भारत में बेकार जा रहे पानी की री-सायकलिंग

भारत के चेन्नई शहर में जल की कमी की समस्या का समाधान तलाश करने के लिये, विश्व बैंक की सहायता से अपशिष्ट जल की री-सायकलिंग की जा रही है. चेन्नई, पानी की री-सायकलिंग करने वाला भारत का पहला शहर है.  भारत में विश्व बैंक के सीनियर म्यूनिसिपल इंजीनियर, पूनम अहलूवालिया और सीनियर इन्फ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ रघु केसवन का ब्लॉग.

दुनिया भर में, जल आपूर्ति की चुनौतियाँ अधिक जटिल होती जा रही हैं. लेकिन शायद यह कल्पना करना कठिन नहीं होगा कि जो शहर बाढ़ आने के लिये मशहूर हो, वहाँ पानी का संकट भी पैदा हो सकता है.
चेन्नई में, 2019 में, भारी बाढ़ आने से कामकाज ठप हो गया था. लेकिन उसके केवल चार साल बाद ही, दक्षिण भारत के इस महानगर में पानी की भारी कमी हो गई और अधिकारियों को वहाँ “डे ज़ीरो” घोषित करना पड़ा.
लगभग न्यूयॉर्क के आकार वाले इस शहर – चेन्नई को बचाने के लिये, लगभग 200 किलोमीटर दूर से ट्रेन से पानी लाया गया.
तब से ही, चेन्नई के जल संकट के बारे में गहन सोच-विचार किया गया है. फिर, सिंगापुर की एक पहल से प्रेरणा लेते हुए, चेन्नई में उद्योगों की ग़ैर-पेयजल ज़रूरतों को पूरा करने के लिये, बड़े पैमाने पर अपशिष्ट जल को री-सायकल करना शुरू किया गया है.
2019 के अन्त में शुरू किये गए, इसके दो तृतीयक उपचार रिवर्स ऑस्मोसिस (TTRO) संयन्त्र, भारत में इस तरह के, और इस पैमाने की पहली सुविधाएँ हैं.

UNICEF/Patrick Brownम्याँमार के काचीन प्रान्त में, एक 12 वर्षीय बच्चा, अपने परिवार के लिये , बाल्टी में पानी भर कर ले जाता हुआ. पानी एक बेशक़ीमती प्राकृतिक संसाधन है जिसका सही इस्तेमाल बेहद ज़रूरी है.

