भारत: ग्रामीण महिलाओं का डिजिटल सशक्तिकरण

भारत में विश्व बैंक के वित्त पोषण से स्व-नियोजित महिला संघ (SEWA), ग्रामीण महिलाओं को डिजिटल तकनीक में प्रशिक्षित करने की कोशिशों में सक्रिय है. कोविड-19 महामारी के दौरान इसी परियोजना ने महिला कारीगरों के जीवन में व्यवधान नहीं उत्पन्न होने दिया है.

जब भारत में कोविड-19 महामारी के कारण तालाबन्दी की घोषणा की गई, तो गुजरात के आणन्द ज़िले की मुसकान बेन वोहरा समेत सभी महिला बुनकर चिन्ता में पड़ गई थीं.
20 वर्षीया इस महिला ने अपने गाँव फ़ोन करके, वीडियो कॉल पर चिन्ता जताते हुए कहा, “मैं अपने परिवार के आठ सदस्यों का पालन-पोषण करती हूँ, हमारा काम अचानक ठप हो गया है. अब हम कैसे गुज़र-बसर करेंगे? ”
उससे ठीक पहले, सौभाग्य से, मुसकान बेन और उनके समूह को स्व-नियोजित महिला संघ (सेवा) ने डिजिटल कौशल का प्रशिक्षण दिया था.
यह सदस्यता-आधारित एक संगठन है जो अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के जीवन और आजीविका में सुधार के लिये काम करता है, जिनमें दर्ज़ी, कारीगर, विक्रेता और छोटे किसान शामिल हैं.
प्रशिक्षण प्राप्त, यह समूह जल्द ही ग्राहकों के व्हाट्सएप समूह बनाकर, अपने उत्पादों की तस्वीरें ऑनलाइन साझा करने और ख़रीदारी के लिये डिजिटल भुगतान करने में सक्षम हो गया था.
मुस्कान बेन ने गर्व के साथ बताया, “न केवल हम अपने काम को बिना व्यवधान जारी रखने में सक्षम हुए, बल्कि घरेलू सज्जा के सामान का हमारा सारा भण्डार भी आसानी से बिक गया.”
SEWA के निदेशक, रीमा नानावती बताते हैं, “लीलावती परियोजना की परख सही समय पर हुई. जब हमने पहली बार इसे शुरू किया था, तो पारम्परिक व्यवसायों पर भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और अन्य आर्थिक परिवर्तनों का असर पड़ रहा था. लेकिन हमने यह नहीं सोचा था कि इस प्रशिक्षण से महामारी के दौरान इतनी मदद मिलेगी.”
डिजिटल अवसर की नवीन दुनिया से परिचय
प्रशिक्षण से मुस्कानबेन और अन्य कारीगरों को, जहाँ, फेसबुक और इंस्टाग्राम के माध्यम से अपने ग्राहक बढ़ाने में मदद मिली, वहीं, अधिकतर महिलाओं ने महामारी के दौरान ऑनलाइन लेन-देन भी सीख लिया.
अब उनमें से बहुत सी महिलाएँ, लोगों से मिलकर, नक़द राशि लेन-देने से उपजे संक्रमण के ख़तरे से दूर रहते हुए, पेटीएम, BHIM ऐप और Google पे के माध्यम से डिजिटल भुगतान करती हैं.

Self Employed Women’s Association (SEWA)भारत के, गुजरात प्रदेश के, पाटन ज़िले में, पारम्परिक कढ़ाई करती महिला कारीगर.

