पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिये पुख़्ता कार्रवाई का ब्लूप्रिन्ट

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने प्रकृति के साथ समरसतापूर्ण रिश्तों को स्थापित किये जाने की अहमियत को रेखांकित करते हुए आगाह किया है कि प्रकृति के बग़ैर मानवता का फलना-फूलना या बच पाना सम्भव नहीं है. यूएन प्रमुख ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट, Making Peace with Nature, को पेश करते हुए प्रकृति को देखने के नज़रिये में बदलाव लाने और नई दृष्टि के साथ पर्यावरण संरक्षण व बहाली उपायों में निवेश की पुकार लगाई है.

यूएन प्रमुख ने गुरुवार को एक वर्चुअल प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए कहा, “लम्बे समय से, हम प्रकृति से एक निरर्थक व आत्मघाती युद्ध लड़ रहे हैं. इसका नतीजा, आपस में जुड़े तीन पर्यावरणीय संकटों के रूप में सामने है.”
उन्होंने कहा कि जलवायु व्यवधानों, जैवविविधता की हानि, और प्रदूषण के कारण मानवता पर एक बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है, और इन समस्याओं की वजह, ग़ैर-टिकाऊ उत्पादन और खपत है. 
“मानवता का कल्याण, पृथ्वी की सेहत की रक्षा करने में निहित है.”

For too long, we have been waging a senseless war on nature.Climate disruption, biodiversity loss and pollution threaten our viability as a species.Without nature’s help, we will not thrive or even survive.It’s time to make peace with nature. https://t.co/joOanKGaPe— António Guterres (@antonioguterres) February 18, 2021

यूएन पर्यावरण एजेंसी की नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, जैवविविधिता के खोने और प्रदूषण से उपजे संकट का सामना किया जा सकता है, लेकिन आपस में जुड़े इन संकटों से निपटने के लिये पूर्ण समाज के स्तर पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है.
महासचिव गुटेरेश ने ध्यान दिलाया कि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन की कुल मात्रा में दो-तिहाई के लिये घरों से होने वाला उत्सर्जन ज़िम्मेदार है. 
इसके मद्देनज़र, उन्होंने ध्यान दिलाया कि लोगों का चयन मायने रखता है. 
“हम भूमि और समुद्रों के पर्यावरण का आवश्यकता से दोहन और क्षरण कर रहे हैं. वातावरण और महासागर, हमारे कचरे को फेंके जाने का स्थान बन गए हैं.”
“और सरकारें अभी भी, प्रकृति की रक्षा के बजाए, उसके दोहन को ज्यादा बढ़ावा दे रही हैं.”
पर्यावरण क्षरण 
रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था में पिछले पाँच दशकों में लगभग पाँच गुना बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन पर्यावरण को इसकी एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है. 
कोरोनावायरस संकट के दौरान कार्बन उत्सर्जनों में गिरावट आई है, इसके बावजूद वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी सदी के अन्त तक 3 डिग्री सेल्सियस की दिशा में आगे बढ़ रही है.  
प्रदूषण जनित बीमारियों की वजह से हर वर्ष 90 लाख लोगों की मौत हो रही है, जबकि दस लाख से ज़्यादा पौधों व पशुओं की प्रजातियों के लुप्त हो जाने का ख़तरा है. 
यूएन प्रमुख ने कहा कि इस चुनौती से निपटने का एकमात्र उपाय टिकाऊ विकास है, जिसके ज़रिये पृथ्वी व मानवता के कल्याण को सुनिश्चित किया जा सकता है.
उन्होंने इस दिशा में उपायों को ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि कार्बन उत्सर्जन पर कर (टैक्स) लगाया जाना होगा, जीवाश्म ईंधनों को मिलने वाली सब्सिडी को हटाकर उसे प्रकृति-अनुकूल समाधानों के लिये उपलब्ध कराना होगा.
साथ ही कृषि के ऐसे तरीक़ों से बचना होगा जिससे प्रकृति नष्ट या प्रदूषित होती हो.
इसके लिये यह अहम है कि प्रकृति को देखने का नज़रिया बदलना होगा, और नई दृष्टि के साथ पर्यावरण संरक्षण व बहाली के लिये नीतियों व गतिविधियों में प्रत्यक्ष निवेश करना होगा. 
टिकाऊ विकास और पर्यावरण
रिपोर्ट बताती है कि विज्ञान और नीतिनिर्माण के ज़रिये किस तरह वर्ष 2030 तक टिकाऊ विकास लक्ष्यों को हासिल करने और 2050 तक कार्बन तटस्थ दुनिया की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है.
इसके समानान्तर जैवविविधता के लुप्त होने और प्रदूषण फैलने के रोकथाम उपायों का भी उल्लेख किया गया है. 
विशेषज्ञों ने ज़ोर देकर कहा है कि ग़रीबी उन्मूलन, भोजन, व जल सुरक्षा पर टिकाऊ विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ने के लिये पर्यावरण क्षरण का अन्त बेहद अहम है.
महासचिव गुटेरेश ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि खाद्य उत्पादन और जल, भूमि व महासागर प्रबन्धन की चुनौतियों से निपटने के लिये तत्काल महत्वाकाँक्षा प्रदर्शित किये जाने की आवश्यकता है. 
इस क्रम में उन्होंने विकासशील देशों को ज़्यादा सहायता मुहैया कराने पर बल दिया है. 
उदाहरणस्वरूप, रिपोर्ट बताती है कि टिकाऊ कृषि व मत्स्य पालन के समाधानों, आहार में बदलाव लाने और भोजन की बर्बादी को कम करने से वैश्विक स्तर पर भुखमरी, निर्धनता, कुपोषण से निपटने में मदद मिलेगी. 
साथ ही प्रकृति के लिये ज़्यादा भूमि और महासागर भी उपलब्ध हो सकेगा.  
यूएन प्रमुख ने कहा कि समय आ गया है कि प्रकृति को एक ऐसे सहयोगी के रूप में देखा जाए, जिससे टिकाऊ विकास लक्ष्यों को पाने में मदद मिलेगी. 
दूरदृष्टि की दरकार 
रिपोर्ट में बताया गया है कि पर्यावरण संकट के हल के लिये राजनैतिक व तकनीकी समाधान ढूँढने में मानसिकता को बदला जाना अहम होगा.
“टिकाऊ अर्थव्यवस्था की ओर रास्ता मौजूद है, जहाँ नवीकरणीय ऊर्जा, टिकाऊ खाद्य प्रणालियों और प्रकृति आधारित समाधानों के ज़रिये पहुँचा जा सकता है.”
महासचिव गुटेरेश ने कहा, “यह एक समावेशी दुनिया की ओऱ ले जाएगा जहाँ प्रकृति के साथ शान्ति क़ायम हो…और इसी दूरदृष्टि को अपनाए जाने की आवश्यकता है.”
यूएन प्रमुख ने आग्रह किया है कि इस रिपोर्ट का इस्तेमाल प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते की समीक्षा करने और उसे पुनर्स्थापित किए जाने में किया जाना होगा., संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने प्रकृति के साथ समरसतापूर्ण रिश्तों को स्थापित किये जाने की अहमियत को रेखांकित करते हुए आगाह किया है कि प्रकृति के बग़ैर मानवता का फलना-फूलना या बच पाना सम्भव नहीं है. यूएन प्रमुख ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की नई रिपोर्ट, Making Peace with Nature, को पेश करते हुए प्रकृति को देखने के नज़रिये में बदलाव लाने और नई दृष्टि के साथ पर्यावरण संरक्षण व बहाली उपायों में निवेश की पुकार लगाई है.

