भारत: अनोखी मुहिम, जहाँ प्लास्टिक कचरा है शिक्षा पाने का टिकट

भारत के असम राज्य में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और अक्षर फाउण्डेशन ने मिलकर एक ऐसा अनूठा कार्यक्रम शुरू किया है, जिसके ज़रिये निर्धन परिवारों के बच्चे, स्कूली पढ़ाई का शुल्क के रूप में, प्लास्टिक कचरा री-सायक्लिंग के लिये देकर, निजी स्कूलों में गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे.  

दीपिका हेमरोम के माता-पिता प्लास्टिक के ज़रिये उसकी स्कूली पढ़ाई के शुल्क का भुगतान करते हैं. मास्टर कार्ड या वीज़ा कार्ड से नहीं बल्कि वास्तविक प्लास्टिक कचरे से.
वो भारत के असम राज्य में एक अभूतपूर्व योजना में भाग ले रहे हैं, जिसके तहत निम्न-आय वाले परिवार, निजी स्कूली शिक्षा के लिये धन के बदले, एकल-उपयोग प्लास्टिक का उपयोग कर सकते हैं. दीपिका के माता-पिता मज़दूर हैं और इस अनूठी भुगतान पद्धति के कारण, डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली उनकी 13 वर्षीय बेटी, अब एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकती है, जो पहले उसके परिवार की पहुँच से बाहर थी.
‘प्लास्टिक-फ़ॉर-स्कूलिंग कार्यक्रम’ अक्षर फाउण्डेशन द्वारा शुरू किया गया था और अब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) इसके साथ जुड़ गया है.
बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के साथ, यह माता-पिता द्वारा दिया गया प्लास्टिक कचरा, ईंटों में परिवर्तित करके, री-सायकलिंग को बढ़ावा देता है और प्रदूषण दूर करने में मदद करता है.
UNEP अपने Tide Turners Plastic Challenge के ज़रिये अक्षर फाउण्डेशन जैसी संस्थाओं के साथ काम करता है. इस वैश्विक पहल के तहत, युवाओं को एकल-उपयोग प्लास्टिक के पारिस्थितिक नुक़सान के बारे में शिक्षित किया जाता है और उन लोगों को पुरस्कृत किया जाता है जो कचरा साफ़ करने में मदद करते हैं. प्रतिभागियों को कार्यक्रम के विभिन्न स्तरों पर काम करने के अवसर मिलते हैं, और अपने काम के लिये पदक व प्रमाण पत्र मिलते हैं एवं अन्ततः उन्हें समुदाय का नेतृत्व करने में सक्षम बनाते हैं.
अक्षर फाउण्डेशन के संस्थापक, माज़िन मुख़्तार कहते हैं, “यूनेप द्वारा सम्पर्क किए जाने के बाद, जब हमें टाइड टर्नर के बारे में मालूम हुआ, तो हमने सोचा कि यह हमारे छात्रों के लिये एक वैश्विक कार्रवाई में शामिल होने का उचित अवसर है. हमें यह भी अच्छा लगा कि इसके एवज़ में छात्रों को यूनेप का प्रमाणपत्र मिलेगा, जो कॉलेजों में आवेदन के दौरान उनके काम आएगा.”
यूनेप के उप कार्यकारी निदेशक, जॉयस मसूया ने कहा, “प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के प्रयासों में युवाओं को शामिल करना महत्वपूर्ण है. टाइड टर्नर, युवाओं को उनके समुदायों का नेतृत्व करने के लिये प्रोत्साहित करते हुए समस्या को समझने और उसका हल निकालने में मदद करता है.”
एक वैश्विक समस्या
दुनिया भर में इंसानी गतिविधियों के कारण, हर साल 30 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से लगभग 80 लाख टन महासागर में जा गिरता है. पिछले 50 वर्षों में, प्लास्टिक उत्पादन 22 गुना से अधिक बढ़ गया है. 
फिर भी 2015 में, केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक री-सायकल किया गया था. टाइड टर्नर्स, प्लास्टिक के इसी बढ़ते ज्वार पर अंकुश लगाने में मदद कर रहे हैं.
विश्व स्तर पर, टाइड टर्नर 28 देशों में, 3 लाख 60 हज़ार से अधिक युवाओं तक पहुँच चुके हैं, जिनमें भारत के 1 लाख 5 हज़ार युवा शामिल हैं. 
भारत में यूनेप की अभियान समन्वयक, गायत्री राघव कहती हैं, “हमारे पास व्यक्तियों, स्कूलों, क्लबों और प्लास्टिक प्रदूषण अभियानों से, टाइड टर्नर चुनौती में शामिल होने के असंख्य अनुरोध आए हैं.”

