराकों (MCV1 और MCV2) को दिये जाने की आवश्यकता होती है.
MCV1 की कवरेज में विश्व भर में पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से रूकावट आई है और अब यह 84-85 फ़ीसदी तक सीमित है.
MCV2 की कवरेज में बढ़ोत्तरी हो रही है लेकिन यह अभी 71 प्रतिशत तक ही सम्भव हो पाई है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन में ख़सरा और रुबैला बीमारियों पर वरिष्ठ तकनीकी सलाहकार नताशा क्रोक्रॉफ़्ट का कहना है कि अच्छी बात ये है कि दुनिया भर में ख़सरा टीकाकरण से वर्ष 2000 से अब तक ढाई करोड़ से ज़्यादा ज़िंदगियों को बचा पाना सम्भव हुआ है.
लेकिन वैक्सीन कवरेज का दायरा कम रह जाने से रक्षा कवच के बग़ैर रहने वाले बच्चों की संख्या हर साल बढ़ रही है.
कवरेज में रूकावट
जिनीवा में एक पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए डॉक्टर क्रोक्रॉफ़्ट ने बताया कि बड़ी समस्या कवरेज में बड़ी ख़ामियाँ नहीं है बल्कि कवरेज का अवरुद्ध हो जाना है.
डॉक्टर क्रोक्रॉफ़्ट ने कहा कि धीरे-धीरे यह एक ऐसे बिन्दु तक पहुँच जाता है जहाँ बीमारी तेज़ी से फैलती है, जैसे जंगल में आग.
“और यही हमने 2019 में देखा, जिन इलाक़ों में हाल के सालों में अपर्याप्त कवरेज रही है वहाँ लगभग विस्फोटक ढँग से बीमारी का फैलाव हुआ.”
“अगर आपकी कवरेज 80 फ़ीसदी के स्तर के आसपास हो, तब आपको महसूस होता है कि स्थिति सामान्य बनी हुई है लेकिन असल में वे होती नहीं हैं, और अन्तत: आप बड़े पैमाने पर बीमारी का फैलाव देखते हैं.”
ये भी पढ़ें – ख़सरा और रुबेला के 2023 तक ख़ात्मे का संकल्प
उन्होंने बताया कि कमज़ोर स्वास्थ्य प्रणालियों और बच्चों तक ना पहुँच पाना दुनिया भर में एक बड़ी समस्या है और साथ ही कुछ देशों में लोग वैक्सीन के प्रति हिचकिचाहट दिखा रहे हैं.
पिछले सप्ताह यूनीसेफ़ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ख़सरा और पोलियो के मामलों में उभार को टालने के लिये एक साझा अपील जारी की थी.
इस अपील के तहत अगले तीन वर्षों में 25 करोड़ डॉलर की धनराशि की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है ताकि ख़सरा के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता की कमियों को दूर किया जा सके.
ये चुनौती उन 45 देशों में ज़्यादा है जहाँ जल्द बड़े पैमाने पर बीमारी फैलने की आशंका है.
हाल के समय में काँगो लोकतान्त्रिक गणराज्य, मैडागास्कर, मध्य अफ़्रीकी गणराज्य, जॉर्जिया, समोआ, यूक्रेन, उत्तर मैसेडोनिया सहित अन्य देशों में बड़ी संख्या में ख़सरा के मामले सामने आये हैं., ख़सरा बीमारी के कारण वर्ष 2019 में दो लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है और पिछले 23 सालों में सबसे ज़्यादा मामले दर्ज किये गये हैं. गुरुवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और बीमारियों पर नियन्त्रण के लिये अमेरिकी विभाग (CDC) की साझा रिपोर्ट दर्शाती है कि एक दशक में वैक्सीन की पर्याप्त कवरेज में विफलता की वजह से ख़सरा के मामलों में तेज़ी देखी गई है.

वर्ष 2016 में ख़सरा के कारण होने वाली मौतों में ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली थी लेकिन 2019 में उसकी तुलना में 50 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.

यूएन स्वास्थ्य एजेंसी के सभी क्षेत्रीय कार्यालयों के तहत आने वाले देशों में मामलों में बढ़ोत्तरी आई है और विश्व में साढ़े आठ लाख से ज़्यादा मामले दर्ज किये गये हैं.

इस वर्ष कम मामले देखने को मिले है लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण टीकाकरण प्रयासों को झटका लगा है.

