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बौद्धधर्म में आज भी करोड़ों लोगों की बनी हुयी है आस्था

June 17
12:43 2013

डी. राय

आध्यात्मिक क्षेत्र में भारतीय ऋषियों-महर्षियों और संतों की अपनी विशिष्ट पहचान है। हम उन्हें अंगुलियों पर नहीं गिन सकते। लेकिन ऐसे विरल संतों की पहचान आज भी अक्षुण है और भारत भूमि के साथ विश्व स्तर पर उनकी आध्यात्मिकता की पताका लहरा रही है। उनके ज्ञान के साये में मुमुक्षु अध्यात्म पथ के राही बने हुए हैं। भगवान बुद्ध ऐसे ही भारतीय संत थे जिनके नाम पर बहुचर्चित बौद्धधर्म में इतने दिनों बाद भी करोड़ों लोगों की आस्था बनी हुई है। यही नहीं भारत के अतिरिक्त चीन, जापान आदि देश बौद्ध धर्म के अनुयायी बनकर अपना जीवन सुधार आध्यात्म के यथार्थ को सार्थक कर रहे हैं।

लोकामान्य बाल गंगाधर तिलक का कहना है कि बौद्ध धर्म भी अपने वैदिक धर्म रूप पिता का ही पुत्र है कि जो अपनी सम्पत्ति का हिस्स लेकर किसी कारण से विभक्त हो गया है। अर्थात वह कोई पराया नहीं है, परन्तु उसके पहले यहां पर जो ब्राह्मण धर्म था उसी की उपजी हुई यह एक शाखा है।

श्रीमद्भगवद्गीता (अ06/5-6) में कहा गया है कि ‘मनुष्य अपना उद्धार आप करे। अपने आप को गिरने न दे। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य स्वयं ही अपना बन्धु या स्वयं अपना शत्रु है। जिसने अपने आपको जीत लिया, वह स्वयं अपना बन्धु है, परन्तु जो अपने आपको नहीं पहचानता, वह स्वयं अपने साथ शत्रु के समान वैर करता है।’

उपरोक्त आशय के उद्बोधन का बुद्धवाणी से भी साम्य दिखता है। यथा-‘धम्मपद’ के ‘अन्तवग्गों में ‘‘अत्ता की अत्तनो नाथो’’ कहकर बताया गया है कि ‘‘मनुष्य अपना स्वामी आप है।’’ साथ ही चित्तवग्गो के 10वें और 11वें वचन में लिखा है-‘‘जितनी हानि शत्रु शत्रु की और वैरी वैरी की करता हे, झूठे मार्ग पर लगा चित्त उससे अधिक बुराई करता है। जितनी (भलाई) न माता-पिता कर सकते हैं न दूसरे भाई-बन्धु उससे अधिक उसकी भलाई ठीक मार्ग पर लगा चित्त करता है।’’

 

‘धम्मपद’ के ‘दण्डवग्गो’ में निहित है कि ‘सुख चाहने वाले प्राणियों को अपने सुख की चाह से, जो दण्ड से मारता है, वह मरकर सुख नहीं पाता।’’ किन्तु यह प्रमाणिक है कि ‘धम्मपद’ की रचना के बहुत पूर्व से ही मनुस्मृति और महाभारत में यह बात प्रतिष्ठित है। ‘जो नित्य वृद्धों को प्रणाम तथा उनकी सेवा करने का स्वभाव वाला है, उसकी चार चीजें बढ़ती हैं-आयु, विद्या, यश और बल।’’ यह वचन मनुस्मृति (2/121) में लिखा है। लेकिन ‘धम्मपद’ के सहस्सवग्गों में भी यही बात कही गई है-‘‘जो अभिवादनशील है, जो सदा वुद्धों की सेवा करनेवाला है, उसके चार धर्म बढ़ते हैं-आयु, वर्ण, सुख और बल।

 

‘महाभारत’ के अश्वमेध पर्व (अ 19, श्लोक 22-23) में लिखा है-‘जैसे कोई मनुष्य सींक को मंूज से खैंच कर देखे, उसी प्रकार योगी भी शरीर से आत्मा को जुदा करके देखता हैं। मूंज को शरीर कहा, सींक को आत्मारूप कहा, यह श्रेष्ठ दृष्टांत बड़े उतम योगी लोगों से जाना गया है।’’

