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मंत्री बनते ही कमलेश सिंह की खाली झोली में भर गई करोड़ों की की राशि

मंत्री बनते ही कमलेश सिंह की खाली झोली में भर गई करोड़ों की की राशि
August 09
09:41 2018

-धर्मराज राय

नवगठित झारखण्ड राज्य की सरकार में कई ऐसे व्यक्ति भी मंत्री बने जिनके बारे में अभी तक चर्चा होती है कि अवैध कमाई से अर्जित नगद रूपयों की गिनती के लिए नोट गिनने वाली मशीन लगाई थी। इस तरह की खबर झारखण्ड सहित दुनिया भर की मीडिया में भी खूब चर्चित हुई थी। लोगों की स्मृति कमजोर नहीं हुई हो तो ऐसे मंत्री अब कानून के गिरफ्त में हैं और जेल की हवा खा-खा कर अदालत का चक्कर लगा रहे हैं।  पलामू के हुसैनाबाद क्षेत्र से राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी के रूप में 2005 में विधानसभा का चुनाव जीतने वाले कमलेश सिंह ऐसे राजनेता निकले जो सत्ता में रहकर विवादों में घिरे रहे और मंत्री पद का कथित दुरूपयोग कर करोड़ों की अवैध सम्पति अर्जित की। तब की मीडिया में आयी विश्लेषणात्मक खबरों के मुताबिक झारखण्ड गठन के तत्काल बाद ही राज्य में सरकारों की अस्थिरता का दौर शुरू हो गया था।

राज्य के विकास का संकल्प और कार्यक्रम पीछे छूट गये थे। सरकार का बनाना और गिराना राजनीतिक पार्टियों की प्राथमिकता बन गई थी। केवल अस्थिरता का दौर शुरू हो गया था। यह कालखंड राज्य के लिए भी और लोकतंत्र के लिए हास्यास्पद, निराशाजनक और शर्मनाक था। सबकी अपनीडफली बज रही थी सब अपना राग आलाप रहे थे। कोई किसी की नहीं सुन रहा था। इसी दौर में एक निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा झारखण्ड के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गये। देश के किसी राज्य में एक निर्दलीय का मुख्यमंत्री बनना पहली अघटित घटना थी, क्योंकि इस मुख्यमंत्री को कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के साथ अन्य अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिल गया था।

कमलेश सिंह को इसी स्थिति का फायदा मिला और वह कोड़ा सरकार में खाद्य-आपूर्ति, मद्य निषेध, जल संसाधन एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री बन बैठे। यह समय ‘बिल्ली के भाग्य से छीका टूटने’ जैसा था। इस दौर में मंत्री पदों की छीना-छपटी भी खूब हुई। जो जितना भूना सकता था भुनाया। कमलेश सिंह की तो पांचों अंगुली घी में थी। इस ‘जांबाज’ मंत्री ने कमाई का वह रिकाॅर्ड तोड़ा जो अन्य बदनाम आरोपी मंत्री नहीं कर सके। बेहिसाब अवैध कमाई जब कमलेश सिंह की झोली में उफनकर भरने लगी तो वह बाहर भी दिखने लगी। कमलेश सिंह की पुत्री की जिस भव्यता का प्रदर्शन हुआ वह आज तक चर्चित है। मुंबई से चार्ट्र्ड विमानों से रांची में बारात पहुंची थी। उस रात्री शहर का कोई कोना जाम से बच नहीं पाया था। बहरहाल, कमलेश की कमाई छिपी नहीं रही। अंततः उनके विरूद्ध जांच शुरू हुई तो वह मनी लांउड्रिंग सहित कई मामलों में फंस गए।