एक बार जब ये संयन्त्र, प्रत्येक दिन साढ़े चार करोड़ लीटर (एमएलडी) की अपनी पूरी क्षमता पर पहुँचेंगे, तो वे चेन्नई के सीवेज के लगभग 20 प्रतिशत पानी को री-सायकल करने में सक्षम होंगे, जिससे शहर में ताज़े पानी की खपत कम हो सकेगी.
कोडुंगैयुर और कोयम्बेडु के संयंन्त्र, चेन्नई के उत्तरी बेल्ट और श्रीपेरुम्बुदूर, ओरागडम और वल्लमवदगल के पड़ोसी क्षेत्रों के उद्योगों को जल की आपूर्ति करेंगे.
यहाँ के उद्योगों को सीवेज ट्रीटमेंट संयन्त्रों से पानी मिलेगा, जिसे तब तक शुद्ध किया जाता है, जब तक वह उसी गुणवत्ता वाला न हो जाए, जैसा पारम्परिक रूप से उन्हें दिया जाता रहा है. 
फिर आश्चर्य नहीं कि इस अग्रणी पहल को अनेक वैश्विक और राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं, जिनमें ग्लोबल वॉटर अवार्ड, और हुडको का 2019 का उत्कृष्ट उदाहरण पुरस्कार भी शामिल है, जो जीवन बेहतर बनाने और शहरों में लचीलापन बढ़ाने के लिये दिया जाता है.
कोडुंगैयुर संयन्त्र को विश्व बैंक और केन्द्र व राज्य सरकारों से सह-वित्तपोषण मिला था. इस संयन्त्र का निर्माण शुरू होने के तुरन्त बाद, राज्य सरकार ने कोआंबेडु में दूसरे संयन्त्र पर भी काम शुरू किया.
चेन्नई की बिगड़ती जल स्थिति
परम्परागत रूप से, भारत में सबसे अधिक वार्षिक वर्षा होने वाला, 90 लाख की आबादी का यह शहर, मानसून की बारिश से आपूर्ति पाने वाली चार प्रमुख झीलों से पानी लेता है. लेकिन, जबकि चेन्नई को हर साल लगभग 1200 MLD पानी की आवश्यकता होती है, इन झीलों से, साल भर में केवल 500 से 800 MLD की आपूर्ति सम्भव है, और वो भी वर्षा की मात्रा पर निर्भर होती है.
पानी की मांग की तुलना में, आपूर्ति कम होने के कारण, शहर को अपनी जल ज़रूरतें पूरी करने के लिये, अन्य स्रोतों की ओर रुख़ करना पड़ता है, जैसे कि क़ीमती भूजल निकालने या पानी को ज़्यादा लागत वाले तरीक़ों से डीसैलीनेट करके.
ऐसे में, पानी का पुनर्नवीनीकरण, शहर के लिये एक नया, अधिक स्थायी जल स्रोत जोड़ता है – जो ताज़े व खारे पानी – दोनों की बचत करता है, हमेशा उपलब्ध रहता है और हर साल अलग-अलग पैमाने पर होने वाली वर्षा के जल की तुलना में अधिक विश्वसनीय होता है.
बल्कि, अन्ना विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने गणना की है कि 2050 तक, चेन्नई अपनी जल आवश्यकता का 50 प्रतिशत तक, री-सायकलिंग और अपने सीवेज के पानी के पुन: उपयोग से पूरा कर सकता है. जैसा कि सिंगापुर की उदाहरणीय जल उपयोगिता के मुख्य कार्यकारी, एनजी जू ही कहते हैं, “जल एक अन्तहीन, पुन: उपयोग योग्य संसाधन है और इसे बार-बार री-सायकिल किया जा सकता है.”
स्थायी जल संसाधनों का संवर्धन 
अधिकतर भारतीय शहरों के लिये, जल उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन रही है. वर्ष 2018 में, भारत सरकार के नीति आयोग की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि देश अपने इतिहास के सबसे बड़े जल संकट का सामना कर रहा है ,और 60 करोड़ लोग – यानि देश की आबादी का लगभग आधा हिस्सा – पानी की अत्यधिक कमी से जूझ रहा है.
जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ता है, जल संसाधन कम होते जाते हैं और वर्षा अधिक अप्रत्याशित हो जाती है. ऐसे में, प्रत्येक शहर को अपनी भौगोलिक, भूवैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के आधार पर, अपनी जल आपूर्ति बढ़ाने के लिये कई प्रकार के विकल्प तलाशने होंगे.
नागरिकों की बढ़ती मांग पूरा करना, बेकार जा रहे पानी के नुक़सान को कम करना और मूल्यवान भूजल संसाधनों का संरक्षण करना – सभी ऐसे आवश्यक उपाय हैं जिन पर प्रत्येक शहर को तत्काल काम करने की ज़रूरत होगी.
चेन्नई को भी इन मुद्दों का सामना  करने और अपने जलाशयों व झीलों के पुनर्वास और विस्तार करके, हालात दुरुस्त करने की आवश्यकता होगी, ताकि अधिक से अधिक पानी का भण्डारण हो सके.
तभी हम आने वाली पीढ़ियों को आश्वस्त कर सकते हैं कि आज अपनाए गए उपायों पर, मानव कल्याण और ग्रह की स्थिरता, दोनों को ध्यान में रखते हुए, सावधानीपूर्वक विचार के बाद ही, अमल किया गया है., भारत के चेन्नई शहर में जल की कमी की समस्या का समाधान तलाश करने के लिये, विश्व बैंक की सहायता से अपशिष्ट जल की री-सायकलिंग की जा रही है. चेन्नई, पानी की री-सायकलिंग करने वाला भारत का पहला शहर है.  भारत में विश्व बैंक के सीनियर म्यूनिसिपल इंजीनियर, पूनम अहलूवालिया और सीनियर इन्फ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ रघु केसवन का ब्लॉग.

