बड़े भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सदग्रंथ हि गावा : चम्पा भाटिया

दिव्य को देखने की दिव्य दृष्टि हर युग में सतगुरु देता है।

भाग्य से यह मनुष्य जन्म मिलता है जो कि देवताओं को भी दुर्लभ है। इस मनुष्य जीवन को सार्थक कर सकें, यहीं इस जीवन का उद्देश्य है। इस शरीर में ये आत्मा जो ईश्वर का अंश है अपने निज घर परमात्मा से बिछड़ कर जन्मो जन्मों से भटक रही है, परमात्मा की प्राप्ती कर के जीवन मरण के चौरासी के चक्कर में मुक्त हो सकें और मोक्ष को प्राप्त कर सकें। ये उपलब्धि केवल मनुष्य को ही प्राप्त हो सकती है अन्य किसी भी योनि में यह संभव नहीं अवतार बाणी में कहा हैः-

मनुष जन्म आखरी पौड़ी, तिलक गया ते वारि गई।
कहे अवतार चौरासी वाली, घोल घमाई सारी गई।।

भाव चौरासी लाख जन्मों के बाद ये जो मानव जीवन मिला है, इसी जीवन में अपने उद्देश्य को पुरा कर लें। यही अवसर है इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। यह समय हाथ से छुट गया तो जीवन की बजी जीत कर नहीं, हार कर चला जाएगा। आदि ग्रंथ में लिखा हैः-

भई प्राप्त मानुख देहुरिया।
गेविंद मिलन की एहो तेरी बरिया।।

मनुष्य देह में ही यह आत्मा का परमात्मा से मिलाप सम्भव है। परमात्मा से नाता जोड़कर यह आत्मा आवागमन के बंधन से निजात पा सकती है अन्यथा आदि ग्रन्थ में कहा हैः-

जम जम मरे, मरे फिर जमें, बहुत सजाए पया देस लमे।
कादर करीम न जातो कर्ता, तिल पीड़े ज्यों घानियाँ ।।

  • आदि ग्रन्थ

बार बार यें आत्मा जन्म लेगी, एवं बार बार मृत्यु को प्राप्त होगी। बड़ी लम्बी सजा है ये। भाव चौरासी लाख योनियों के बाद मानव जन्म मिला है, अगर कुदरत की रचना करने वाले कादर को नहीं जाना तो फिर वही चौरासी के चक्कर में जाना पढ़ेगा। गीता में भगवान श्री कृष्ण जी ने अध्याय 7 के 19वें श्लोक में कहा है किः-

बहुनाम् जन्माम् अन्ते ज्ञानवान् माम् प्रपद्यते।

बहुत से जन्मों के बाद वह ज्ञानवान जो मेरे निराकार अविनाशी रुप को जनता है, वो मेरी शरण में आता है। परमात्मा की भक्ति करने वाला हर भक्त प्रभु को पाना चाहता है, और इसे प्राप्त करने के लिए कई रास्ते अपनाता है। व्रत पुण्य दान जप तप तीर्थ पठन पाठन और अन्य कई साधन कि शायद इन सब से परमात्मा मिल सकता है। गुरु गीता में स्पष्ट कर दियाः-

न जपः तपः न यज्ञ दानम् न पुण्य तीथम् एवं च।
गुरुः तत्वम् अविज्ञाय सर्व व्यर्थम भवेत प्रिये।

भाव गुरु से तत्व परमात्मा को जाने बिना जप तप आदि सब कुछ व्यर्थ है। श्री मद् भागवद् गीता में 11वे अध्याय के 53वे श्लोक में भगवान श्री कृष्ण जी ने बतायाः-

श्री मद् भागवद् गीता में 11वे अध्याय के 53वे श्लोक में भगवान श्री कृष्ण जी ने बतायाः-

न अहम् विदै न तपसा न दानेन् न च इज्जया।
शक्यम् अहम् विद्यौ प्रष्टुम् शक्यमान् असिमाम् यथा।।

भाव न मै वेदो के पढ़ने से न तप से न दान से और न यज्ञ के करने से जाना जा सकता हूँ। मैं देखने और जानने में समर्थ हूँ जैसा देखने वाले ने मुझे देखा है, उसी के द्वारा। भाव गुरु ही ज्ञान उजाला देकर यह अंधकार दूर करता है। हर युग में यह अंधेरा गुरु ने ही दुर किया। कबीर जी ने कहा हैः-

अल्लोह लख न जाए लखया, गुरु गुड़ दीना मीठा।

  •  आदि ग्रन्थ

कबीर जी कह रहे है कि जो लक्ष्य कठिन था वह लक्ष्य गुरु की कृपा से पुरा हुआ और मेरे सारे संशय समाप्त हो गए और मैने प्रभु परमात्मा को देख लिया है। आदि ग्रंथ में लिखा हैः-

ज्ञान अंजन गुरू दिया, अज्ञान अंधेर विनाष।
हर किरपा ते संत भेटेया, नानक मन प्रकाष।।

मुझे संत मिले जिनसे मिलकर मेरा अंधकार पूरा दूर हुआ और मेरे जीवन में उजाला हो गया। आज भी जिन्होनें इस लक्ष्य को प्राप्त कर लिया वो कह रहे हैः-

मैं बंदा हां बंदे वरगा, हस्ती नहीं कोई वख मिलि।
सत्गुरु बख्शी ज्ञान सलाई, वेखन वाली अख मिली।।

  • अवतार बाणी शब्द संख्या 5

अवतार बाणी में शहनशाह अवतार सिंह जी ने फरमाया कि मैं आम इंसानो के जैसा ही इंसान हुँ, कोई अलग हैसियत नहीं है। मुझे मेरे सत्गुरू ने ज्ञान देकर, मेरी आत्मा को रौशनी देकर, मुझे अंधकार से निकाल कर, प्रभु को देखने की दृष्टि बख्श दी। जो दिव्य को देखने की दिव्य दृष्टि हर युग में सत्गुरू देता है।

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