मिताली प्रजापति के पिता अहमदाबाद ज़िले में एक बर्तन की दुकान चलाते हैं. वो महामारी के शुरुआती दिनों की कठिनाइयों को याद करते हुए बताती हैं,  “हमारा व्यवसाय ठप हो गया क्योंकि मेरे पिता अब अपने आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान करने के लिये अन्य गाँव नहीं जा सकते थे.”
“प्रशिक्षण ने मेरे अन्दर ऑनलाइन लेन-देन से रक़म खोने के डर से उबरने में मदद की और अब मैं उनके लिये आसानी से यह भुगतान डिजिटल तरीक़े से करती हूँ.”
गुजरात के कच्छ ज़िले की जयश्री घरोदा ने अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल, बातचीत करने के अलावा, कभी किसी अन्य काम के लिये नहीं किया. अपने पति के 14-सदस्यीय बड़े परिवार के साथ रहने वाली यह 30 वर्षीया युवती, अब घर के सभी बिलों का भुगतान ऑनलाइन करती है.
जयश्री कहती हैं, “परिवार में इससे पहले, केवल पुरुषों के पास ही स्मार्टफोन थे. लेकिन जब मेरे पति ने देखा कि मैं क्या-कुछ कर सकती हूँ, तो उन्होंने मुझे एक स्मार्टफोन ख़रीद कर दिया. अब, मैं प्लेस्टोर से ऐप डाउनलोड करती हूँ और घरेलू सजावट का पारम्परिक सामान बनाने के नए तरीक़े सीखने के लिये, यू-ट्यूब (YouTube) पर वीडियो देखती हूँ, जिससे मेरी आमदनी बढ़ी है.”
‘सेवा’ के नैटवर्क के दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाक़ों में पहुँचने से, देश के अन्य भागों में भी महिलाओं के सशक्तिकरण की नई भावना की गूँज सुनाई देने लगी है.
राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले की 35 वर्षीय रितिका कुमारी, अपने पारम्परिक राजपूत समुदाय के रीति-रिवाज़ों के कारण, शायद ही कभी घर से बाहर निकली हों.
दो बच्चों की माँ, रितिका बताती हैं, “मैं अपने पति के परिवार के पुरुषों के सामने, हमेशा अपना चेहरा घूँघट से ढकती हूँ. 2014 में SEWA में शामिल होने के बाद ही मुझे अपनी पंचायत और ग्राम सभा की बैठकों में बोलने का आत्मविश्वास मिला.
रितिका कुमारी को, उनके नव-अर्जित डिजिटल कौशल ने और अधिक आत्मनिर्भर बना दिया है. वो कहती हैं, “अब मुझे किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ता क्योंकि अब मैं सभी घरेलू आपूर्ति का सामान ऑनलाइन ख़रीद सकती हूँ. जोधपुर और अहमदाबाद के सुदूर इलाक़ों का दौरा करते समय मैंने, Google मानचित्र का उपयोग करना भी सीख लिया.”
कठिन समय में लोगों की मदद के लिये तैयार
यही नहीं, SEWA, अपने सदस्यों को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से जोड़कर, ज़मीनी स्तर की समस्याओं को बेहतर समझने में सफल रहा है.
मिसाल के तौर पर, जब ग्रामीण परिवारों को किराने का आम सामान मिलना मुश्किल हो गया, तो SEWA ने उन्हें उचित मूल्य पर ज़रूरी सामान मुहैया कराने के लिये कृषि-उत्पादन आपूर्ति श्रृँखला के साथ जोड़ा.
आज भी, ज़मीनी स्तर पर कार्य करने वाले SEWA के कार्यकर्ता और समन्वयक, वर्चुअल तौर पर लगभग हर हफ़्ते बैठकें करते हैं – फिर चाहे वो घरों में हों, खेतों में, या फिर घर से बाहर गाँवों में हों.
गुजरात के सुरेंद्रनगर ज़िले के हेनाबेन दवे बताते हैं, “हम तालाबन्दी के दौरान बैठकें नहीं पा रहे थे. लेकिन इन वर्चुअल बैठकों की बदौलत, अब, हम कम से कम एक-दूसरे को देखने और अपनी समस्याओं पर बात करने में सक्षम हो सके. इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ा क्योंकि हमें लगा कि एक संगठन है जो इस कठिन समय में हमारी मदद के लिये मौजूद है.”
भारत के लिये विश्व बैंक के डायरेक्टर, जुनैद अहमद ने कहा, “डिजिटल वित्तीय समावेशन, कोविड-19 महामारी से पहले भी भारत के लिये एक विकास प्राथमिकता थी. अब, यह बिल्कुल ज़रूरी हो गया है.” 
उन्होंने कहा, “इस कार्यक्रम के माध्यम से, हमारा प्रयास ग़रीब ग्रामीण महिलाओं के लिये आजीविका के नए अवसर पैदा करने, महिलाओं के नेतृत्व वाली उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और कार्यबल में महिलाओं के अधिक से अधिक समावेश की दिशा में एक राष्ट्रीय बदलाव को गति देने का रहा है.”, भारत में विश्व बैंक के वित्त पोषण से स्व-नियोजित महिला संघ (SEWA), ग्रामीण महिलाओं को डिजिटल तकनीक में प्रशिक्षित करने की कोशिशों में सक्रिय है. कोविड-19 महामारी के दौरान इसी परियोजना ने महिला कारीगरों के जीवन में व्यवधान नहीं उत्पन्न होने दिया है.