ठीक इसी तरह की उपमा हम बुद्ध साहित्य के ‘दीघ निकाय’ में पाते हैं। यथा-‘जैसे कोई पुरूष मूंज से सरकंडे को निकाल ले। उसके मन में ऐसा हो, यह मूंज है और यह सरकंडा। मूंज दूसरी है और सरकंडा दूसरा है। मूंज से ही सरकंडा निकाला गया है।’’

महर्षि संतसेवी ने अपने तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट किया है कि वैदिक धर्मग्रंथों में जैसे हम देवता, ब्रह्मा, इन्द्र, वरूण, यक्ष, गन्धर्व, कामदेव, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, बन्ध-मोक्ष, आवागमन आदि की चर्चा पाते हैं, उसी तरह बौद्ध धर्म ग्रंथ में भी चर्चा है। वैदिक धर्म-ग्रंथों अथवा संतों के मत में जिन पंच पापों-मिथ्या भाषण, चैय्र्य, मादक द्रव्य-सेवन, हिंसा तथा व्यभिचार से विरत रह ध्यानाभ्यास करने का प्रबल आदेश है, भगवान बुद्ध ने भी उन्हीं पंच अकरणीय कर्मों से विलग रहने अर्थात् पंचशील पर प्रतिष्ठित होकर ध्यानाभ्यास करने की आज्ञा दी है।

योग शिखोपनिषद् के अध्याय-1 में लिखा है-‘‘योग हीन ज्ञान और ज्ञानहीन योग मोक्षप्रद नहीं हो सकता। इसलिए ज्ञान और योग इन दोनों का अभ्यास मुमुक्षु को करना चाहिए।’’

और ‘धम्मपद’ के भिक्खुवग्गो-वचन 13 में लिखा है-‘‘प्रज्ञाविहीन को ध्यान नहीं होता और ध्यान (एकाग्रता) न करनेवाले को प्रज्ञा नहीं हो सकती। जिसमें ज्ञान और ध्यान दोनों है, वही निर्वाण के समीप है।’’ गोस्वामी तुलसी दास ने भी अपनी वाणी में ऐसी ही सत्य बात कही है-

‘धर्म में बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।। (रामचरितमानस)।
इस भांति के और भी अनेक साम्य वचन हैं, जिनमें शब्दान्तर है, भावान्तर नहीं। कितने वाक्य तो ऐसे हैं जिनमें भावान्तर हैं, भाषान्तर नहीं है और कतिपय ऐसे शब्द हैं, जो हूबहू वही रख दिये गये जैसे प्रतीत होते हैं।

बौद्ध ग्रंथ में या बौद्ध धर्म में प्रचलित एक शब्द ‘निर्वाण’ पर विचार किया जा सकता है। ‘निर्वाण’ शब्द की चर्चा हम मात्र बौद्ध ग्रंथों में नहीं अपितु जैनागम और श्रीमद्भवगद्गीता में भी पाते हैं और संतमत तो ‘निर्वाण’ शब्द से भरपूर है। चैबीसवें तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर की वाणी में निर्वाण की चर्चा इस भांति की गई है-‘‘जो मनुष्य निष्कपट और सरल होता है, उसी की आत्मा शुद्ध होती है। जिसकी आत्मा शुद्ध होती है उसी के पास धर्म ठहर सकता है। घी से सींची हुई अग्नि जिस प्रकार पूर्ण प्रकाश को पाती है, उसी प्रकार सरल, शुद्ध साधक ही पूर्ण निर्वाण को प्राप्त होता है।’’

श्रीमद्भगवद्गीता के कई स्थलों पर ‘निर्वाण’ और ‘ब्रह्मनिर्वाण’ का विवेचन किया गया है। संतों की वाणियां भी निर्वाण शब्द से रिक्त नहीं हैं। कबीर साहब कहते हैं-

जहां पुरूष तंहवां कछु नाहीं,
कहै कबीर हम जाना।
हमरी सैन लखै जो कोई
पावै पद निरवाना।।

