प्लास्टिक प्रदूषण: छिपी महामारी…

कोविड-19 महामारी का अन्त अब नज़र आने लगा है, लेकिन इस विश्व-व्यापी संकट के बीच एक और महामारी है जो मानवता के सामने मुँह बाएँ खड़ी है – प्लास्टिक प्रदूषण की महामारी. पर्यावरण प्रदूषण के मुद्दे पर, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के भारत कार्यालय के प्रमुख अतुल बगई, और नेशनल ज्योग्राफ़िक फ़ैलो और पर्यावरण इंजीनियरिंग की प्रोफ़ेसर,जेना जैम्बेक का ब्लॉग, .

एक साल की निराशा के बाद वर्ष 2021 की शुरुआत, आशा का संकेत देती नज़र आई है. कोविड-19 के वैक्सीन टीकाकरण की शुरूआत हो चुकी है और कोविड-19 महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में आख़िरकार, मानवता का पलड़ा भारी होने व सामान्य स्थिति बहाल होने की झलक नज़र आने लगी है.
अब जबकि कोविड-19 पर विजय नज़दीक आ रही है है, इस वायरस के कारण बढ़ रही एक अन्य समस्या को और ज़्यादा अनदेखा करना ग़लत होगा.
महामारी के ख़िलाफ़ प्राथमिक ढाल के रूप में, प्लास्टिक का उपयोग बड़े पैमाने पर किया गया है, लेकिन इस पर कम ही ध्यान दिया गया है कि इस बढ़ते प्लास्टिक कचरे का निपटान कैसे होगा.
 
दु:खद विडम्बना यह है कि कोरोनोवायरस महामारी के शुरू होने से ठीक पहले, हम प्लास्टिक प्रदूषण के ख़िलाफ़ वास्तविक जीत हासिल करने के बहुत क़रीब थे.
भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2019 में, एकल-उपयोग प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीक़े से, वर्ष 2022 तक पूर्ण रूप से ख़त्म करने की प्रतिबद्धता जताई थी. इसके लिये, एकल-उपयोग प्लास्टिक को इकट्ठा करने, भण्डारण करने और री-सायकिल करने के लिये बेहतर व्यवस्था करने की ज़रूरत थी.
यह आन्दोलन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी था. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने नॉर्वे और जापान के सहयोग से, CounterMEASURE जैसी परियोजनाओं के ज़रिये, यह जानने की कोशिश की कि प्लास्टिक किस तरह नदी और अन्ततः महासागरों को प्रदूषित कर रही है.
साथ ही, नेशनल ज्योग्राफ़िक चैनल के “सी टू सोर्स: गंगा” अभियान ने भारत और बांग्लादेश सहित चार देशों को साथ लाकर, गंगा नदी के क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण का समग्र अध्ययन किया.
प्रगति पलटी
महामारी ने कुछ मामलों में, इस प्रगति को उलट दिया.
प्लास्टिक, विशेष रूप से एकल-उपयोग वाला प्लास्टिक, 2020 में अधिक सर्वव्यापी हो गया. मास्क, सैनिटाइज़र बोतलें, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, खाद्य पैकेजिंग, पानी की बोतलें, खुदरा सामान, मानो पूरा जीवन ही एक प्लास्टिक के गोले में समा गया.
समय के साथ, यह प्लास्टिक पाँच मिलीमीटर से भी छोटे सूक्ष्म कणों में विखण्डित हो जाएगा – जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक्स के रूप में जाना जाता है – और जल निकायों व खेत की मिट्टी के माध्यम से हमारे भोजन और हवा में मिल जाएगा.

UNDP/Deepak Malikकंचन नेसा, भारत, के उत्तर प्रदेश में, गाज़ियाबाद शहर में एक सफ़ाई कर्मचारी हैं. पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिये, प्लास्टिक का उचित भण्डारण व निपटान ज़रूरी है