यूएन प्रमुख ने गुरुवार को एक वर्चुअल प्रेस वार्ता को सम्बोधित करते हुए कहा, “लम्बे समय से, हम प्रकृति से एक निरर्थक व आत्मघाती युद्ध लड़ रहे हैं. इसका नतीजा, आपस में जुड़े तीन पर्यावरणीय संकटों के रूप में सामने है.”

उन्होंने कहा कि जलवायु व्यवधानों, जैवविविधता की हानि, और प्रदूषण के कारण मानवता पर एक बड़ा ख़तरा मंडरा रहा है, और इन समस्याओं की वजह, ग़ैर-टिकाऊ उत्पादन और खपत है. 

“मानवता का कल्याण, पृथ्वी की सेहत की रक्षा करने में निहित है.”

यूएन पर्यावरण एजेंसी की नई रिपोर्ट के अनुसार, जलवायु परिवर्तन, जैवविविधिता के खोने और प्रदूषण से उपजे संकट का सामना किया जा सकता है, लेकिन आपस में जुड़े इन संकटों से निपटने के लिये पूर्ण समाज के स्तर पर तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है.

महासचिव गुटेरेश ने ध्यान दिलाया कि वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन की कुल मात्रा में दो-तिहाई के लिये घरों से होने वाला उत्सर्जन ज़िम्मेदार है. 

इसके मद्देनज़र, उन्होंने ध्यान दिलाया कि लोगों का चयन मायने रखता है. 

“हम भूमि और समुद्रों के पर्यावरण का आवश्यकता से दोहन और क्षरण कर रहे हैं. वातावरण और महासागर, हमारे कचरे को फेंके जाने का स्थान बन गए हैं.”

