मौसम संगठन की चेतावनी – अभूतपूर्व जोखिम की ज़द में हैं समुद्र

संयुक्त राष्ट्र के मौसम वैज्ञानिकों ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन ने दुनिया भर के समुद्रों को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन रक्षक निगरानी प्रणालियों और पूर्व चेतावनी देने वाली सेवाओं में, कोविड-19 महामारी के कारण जो व्यवधान आया है, उन्हें फिर से मुस्तैद बनाए जाने की ज़रूरत है, ताकि तटवर्ती इलाक़ों में रहने वाले और जोखिम का सामना करने वाले समुदायों की रक्षा की जा सके.

विश्व मौसम संगठन (WMO) ने सतर्क करते हुए कहा है कि वर्ष 2020 में, गर्म समुद्रों ने अटलांटिक में रिकॉर्ड तूफ़ानों वाले मौसम के लिये अनुकूल हालात बनाए. इसके अलावा, हिन्द महासगार और दक्षिण-प्रशान्त महासगर में, गहन उष्णकटिबन्धीय तूफ़ानों को बल मिला.

#WorldMetDay is 23 March.The #Ocean, our #climate and #weather. The ocean drives climate and weather. It absorbs around 90% of excess heat trapped by C02. #ClimateChange makes it more vulnerable and hazardous. #OceanDecadeResources at https://t.co/AnMwluwPnO pic.twitter.com/2yuYmEfNIa— World Meteorological Organization (@WMO) March 22, 2021