हम जानते हैं कि अभी तक उत्पादित सम्पूर्ण प्लास्टिक का केवल नौ प्रतिशत ही री-सायकिल किया गया है, जबकि इसका 79 प्रतिशत भाग दुनियाभर के लैंडफिल और हमारी हवा, पानी, मिट्टी और अन्य प्राकृतिक प्रणालियों में पाया जा सकता है.
प्लास्टिक की जगह हमारे शरीर में नहीं है और प्रकृति में उसका कोई स्थान नहीं है.
लेकिन फिर भी प्लास्टिक महत्वपूर्ण है. टिकाऊ वस्तुओं, दवा और खाद्य सुरक्षा में इसकी केन्द्रीय भूमिका होने के कारण, इससे पूरी तरह से छुटकारा पाना व्यावहारिक नहीं है. इसके बजाय, हमें इस बारे में अधिक विचारशील होना चाहिये कि हम कब, कहाँ और कैसे इसका उपयोग करते हैं.
अपशिष्ट संग्रह और निपटान
हमें एक ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें नए जीवाश्म ईंधन-आधारित प्लास्टिक के निर्माण को कम करना, अपशिष्ट संग्रह और निपटान में सुधार करना और विकल्पों का विकास और उपयोग करना शामिल हो.
इन मोर्चों पर हम तुरन्त कई क़दम उठा सकते हैं, यहाँ तक कि कोविड-19 के ख़िलाफ़ संघर्ष के दौरान भी, इस बात को ध्यान में रखना होगा कि हमें यथासम्भव एकल-उपयोग प्लास्टिक से बचने के प्रयास करते रहने होंगे.
सबसे पहले, हमें यह सुनिश्चित करना चाहिये कि जितनी तेज़ी से प्लास्टिक कचरे का उत्पादन हो रहा है, उसी गति से उसका संग्रह भी हो सके.
यूनेप और नेशनल जियोग्राफ़िक के अध्ययन से स्पष्ट है कि गंगा और अन्य भारतीय नदियों में गिरने वाले कूड़े में प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा है. कचरे के निपटान के संचालन की बेहतर योजना और जल्दी-जल्दी कूड़े का निपटान ही इस समस्या को कम कर सकता है.
दूसरा, हमें ‘अपशिष्ट-से-मूल्य चक्र’ के लिये, प्लास्टिक कचरे को शुरू में ही अलग करने में सक्षम होना होगा ताकि प्लास्टिक री-सायक्लिंग के लिये उपयुक्त रहे. महामारी के दौरान, स्रोत पर ही अलग करने के कई प्रयास सामान्य रूप से अपनाए जाने लगे हैं और यह चलन जारी रखना चाहिये. यह री-सायक्लिंग को बहुत आसान और आर्थिक रूप अधिक लाभप्रद बना देगा.
तीसरा, जहाँ एकल-उपयोग प्लास्टिक के पर्यावरण अनुकूल विकल्प मौजूद हैं, वहाँ हमें इन विकल्पों को प्रोत्साहन देने की ज़रूरत है, और जहाँ वे उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ उन विकल्पों को विकसित करना होगा. व्यवसाय के ऐसे मॉडल, जो वैकल्पिक उत्पाद वितरण प्रणालियों के माध्यम से प्लास्टिक कचरे के इस्तेमाल से बचें और रीस-सायक्लिंग को बढ़ावा दें, उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये. हम कम संसाधन ख़र्च करके भी, अहम बदलाव ला सकते हैं.
और अन्त में, यह समझते हुए कि प्लास्टिक प्रदूषण वास्तव में एक समाज-व्यापी समस्या है, इसका समाधान खोजने के लिये सरकारों, व्यवसायों और नागरिक समाज को समन्वित रूप से प्रयास करने होंगे.
यूनेप और उसके साझीदार, भारत सरकार के साथ मिलकर, प्लास्टिक प्रदूषण दूर करने के लक्ष्यों को हासिल करने के लिये, शोधकर्ताओं, उद्यमों और सामुदायिक समूहों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. UNEP और National Geographic द्वारा विकसित विज्ञान, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर नीति और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं को अहम जानकारी दे रहा है.  
हमें उम्मीद है कि इन प्रयासों से, भारत में मौजूदा प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबन्धन ढाँचे को मज़बूत करने और समुद्री कूड़े व नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण के लिये एक राष्ट्रीय कार्य योजना विकसित करने में मदद मिलेगी. 
अभी,कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई को प्राथमिकता देनी चाहिये, लेकिन पृष्ठभूमि में प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या भी सुलग रही है. ऐसा न हो कि वो हमें अचानक परास्त कर जाए., कोविड-19 महामारी का अन्त अब नज़र आने लगा है, लेकिन इस विश्व-व्यापी संकट के बीच एक और महामारी है जो मानवता के सामने मुँह बाएँ खड़ी है – प्लास्टिक प्रदूषण की महामारी. पर्यावरण प्रदूषण के मुद्दे पर, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के भारत कार्यालय के प्रमुख अतुल बगई, और नेशनल ज्योग्राफ़िक फ़ैलो और पर्यावरण इंजीनियरिंग की प्रोफ़ेसर,जेना जैम्बेक का ब्लॉग, .

