मलेशिया: प्रवासियों को म्याँमार वापिस भेजे जाने के फ़ैसले की आलोचना

संयुक्त राष्ट्र के स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने, हिरासत में रखे गए, एक हज़ार से ज़्यादा प्रवासियों को संकटग्रस्त म्याँमार वापिस भेजे जाने के मलेशियाई सरकार के फ़ैसले की आलोचना की है. मलेशिया की एक अदालत ने न्यायिक समीक्षा होने तक, प्रवासियों को देश वापिस भेजे जाने रोक लगाई थी, लेकिन इसके बावजूद इन प्रवासियों को निर्वासित किया गया है. 

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने बुधवार को एक वक्तव्य जारी कर बताया कि मलेशियाई आव्रजन अधिकारियों ने एक हज़ार 86 प्रवासियों को वापिस म्याँमार भेज दिया है. इनमें नाबालिग और छोटे बच्चे भी हैं. 

UN experts are appalled by #Malaysia’s decision to proceed with the deportation to #Myanmar of over 1,000 detained migrants, including unaccompanied minors, despite a court order to suspend their return and breaching the principle of non-refoulement. Read: https://t.co/eP429GPqMa pic.twitter.com/k8rL90Rllo— UN Special Procedures (@UN_SPExperts) February 24, 2021

बताया गया है कि यह फ़ैसला क्वाला लम्पुर हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना है. 
यूएन विशेषज्ञों के अनुसार मलेशियाई अधिकारियों ने उस सिद्धान्त का भी उल्लंघन किया है, जिसके तहत प्रवासियों को तब तक सामूहिक रूप से देश से नहीं निकाला जा सकता, जब तक हर मामले का वस्तुपरक मूल्याँकन नहीं कर लिया जाता.   
उन्होंने कहा कि बच्चों को उनके परिवार से अलग नहीं किया जाना चाहिए था, और हालात को परखे बिना उन्हें नहीं लौटाया जाना चाहिए था.
म्याँमार में, 1 फ़रवरी को, सेना ने तख़्ता पलट के बाद देश की सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद से ही देश में, बुनियादी अधिकारों और आज़ादियों के व्यवस्थित ढँग से हनन की रिपोर्टें मिली हैं. 
इस पृष्ठभूमि में, यूएन विशेषज्ञों ने, म्याँमार लौटने वाले लोगो के अधिकारों के प्रति चिन्ता ज़ाहिर की है. 
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि प्रवासियों की शिनाख़्त सम्बन्धी प्रक्रिया और उनकी व्यक्तिगत संरक्षा आवश्यकताओं का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया गया है.
अनियमित प्रवासन दर्जे के कारण, प्रवासियों को मलेशियाई आव्रजन हिरासत केन्द्रों में लम्बी अवधि के लिये हिरासत में रखा गया था.  
म्याँमार के सैन्य नेतृत्व ने एक हज़ार से ज़्यादा प्रवासियों को लाने के लिये नौसेना के तीन जहाज़ों को भेजने की पेशकश की थी. 
मानवाधिकार हनन पर चिन्ता
यूएन विशेषज्ञों ने मलेशियाई अधिकारियों को एक ख़त लिखकर अपनी चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं, और ज़ोर देकर कहा है कि प्रवासियों को यातना दिये जाने की रोकथाम के तहत उन्हें जबरन वापिस भेजे जाने पर पूर्ण पाबन्दी लगाई जानी होगी.  
उन्होंने ध्यान दिलाते हुए कहा कि देश, किसी व्यक्ति को एक ऐसे देश नहीं लौटाया जा सकता, जहाँ यह मानने का पर्याप्त आधार हो, कि उसके मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन हो सकता है. 
यूएन विशेषज्ञों के अनुसार, सभी प्रवासियों के लिये तय प्रक्रिया के तहत जोखिम मूल्याँन और संरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया. 
इससे, उनके लिये शोषण व उत्पीड़न का शिकार होने का जोखिम बढ़ गया है.
उन्होंने मलेशियाई अधिकारियों से आग्रह किया है कि शेष प्रवासियों का पर्याप्त मूल्याँकन किया जाना होगा और उन्हें आवश्यकता अनुसार संरक्षा प्रदान की जानी होगी. 
उन्होंने स्पष्ट किया है कि आने वाले दिनों में वे हालात की निगरानी करना जारी रखेंगे. 
स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं., संयुक्त राष्ट्र के स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने, हिरासत में रखे गए, एक हज़ार से ज़्यादा प्रवासियों को संकटग्रस्त म्याँमार वापिस भेजे जाने के मलेशियाई सरकार के फ़ैसले की आलोचना की है. मलेशिया की एक अदालत ने न्यायिक समीक्षा होने तक, प्रवासियों को देश वापिस भेजे जाने रोक लगाई थी, लेकिन इसके बावजूद इन प्रवासियों को निर्वासित किया गया है. 

संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों ने बुधवार को एक वक्तव्य जारी कर बताया कि मलेशियाई आव्रजन अधिकारियों ने एक हज़ार 86 प्रवासियों को वापिस म्याँमार भेज दिया है. इनमें नाबालिग और छोटे बच्चे भी हैं. 

बताया गया है कि यह फ़ैसला क्वाला लम्पुर हाई कोर्ट के आदेश की अवहेलना है. 

यूएन विशेषज्ञों के अनुसार मलेशियाई अधिकारियों ने उस सिद्धान्त का भी उल्लंघन किया है, जिसके तहत प्रवासियों को तब तक सामूहिक रूप से देश से नहीं निकाला जा सकता, जब तक हर मामले का वस्तुपरक मूल्याँकन नहीं कर लिया जाता.   

उन्होंने कहा कि बच्चों को उनके परिवार से अलग नहीं किया जाना चाहिए था, और हालात को परखे बिना उन्हें नहीं लौटाया जाना चाहिए था.

म्याँमार में, 1 फ़रवरी को, सेना ने तख़्ता पलट के बाद देश की सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद से ही देश में, बुनियादी अधिकारों और आज़ादियों के व्यवस्थित ढँग से हनन की रिपोर्टें मिली हैं. 

इस पृष्ठभूमि में, यूएन विशेषज्ञों ने, म्याँमार लौटने वाले लोगो के अधिकारों के प्रति चिन्ता ज़ाहिर की है. 

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि प्रवासियों की शिनाख़्त सम्बन्धी प्रक्रिया और उनकी व्यक्तिगत संरक्षा आवश्यकताओं का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया गया है.

अनियमित प्रवासन दर्जे के कारण, प्रवासियों को मलेशियाई आव्रजन हिरासत केन्द्रों में लम्बी अवधि के लिये हिरासत में रखा गया था.  

म्याँमार के सैन्य नेतृत्व ने एक हज़ार से ज़्यादा प्रवासियों को लाने के लिये नौसेना के तीन जहाज़ों को भेजने की पेशकश की थी. 

मानवाधिकार हनन पर चिन्ता

यूएन विशेषज्ञों ने मलेशियाई अधिकारियों को एक ख़त लिखकर अपनी चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं, और ज़ोर देकर कहा है कि प्रवासियों को यातना दिये जाने की रोकथाम के तहत उन्हें जबरन वापिस भेजे जाने पर पूर्ण पाबन्दी लगाई जानी होगी.  

उन्होंने ध्यान दिलाते हुए कहा कि देश, किसी व्यक्ति को एक ऐसे देश नहीं लौटाया जा सकता, जहाँ यह मानने का पर्याप्त आधार हो, कि उसके मानवाधिकारों का गम्भीर उल्लंघन हो सकता है. 

यूएन विशेषज्ञों के अनुसार, सभी प्रवासियों के लिये तय प्रक्रिया के तहत जोखिम मूल्याँन और संरक्षा उपायों का पालन नहीं किया गया. 

इससे, उनके लिये शोषण व उत्पीड़न का शिकार होने का जोखिम बढ़ गया है.

उन्होंने मलेशियाई अधिकारियों से आग्रह किया है कि शेष प्रवासियों का पर्याप्त मूल्याँकन किया जाना होगा और उन्हें आवश्यकता अनुसार संरक्षा प्रदान की जानी होगी. 

उन्होंने स्पष्ट किया है कि आने वाले दिनों में वे हालात की निगरानी करना जारी रखेंगे. 

स्पेशल रैपोर्टेयर और वर्किंग ग्रुप संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की विशेष प्रक्रिया का हिस्सा हैं. ये विशेष प्रक्रिया संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था में सबसे बड़ी स्वतंत्र संस्था है. ये दरअसल परिषद की स्वतंत्र जाँच निगरानी प्रणाली है जो किसी ख़ास देश में किसी विशेष स्थिति या दुनिया भर में कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती है. स्पेशल रैपोर्टेयर स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं; वो संयक्त राष्ट्र के कर्मचारी नहीं होते हैं और उन्हें उनके काम के लिए कोई वेतन नहीं मिलता है. ये रैपोर्टेयर किसी सरकार या संगठन से स्वतंत्र होते हैं और वो अपनी निजी हैसियत में काम करते हैं.

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