जब भारत में कोविड-19 महामारी के कारण तालाबन्दी की घोषणा की गई, तो गुजरात के आणन्द ज़िले की मुसकान बेन वोहरा समेत सभी महिला बुनकर चिन्ता में पड़ गई थीं.

20 वर्षीया इस महिला ने अपने गाँव फ़ोन करके, वीडियो कॉल पर चिन्ता जताते हुए कहा, “मैं अपने परिवार के आठ सदस्यों का पालन-पोषण करती हूँ, हमारा काम अचानक ठप हो गया है. अब हम कैसे गुज़र-बसर करेंगे? ”

उससे ठीक पहले, सौभाग्य से, मुसकान बेन और उनके समूह को स्व-नियोजित महिला संघ (सेवा) ने डिजिटल कौशल का प्रशिक्षण दिया था.

यह सदस्यता-आधारित एक संगठन है जो अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के जीवन और आजीविका में सुधार के लिये काम करता है, जिनमें दर्ज़ी, कारीगर, विक्रेता और छोटे किसान शामिल हैं.

प्रशिक्षण प्राप्त, यह समूह जल्द ही ग्राहकों के व्हाट्सएप समूह बनाकर, अपने उत्पादों की तस्वीरें ऑनलाइन साझा करने और ख़रीदारी के लिये डिजिटल भुगतान करने में सक्षम हो गया था.

मुस्कान बेन ने गर्व के साथ बताया, “न केवल हम अपने काम को बिना व्यवधान जारी रखने में सक्षम हुए, बल्कि घरेलू सज्जा के सामान का हमारा सारा भण्डार भी आसानी से बिक गया.”

SEWA के निदेशक, रीमा नानावती बताते हैं, “लीलावती परियोजना की परख सही समय पर हुई. जब हमने पहली बार इसे शुरू किया था, तो पारम्परिक व्यवसायों पर भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और अन्य आर्थिक परिवर्तनों का असर पड़ रहा था. लेकिन हमने यह नहीं सोचा था कि इस प्रशिक्षण से महामारी के दौरान इतनी मदद मिलेगी.”

डिजिटल अवसर की नवीन दुनिया से परिचय

प्रशिक्षण से मुस्कानबेन और अन्य कारीगरों को, जहाँ, फेसबुक और इंस्टाग्राम के माध्यम से अपने ग्राहक बढ़ाने में मदद मिली, वहीं, अधिकतर महिलाओं ने महामारी के दौरान ऑनलाइन लेन-देन भी सीख लिया.

अब उनमें से बहुत सी महिलाएँ, लोगों से मिलकर, नक़द राशि लेन-देने से उपजे संक्रमण के ख़तरे से दूर रहते हुए, पेटीएम, BHIM ऐप और Google पे के माध्यम से डिजिटल भुगतान करती हैं.


Self Employed Women’s Association (SEWA)
भारत के, गुजरात प्रदेश के, पाटन ज़िले में, पारम्परिक कढ़ाई करती महिला कारीगर.

मिताली प्रजापति के पिता अहमदाबाद ज़िले में एक बर्तन की दुकान चलाते हैं. वो महामारी के शुरुआती दिनों की कठिनाइयों को याद करते हुए बताती हैं,  “हमारा व्यवसाय ठप हो गया क्योंकि मेरे पिता अब अपने आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान करने के लिये अन्य गाँव नहीं जा सकते थे.”

“प्रशिक्षण ने मेरे अन्दर ऑनलाइन लेन-देन से रक़म खोने के डर से उबरने में मदद की और अब मैं उनके लिये आसानी से यह भुगतान डिजिटल तरीक़े से करती हूँ.”

गुजरात के कच्छ ज़िले की जयश्री घरोदा ने अपने मोबाइल फोन का इस्तेमाल, बातचीत करने के अलावा, कभी किसी अन्य काम के लिये नहीं किया. अपने पति के 14-सदस्यीय बड़े परिवार के साथ रहने वाली यह 30 वर्षीया युवती, अब घर के सभी बिलों का भुगतान ऑनलाइन करती है.