Hrishikesh Mehdi / Akshar Foundation, Indiaहर सप्ताह छात्र, प्लास्टिक के कचरे के रूप में अपनी स्कूल फीस लेकर आते हैं.

टाइड टर्नर दुनिया की पर्यावरणीय समस्याओं को दूर करने में युवाओं को शामिल करने के लिये डिज़ायन किये गए अनेक यूनेप कार्यक्रमों में से एक है. 
अक्षर फाउण्डेशन अब इसका विस्तार करने में लगा है और उन्होंने हाल ही में असम सरकार के साथ पाँच सरकारी स्कूलों में “अक्षर शिक्षा मॉडल” को लागू करने के लिये एक समझौता किया है. यह मॉडल, पूरे प्रदेश में लागू करने के लिये एक पायलट के रूप में काम करेगा. 
माज़िन मुख़्तार कहते हैं, “सरकार ने हमें इन स्कूलों में अपनी प्लास्टिक स्कूल फ़ीस नीति लागू करने के लिये अधिकृत किया है. इसके लिये, घरेलू प्लास्टिक को जमा करना अनिवार्य है, साथ ही प्रत्येक स्कूल में प्लास्टिक री-सायकलिंग केंद्र भी शुरू किये गए हैं.”
जॉयस मसूया कहते हैं, “टाइड टर्नर जैसे अभियान युवा लोगों तक पहुँचने का एक शानदार तरीक़ा हो सकता है, लेकिन वास्तव में जब इस तरह के अभियान कई गुना बढ़ जाते हैं और सरकारें समाधान योजना और प्लास्टिक बैग प्रतिबन्ध जैसे समाधानों में संसाधन निवेश करती हैं, तब इसके सच्चे मायने सामने आते हैं.”
गोलाकार अर्थव्यवस्थाएँ
लम्बी अवधि में, एक गोलाकार अर्थव्यवस्था विकसित करके ही प्लास्टिक कचरे का समाधान सम्भव है, जहाँ सब कुछ री-सायकल या पुन: उपयोग किया जा सके. यूनेप वृत्ताकार मंच, वृत्ताकार अवधारणा, इसके दायरे और यह कैसे स्थायी उपभोग और उत्पादन श्रृंखला को बढ़ावा देने में योगदान देता है, इसे समझने में मदद देता है. यह संसाधनों की एक विस्तृत श्रृंखला भी प्रस्तुत करता है और ऐसी कहानियाँ दिखाता है जिनमें विभिन्न हितधारकों द्वारा परिपत्र दृष्टिकोण सफलतापूर्वक अपनाने का उल्लेख हो.
जॉयस मसूया ने कहा, “सतत विकास लक्ष्यों से लेकर, पेरिस समझौते और 2020 के बाद के वैश्विक जैव विविधता ढाँचे तक, हर बहुपक्षीय समझौते की सफलता के लिये, परिपत्रता व टिकाऊ उत्पादन एवं उपभोग आवश्यक हैं. गोलाकार अर्थव्यवस्था, महामारी के बाद हरित पुनर्बहाली का पथ प्रदर्शित करने में भी सहायक होगी.”
(टाइड टर्नर, यूनेप के स्वच्छ समुद्र अभियान का हिस्सा है, जो दुनिया के 60 प्रतिशत से अधिक समुद्री तटों पर, समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिये प्रतिबद्ध, दुनिया का सबसे बड़ा वैश्विक गठबन्धन है. भारत में इसे वर्ल्ड वाइड फण्ड फॉर नेचर इण्डिया, भारत के पर्यावरण शिक्षा केन्द्र और भारतीय पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा समर्थन प्राप्त है).
यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ था – https://www.unep.org/news-and-stories/story/can-plastic-bottle-be-ticket-education-india-yes
 , भारत के असम राज्य में, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और अक्षर फाउण्डेशन ने मिलकर एक ऐसा अनूठा कार्यक्रम शुरू किया है, जिसके ज़रिये निर्धन परिवारों के बच्चे, स्कूली पढ़ाई का शुल्क के रूप में, प्लास्टिक कचरा री-सायक्लिंग के लिये देकर, निजी स्कूलों में गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे.  

