‘महामारी से जुड़ी पाबन्दियों से करोड़ों बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर जोखिम’

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान राष्ट्रव्यापी सार्वजनिक स्वास्थ्य आदेशों या अनुशंसाओं के कारण, दुनिया भर में करोड़ों बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिये जोखिम उत्पन्न हो गया है, और इन हालात के कारण, हर सात में से लगभग एक बच्चा अपने घर पर ही रहने को विवश है.

यूनीसेफ़ ने नए अध्ययनों के आधार पर गुरूवार को कहा कि दुनिया भर में 33 करोड़ से भी ज़्यादा बच्चे और युवजन, 2020 में लगभग मार्च में कोरोनावायरस बेक़ाबू होकर फैलने के समय से लेकर, कम से कम नौ महीनों तक अपने घरों के भीतर ही रहने को मजबूर रहे हैं.

We must emerge from the COVID-19 pandemic with a better approach to child and adolescent mental health, and that starts by giving the issue the attention it deserves. https://t.co/hhUMeUlx2A— Henrietta H. Fore (@unicefchief) March 4, 2021

यूनीसेफ़ प्रवक्ता जेम्स एल्डर ने कहा कि इन हालात के कारण, ये बच्चे अलग-थलग महसूस कर रहे हैं और उनमें अपने भविष्य को लेकर भी चिन्ताएँ भर गई हैं.
“महामारी के नतीजे के रूप में सामान्य स्थिति बनी तालाबन्दी और पाबन्दियों की परिस्थितियों में, करोड़ों बच्चों में, अकेलेपन की भावना, भय और चिन्ता घर कर गए हैं.”
उन्होंने कहा कि देशों को, बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की ख़ातिर, इस महामारी से उबरने के लिये कहीं बेहतर तरीक़े सोचने होंगे. और ऐसा करने की शुरुआत इस मुद्दे पर विशेष ध्यान देने के साथ ही हो सकेगी.
मानसिक भंगुरताएँ
यूनीसेफ़ के अनुसार मानसिक रोगों के लगभग आधे मामले तो 15 वर्ष की आयु से पहले ही शुरू हो जाते हैं और हर वर्ष जो बच्चे व किशोर, लगभग आठ लाख आत्महत्याएँ करने के कारण मौत का शिकार होते हैं, उनकी उम्र 18 वर्ष से कम ही होती है.
यूएन बाल एजेंसी का ये भी कहना है कि कोरोनावायरस महामारी ने दुनिया भर के लगभग 93 प्रतिशत देशों में, महत्वपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ या तो बाधित कर दी हैं या पूरी तरह ठप कर दी हैं.
यूनीसेफ़ की कार्यकारी निदेशक हैनरिएटा फ़ोर ने कहा है कि जब कोई इनसान लगातार बहुत दिनों तक, अपने मित्रों और प्रियजनों से दूर होता है, या फिर किसी दुर्व्यवहारी के साथ ही अपने घर में फँस जाता है, तो उसके प्रभाव बहुत गम्भीर होते हैं.
उन्होंने कहा, “बहुत से बच्चे ख़ुद को डर, अकेलेपन, चिन्ता से घिरा हुआ पा रहे हैं और अपने भविष्य के बारे में चिन्तित नज़र आते हैं. हमें इस महामारी का मुक़ाबला करने के लिये ऐसे तरीक़े अपनाने होंगे जो बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिये बेहतर हों…”
यूनीसेफ़ की मदद
यूएन बाल एजेंसी ने बढ़ती ज़रूरतों के मद्देनज़र, सरकारों और साझीदारों को मदद की पेशकश की है ताकि बच्चों के लिये सेवाओं को प्राथमिकता पर रखा जा सके.
एजेंसी ने कज़ाख़्स्तान में एक ऑनलाइन हैल्पलाइन शुरू की है जिसके ज़रिये सलाहकारी सेवाएँ मुहैया कराई जा रही हैं, साथ ही स्कूलों में दूरस्थ शिक्षा के ज़रिये मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
चीन में, यूनीसेफ़ ने बच्चों में चिन्ता (व्यग्रता या उत्कंठा) कम करने में मदद करने के लिये, सोशल मीडिया कम्पनी कुआईशोऊ के साथ मिलकर ऑनलाइन सेवाएँ शुरू की हैं.
यूनीसेफ़ की प्रमुख हैनरिएटा फ़ोर ने कहा है कि अगर कोविड-10 महामारी से पहले, इस मुद्दे की तात्कालिकता को नहीं समझा गया तो, अब बिल्कुल समझा जाना होगा.
ये भी पढ़ें: क़रीब 17 करोड़ बच्चे, एक साल तक रह गए स्कूली शिक्षा से वंचित
उन्होंने कहा कि देशों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया कराने वाले ढाँचे में और ज़्यादा संसाधन निवेश करने होंगे और समुदायों व स्कूलों में, बच्चों, किशोरों और युवाओं के साथ-साथ उनकी देखभाल करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को सहारा देना होगा.
साथ ही ऐसे परवरिश कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना होगा जिनके तहत कमज़ोर परिस्थितियों वाले परिवारों के बच्चों के लिये वो समर्थन, सहायता और संरक्षा सुनिश्चित किये जा सकें, जिनकी उन्हें ज़रूरत है., संयुक्त राष्ट्र बाल कोष – यूनीसेफ़ ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान राष्ट्रव्यापी सार्वजनिक स्वास्थ्य आदेशों या अनुशंसाओं के कारण, दुनिया भर में करोड़ों बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिये जोखिम उत्पन्न हो गया है, और इन हालात के कारण, हर सात में से लगभग एक बच्चा अपने घर पर ही रहने को विवश है.