जयश्री कहती हैं, “परिवार में इससे पहले, केवल पुरुषों के पास ही स्मार्टफोन थे. लेकिन जब मेरे पति ने देखा कि मैं क्या-कुछ कर सकती हूँ, तो उन्होंने मुझे एक स्मार्टफोन ख़रीद कर दिया. अब, मैं प्लेस्टोर से ऐप डाउनलोड करती हूँ और घरेलू सजावट का पारम्परिक सामान बनाने के नए तरीक़े सीखने के लिये, यू-ट्यूब (YouTube) पर वीडियो देखती हूँ, जिससे मेरी आमदनी बढ़ी है.”

‘सेवा’ के नैटवर्क के दूर-दराज़ के ग्रामीण इलाक़ों में पहुँचने से, देश के अन्य भागों में भी महिलाओं के सशक्तिकरण की नई भावना की गूँज सुनाई देने लगी है.

राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले की 35 वर्षीय रितिका कुमारी, अपने पारम्परिक राजपूत समुदाय के रीति-रिवाज़ों के कारण, शायद ही कभी घर से बाहर निकली हों.

दो बच्चों की माँ, रितिका बताती हैं, “मैं अपने पति के परिवार के पुरुषों के सामने, हमेशा अपना चेहरा घूँघट से ढकती हूँ. 2014 में SEWA में शामिल होने के बाद ही मुझे अपनी पंचायत और ग्राम सभा की बैठकों में बोलने का आत्मविश्वास मिला.

रितिका कुमारी को, उनके नव-अर्जित डिजिटल कौशल ने और अधिक आत्मनिर्भर बना दिया है. वो कहती हैं, “अब मुझे किसी पर निर्भर नहीं होना पड़ता क्योंकि अब मैं सभी घरेलू आपूर्ति का सामान ऑनलाइन ख़रीद सकती हूँ. जोधपुर और अहमदाबाद के सुदूर इलाक़ों का दौरा करते समय मैंने, Google मानचित्र का उपयोग करना भी सीख लिया.”

कठिन समय में लोगों की मदद के लिये तैयार

यही नहीं, SEWA, अपने सदस्यों को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के माध्यम से जोड़कर, ज़मीनी स्तर की समस्याओं को बेहतर समझने में सफल रहा है.

मिसाल के तौर पर, जब ग्रामीण परिवारों को किराने का आम सामान मिलना मुश्किल हो गया, तो SEWA ने उन्हें उचित मूल्य पर ज़रूरी सामान मुहैया कराने के लिये कृषि-उत्पादन आपूर्ति श्रृँखला के साथ जोड़ा.

आज भी, ज़मीनी स्तर पर कार्य करने वाले SEWA के कार्यकर्ता और समन्वयक, वर्चुअल तौर पर लगभग हर हफ़्ते बैठकें करते हैं – फिर चाहे वो घरों में हों, खेतों में, या फिर घर से बाहर गाँवों में हों.

गुजरात के सुरेंद्रनगर ज़िले के हेनाबेन दवे बताते हैं, “हम तालाबन्दी के दौरान बैठकें नहीं पा रहे थे. लेकिन इन वर्चुअल बैठकों की बदौलत, अब, हम कम से कम एक-दूसरे को देखने और अपनी समस्याओं पर बात करने में सक्षम हो सके. इससे हमारा आत्मविश्वास बढ़ा क्योंकि हमें लगा कि एक संगठन है जो इस कठिन समय में हमारी मदद के लिये मौजूद है.”

भारत के लिये विश्व बैंक के डायरेक्टर, जुनैद अहमद ने कहा, “डिजिटल वित्तीय समावेशन, कोविड-19 महामारी से पहले भी भारत के लिये एक विकास प्राथमिकता थी. अब, यह बिल्कुल ज़रूरी हो गया है.” 

उन्होंने कहा, “इस कार्यक्रम के माध्यम से, हमारा प्रयास ग़रीब ग्रामीण महिलाओं के लिये आजीविका के नए अवसर पैदा करने, महिलाओं के नेतृत्व वाली उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और कार्यबल में महिलाओं के अधिक से अधिक समावेश की दिशा में एक राष्ट्रीय बदलाव को गति देने का रहा है.”

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