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प्रकाश पर्व: सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी

प्रकाश पर्व: सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी
January 12
20:52 2019

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ 

13 जनवरी को गुरु गोविंद सिंह का प्रकाश पर्व मनाया जाएगा। गुरु गोविंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरु हैं। गुरु गोविंदसिंह एक विलक्षण क्रांतिकारी संत व्यक्तित्व है। गुरु गोविंद सिंह जी खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होने पंज प्यारे और 5 ककार शुरू किए थे।

इसके साथ ही गुरू गोबिन्द सिंह ने सिखों की पवित्र ग्रन्थ गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में सुशोभित किया। गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म बिहार राज्य की राजधानी पटना में हुआ था। गुरु गोविंद सिंह जी को सिख धर्म का सबसे वीर योद्धा और गुरु माना जाता है।

गुरु गोबिंद सिंह की गिनती महान लेखकों और रचनाकारों में होती है। उन्होंने जाप साहिब, अकाल उस्तत, बिचित्र नाटक, चंडी चरित्र, शास्त्र नाम माला, अथ पख्यां चरित्र लिख्यते, जफरनामा और खालसा महिमा जैसी रचनाएं लिखीं। बिचित्र नाटक को उनकी आत्मकथा माना जाता है, जोकि दसम ग्रन्थ का एक भाग है।

गुरु गोविंद सिंह एक महान कर्मप्रणेता, अद्वितीय धर्मरक्षक, ओजस्वी वीर रस के कवि के साथ ही संघर्षशील वीर योद्धा भी थे। उनमें भक्ति और शक्ति, ज्ञान और वैराग्य, मानव समाज का उत्थान और धर्म और राष्ट्र के नैतिक मूल्यों की रक्षा हेतु त्याग एवं बलिदान की मानसिकता से ओत-प्रोत अटूट निष्ठा तथा दृढ़ संकल्प की अद्भुत प्रधानता थी तभी स्वामी विवेकानंद ने गुरुजी के त्याग एवं बलिदान का विश्लेषण करने के पश्चात कहा है कि ऐसे ही व्यक्तित्व के आदर्श सदैव हमारे सामने रहना चाहिए।

गुरुजी ने निर्बलों को अमृतपान करवा कर शस्त्रधारी कर उनमें वीर रस भरा। उन्होंने ही खालसा पंथ में ‘सिंह’ उपनाम लगाने की शुरुआत की। इस तरह उनकी वीरता को याद किया जाता है। साथ ही जिस तरह से उन्होंने अपने धर्म को आगे बढ़ाया और कुर्बानी दी वैसे ही आगे बढ़ाने का संकल्प भी लिया जाता है।

गुरु नानक देव की ज्योति इनमें प्रकाशित हुई, इसलिए इन्हें दसवीं ज्योति भी कहा जाता है। सिख धर्म के नौवें गुरु तेग बहादुर साहब की इकलौती संतान के रूप में जन्मे गोविंद सिंह की माता का नाम गुजरी था।

प्रकाश पर्व: सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी

श्री गुरु तेग बहादुर सिंह ने गुरु गद्दी पर बैठने के पश्चात आनंदपुर में एक नए नगर का निर्माण किया और उसके बाद वे भारत की यात्रा पर निकल पड़े। जिस तरह गुरु नानक देव ने सारे देश का भ्रमण किया था, उसी तरह गुरु तेग बहादुर को भी आसाम जाना पड़ा।

इस दौरान उन्होंने जगह-जगह सिख संगत स्थापित कर दी। गुरु तेग बहादुर जी जब अमृतसर से आठ सौ किलोमीटर दूर गंगा नदी के तट पर बसे शहर पटना पहुंचे तो सिख संगत ने अपना अथाह प्यार प्रकट करते हुए उनसे विनती की कि वे लंबे समय तक पटना में रहें। ऐसे समय में नवम् गुरु अपने परिवार को वहीं छोड़कर बंगाल होते हुए आसाम की ओर चले गए।

पटना में वे अपनी माता नानकी, पत्नी गुजरी तथा कृपालचंद अपने साले साहब को छोड़ गए थे। पटना की संगत ने गुरु परिवार को रहने के लिए एक सुंदर भवन का निर्माण करवाया, जहां गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ। तब गुरु तेग बहादुर को आसाम सूचना भेजकर पुत्र प्राप्ति की बधाई दी गई।

पंजाब में जब गुरु तेग बहादुर के घर सुंदर और स्वस्थ बालक के जन्म की सूचना पहुंची तो सिख संगत ने उनके अगवानी की बहुत खुशी मनाई। उस समय करनाल के पास ही सिआणा गांव में एक मुसलमान संत फकीर भीखण शाह रहता था। उसने ईश्वर की इतनी भक्ति और निष्काम तपस्या की थी कि वह स्वयं परमात्मा का रूप लगने लगा।

पटना में जब गुरु गोविंद सिंह का जन्म हुआ उस समय भीखण शाह अपने गांव में समाधि में लिप्त बैठे थे। उसी अवस्था में उन्हें प्रकाश की एक नई किरण दिखाई दी जिसमें उसने एक नवजात जन्मे बालक का प्रतिबिंब भी देखा। भीखण शाह को यह समझते देर नहीं लगी कि दुनिया में कोई ईश्वर के प्रिय पीर का अवतरण हुआ है। यह और कोई नहीं गुरु गोविंद सिंह जी ही ईश्वर के अवतार थे।

सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह हमेशा ही अपने अनुयायियों को इस बात का संदेश दिया कि भौतिक सुख सुविधाओं में मत उलझो, बल्कि वाहे गुरु के लिए पीड़ित जनों की सेवा और रक्षा करो।

गुरु जी की वाणी

इंसान से प्रेम करना ही, ईश्वर की सच्ची आस्था और भक्ति है।

मैं उन लोगों को पसंद करता हूं जो सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं।

अज्ञानी व्यक्ति पूरी तरह से अंधा है, वह मूल्यवान चीजों की कद्र नहीं करता है।

भगवान के नाम के अलावा कोई मित्र नहीं है, भगवान के विनम्र सेवक इसी का चिंतन करते और इसी को देखते हैं।

ईश्वर ने हमें जन्म दिया है ताकि हम संसार में अच्छे काम करें और बुराई को दूर करें।

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