यूनीसेफ़ ने नए अध्ययनों के आधार पर गुरूवार को कहा कि दुनिया भर में 33 करोड़ से भी ज़्यादा बच्चे और युवजन, 2020 में लगभग मार्च में कोरोनावायरस बेक़ाबू होकर फैलने के समय से लेकर, कम से कम नौ महीनों तक अपने घरों के भीतर ही रहने को मजबूर रहे हैं.

यूनीसेफ़ प्रवक्ता जेम्स एल्डर ने कहा कि इन हालात के कारण, ये बच्चे अलग-थलग महसूस कर रहे हैं और उनमें अपने भविष्य को लेकर भी चिन्ताएँ भर गई हैं.

“महामारी के नतीजे के रूप में सामान्य स्थिति बनी तालाबन्दी और पाबन्दियों की परिस्थितियों में, करोड़ों बच्चों में, अकेलेपन की भावना, भय और चिन्ता घर कर गए हैं.”

उन्होंने कहा कि देशों को, बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की ख़ातिर, इस महामारी से उबरने के लिये कहीं बेहतर तरीक़े सोचने होंगे. और ऐसा करने की शुरुआत इस मुद्दे पर विशेष ध्यान देने के साथ ही हो सकेगी.

मानसिक भंगुरताएँ

यूनीसेफ़ के अनुसार मानसिक रोगों के लगभग आधे मामले तो 15 वर्ष की आयु से पहले ही शुरू हो जाते हैं और हर वर्ष जो बच्चे व किशोर, लगभग आठ लाख आत्महत्याएँ करने के कारण मौत का शिकार होते हैं, उनकी उम्र 18 वर्ष से कम ही होती है.

यूएन बाल एजेंसी का ये भी कहना है कि कोरोनावायरस महामारी ने दुनिया भर के लगभग 93 प्रतिशत देशों में, महत्वपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ या तो बाधित कर दी हैं या पूरी तरह ठप कर दी हैं.

यूनीसेफ़ की कार्यकारी निदेशक हैनरिएटा फ़ोर ने कहा है कि जब कोई इनसान लगातार बहुत दिनों तक, अपने मित्रों और प्रियजनों से दूर होता है, या फिर किसी दुर्व्यवहारी के साथ ही अपने घर में फँस जाता है, तो उसके प्रभाव बहुत गम्भीर होते हैं.

उन्होंने कहा, “बहुत से बच्चे ख़ुद को डर, अकेलेपन, चिन्ता से घिरा हुआ पा रहे हैं और अपने भविष्य के बारे में चिन्तित नज़र आते हैं. हमें इस महामारी का मुक़ाबला करने के लिये ऐसे तरीक़े अपनाने होंगे जो बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के लिये बेहतर हों…”

यूनीसेफ़ की मदद

यूएन बाल एजेंसी ने बढ़ती ज़रूरतों के मद्देनज़र, सरकारों और साझीदारों को मदद की पेशकश की है ताकि बच्चों के लिये सेवाओं को प्राथमिकता पर रखा जा सके.

एजेंसी ने कज़ाख़्स्तान में एक ऑनलाइन हैल्पलाइन शुरू की है जिसके ज़रिये सलाहकारी सेवाएँ मुहैया कराई जा रही हैं, साथ ही स्कूलों में दूरस्थ शिक्षा के ज़रिये मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

चीन में, यूनीसेफ़ ने बच्चों में चिन्ता (व्यग्रता या उत्कंठा) कम करने में मदद करने के लिये, सोशल मीडिया कम्पनी कुआईशोऊ के साथ मिलकर ऑनलाइन सेवाएँ शुरू की हैं.

यूनीसेफ़ की प्रमुख हैनरिएटा फ़ोर ने कहा है कि अगर कोविड-10 महामारी से पहले, इस मुद्दे की तात्कालिकता को नहीं समझा गया तो, अब बिल्कुल समझा जाना होगा.

ये भी पढ़ें: क़रीब 17 करोड़ बच्चे, एक साल तक रह गए स्कूली शिक्षा से वंचित

उन्होंने कहा कि देशों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया कराने वाले ढाँचे में और ज़्यादा संसाधन निवेश करने होंगे और समुदायों व स्कूलों में, बच्चों, किशोरों और युवाओं के साथ-साथ उनकी देखभाल करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को सहारा देना होगा.

साथ ही ऐसे परवरिश कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना होगा जिनके तहत कमज़ोर परिस्थितियों वाले परिवारों के बच्चों के लिये वो समर्थन, सहायता और संरक्षा सुनिश्चित किये जा सकें, जिनकी उन्हें ज़रूरत है.

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