दीपिका हेमरोम के माता-पिता प्लास्टिक के ज़रिये उसकी स्कूली पढ़ाई के शुल्क का भुगतान करते हैं. मास्टर कार्ड या वीज़ा कार्ड से नहीं बल्कि वास्तविक प्लास्टिक कचरे से.

वो भारत के असम राज्य में एक अभूतपूर्व योजना में भाग ले रहे हैं, जिसके तहत निम्न-आय वाले परिवार, निजी स्कूली शिक्षा के लिये धन के बदले, एकल-उपयोग प्लास्टिक का उपयोग कर सकते हैं. दीपिका के माता-पिता मज़दूर हैं और इस अनूठी भुगतान पद्धति के कारण, डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली उनकी 13 वर्षीय बेटी, अब एक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकती है, जो पहले उसके परिवार की पहुँच से बाहर थी.

‘प्लास्टिक-फ़ॉर-स्कूलिंग कार्यक्रम’ अक्षर फाउण्डेशन द्वारा शुरू किया गया था और अब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) इसके साथ जुड़ गया है.

बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के साथ, यह माता-पिता द्वारा दिया गया प्लास्टिक कचरा, ईंटों में परिवर्तित करके, री-सायकलिंग को बढ़ावा देता है और प्रदूषण दूर करने में मदद करता है.

UNEP अपने Tide Turners Plastic Challenge के ज़रिये अक्षर फाउण्डेशन जैसी संस्थाओं के साथ काम करता है. इस वैश्विक पहल के तहत, युवाओं को एकल-उपयोग प्लास्टिक के पारिस्थितिक नुक़सान के बारे में शिक्षित किया जाता है और उन लोगों को पुरस्कृत किया जाता है जो कचरा साफ़ करने में मदद करते हैं. प्रतिभागियों को कार्यक्रम के विभिन्न स्तरों पर काम करने के अवसर मिलते हैं, और अपने काम के लिये पदक व प्रमाण पत्र मिलते हैं एवं अन्ततः उन्हें समुदाय का नेतृत्व करने में सक्षम बनाते हैं.

अक्षर फाउण्डेशन के संस्थापक, माज़िन मुख़्तार कहते हैं, “यूनेप द्वारा सम्पर्क किए जाने के बाद, जब हमें टाइड टर्नर के बारे में मालूम हुआ, तो हमने सोचा कि यह हमारे छात्रों के लिये एक वैश्विक कार्रवाई में शामिल होने का उचित अवसर है. हमें यह भी अच्छा लगा कि इसके एवज़ में छात्रों को यूनेप का प्रमाणपत्र मिलेगा, जो कॉलेजों में आवेदन के दौरान उनके काम आएगा.”

यूनेप के उप कार्यकारी निदेशक, जॉयस मसूया ने कहा, “प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के प्रयासों में युवाओं को शामिल करना महत्वपूर्ण है. टाइड टर्नर, युवाओं को उनके समुदायों का नेतृत्व करने के लिये प्रोत्साहित करते हुए समस्या को समझने और उसका हल निकालने में मदद करता है.”

एक वैश्विक समस्या

दुनिया भर में इंसानी गतिविधियों के कारण, हर साल 30 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जिसमें से लगभग 80 लाख टन महासागर में जा गिरता है. पिछले 50 वर्षों में, प्लास्टिक उत्पादन 22 गुना से अधिक बढ़ गया है. 

फिर भी 2015 में, केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक री-सायकल किया गया था. टाइड टर्नर्स, प्लास्टिक के इसी बढ़ते ज्वार पर अंकुश लगाने में मदद कर रहे हैं.
विश्व स्तर पर, टाइड टर्नर 28 देशों में, 3 लाख 60 हज़ार से अधिक युवाओं तक पहुँच चुके हैं, जिनमें भारत के 1 लाख 5 हज़ार युवा शामिल हैं. 