एक साल की निराशा के बाद वर्ष 2021 की शुरुआत, आशा का संकेत देती नज़र आई है. कोविड-19 के वैक्सीन टीकाकरण की शुरूआत हो चुकी है और कोविड-19 महामारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में आख़िरकार, मानवता का पलड़ा भारी होने व सामान्य स्थिति बहाल होने की झलक नज़र आने लगी है.

अब जबकि कोविड-19 पर विजय नज़दीक आ रही है है, इस वायरस के कारण बढ़ रही एक अन्य समस्या को और ज़्यादा अनदेखा करना ग़लत होगा.

महामारी के ख़िलाफ़ प्राथमिक ढाल के रूप में, प्लास्टिक का उपयोग बड़े पैमाने पर किया गया है, लेकिन इस पर कम ही ध्यान दिया गया है कि इस बढ़ते प्लास्टिक कचरे का निपटान कैसे होगा.
 
दु:खद विडम्बना यह है कि कोरोनोवायरस महामारी के शुरू होने से ठीक पहले, हम प्लास्टिक प्रदूषण के ख़िलाफ़ वास्तविक जीत हासिल करने के बहुत क़रीब थे.
भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2019 में, एकल-उपयोग प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीक़े से, वर्ष 2022 तक पूर्ण रूप से ख़त्म करने की प्रतिबद्धता जताई थी. इसके लिये, एकल-उपयोग प्लास्टिक को इकट्ठा करने, भण्डारण करने और री-सायकिल करने के लिये बेहतर व्यवस्था करने की ज़रूरत थी.

यह आन्दोलन अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी था. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने नॉर्वे और जापान के सहयोग से, CounterMEASURE जैसी परियोजनाओं के ज़रिये, यह जानने की कोशिश की कि प्लास्टिक किस तरह नदी और अन्ततः महासागरों को प्रदूषित कर रही है.

साथ ही, नेशनल ज्योग्राफ़िक चैनल के “सी टू सोर्स: गंगा” अभियान ने भारत और बांग्लादेश सहित चार देशों को साथ लाकर, गंगा नदी के क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण का समग्र अध्ययन किया.

प्रगति पलटी

महामारी ने कुछ मामलों में, इस प्रगति को उलट दिया.

प्लास्टिक, विशेष रूप से एकल-उपयोग वाला प्लास्टिक, 2020 में अधिक सर्वव्यापी हो गया. मास्क, सैनिटाइज़र बोतलें, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, खाद्य पैकेजिंग, पानी की बोतलें, खुदरा सामान, मानो पूरा जीवन ही एक प्लास्टिक के गोले में समा गया.

समय के साथ, यह प्लास्टिक पाँच मिलीमीटर से भी छोटे सूक्ष्म कणों में विखण्डित हो जाएगा – जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक्स के रूप में जाना जाता है – और जल निकायों व खेत की मिट्टी के माध्यम से हमारे भोजन और हवा में मिल जाएगा.


UNDP/Deepak Malik
कंचन नेसा, भारत, के उत्तर प्रदेश में, गाज़ियाबाद शहर में एक सफ़ाई कर्मचारी हैं. पर्यावरण प्रदूषण से बचने के लिये, प्लास्टिक का उचित भण्डारण व निपटान ज़रूरी है

हम जानते हैं कि अभी तक उत्पादित सम्पूर्ण प्लास्टिक का केवल नौ प्रतिशत ही री-सायकिल किया गया है, जबकि इसका 79 प्रतिशत भाग दुनियाभर के लैंडफिल और हमारी हवा, पानी, मिट्टी और अन्य प्राकृतिक प्रणालियों में पाया जा सकता है.