दुनिया भर में, जल आपूर्ति की चुनौतियाँ अधिक जटिल होती जा रही हैं. लेकिन शायद यह कल्पना करना कठिन नहीं होगा कि जो शहर बाढ़ आने के लिये मशहूर हो, वहाँ पानी का संकट भी पैदा हो सकता है.

चेन्नई में, 2019 में, भारी बाढ़ आने से कामकाज ठप हो गया था. लेकिन उसके केवल चार साल बाद ही, दक्षिण भारत के इस महानगर में पानी की भारी कमी हो गई और अधिकारियों को वहाँ “डे ज़ीरो” घोषित करना पड़ा.

लगभग न्यूयॉर्क के आकार वाले इस शहर – चेन्नई को बचाने के लिये, लगभग 200 किलोमीटर दूर से ट्रेन से पानी लाया गया.

तब से ही, चेन्नई के जल संकट के बारे में गहन सोच-विचार किया गया है. फिर, सिंगापुर की एक पहल से प्रेरणा लेते हुए, चेन्नई में उद्योगों की ग़ैर-पेयजल ज़रूरतों को पूरा करने के लिये, बड़े पैमाने पर अपशिष्ट जल को री-सायकल करना शुरू किया गया है.

2019 के अन्त में शुरू किये गए, इसके दो तृतीयक उपचार रिवर्स ऑस्मोसिस (TTRO) संयन्त्र, भारत में इस तरह के, और इस पैमाने की पहली सुविधाएँ हैं.


UNICEF/Patrick Brown
म्याँमार के काचीन प्रान्त में, एक 12 वर्षीय बच्चा, अपने परिवार के लिये , बाल्टी में पानी भर कर ले जाता हुआ. पानी एक बेशक़ीमती प्राकृतिक संसाधन है जिसका सही इस्तेमाल बेहद ज़रूरी है.

एक बार जब ये संयन्त्र, प्रत्येक दिन साढ़े चार करोड़ लीटर (एमएलडी) की अपनी पूरी क्षमता पर पहुँचेंगे, तो वे चेन्नई के सीवेज के लगभग 20 प्रतिशत पानी को री-सायकल करने में सक्षम होंगे, जिससे शहर में ताज़े पानी की खपत कम हो सकेगी.

कोडुंगैयुर और कोयम्बेडु के संयंन्त्र, चेन्नई के उत्तरी बेल्ट और श्रीपेरुम्बुदूर, ओरागडम और वल्लमवदगल के पड़ोसी क्षेत्रों के उद्योगों को जल की आपूर्ति करेंगे.

यहाँ के उद्योगों को सीवेज ट्रीटमेंट संयन्त्रों से पानी मिलेगा, जिसे तब तक शुद्ध किया जाता है, जब तक वह उसी गुणवत्ता वाला न हो जाए, जैसा पारम्परिक रूप से उन्हें दिया जाता रहा है. 

फिर आश्चर्य नहीं कि इस अग्रणी पहल को अनेक वैश्विक और राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं, जिनमें ग्लोबल वॉटर अवार्ड, और हुडको का 2019 का उत्कृष्ट उदाहरण पुरस्कार भी शामिल है, जो जीवन बेहतर बनाने और शहरों में लचीलापन बढ़ाने के लिये दिया जाता है.