गुरूनानक देव जी ने निर्वाण पद को नित्य शाश्वत बताया और कहा कि बिना अन्तःकरण की शुद्धि के कोई भी इसे नहीं पा सकता। अन्र्तर्नाद में रत होने पर ही इसकी प्राप्ति संभव है। यथा-‘तब लगु महल न पाइअै, जब लगु सचिन न चीति। सबदि रपै घरू पाइअै, निरवाणी पदु नीति।।

इसी तरह अन्य अनेक संतों की वाणियों में भी ‘निर्वाण’ शब्द बार-बार आया है। यथा-

गुरु अविनाशी सूछम वेद।
निरवान विद्या अपार भेद।।’’
-श्रीचंदजी महाराज

जाके लगी अनहद तान हो,
निरवान निरगुन नाम की।।’
-जगजीवन साहब

अल्लह अविगत राम है, बेच गून रिवान।
मेरा मालिक है सही, महल मढ़ी नहिं थान।।’
-संत गरीब दास जी

रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पर निर्बान।
ज्ञानवंत अपि सो नर, पसु बिनु पूंछ विषान।।’
-गोस्वामी तुलसीदास

सुखकन्द अनहद नाद सुनि, दुख दुरित, क्रम भ्रम भाज।
सतलोक बरसो पानि, धुनि निर्वाण यहि मन बाज।।
-संत दूलनदास जी

ज्ञानवान यहां प्रश्न खड़ा करते हैं कि जिस ‘निर्वाण’ शब्द की हम इतनी व्याख्या के साथ विशद् गाथा कह रहे हैं, यथार्थ में वह क्या है? निर्वाण किसे कहते हैं तथा इसकी उपलब्धि के उपाय क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर महर्षि संतसेवी के पास उपलब्ध है। वह कहते हैं, ‘निर्वाण’ में दो शब्द हैं-निः$वाण। पालि भाषा में वाण का अर्थ तृष्णा होता है। इस भांति इसका अर्थ होता है-वीत तृष्ण अर्थात् तृष्णा रहित। ‘निर्वाण’ का दूसरे शब्दों में दीपक के बूझ जाने अर्थात् वासना रूपी प्रदीप के अंत हो जाने के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। तीसरा अर्थ वाण रहित भी किया जा सकता है।

इसी संदर्भ में भगवान बुद्ध ने एक बार किसी की जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा था कि वाण लगने पर सबसे पहले उसे शरीर से निकालकर घाव की मरहम पट्टी करनी चाहिए, न कि तीर के बारे में जानने में लगना चाहिए। उसी तरह जब काल के तीर से जीवन विद्ध हो चुका है तो पहले इससे मुक्त होना होगा। इसके उपरांत ही सृष्टि और इसके निर्माणकर्ता के बारे चिंतन करना उपयुक्त है। इस तरह यह भी स्पष्ट होता है कि काल के वाण से रहित होना भी ‘निर्वाण’ है। भगवान बुद्ध ने भी एक जिज्ञासु परिव्राजक के पूछने पर कहा है-‘जो राग-द्वेष और मोह का क्षय है, इसी को निर्वाण कहते हैं।’

निर्वाण की परिभाषा समझ लेने के बाद इसकी प्राप्ति की उत्सुकता जगनी स्वाभाविक है। भगवान बुद्ध के पास इसके उत्तर हैं। उनकी साधना पद्धति ‘निर्वाण’ की प्राप्ति की ओर ले जाती है। निर्वाण के साक्षात्कार के लिए बुद्ध ने आष्टांगिक मार्ग की ओर संकेत किया है। बौद्ध ग्रंथ दीघनिकाय में इसकी व्याख्या की गई है। यह आर्य आष्टांगिक मार्ग है। इसमें चार प्रकार के ध्यान का नाम दिया गया है। जाप के मंत्र के सम्बन्ध में सभी बौद्धों में मतैक्य नहीं है।

 