प्लास्टिक की जगह हमारे शरीर में नहीं है और प्रकृति में उसका कोई स्थान नहीं है.

लेकिन फिर भी प्लास्टिक महत्वपूर्ण है. टिकाऊ वस्तुओं, दवा और खाद्य सुरक्षा में इसकी केन्द्रीय भूमिका होने के कारण, इससे पूरी तरह से छुटकारा पाना व्यावहारिक नहीं है. इसके बजाय, हमें इस बारे में अधिक विचारशील होना चाहिये कि हम कब, कहाँ और कैसे इसका उपयोग करते हैं.

अपशिष्ट संग्रह और निपटान

हमें एक ऐसे दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें नए जीवाश्म ईंधन-आधारित प्लास्टिक के निर्माण को कम करना, अपशिष्ट संग्रह और निपटान में सुधार करना और विकल्पों का विकास और उपयोग करना शामिल हो.

इन मोर्चों पर हम तुरन्त कई क़दम उठा सकते हैं, यहाँ तक कि कोविड-19 के ख़िलाफ़ संघर्ष के दौरान भी, इस बात को ध्यान में रखना होगा कि हमें यथासम्भव एकल-उपयोग प्लास्टिक से बचने के प्रयास करते रहने होंगे.

सबसे पहले, हमें यह सुनिश्चित करना चाहिये कि जितनी तेज़ी से प्लास्टिक कचरे का उत्पादन हो रहा है, उसी गति से उसका संग्रह भी हो सके.

यूनेप और नेशनल जियोग्राफ़िक के अध्ययन से स्पष्ट है कि गंगा और अन्य भारतीय नदियों में गिरने वाले कूड़े में प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा है. कचरे के निपटान के संचालन की बेहतर योजना और जल्दी-जल्दी कूड़े का निपटान ही इस समस्या को कम कर सकता है.

दूसरा, हमें ‘अपशिष्ट-से-मूल्य चक्र’ के लिये, प्लास्टिक कचरे को शुरू में ही अलग करने में सक्षम होना होगा ताकि प्लास्टिक री-सायक्लिंग के लिये उपयुक्त रहे. महामारी के दौरान, स्रोत पर ही अलग करने के कई प्रयास सामान्य रूप से अपनाए जाने लगे हैं और यह चलन जारी रखना चाहिये. यह री-सायक्लिंग को बहुत आसान और आर्थिक रूप अधिक लाभप्रद बना देगा.

तीसरा, जहाँ एकल-उपयोग प्लास्टिक के पर्यावरण अनुकूल विकल्प मौजूद हैं, वहाँ हमें इन विकल्पों को प्रोत्साहन देने की ज़रूरत है, और जहाँ वे उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ उन विकल्पों को विकसित करना होगा. व्यवसाय के ऐसे मॉडल, जो वैकल्पिक उत्पाद वितरण प्रणालियों के माध्यम से प्लास्टिक कचरे के इस्तेमाल से बचें और रीस-सायक्लिंग को बढ़ावा दें, उन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये. हम कम संसाधन ख़र्च करके भी, अहम बदलाव ला सकते हैं.

और अन्त में, यह समझते हुए कि प्लास्टिक प्रदूषण वास्तव में एक समाज-व्यापी समस्या है, इसका समाधान खोजने के लिये सरकारों, व्यवसायों और नागरिक समाज को समन्वित रूप से प्रयास करने होंगे.

यूनेप और उसके साझीदार, भारत सरकार के साथ मिलकर, प्लास्टिक प्रदूषण दूर करने के लक्ष्यों को हासिल करने के लिये, शोधकर्ताओं, उद्यमों और सामुदायिक समूहों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. UNEP और National Geographic द्वारा विकसित विज्ञान, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर नीति और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं को अहम जानकारी दे रहा है.  

हमें उम्मीद है कि इन प्रयासों से, भारत में मौजूदा प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबन्धन ढाँचे को मज़बूत करने और समुद्री कूड़े व नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण के लिये एक राष्ट्रीय कार्य योजना विकसित करने में मदद मिलेगी. 

अभी,कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई को प्राथमिकता देनी चाहिये, लेकिन पृष्ठभूमि में प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या भी सुलग रही है. ऐसा न हो कि वो हमें अचानक परास्त कर जाए.

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