कोडुंगैयुर संयन्त्र को विश्व बैंक और केन्द्र व राज्य सरकारों से सह-वित्तपोषण मिला था. इस संयन्त्र का निर्माण शुरू होने के तुरन्त बाद, राज्य सरकार ने कोआंबेडु में दूसरे संयन्त्र पर भी काम शुरू किया.

चेन्नई की बिगड़ती जल स्थिति

परम्परागत रूप से, भारत में सबसे अधिक वार्षिक वर्षा होने वाला, 90 लाख की आबादी का यह शहर, मानसून की बारिश से आपूर्ति पाने वाली चार प्रमुख झीलों से पानी लेता है. लेकिन, जबकि चेन्नई को हर साल लगभग 1200 MLD पानी की आवश्यकता होती है, इन झीलों से, साल भर में केवल 500 से 800 MLD की आपूर्ति सम्भव है, और वो भी वर्षा की मात्रा पर निर्भर होती है.

पानी की मांग की तुलना में, आपूर्ति कम होने के कारण, शहर को अपनी जल ज़रूरतें पूरी करने के लिये, अन्य स्रोतों की ओर रुख़ करना पड़ता है, जैसे कि क़ीमती भूजल निकालने या पानी को ज़्यादा लागत वाले तरीक़ों से डीसैलीनेट करके.

ऐसे में, पानी का पुनर्नवीनीकरण, शहर के लिये एक नया, अधिक स्थायी जल स्रोत जोड़ता है – जो ताज़े व खारे पानी – दोनों की बचत करता है, हमेशा उपलब्ध रहता है और हर साल अलग-अलग पैमाने पर होने वाली वर्षा के जल की तुलना में अधिक विश्वसनीय होता है.

बल्कि, अन्ना विश्वविद्यालय के एक अध्ययन ने गणना की है कि 2050 तक, चेन्नई अपनी जल आवश्यकता का 50 प्रतिशत तक, री-सायकलिंग और अपने सीवेज के पानी के पुन: उपयोग से पूरा कर सकता है. जैसा कि सिंगापुर की उदाहरणीय जल उपयोगिता के मुख्य कार्यकारी, एनजी जू ही कहते हैं, “जल एक अन्तहीन, पुन: उपयोग योग्य संसाधन है और इसे बार-बार री-सायकिल किया जा सकता है.”

स्थायी जल संसाधनों का संवर्धन 

अधिकतर भारतीय शहरों के लिये, जल उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन रही है. वर्ष 2018 में, भारत सरकार के नीति आयोग की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि देश अपने इतिहास के सबसे बड़े जल संकट का सामना कर रहा है ,और 60 करोड़ लोग – यानि देश की आबादी का लगभग आधा हिस्सा – पानी की अत्यधिक कमी से जूझ रहा है.

जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ता है, जल संसाधन कम होते जाते हैं और वर्षा अधिक अप्रत्याशित हो जाती है. ऐसे में, प्रत्येक शहर को अपनी भौगोलिक, भूवैज्ञानिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के आधार पर, अपनी जल आपूर्ति बढ़ाने के लिये कई प्रकार के विकल्प तलाशने होंगे.

नागरिकों की बढ़ती मांग पूरा करना, बेकार जा रहे पानी के नुक़सान को कम करना और मूल्यवान भूजल संसाधनों का संरक्षण करना – सभी ऐसे आवश्यक उपाय हैं जिन पर प्रत्येक शहर को तत्काल काम करने की ज़रूरत होगी.

चेन्नई को भी इन मुद्दों का सामना  करने और अपने जलाशयों व झीलों के पुनर्वास और विस्तार करके, हालात दुरुस्त करने की आवश्यकता होगी, ताकि अधिक से अधिक पानी का भण्डारण हो सके.

तभी हम आने वाली पीढ़ियों को आश्वस्त कर सकते हैं कि आज अपनाए गए उपायों पर, मानव कल्याण और ग्रह की स्थिरता, दोनों को ध्यान में रखते हुए, सावधानीपूर्वक विचार के बाद ही, अमल किया गया है.

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