“और सरकारें अभी भी, प्रकृति की रक्षा के बजाए, उसके दोहन को ज्यादा बढ़ावा दे रही हैं.”

पर्यावरण क्षरण 

रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक अर्थव्यवस्था में पिछले पाँच दशकों में लगभग पाँच गुना बढ़ोत्तरी हुई है, लेकिन पर्यावरण को इसकी एक बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी है. 

कोरोनावायरस संकट के दौरान कार्बन उत्सर्जनों में गिरावट आई है, इसके बावजूद वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी सदी के अन्त तक 3 डिग्री सेल्सियस की दिशा में आगे बढ़ रही है.  

प्रदूषण जनित बीमारियों की वजह से हर वर्ष 90 लाख लोगों की मौत हो रही है, जबकि दस लाख से ज़्यादा पौधों व पशुओं की प्रजातियों के लुप्त हो जाने का ख़तरा है. 

यूएन प्रमुख ने कहा कि इस चुनौती से निपटने का एकमात्र उपाय टिकाऊ विकास है, जिसके ज़रिये पृथ्वी व मानवता के कल्याण को सुनिश्चित किया जा सकता है.

उन्होंने इस दिशा में उपायों को ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि कार्बन उत्सर्जन पर कर (टैक्स) लगाया जाना होगा, जीवाश्म ईंधनों को मिलने वाली सब्सिडी को हटाकर उसे प्रकृति-अनुकूल समाधानों के लिये उपलब्ध कराना होगा.

साथ ही कृषि के ऐसे तरीक़ों से बचना होगा जिससे प्रकृति नष्ट या प्रदूषित होती हो.

इसके लिये यह अहम है कि प्रकृति को देखने का नज़रिया बदलना होगा, और नई दृष्टि के साथ पर्यावरण संरक्षण व बहाली के लिये नीतियों व गतिविधियों में प्रत्यक्ष निवेश करना होगा. 

टिकाऊ विकास और पर्यावरण

रिपोर्ट बताती है कि विज्ञान और नीतिनिर्माण के ज़रिये किस तरह वर्ष 2030 तक टिकाऊ विकास लक्ष्यों को हासिल करने और 2050 तक कार्बन तटस्थ दुनिया की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है.

इसके समानान्तर जैवविविधता के लुप्त होने और प्रदूषण फैलने के रोकथाम उपायों का भी उल्लेख किया गया है. 

विशेषज्ञों ने ज़ोर देकर कहा है कि ग़रीबी उन्मूलन, भोजन, व जल सुरक्षा पर टिकाऊ विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ने के लिये पर्यावरण क्षरण का अन्त बेहद अहम है.

महासचिव गुटेरेश ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि खाद्य उत्पादन और जल, भूमि व महासागर प्रबन्धन की चुनौतियों से निपटने के लिये तत्काल महत्वाकाँक्षा प्रदर्शित किये जाने की आवश्यकता है. 

इस क्रम में उन्होंने विकासशील देशों को ज़्यादा सहायता मुहैया कराने पर बल दिया है. 

उदाहरणस्वरूप, रिपोर्ट बताती है कि टिकाऊ कृषि व मत्स्य पालन के समाधानों, आहार में बदलाव लाने और भोजन की बर्बादी को कम करने से वैश्विक स्तर पर भुखमरी, निर्धनता, कुपोषण से निपटने में मदद मिलेगी. 

साथ ही प्रकृति के लिये ज़्यादा भूमि और महासागर भी उपलब्ध हो सकेगा.  

यूएन प्रमुख ने कहा कि समय आ गया है कि प्रकृति को एक ऐसे सहयोगी के रूप में देखा जाए, जिससे टिकाऊ विकास लक्ष्यों को पाने में मदद मिलेगी. 

दूरदृष्टि की दरकार 

रिपोर्ट में बताया गया है कि पर्यावरण संकट के हल के लिये राजनैतिक व तकनीकी समाधान ढूँढने में मानसिकता को बदला जाना अहम होगा.

“टिकाऊ अर्थव्यवस्था की ओर रास्ता मौजूद है, जहाँ नवीकरणीय ऊर्जा, टिकाऊ खाद्य प्रणालियों और प्रकृति आधारित समाधानों के ज़रिये पहुँचा जा सकता है.”

महासचिव गुटेरेश ने कहा, “यह एक समावेशी दुनिया की ओऱ ले जाएगा जहाँ प्रकृति के साथ शान्ति क़ायम हो…और इसी दूरदृष्टि को अपनाए जाने की आवश्यकता है.”

यूएन प्रमुख ने आग्रह किया है कि इस रिपोर्ट का इस्तेमाल प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते की समीक्षा करने और उसे पुनर्स्थापित किए जाने में किया जाना होगा.

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