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भ्रष्टाचार के खलनायक एनोस काट रहे आजीवन कारावास की सजा

भ्रष्टाचार के खलनायक एनोस काट रहे आजीवन कारावास की सजा
July 14
10:29 2019

निर्दलीय मंत्री एनोस एक्का की दागदार कहानी

धर्मराज राय 

एक पारा शिक्षक मनोज कुमार की हत्या के सिद्ध आरोप में कोलेबिरा (सिमडेगा) के विधायक एवं पूर्व मंत्री एनोस एक्का को अदालत से मिली आजीवन कारावास की सजा से झारखण्ड हिल गया है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में चुप्पी भले छा गई है लेकिन अन्दर ही अन्दर बहुचर्चित पारा-शिक्षक हत्याकांड में एनोस एक्का की संलिप्तता पर व्यापक चर्चा के साथ अब तक ऐसे ही आपराधिक मामलों में सजा पाकर विधायकी गंवाने वाले और सजा पाकर जेल गए राजनीतिज्ञों और मंत्रियों की करतूतों पर भी बहस जारी है। कोई हत्या कांड में, कोई चोरी में और कोई सरकारी कर्मियों के साथ हिंसक मारपीट में सजा भोग रहा है।

झारखण्ड राज्य की यह विडंबना ही है कि इसके गठन के साथ ही राजनेताओं ने विभेद और हिंसा को बढ़ावा देकर इसकी दुर्गति कर दी। भारतीय जनता पार्टी भले ही झारखण्ड के गठन का दावा करते हुए गर्वोनत भाव प्रदर्शित करे लेकिन इस पार्टी से जुड़े तत्कालीन प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने आदिवासी, गैरआदिवासी के बीच विभेद का जो बीज बोया, वह कांटे का पेड़ बन गया है, जिसमें झारखण्ड आज भी उलझा हुआ है। उसी तरह एनोस एक्का जैसे लोगों ने झारखण्ड की समग्र जनता की आशाओं पर पानी फेरने का काम किया है।

कथित रूप से सुलझे भाजपा नेता अर्जुन मुंडा के मुख्यमंत्रित्व काल में मंत्री पद सम्भालते ही एनोस एक्का के मन-मैदान में दौड़ता अपराध का घोड़ा इतना तेज दौड़ने लगा कि राज्य की भलाई पीछे छोड़कर लाभ की मलाई चाटने के लिए ’मंत्री जी’ दिशाहीन हो गये। अंततः उस मंजिल पर पहुंच कर एनोस-एक्का ऐसे गिरे कि अब उठना संभव नहीं है। कहावत है कि तराजू के एक पलड़े पर रखा ‘हत्या का पाप’ दूसरे पलड़े पर एक साथ रखे सभी तरह के अपराधों के पाप से भारी होता है। एनोस एक्का से सटा हत्या का अपराध ‘भारी पाप’ के रूप में सामने आ गया, जिसका फल आजीवन कारावास की सजा के रूप में भोगना पड़ेगा।

चर्चा तो यही है कि अंततः झारखण्ड का एक और नेता अपनी करनी का फल भोगने के लिए कानून के शिकंजे में फंस ही गया। झारखण्ड सरकार में तीन-तीन बार मंत्री पद पर आसीन रहे एनोस एक्का ने राज्य और राज्य के लोगों के प्रति गद्दारी की। अवैध सम्पत्ति अर्जित करने का अपराध किया और मन इतना बढ़ा कि एक निर्दोष शिक्षक की हत्या का पाप कर डाला। समाज विरोधी नक्सली से सम्बन्ध भी एनोस एक्का की आपराधिक मानसिकता का ही परिचायक है। हालांकि इस मामले में जो न्याय हुआ है उससे साबित होता है कि न्याय के दरबार में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ ही होता है और यह भी ‘सब अपने हक को प्राप्त होते हैं।’

‘जैसी करनी वैसी भरनी’ का मुहावरा भी एनोस एक्का के मामले में चरितार्थ होता है। यह सत्य भी शत्-प्रतिशत चरितार्थ होता है कि ‘भगवान के दरबार में देर है, अंधेर नहीं।’ एनोस एक्का के अपराध और सजा के परिप्रेक्ष्य में उपरोक्त सभी वाक्य और ‘कथन’ उदाहरण स्वरूप चरितार्थ हुए हैं। यह भी कहा गया है-

