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धनतेरस : चारों तरफ मंदी-मंदी की गूंज के बीच कैसा रहेगा 2019 का धनतेरस

धनतेरस : चारों तरफ मंदी-मंदी की गूंज के बीच कैसा रहेगा 2019 का धनतेरस
October 19
10:17 2019

नोटबंदी हो या जीएसटी हो कालाधन का प्रचलन इस देश में कभी कम नहीं होगा।- भाग-1

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ टीम  

देश में हिंदू धार्मिक मान्यताओं में धनतेरस का बहुत महत्व है। ऐसा माना जाता है कि धनतेरस के दिन सोने-चांदी से लेकर अन्य सभी धातुओं से निर्मित सामग्रियों की खरीद से घर-घर पूर्ण रूप से धन-धान से संपन्न हो जाता है। इसमें ज्यादातर लोगों का ध्यान सोने से बनी वस्तुओं की ओर जाता है।

2018 में जब सोना सहित सभी धातुओं के मूल्य तत्कालीन समय में आसमान छू रहे थे तो पूरे देश में एक अनुमानितः आकलन के हिसाब से 195 करोड़ रुपये की खरीददारी हुई थी जो 2017 में हुई खरीदारी से 55 करोड़ कम थी।

2019 में जहां पूरे देश में मंदी-मंदी का हाहाकार मचा हुआ है तब इस हाहाकार के पीछे देश की विरोधी राजनीतिक पार्टियां सरकार द्वारा नोटबंदी और जीएसटी को ही दोषी मानती हैं। इस तथाकथित मंदी के दौर में सोना सहित अन्य धातुओं की कीमत में 2018 के मुकाबले 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

देश के प्रमुख समाचार पत्रों एवं अन्य अर्थिक सर्वेक्षण करने वाली संस्थाओं के अनुमान के अनुसार पूर्व वर्ष से वर्तमान वर्ष में तुलनात्मक रूप से धनतेरस पर खरीद में लगभग 50 प्रतिशत कम खरीददारी होने का अनुमान है।

विडंबना यह है कि सोना-चांदी और धातुओं की खरीददारी में 60 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों की भागीदारी रहती है और इस भागीदारी में किसानों की संख्या 90 प्रतिशत होती है। यदि किसानों को अपनी खेती का उचित मूल्य उचित समय पर मिला तो खरीददारी में बढोतरी भी हो सकती है, अन्यथा जो मूल्यांकन है उसमें और कमी आयेगी।

2019 में यदि धनतेरस की खरीददारी पूर्व के वर्षों का रिकार्ड तोड़ देती है जैसा कि कुछ विशेषज्ञों का मानना है तो मंदी-मंदी की आवाज इस खरीददारी में नकारखाने में तूती की आवाज बन कर रह जायेगी। विरोधी राजनीतिक पार्टियों के पास अभी यह एक ज्वलंत मुद्दा है और इस ज्वलंत मुद्दे पर ठंडा पानी पड़ जायेगा।

धनतेरस में होने वाली बिक्री जो उनके अनुमान से पिछले वर्ष के रिकार्ड को तोड़ेगी से अतिउत्साहीत हैं सोना-चांदी व्यापारी और उन्होंने ग्राहकों को लुभाने की कर ली है भरपूर तैयारी। इसलिए देश के लगभग सभी अखबार सोना-चांदी व्यापारियों के विज्ञापनों से लबालब भरे हुये हैं और कमाई ही कमाई पा रहे हैं।

अनेकों जानकार आंखोंदेखी, कानोसूनी और सीधी संलिप्तता के आधार पर सोने-चांदी से संबंधित व्यापारियों की रातों-रात अमीरी होने को अजूबा मानते हैं। अगर एक रांची छोटे शहर का ही उदाहरण लिया जाये तो एक जानकार का मानना है कि जो बहुत से व्यापारियों को जानता है जो 10 या 15 साल पहले धोती पहनकर और रिक्शा पर चढकर दुकान खोलते थे आज शहर के सबसे कीमती इलाकों के आलिशान बंगलों में रहते हैं और महंगी और लग्जरी गाड़ियों में अपने ड्राइवर के साथ शान से चढते हैं। जो कभी ट्रेन की थ्री टायर में चला करते थे आज उनके पांव हवाई जहाज से नीचे नहीं उतरते हैं।

धनतेरस पर यह सब कुछ लिखने की वजह यह है कि सोना-चांदी की कमाई कितनी प्रतिशत होती है यह उन व्यापारियों को छोड़कर पूरे देश में आम अवाम के सोंच के बाहर की बात है।

यह सत्य है कि घरों में महिलाओं को सोने-चांदी से बनी वस्तुओं से प्यार होता ही है और उसकी चमक में उनको अंदर की मिलावट कहां नजर आती हैं?

छोटे से शहर रांची में कहा तो यह भी जाता है कि पशुपालन और अन्य भ्रष्टाचारी नेताओं का काफी पैसा गहनों के कुछ व्यापारियों की दुकानों में लगा हुआ है जिसमें झारखंड केएक-दो मशहूर पूर्व मंत्री एवं राजनेताओं का भी कालाधन इस व्यापार में लगा हुआ है।

नोटबंदी हो या जीएसटी हो कालाधन का प्रचलन इस देश में कभी कम नहीं होगा।

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