संगठन ने समुद्रों का जल स्तर बढ़ने के कारण, दीर्घकालीन ख़तरों के बारे में भी आगाह किया है.
विश्व मौसम संगठन के महासचिव प्रोफ़ेसर पैटरी तालस का कहना है, “वैश्विक आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा, तटों से 100 किलोमीटर की दूरी के भीतर रहता है.
बहु आपदाओं के बारे में सतर्क करने वाली पूर्व चेतावनी व अनुमान बताने वाली प्रणालियों के ज़रिये, ऐसे समुदायों को, विनाशकारी तटीय तूफ़ानों से तत्काल बचाने की ज़रूरत है. 
विशाल नील अर्थव्यवस्था
यूएन मौसम एजेंसी के अनुसार समुद्रों के सहारे चलने वाली नील अर्थव्यवस्था का वार्षिक आकार तीन से छह ट्रिलियन डॉलर है, जोकि विश्व व्यापार का तीन चौथाई से भी ज़्यादा है.
नील अर्थव्यवस्था से, दुनिया के लगभग छह अरब लोगों की आजीविका चलती है.
संगठन ने कहा है कि तेज़ रफ़्तार वाली हवाओं, विशाल लहरों, धुन्ध व कोहरे, गड़गड़ाहट वाले तूफ़ानों, समुद्री बर्फ़ जैसी चरम मौसम घटनाओं के कारण, हर साल करोड़ों डॉलर के सामान और सैक़ड़ों लोगों की जानों का नुक़सान होता है.
यूएन एजेंसी ने ध्यान दिलाते हुए कहा है कि समुद्र, वातावरण में ज़रूरत से ज़्यादा मात्रा में मौजूद गर्मी की सोखते हैं, जोकि वहाँ ग्रीन हाउस गैसों के कारण फँसी होती है.
लेकिन इसका गम्भीर परिणाम इस रूप में है कि समुद्रों में गर्मी होने और उनमें रसायनिक बदलाव होने के कारण, पहले ही समुद्री पारिस्थिकि तन्त्र में व्यवधान उत्पन्न हो गया है, समुद्रों पर निर्भर रहने वाले लोगों पर भी इसका गम्भीर प्रभाव हुआ है.
विश्व मौसम संगठन के महासचिव प्रोफ़ेसर पैटारी तालस ने कहा कि ये प्रभाव सैकड़ों वर्षों तक महसूस किया जाएगा. 
जोखिम निगरानी
मंगलवार, 23 मार्च को, विश्व मौसम विज्ञान दिवस के मौक़े पर, संगठन ने, ना केवल ज़मीन पर बल्कि समुद्र में भी, जान-माल की हिफ़ाज़त करने के लिये, रात-दिन काम करने वाले राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय, मौसम केन्द्रों की भूमिका को रेखांकित किया है.
संगठन ने कहा है कि मौसम का पूर्वानुमान लगाने के बारे में, सटीकता और सामयिकता में सुधार आया है, इसके बावजूद, आधुनिक टैक्नॉलॉजी के अभाव वाले जहाज़ और नावें, अक्सर इस महत्वपूर्ण जानकारी से वंचित रह जाते हैं. 
संगठन ने आगाह करते हुए कहा है कि समुद्रों में निगरानी करने वाली क्रान्तिकारी प्रगति के बावजूद, वैश्विक समुद्री निगरानी प्रणाली में, अब भी बड़े भौगोलिक व शोध अन्तर बने हुए हैं. जबकि पूर्वानुमान व अन्य सेवाओं की माँग में, तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है.
कोविड-19 महामारी ने, स्थिति को उस समय और भी ज़्यादा गम्भीर बना दिया जब, मार्च 2020 में, देशों की सरकारों और समुद्री विज्ञान संस्थानों ने, लगभग सभी समुद्री शोध परिवहन-साधनों को वापिस बुला लिया था.
मौसम संगठन ने कहा, “महामारी ने, समुद्रों और मौसम की निगरानी में, व्यावसायिक जहाज़ों के योगदान की क्षमता को भी घटा दिया था. समुद्री सुरक्षा और अन्य प्रणालियाँ जारी नहीं रखी जा सकीं, कुछ मामलों में तो, समय से पहले ही नाकामी मिली.”
विश्व मौसम संगठन के अनुसार, 20 वीं सदी के दौरान, समुद्रों का जल स्तर 15 प्रतिशत बढ़ा है, इनमें हिमनदों (ग्लेशियरों) के पिघलने, गर्म समुद्री पानी का विस्तार होने और ग्रीनलैण्ड व अंटार्कटिका में, बर्फ़ की पूर्व चादरों का भी योगदान है.
अनुमान दर्शाते हैं कि 21वीं सदी समाप्त होते समय, समुद्रों का जल स्तर 30 से 60 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है. ऐसा, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेज़ कमी लाने और वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा में ही रखे जाने के बावजूद भी होगा.
अलबत्ता, अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो, समुद्रों के जल स्तर में बढ़ोत्तरी, 60 से 110 सेंटीमीटर तक हो सकती है., संयुक्त राष्ट्र के मौसम वैज्ञानिकों ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन ने दुनिया भर के समुद्रों को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन रक्षक निगरानी प्रणालियों और पूर्व चेतावनी देने वाली सेवाओं में, कोविड-19 महामारी के कारण जो व्यवधान आया है, उन्हें फिर से मुस्तैद बनाए जाने की ज़रूरत है, ताकि तटवर्ती इलाक़ों में रहने वाले और जोखिम का सामना करने वाले समुदायों की रक्षा की जा सके.

विश्व मौसम संगठन (WMO) ने सतर्क करते हुए कहा है कि वर्ष 2020 में, गर्म समुद्रों ने अटलांटिक में रिकॉर्ड तूफ़ानों वाले मौसम के लिये अनुकूल हालात बनाए. इसके अलावा, हिन्द महासगार और दक्षिण-प्रशान्त महासगर में, गहन उष्णकटिबन्धीय तूफ़ानों को बल मिला.

संगठन ने समुद्रों का जल स्तर बढ़ने के कारण, दीर्घकालीन ख़तरों के बारे में भी आगाह किया है.

विश्व मौसम संगठन के महासचिव प्रोफ़ेसर पैटरी तालस का कहना है, “वैश्विक आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा, तटों से 100 किलोमीटर की दूरी के भीतर रहता है.

बहु आपदाओं के बारे में सतर्क करने वाली पूर्व चेतावनी व अनुमान बताने वाली प्रणालियों के ज़रिये, ऐसे समुदायों को, विनाशकारी तटीय तूफ़ानों से तत्काल बचाने की ज़रूरत है. 

विशाल नील अर्थव्यवस्था

यूएन मौसम एजेंसी के अनुसार समुद्रों के सहारे चलने वाली नील अर्थव्यवस्था का वार्षिक आकार तीन से छह ट्रिलियन डॉलर है, जोकि विश्व व्यापार का तीन चौथाई से भी ज़्यादा है.