उनके साथ उनकी पत्नी मधु सिंह, पुत्र सूर्य सोनल सिंह, बेटी अंकिता और दामाद नरेन्द्र मोहन सिंह का नाम भी अभियुक्त के रूप में शामिल हुआ है। कमलेश के विरूद्ध उनकी पत्नी मधु सिंह के साथ पांच करोड़ 83 लाख 64 हजार 197 रूपए की मनी लाॅन्ड्रिग का आरोप पत्र विशेष अदालत में दाखिल है। इडी टीम को जांच-पड़ताल के दौरान कमलेश सिंह के बैंक खाते से लगभग दो करोड़ की राशि पुत्र सूर्य सोनल सिंह और दामाद नरेन्द्र मोहन सिंह के खाते में ट्रांसफर के भी सूबत मिले। कमलेश सिंह के दामाद महाराष्ट्र कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कृपा शंकर सिंह के पुत्र हैं।  इडी टीम द्वारा विशेष अदालत में दाखिल आरोप पत्र में अलग-अलग जगहों पर 40 लाख रूपए जमीन में लगाने का आरोप भी शामिल है। इसके साथ ही एक करोड़ रूपये के कालाधन को ह्वाइट करने के प्रयास का भी आरोप है।

आरोप पत्र के अनुसार कमलेश सिंह के दामाद नरेन्द्र मोहन के खाते में एक ही दिन 83 लाख रूपये जमा हुए। इसके उपरांत नरेन्द्र मोहन ने अपनी पत्नी अंकिता जो कमलेश सिंह की सुपुत्री हैं, के खाते में एक करोड़ रूपये चेक के द्वारा लोन के रूप में डाल दिया। अंकिता ने उस राशि को अपने भाई को दे दिया। भाई सूर्य सोनल सिंह ने बहन से प्राप्त राशि को अपने पिता कमलेश सिंह के खाते में डाल दिया। यह प्रक्रिया एक करोड़ की काली राशि से वैध राशि बनाने के लिए अपनायी गई जो पकड़ में आ गई।

इसे? मामले में पूर्व मंत्री कमलेश सिंह के भांजे अभिषेक सिंह भी फंसे हैं। उनपर फर्जी कंपनियों के नाम पर अपने मामा कमलेश सिंह द्वारा अवैध धन के निवेश का आरोप है। इस मामले में सीबीआई ने न्यायालय में सबूत उपलब्ध कराये हैं।
इस तरह कमलेश सिंह ने सोचा भी नहीं था कि अवैध सम्पति अर्जित करने का कुफल इतना भयावह होता है। उनकी हेराफेरी ने उनके परिवार को भी बदनामी के अंधेरे में ढकेल दिया। परेशानी ऐसी कि पत्नी, बेटी, दामाद और बेटे सहित स्वयं पूर्व मंत्री कमलेश सिंह का दिन कोर्ट के चक्कर लगाते बीत रहा है। वर्षों तक जेल में कष्ट कर दिन बीते हैं सो अलग से हैं।

झारखण्ड की राजनीतिक चहल-पहल से दूर कमलेश सिंह और उनके परिवार की ओर शायद ही अच्छी नजर से कोई देख रहा है। ऐसा लगता है जैसे उनकी राजनीतिक पारी समाप्त हो गई है। हो भी क्यों नहीं, जिन लोगों के झारखंड के अभागेपन को दूर करने का सुयोग मिला था उन्हीं लोगों ने चालाकी और चाटुकारिता के फेर में फंसकर राज्य को ही विनाश की गहरी खाई में ढकेल दिया। झारखण्ड में आज भी विकास की आड़ में अराजकता का साम्राज्य है। राज्य के विकास में सामूहिक जिम्मेदारी निभाने के बजाय बेमेल खोखली राजनीति का ढोल पीटा जा रहा है। भले कुछ राजनेता, पूर्व मंत्री और सरकारी अधिकारी कानून की नजर में अपराधी हों, लेकिन वोट देनेवाली जनता की नजर में उनके विरूद्ध आरोप का कोई अर्थ नहीं है। अगर यह सच नहीं है तो फिर भष्टाचारी, व्यभिचारी और हत्यारे नेता बारबार जीत कैसे जाते हैं ?

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