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प्रासंगिक हैं महात्मा विदुर की नीतियां

प्रासंगिक हैं महात्मा विदुर की नीतियां
April 28
11:14 2019

अमीरी या गरीबी का बुद्धि से नही है कोई सम्बन्ध

अपनी शक्ति से अधिक की कामना होती है कष्टदायी

इनसाइट ऑनलाइन न्यूज़ 

महाभारत हमारी सभ्यता और संस्कृति का एक ऐसा सद्ग्रंथ है जिसमें धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष की कहानी है। महाभारत के दो प्रमुख पात्र-भगवान श्रीकृष्ण और महात्मा विदुर उपदेशक की भूमिका में भी हैं ।

भगवान श्रीकृष्ण जहां युद्ध से विरक्त अर्जुन को गीता का उपदेश देकर अधर्म के विरूद्ध युद्ध करने की प्रेरणा देते हैं तो महात्मा विदुर दूसरे पक्ष दुर्योधन के पिता महाराज धृतराष्ट्र को विविध प्रकार से उपदेश देकर अधर्म (दुर्योधन) का साथ नहीं देकर पांडवों के विरूद्ध युद्ध टालने की प्रेरणा देते हैं लेकिन बात बनती नहीं और अंततः महाभारत होकर रहता है।

प्रासंगिक हैं महात्मा विदुर की नीतियां

यहां गौर करने की बात है कि महात्मा विदुर भले ही धृतराष्ट्र का हृदय परिवर्तन नहीं कर पाये लेकिन उनकी नीतियों की सार्थकता आज भी प्रासंगिक है। विदुर रिश्ते में महाराजा धृतराष्ट्र और पंाडु के भाई थे किन्तु उनका जन्म दासी के गर्भ से हुआ था। विदुर धर्मात्मा थे। वह पांडवों के पक्षधर थे। महाभारत युद्ध आरम्भ होने से पहले उन्होंने धृतराष्ट्रको बहुत समझाया था।

विदुर की नीति या ‘विदुर प्रजागर’ महाभारत के पांचवे पर्व में 33वें अध्याय से 40वें अध्याय तक दर्ज है। विदुर ने धृतराष्ट्र को हमेशा उचित और बेबाक सलाह दी।

उन्होंने महाभारत में चर्चित कौरव-पांडवों के बीच जुआ के खेल का विरोध किया था और धृतराष्ट्र को खरी-खोटी सुनाई थी। विदुर ने धृतराष्ट्र को बार-बार समझाया था कि पांडवों को उचित हिस्सेदारी जरूर मिलनी चाहिए।

पांडवों को लाक्षागृह में लगाई गई आग से बचाने में विदुर ही सहायक हुए थे। नीतिज्ञ, उपदेशक और कर्मशील विदुर को वेदव्यास ने बार-बार महात्मा विदुर कहा है। वह महान राजनेता और राजनीति-विद् थे।

उनकी ‘विदुर-नीति’ आज भी अनुकरणीय है। वह अपने समय के ऐसे नीतिज्ञ थे, जिनके वचनों में निर्भिकता, प्रासंगिकता और नीतिमता है। समयोचित बातों को वह प्रकट करने में हिचकते नहीं थे। महात्मा विदुर के कुछ उल्लेखनीय नीति वचन इस प्रकार हंैः-

  • आग में तपाकर सोने की, सदाचार से सज्जन की, व्यवहार से संत पुरूष की, संकट काल में योद्धा की, आर्थिक संकट में र्धर्यवान की तथा घोर संकट काल में मित्र और शत्रु की पहचान होती है।
  • यह जरूरी नहीं कि मूर्ख व्यक्ति दरिद्र हो और बुद्धिमान धनवान। अर्थात बुद्धि का अमीरी या गरीबी से कोई संबंध नहीं है। जो ज्ञानी पुरूष लोक-परलोक की बारीकियों को समझते हैं, वे ही इस मर्म को समझ पाते हैं।
  • जिस व्यक्ति को बुद्धि बल से मारा जाता है, उसके उपचार में योग्य चिकित्सक, औषधीयां, जड़ी-बूटियां, यज्ञ, हवन, वेदमंत्र आदि सारे उपाय व्यर्थ हो जाते हैं।
  • विष केवल उसके पीनेवाले एक व्यक्ति की जान लेता है, शस्त्र भी एक अभिष्ट की जान लेता है, किन्तु राजा की एक गलत नीति राज्य और जनता के साथ-साथ राजा का भी सर्वनाश कर डालती है।
  • विवेकशील और बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ये चेष्टा करते हैं कि वे यथाशक्ति कार्य करें और वे ऐसा करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।
  • पांच लोग छाया की तरह सदा आपके पीछे लगे रहते हैं। ये पांच लोग हैं- मित्र, शत्रु, उदासीन, शरण देने वाले और शरणार्थी।
  • जो अपने स्वभाव के विपरीत कार्य करते हैं वह कभी शोभा नहंी पाते।
  • गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और संन्यासी होते हुए विषयाशक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है।
  • अल्पमात्रा में धन होते हुए भी कीमती वस्तु को पाने की कामना और शक्तिहीन होते हुए भी क्रोध करना मनुष्य की देह के लिए कष्टदायक और कांटों के समान है।
  • किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि हम उसके लिए या वह हमारे लिए उपयुक्त है कि नहीं। अपनी शक्ति से अधिक का कार्य और कोई वस्तु पाने की कामना स्वयं के लिए कष्टदायी होता है।
  • न केवल अपनी शक्ति का, बल्कि अपने स्वभाव का भी अवलोकन करना चाहिए। अनेक लोग क्रोध करने पर स्वतः ही कांपने लगते हैं तो अनेक लोग निराश होने पर मानसिक संताप का शिकार होते हैं। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिए।

हमारे जिस मानसिक भाव का बोझ हमारी यह देह नहीं उठा पाती उसे मन में हीं न आने दें। जब हम कोई काम या कामना करते हैं तो उस समय हमें अपनी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति का भी अवलोकन करना चाहिए।

कभी-कभी गुस्से या प्रसन्नता के कारण हमारा रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है और हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत कोई कार्य करने के लिए तैयार हो जाते हैं और जिसका हमें बाद में दुख भी होता है। इसलिए विशेष अवसरों पर आत्ममुग्ध होने के बजाय आत्म चिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।

प्रसंगवश यह उल्लेख करना उचित है कि जब कृष्ण कौरवों-पांडवों के बीच युद्ध टालने के लिए अंतिम प्रयास के साथ युद्धिष्ठिर के दूत बनकर धृतराष्ट्र से मिलने आये तो धृतराष्ट्र किंकर्तव्य विमूढ़ और हत्प्रभ होकर रह गये।

प्रासंगिक हैं महात्मा विदुर की नीतियां

घबरा कर धृतराष्ट्र ने विदुर से रात भर परामर्श किया कि कृष्ण से किस प्रकार निपटा जाए। विदुर से धृतराष्ट्र ने जो भी जिज्ञासा की उसका नीति पूर्वक जवाब देते हुए विदुर ने अपना कर्तव्य पालन किया। फिर भी धृतराष्ट्र ने विदुर की कोई बात नहीं मानी और महाभारत होकर रहा। सबों ने अपने कर्मफल को भोगा। किन्तु महात्मा विदुर के उपदेश और उनकी नीतियों आज भी प्रासंगिक हैं।

 

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