पाप छिपाए ना छिपे, जस लहसुन की बोय।
कितनो नीचे गाड़िये, तौ भी ऊपर होय।।

झारखण्ड के निर्माण के साथ ही यहां के अनेक नेता मदांध हो गए। कहां तो बदहाल और शोषित झारखण्ड के नव-निर्माण की दिशा में नये संघर्ष के लिए सक्रिय होना चाहिए था जबकि इसके उलट अनेक नेता अपने विकास के लिए गलत रास्ता अपना कर धन सम्पति बटोरने के साथ अन्य घृणित अपराधों को प्रश्रय देने में लगे। इसी का दुष्परिणाम है कि बाबू लाल मरांडी के भाजपा सरकार से शुरू हुई झारखण्ड की अराजक स्थिति वर्तमान सरकार तक कब्जे में नहीं आयी है।

एनोस एक्का जैसे लोग उन्हीं लोगों की पांत के नेता बनकर उभरे जिन्होंने निहित स्वार्थवश अकूत सम्पति अर्जन के साथ हत्या जैसे हिंसक अपराध के अभियुक्त बने। चुनाव में जीतने के लिए एनोस एक्का ने लोकप्रिय पारा शिक्षक मनोज कुमार पर अपने पक्ष में प्रचार करने का दबाव बनाया लेकिन जब उस शिक्षक ने बात नहीं मानी तो एनोस ने उसकी हत्या करवा दी। इस मामले में एनोस के साथ दूसरे दोषी धनेश बड़ाइक को भी आजीवन कारावास की सजा मिली है। आर्थिक दंड भी अलग से लगा है।

इस चर्चित हत्याकांड में एनोस एक्का द्वारा नक्सली सम्बन्ध रखने का अपराध भी सामने आया जब पीएलएफआई का कमान्डर बारूद गोप गिरफ्तार हुआ। वह अंततः सरकारी गवाह बना। हालांकि एनोस एक्का ने बारूद गोप को सरकारी गवाह बनाने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती भी दी थी। लेकिन हाईकोर्ट ने बारूद गोप को सरकारी गवाह बनने की इजाजत दे दी। एनोस एक्का को मिली आजीवन कारावास की सजा के कारण उनकी विधायकी भी समाप्त हो जायेगी।

एनोस एक्का झारखण्ड के चैथे राजनीतिक व्यक्ति हैं जिनकी अपराधिक सजा के कारण विधायकी समाप्त हुई है। उनकी विधानसभा की सदस्यता तीन जुलाई 2018 से समाप्त मानी जायेगी। अर्थात् लहसुन की तरह पाप अंततः ऊपर आ ही गया।

विडंबना यह कि एनोस एक्का भाजपा शासनकाल की उपज हैं। वह 2005 से लगातार तीन बार कोलेबिरा से विधायक रहे। तब एनोस एक्का पहली बार विधायक बनते ही 2005 में अर्जुन मुंडा की सरकार में ग्रामीण विकास और परिवहन मंत्री बनकर शासन करने लगे। हालांकि शीघ्र ही 16 सितम्बर 2006 में अर्जुन मुंडा की यह सरकार खत्म हो गई और 18 सितम्बर 2006 को मधु कोड़ा की सरकार गठित हुई। इस सरकार में भी एनोस एक्का दूसरी बार मंत्री बन गए। उन्हें ग्रामीण विकास के साथ-साथ परिवहन और भवन निर्माण विभाग भी मिला।

26 अगस्त 2008 को मधु कोड़ा की सरकार भी गिर गई। 27 अगस्त 2008 को शिबू सोरेन की सरकार बनी, जिसमें शामिल एनोस एक्का को तीसरी बार मंत्री पद मिला और उन्हें पुराने विभाग ही मिले। लेकिन शिबू सोरेन की सरकार शीघ्र गिर गई। यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई।

इस बीच एनोस एक्का आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के मामले में फंस चुके थे। एनोस एक्का के साथ दूसरे मंत्री हरिनारायण राय पर भी आय से अधिक सम्पति अर्जित करने के मामले में दर्ज हुए मुकदमे के कारण मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने 18 दिसम्बर 2008 को राज्यपाल से दोनों को बर्खास्त करने की अनुशंसा की। तब कार्यवाहक राज्यपाल रघुनन्दन लाल भाटिया ने 19 दिसम्बर 2008 को एनोस एक्का और हरिनारायण राय की बर्खास्तगी की अनुशंसा को मंजूरी दे दी।

