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पशु-बलि-कुर्बानी आज भी आधार है धर्म और परम्परा का

August 19
09:03 2019

अभी देश के केई राज्यों ने पशु बध रोकने के लिए निषेध कानून बनाया है

लेकिन धर्म और परम्परा का आधार इस निषेध कानून पर आज भी भारी है।

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज

प्रागैतिहासिक काल से लेकर अधुनातन काल तक मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास और वृत में परम्पराओं का अपना इतिहास और स्थान है। पृथ्वी के सभी भूभागों में जहां-जहां मनुष्यों का वास है और जहां सामजिकता में लोग बंधे हुए हैं, वहां-वहां विविध परम्पराएं भी चलन में है। कुछ परंपराएं परिवार तक ही सिमटी हो सकती है तो अधिकांश परंपराओं का चलन सामाजिक और सामूहिक स्तर पर मान्य है। ऐसी ही एक परंपरा ‘बलि प्रथा’ की भी है।

इस्लाम में ‘कुर्बानी’ प्रथा

इस्लाम में यह प्रथा ‘कुर्बानी’ के रूप में मान्य है जो इद-उल-जोहा अर्थात बकरीद के अवसर पर देखने को मिलती है। यहां भी पशुओं की कुर्बानी देकर अपनी सुनिश्चित धार्मिक परम्परा का अनुपालन किया जाता है।

यहां उल्लेखनीय है कि कुर्बानी की ऐसी परंपरा ‘बलि प्रथा’ के नाम से विश्व की अन्य संस्कृतियों से सम्बद्ध मानव समुदायों के बीच भी प्रचलित हैं। वृहत्तर भारत में पुरा-पाषाण काल से लेकर नव पाषाण काल तक के बीच भी इसके प्रचलन के प्रमाण मिलते हैं। पुरापाषाण काल में मानव पशु-मांस भक्षण करने लगा था।

नव पाषाण काल में मानवों द्वारा भेड़-बकरी के पालन की शुरूआत हो गई थी। निश्चित रूप से ऐसे जानवरों की अन्य उपयोगिता के अतिरिक्त उनके मांस को खाद्य के रूप में उपयोग भी होता होगा। ऐसे जानवरों के पालन से ‘शिकार’ कर मांस जुटाने के झंझट से छुटकारा मिलना आसान हो गया होगा।

भारतीय संस्कृति में देवताओं, विशेष रूप से देवी-शक्ति की प्रसन्नता के लिए पशु-बलि देने की जैसी परम्परा शुरू हुई, वैसी परंपरा आज तक कायम है। विभिन्न देवी-शक्ति मंदिरों या लोक-प्रचलित देव स्थलों पर आम जन स्व-कल्याण की कामना पूर्ति के लिए पशुओं का सिर काटकर उनकी बलि चढ़ाते हैं।

यह प्रथा यदि वर्ष के किसी विशेष धार्मिक पूजा अनुष्ठान के अवसर पर पूरी होती है तो कहीं-कहीं रोज-रोज भी बलि चढ़ाने की परंपरा है। झारखण्ड के रजरप्पा में अवस्थित माॅं छिन्नमस्तिका का मंदिरपरिसर में प्रतिदिन खस्सी-बकरों की बलि चढ़ाने के लिए लोट जुटते हैं। ‘तारा-पीठ’ में भी देवी-शक्ति को बलि देकर प्रसन्न करने की परंपरा है। देश के अन्य भू-भागों में भी इस तरह की विचारधारा से जुड़े लोग समुदाय या जाति बलि-प्रथा को जायज मानकर मंदिरों या विविध देव स्थलों पर पशुओं की बलि चढ़ाते हैं।

अपनी ‘मनौती’ या मनोकामना की पूर्ति हेतु ऐसे लोग विश्वास करते हैं कि जिस देवी-देवता को हमने ‘बलि’ चढ़ाई है वह हमारा कल्याण करेंगे। कुछ लोग विश्वास करते हैं कि अपने कल्याण के लिए हमने जिस देवता से मन्नौती मांगी थी और उसे बदले में बलि चढ़ाने का वादा किया था, यदि वह पूरा हो गया है तो बलि चढ़ाना उचित है।