इसी कारण सभी बौद्ध एक ही मंत्र का जाप नहीं कर विभिन्न मंत्रों का जाप करते हैं। महर्षि संतसेवी कहते हैं कि संत-साधना या संतमत साधना की भांति ही बौद्ध धर्म में भी मानस-जप, मानस ध्यान, दृष्टि साधन और शब्द-साधन वा नादानुसंधान की विधि का विधान पाते हैं। विविध बौद्ध सद्ग्रंथों में साधना की विधि बताई गई है। ‘दीघ निकाय’ में आसन मार कर बैठने, एकाग्र शुद्ध चित्त प्राप्त करने, मनोमय शरीर का निर्माण करने के लिए अपने चित्त को ध्यान में लगाने, को कहा गया है। इसी प्रकार क्रमशः दृष्टि योग और शब्द योग के लिए भी स्पष्ट संकेत मिलते हैं।

यदि ‘निर्वाण’ के सम्बन्ध में बुद्ध वाणी का श्रवण करें तो वह निर्वाण विषयक उपदेश करते हुए कहते हैं कि ‘निर्वाण एक ऐसा आयतन हैं, जहां न तो पृथ्वी है, न जल है, न अग्नि है, न आकाश है….. न यह लोक है, न परलोक है, न चांद है, न सूर्य है। भिक्षुओं! न जाना होता है, न फिर च्युत होना पड़ता है, न उत्पन्न होना होता है। वह आधार रहित है, आलंबन रहित है, यही दुख का अंत है।

‘‘यत्थ आपो च पठवी
तेजो वायो न गाधती।
न तत्थ सुक्का जो तन्ति
आदिच्चो न पकासति।
न तत्थ न विज्जति।।’’

दीघ निकाय के वट्टसुत्त में लिखा है कि अनिदर्शन अनन्त अर्थात उत्पति, स्थिति और नाश की जहां बात नहीं है और अनन्त प्रभायुक्त निर्वाण जहां है वहां जल, पृथ्वी, तेज और वायु स्थित नहीं रहते। वस्तुतः भगवान बुद्ध ने जिसको निर्वाण की संज्ञा दी, उपनिषद्कार ऋषि एवं संतों ने इसे मुक्ति के नाम से अभिहित किया गया है। इसी हेतु निर्वाण विषयक वर्णन बौद्ध ग्रंथों में जैसा किया गया है, ठीक इसी भांति मोक्ष पद का विवेचन उपनिषद्, गीता एवं संतों की वाणियों में भी है। साधकों या संतों वा अर्हन्तों का अंतिम पद निर्वाण या मोक्ष ही है। इसी की प्राप्ति होने पर भगवान बुद्ध ने स्पष्ट शब्देां में कहा था-हे गृह निर्माण करने वाले! मैंने तुम्हें देख लिया, तुम फिर घर नहीं बना सकते। तुम्हारी कड़ियां सब टूट गयीं, गृह का शिखर गिर गया, चित्त संस्कार रहित हो गया, तृष्णाओं का क्षय हो गया।’

‘महोपनिषद्,’ का ऋषि भी यही कहता है-

भिद्यते हृदय ग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।।’

अर्थात्, उस परे से परे को देखने पर हृदय की ग्रंथि खुल जाती है, सभी संशय छिन्न हो जाते हैं और सभी कर्म विनष्ट हो जाते हैं।’

इस तरह बौद्धधर्म हो या जैन धर्म या वैदिक धर्म या संतमत हो सबका ज्ञान एक है, राह एक है। जीवन का एक ही लक्ष्य है, वहां, उस परम धाम (ईश्वर) तक पहुंचना जहां जाकर फिर कोई नहीं लौटता। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, ‘वह मेरा परमधाम’ है।

बुद्धपूर्णिमा (30 अप्रैल) पर भगवान बुद्ध का स्मरण करना संसार में अपने आने के उद्देश्य को स्मरण करना है। राजसुख और रमणि भोग के सुयोग को त्याग कर मानव जन्म के उद्देश्य को सफलीभूत करने के लिए बुद्ध बने सिद्धार्थ का त्याग और तपस्या की गाथा अक्षुण बनी रहेगी, जो सबके लिए अनुकरणीय है। बुद्ध का ज्ञान ईश्वर की प्राप्ति का ज्ञान है। उन्हें नास्तिक कहना भूल है।

 

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