स्वास्थ्य सेवाओं में आये व्यवधान के कारण 26 देशों में 9 करोड़ से ज़्यादा लोगों को ख़सरा की खुराक ना मिल पाने का जोखिम है – इनमें से कुछ ऐसे देश हैं जहाँ ख़सरा फैल रहा है.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) की कार्यकारी निदेशक हेनरीएटा फ़ोर ने आगाह किया है कि कोरोनावायरस संकट से पहले दुनिया ख़सरे के संकट से जूझ रही थी और यह अभी टला नहीं है.

“कोविड-19 महामारी के कारण स्वास्थ्य प्रणालियों पर बोझ है लेकिन एक घातक बीमारी के ख़िलाफ़ हमारी लड़ाई को दूसरे की भेंट नहीं चढ़ाया जाना चाहिये.”

ख़सरा की पूरी तरह रोकथाम की जा सकती है लेकिन सफलता के लिये समय रहते 95 फ़ीसदी बच्चों को ख़सरा वैक्सीन की दो खुराकों (MCV1 और MCV2) को दिये जाने की आवश्यकता होती है.

MCV1 की कवरेज में विश्व भर में पिछले एक दशक से ज़्यादा समय से रूकावट आई है और अब यह 84-85 फ़ीसदी तक सीमित है.

MCV2 की कवरेज में बढ़ोत्तरी हो रही है लेकिन यह अभी 71 प्रतिशत तक ही सम्भव हो पाई है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन में ख़सरा और रुबैला बीमारियों पर वरिष्ठ तकनीकी सलाहकार नताशा क्रोक्रॉफ़्ट का कहना है कि अच्छी बात ये है कि दुनिया भर में ख़सरा टीकाकरण से वर्ष 2000 से अब तक ढाई करोड़ से ज़्यादा ज़िंदगियों को बचा पाना सम्भव हुआ है.

लेकिन वैक्सीन कवरेज का दायरा कम रह जाने से रक्षा कवच के बग़ैर रहने वाले बच्चों की संख्या हर साल बढ़ रही है.

कवरेज में रूकावट

जिनीवा में एक पत्रकार वार्ता को सम्बोधित करते हुए डॉक्टर क्रोक्रॉफ़्ट ने बताया कि बड़ी समस्या कवरेज में बड़ी ख़ामियाँ नहीं है बल्कि कवरेज का अवरुद्ध हो जाना है.

डॉक्टर क्रोक्रॉफ़्ट ने कहा कि धीरे-धीरे यह एक ऐसे बिन्दु तक पहुँच जाता है जहाँ बीमारी तेज़ी से फैलती है, जैसे जंगल में आग.

“और यही हमने 2019 में देखा, जिन इलाक़ों में हाल के सालों में अपर्याप्त कवरेज रही है वहाँ लगभग विस्फोटक ढँग से बीमारी का फैलाव हुआ.”

“अगर आपकी कवरेज 80 फ़ीसदी के स्तर के आसपास हो, तब आपको महसूस होता है कि स्थिति सामान्य बनी हुई है लेकिन असल में वे होती नहीं हैं, और अन्तत: आप बड़े पैमाने पर बीमारी का फैलाव देखते हैं.”

ये भी पढ़ें – ख़सरा और रुबेला के 2023 तक ख़ात्मे का संकल्प

उन्होंने बताया कि कमज़ोर स्वास्थ्य प्रणालियों और बच्चों तक ना पहुँच पाना दुनिया भर में एक बड़ी समस्या है और साथ ही कुछ देशों में लोग वैक्सीन के प्रति हिचकिचाहट दिखा रहे हैं.

पिछले सप्ताह यूनीसेफ़ और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ख़सरा और पोलियो के मामलों में उभार को टालने के लिये एक साझा अपील जारी की थी.

इस अपील के तहत अगले तीन वर्षों में 25 करोड़ डॉलर की धनराशि की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है ताकि ख़सरा के ख़िलाफ़ प्रतिरोधक क्षमता की कमियों को दूर किया जा सके.

ये चुनौती उन 45 देशों में ज़्यादा है जहाँ जल्द बड़े पैमाने पर बीमारी फैलने की आशंका है.

हाल के समय में काँगो लोकतान्त्रिक गणराज्य, मैडागास्कर, मध्य अफ़्रीकी गणराज्य, जॉर्जिया, समोआ, यूक्रेन, उत्तर मैसेडोनिया सहित अन्य देशों में बड़ी संख्या में ख़सरा के मामले सामने आये हैं.

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