समाज में कुछ लोग ‘पशु-बलि’ नहीं देकर फल-सब्जी को भी देव-स्थल पर विधानपूर्वक काट कर ‘बलि’ के रूप में अनुष्ठान पूरा करते हैं। इसे लोक उच्चार में फल-शाक बलि कहते हैं। वैसे आदि मानव द्वारा जब अन्नोत्पादन किया जाने लगा तब ‘अन्नदान’ को भी ‘बलि’ के रूप में माना जाने लगा। ‘दान’ भी ‘त्याग’ का ही समानार्थी है। यदि कोई व्यक्ति-देश, समाज या किसी अन्य उद्देश्य के हित में अपने प्राणों की आहुति देता है तो इसे ‘बलिदान’ कहा जाता है।

जैसे स्वतंत्रता-संग्राम में अनेक क्रांतिकारी युवकों ने अपना ‘बलिदान’ दिया था। इसे ही ‘मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने’ के रूप में कवि द्वारा वर्णित किया गया है। किसी व्यक्ति के मृत्युपरांत उसके श्राद्ध-अनुष्ठान में ‘पिण्डदान’ के क्रम में काग-बलि देने की परंपरा है। इस अनुष्ठान में कौवों के लिए विशेष अन्न आदि दान स्वरूप दिए जाते हैं। स्यार, कुत्तों आदि के लिए अन्नद दान की परंपरा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि सभ्यता के साथ सांस्कृतिक विकास के दौर में मानव समुदाय के बीच विभिन्न तरह की प्रथाओं का चलन शुरू हुआ, जिसके नमूने आज भी किसी न किसी रूप में अक्षुण है।

अपने हिस्से की वस्तुओं के दान को ‘बलिदान’ के रूप में समर्पित करने के साथ-साथ पशुओं का सिर काट कर किसी देवी देवता को चढ़ाने को ‘बलि’ की परंपरा के रूप में आज भी अक्षुण रखना किसी समुदाय विशेष की ही परंपरा नहीं हैं बल्कि अन्य मानव समुदायओं में परंपरा बढ़ी हुई है।

जनजातीय समुदाय में तो मुर्गे की बलि देना और अपने देवता पर हड़िया-शराब चढ़ाना मान्य अनुष्ठान है। दुर्गापूजा के अवसर पर व्यापक स्तर पर अनुष्ठान के साथ भैंसे की बलि दी जाती है। देश के विभिन्न राजघरानों की तरह झारखण्ड के रांची स्थित रातू महाराज के प्रांगण में यह प्रथा श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति में आज भी जारी है। बलि परंपरा में कुछ समुदाय में ऊँट की भी बलि दी जाती है।

वैसे भी कुछ पूजा ऐसी होती है जिसमें पशु बलि का अनुष्ठान पूरी तरह मान्य है। यहां उल्लेख उचित है कि हिन्दु धर्म में प्रथा का प्रचलन भले ही शाक्त और तांत्रिकों के सम्प्रदाय में हीं शुरू हुआ, लेकिन इसका कोई धार्मिक आधार नहीं है। वस्तुतः वैदिक धर्म में भी अनेक विसंगतियों के साथ अनेक परंपराओं ने जन्म लेकर अपनी जड़ जमा ली, जिसे रोकने का प्रयास नहीं हआ।

दक्षिण भारत के कुछ मंदिर भी पशु बलि के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। कोलकाता, बनारस, छत्तीसगढ़ के मंदिरों में भी परम्परा के तहत पशु बलि दी जाती रही है। लेकिन यदि पशु बलि से भगवान या कोई देवता प्रसन्न होते तो श्रीमद्भगवद्गीता में इसका समर्थन होता। लेकिन ऐसा नहीं है। अभी देश के केई राज्यों ने पशु बध रोकने के लिए निषेध कानून बनाया है लेकिन धर्म और परम्परा का आधार इस निषेध कानून पर आज भी भारी है।

आस्था पर प्रहार अनुचित है 

बलि प्रथा अथवा कुर्बानी प्रथा में आस्था रखने वाले विभिन्न संप्रदाय से श्रद्धालुओं का मानना है कि इस धार्मिक परम्परा को समाज में हेय दृष्टि से देखना सर्वथा अनुचित है। ऐसी परम्पराएं युगों-युगों से विभिन्न संप्रदाय के लोगों में देशकाल परिस्थिति के अनुरूप प्रचलन में हैं।

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