हरिनारायण राय को आय से अधिक सम्पति के मामले में पॉंच साल की सजा कुछ माह पहले हुई है और वह जेल में हैं, जबकि एनोस एक्का भी सजा से पहले जेल से हो आए हैं। इसी बीच पारा शिक्षक हत्याकांड में वह 2014 से ही जेल में थे। 2014 में हीं वह चैथी बार चुनाव जीते थे। यहां यह भी गौरतलब है कि 2008 में आय से अधिक सम्पति अर्जन के मामले में बर्खास्त होने के बाद एनोस एक्का 2009 के चुनाव में दूसरी बार कोलेबिरा से विधायक बन गए। हालांकि तब की सरकार में एनोस को शामिल करने के लिए किसी ने नहीं पूछा था।

पारा शिक्षक हत्याकांड में एनोस एक्का को आजीवन कारावास की सजा मिलने से न्यायप्रिय लोगों में न्याय के प्रति आस्था बढ़ी है। लेकिन मुखौटा लगाकर सेवा का नाटक करनेवाले भ्रष्टाचारियों और अपराधियों पर लगाम कैसे लगेगी यह यक्ष प्रश्न खड़ा है। एनोस एक्का जैसे लोगों की पहचान हो जाने के बाद भी अर्जुन मुंडा सहित बाद की सरकारों ने भी उन्हें यथाशीघ्र सत्ता से अलग थलग रखने की कोशिश नहीं की, जिससे एनोस एक्का को अपने प्रभावी होने का गुमान पैदा होते चला गया।

इसी कारण वह झारखण्ड के कल्याण के बदले अपने कल्याण में तो जुटे ही हिंसक अपराध को भी अंजाम देने में उन्हें हिचक नहीं हुई। हत्या के नृशंस अपराध ने विधायक और पूर्व मंत्री एनोस एक्का को गर्हित श्रेणी में ढकेल दिया है। बहरहाल, झारखण्ड की कुंडली में अब तक एनोस एक्का एवं अन्य कई चरित्रों की मारक दशा ही चल रही है।

वस्तुतः अल्पमत प्राप्त किसी मजबूर राजनीतिक दल की सरकार में शामिल होने वाले छोटे राजनीतिक दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने सदैव गुल खिलाया है। ऐसे लोगों ने स्वच्छन्द और निडर होकर सरकार को चोट पहुंचायी है। विकास और कल्याणकारी योजनाओं की राशि की हेराफेरी कर अपना घर भरा है।

केन्द्र हो या नवोदित झारखण्ड राज्य हो, दोनों को ऐसी परिस्थिति का शिकार होने पर गठबंधन सरकार में शामिल हुए लोगों की मनमानी सहनी पड़ी है। यह अलग बात है कि अंततः भ्रष्टाचार का खुलासा होने पर अनेक मंत्रियों और सांसदों, विधायकों के कारनामे सामने आये हैं।

ऐसा विशेष रूप से तब हुआ है जब केन्द्र हो या राज्य, किसी में एक दल की बहुमत की सरकार नहीं बन रही हो और सरकार बनाने में छोटे दलों के या निर्दलीय जनप्रतिनिधियों को शामिल किया जाए। ऐसे छुटभैये दलों के जनप्रतिनिधियों या निर्दलीयों ने ब्लैक मेल कर सरकार से खूब फायदा उठाया है। सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया है। ऐसी मिलीजुली सरकार से विकास भी अवरूद्ध हुआ है। पूर्व में केन्द्र में नरसिम्हा राव की सरकार में शामिल छोटे दल झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सांसदों ने क्या गुल खिलाया था, सर्वविदित और चर्चित है।

झारखण्ड गठन के बाद तो यहां की सरकार आया राम-गया राम की सरकार तो हो ही गई, सरकार में शामिल लोगों ने ऐसी लूट मचाई की झारखण्ड भ्रष्टाचार का पर्याय ही बन गया। कारण यही कि अल्पमत की सरकार में शामिल छोटे दलों के मंत्रियों के साथ-साथ निर्दलीय मंत्रियों ने बेलगाम होकर सरकारी योजनाओं की आड़ में ऐसी लूटपाट मचाई कि झारखण्ड बदनाम हो गया। कहा जाने लगा कि यहां के जंगल में मंत्री के रूप में ‘रूपये की भूखे भेड़िये’ विचरने लगे हैं।

इसी बीच राज्य रघुवर दास के नेतृत्व में गठित बहुमत की भाजपा सरकार द्वारा भ्रष्टाचार पर नियंत्रण का दावा लगभग सही साबित हो रहा है। मंत्रियों पर अभी तक ‘दाग’ नहीं लगा है।

 

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