भारत में यूनेप की अभियान समन्वयक, गायत्री राघव कहती हैं, “हमारे पास व्यक्तियों, स्कूलों, क्लबों और प्लास्टिक प्रदूषण अभियानों से, टाइड टर्नर चुनौती में शामिल होने के असंख्य अनुरोध आए हैं.”


Hrishikesh Mehdi / Akshar Foundation, India
हर सप्ताह छात्र, प्लास्टिक के कचरे के रूप में अपनी स्कूल फीस लेकर आते हैं.

टाइड टर्नर दुनिया की पर्यावरणीय समस्याओं को दूर करने में युवाओं को शामिल करने के लिये डिज़ायन किये गए अनेक यूनेप कार्यक्रमों में से एक है. 

अक्षर फाउण्डेशन अब इसका विस्तार करने में लगा है और उन्होंने हाल ही में असम सरकार के साथ पाँच सरकारी स्कूलों में “अक्षर शिक्षा मॉडल” को लागू करने के लिये एक समझौता किया है. यह मॉडल, पूरे प्रदेश में लागू करने के लिये एक पायलट के रूप में काम करेगा. 

माज़िन मुख़्तार कहते हैं, “सरकार ने हमें इन स्कूलों में अपनी प्लास्टिक स्कूल फ़ीस नीति लागू करने के लिये अधिकृत किया है. इसके लिये, घरेलू प्लास्टिक को जमा करना अनिवार्य है, साथ ही प्रत्येक स्कूल में प्लास्टिक री-सायकलिंग केंद्र भी शुरू किये गए हैं.”

जॉयस मसूया कहते हैं, “टाइड टर्नर जैसे अभियान युवा लोगों तक पहुँचने का एक शानदार तरीक़ा हो सकता है, लेकिन वास्तव में जब इस तरह के अभियान कई गुना बढ़ जाते हैं और सरकारें समाधान योजना और प्लास्टिक बैग प्रतिबन्ध जैसे समाधानों में संसाधन निवेश करती हैं, तब इसके सच्चे मायने सामने आते हैं.”

गोलाकार अर्थव्यवस्थाएँ

लम्बी अवधि में, एक गोलाकार अर्थव्यवस्था विकसित करके ही प्लास्टिक कचरे का समाधान सम्भव है, जहाँ सब कुछ री-सायकल या पुन: उपयोग किया जा सके. यूनेप वृत्ताकार मंच, वृत्ताकार अवधारणा, इसके दायरे और यह कैसे स्थायी उपभोग और उत्पादन श्रृंखला को बढ़ावा देने में योगदान देता है, इसे समझने में मदद देता है. यह संसाधनों की एक विस्तृत श्रृंखला भी प्रस्तुत करता है और ऐसी कहानियाँ दिखाता है जिनमें विभिन्न हितधारकों द्वारा परिपत्र दृष्टिकोण सफलतापूर्वक अपनाने का उल्लेख हो.

जॉयस मसूया ने कहा, “सतत विकास लक्ष्यों से लेकर, पेरिस समझौते और 2020 के बाद के वैश्विक जैव विविधता ढाँचे तक, हर बहुपक्षीय समझौते की सफलता के लिये, परिपत्रता व टिकाऊ उत्पादन एवं उपभोग आवश्यक हैं. गोलाकार अर्थव्यवस्था, महामारी के बाद हरित पुनर्बहाली का पथ प्रदर्शित करने में भी सहायक होगी.”

(टाइड टर्नर, यूनेप के स्वच्छ समुद्र अभियान का हिस्सा है, जो दुनिया के 60 प्रतिशत से अधिक समुद्री तटों पर, समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिये प्रतिबद्ध, दुनिया का सबसे बड़ा वैश्विक गठबन्धन है. भारत में इसे वर्ल्ड वाइड फण्ड फॉर नेचर इण्डिया, भारत के पर्यावरण शिक्षा केन्द्र और भारतीय पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा समर्थन प्राप्त है).

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ था – https://www.unep.org/news-and-stories/story/can-plastic-bottle-be-ticket-education-india-yes
 

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