नील अर्थव्यवस्था से, दुनिया के लगभग छह अरब लोगों की आजीविका चलती है.

संगठन ने कहा है कि तेज़ रफ़्तार वाली हवाओं, विशाल लहरों, धुन्ध व कोहरे, गड़गड़ाहट वाले तूफ़ानों, समुद्री बर्फ़ जैसी चरम मौसम घटनाओं के कारण, हर साल करोड़ों डॉलर के सामान और सैक़ड़ों लोगों की जानों का नुक़सान होता है.

यूएन एजेंसी ने ध्यान दिलाते हुए कहा है कि समुद्र, वातावरण में ज़रूरत से ज़्यादा मात्रा में मौजूद गर्मी की सोखते हैं, जोकि वहाँ ग्रीन हाउस गैसों के कारण फँसी होती है.

लेकिन इसका गम्भीर परिणाम इस रूप में है कि समुद्रों में गर्मी होने और उनमें रसायनिक बदलाव होने के कारण, पहले ही समुद्री पारिस्थिकि तन्त्र में व्यवधान उत्पन्न हो गया है, समुद्रों पर निर्भर रहने वाले लोगों पर भी इसका गम्भीर प्रभाव हुआ है.

विश्व मौसम संगठन के महासचिव प्रोफ़ेसर पैटारी तालस ने कहा कि ये प्रभाव सैकड़ों वर्षों तक महसूस किया जाएगा. 

जोखिम निगरानी

मंगलवार, 23 मार्च को, विश्व मौसम विज्ञान दिवस के मौक़े पर, संगठन ने, ना केवल ज़मीन पर बल्कि समुद्र में भी, जान-माल की हिफ़ाज़त करने के लिये, रात-दिन काम करने वाले राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय, मौसम केन्द्रों की भूमिका को रेखांकित किया है.

संगठन ने कहा है कि मौसम का पूर्वानुमान लगाने के बारे में, सटीकता और सामयिकता में सुधार आया है, इसके बावजूद, आधुनिक टैक्नॉलॉजी के अभाव वाले जहाज़ और नावें, अक्सर इस महत्वपूर्ण जानकारी से वंचित रह जाते हैं. 

संगठन ने आगाह करते हुए कहा है कि समुद्रों में निगरानी करने वाली क्रान्तिकारी प्रगति के बावजूद, वैश्विक समुद्री निगरानी प्रणाली में, अब भी बड़े भौगोलिक व शोध अन्तर बने हुए हैं. जबकि पूर्वानुमान व अन्य सेवाओं की माँग में, तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है.

कोविड-19 महामारी ने, स्थिति को उस समय और भी ज़्यादा गम्भीर बना दिया जब, मार्च 2020 में, देशों की सरकारों और समुद्री विज्ञान संस्थानों ने, लगभग सभी समुद्री शोध परिवहन-साधनों को वापिस बुला लिया था.

मौसम संगठन ने कहा, “महामारी ने, समुद्रों और मौसम की निगरानी में, व्यावसायिक जहाज़ों के योगदान की क्षमता को भी घटा दिया था. समुद्री सुरक्षा और अन्य प्रणालियाँ जारी नहीं रखी जा सकीं, कुछ मामलों में तो, समय से पहले ही नाकामी मिली.”

विश्व मौसम संगठन के अनुसार, 20 वीं सदी के दौरान, समुद्रों का जल स्तर 15 प्रतिशत बढ़ा है, इनमें हिमनदों (ग्लेशियरों) के पिघलने, गर्म समुद्री पानी का विस्तार होने और ग्रीनलैण्ड व अंटार्कटिका में, बर्फ़ की पूर्व चादरों का भी योगदान है.

अनुमान दर्शाते हैं कि 21वीं सदी समाप्त होते समय, समुद्रों का जल स्तर 30 से 60 सेंटीमीटर तक बढ़ सकता है. ऐसा, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेज़ कमी लाने और वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा में ही रखे जाने के बावजूद भी होगा.

अलबत्ता, अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा तो, समुद्रों के जल स्तर में बढ़ोत्तरी, 60 से 110 सेंटीमीटर तक हो सकती है.

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