म्याँमार: आम जन के साथ एकजुटता और उनकी रक्षा ज़रूरी, यूएन विशेषज्ञ का आग्रह

म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ टॉम एण्ड्रयूज़ ने ध्यान दिलाया है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय का यह दायित्व है कि म्याँमार में, अपने ही देश की सेना द्वारा किये जा रहे हमलों का सामना कर रहे लोगों की रक्षा की जाए. यूएन न्यूज़ के साथ उनकी ख़ास बातचीत का यह दूसरा हिस्सा है, जिसमें विशेष रैपोर्टेयर ने म्याँमार के पड़ोसी देशों से, सुरक्षा की ख़ातिर भाग रहे लोगों को शरण देने का आग्रह किया है.

म्याँमार में, सेना ने लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गई सरकार को, एक फ़रवरी को, बेदख़ल कर दिया था.
इसके बाद से जारी विरोध प्रदर्शनों पर सुरक्षा बलों की दमनात्मक कार्रवाई के दौरान 700 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, हज़ारों घायल हुए हैं जिनमें अनेक की हालत गम्भीर है. लगभग तीन हज़ार लोगों को हिरासत में रखा गया है.
देश में हालात पर स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ टॉम एण्ड्रयूज़ की यूएन न्यूज़ के साथ ख़ास बातचीत का पहला हिस्सा यहाँ पढ़ा जा सकता है.
इस विस्तृत इन्टरव्यू के दूसरे हिस्से में, विशेष रैपोर्टेयर ने म्याँमार के लोगों की हिंसा से रक्षा करने के दायित्व, और देश के भविष्य के लिये उम्मीदों पर चर्चा की है.
यह इण्टरव्यू संक्षिप्तता और स्पष्टता के लिये सम्पादित किया गया है.
यूएन न्यूज़: म्याँमार के लोगों की ओर से ‘रक्षा के दायित्व’ (Responsibility to Protect/R2P) की कई बार पुकार लगाई गई है. इन अपीलों के सम्बन्ध में आपकी क्या राय है… क्या R2P ऐसी सम्भावना है, जिस पर मौजूदा हालात में विचार किया जाना चाहिये? या फिर यह बहुत ज़्यादा या अवास्तविक है?
विशेष रैपोर्टेयर: नहीं, मेरे विचार में यह बहुत तर्कसंगत है. पहले तो, ‘रक्षा का दायित्व’ में यह स्पष्ट है कि अपने लोगों की रक्षा का दायित्व, सरकारों और राष्ट्रों का स्वयं है. लेकिन फिर इसमें आगे इस बात को माना गया है कि अक्सर, वे देश, हमेशा, अपने नागरिकों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते. और इस मामले में, ये एक ऐसा देश है जोकि अपने ही लोगों पर हमले कर रहा है.
इसलिये ‘रक्षा के दायित्व’ के मुताबिक़ अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की यह ज़िम्मेदारी है कि उन देशों में मासूम लोगों के जीवनों की रक्षा के लिये हरसम्भव प्रयास किये जाएँ, जोकि ऐसा करने में अक्षम या अनिच्छुक हैं, या असल में उन पर हमले कर रहे हैं.

John Boalम्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर यूएन के विशेष रैपोर्टेयर टॉम एण्ड्रयूज़.

मेरा सोचना है कि यह पूरी तरह से उपयुक्त है, यह वैसी ही स्थिति ही है जिसमें हमारा रक्षा का दायित्व बनता है.
यूएन चार्टर के सातवें अध्याय के तहत सुरक्षा परिषद बल प्रयोग कर सकती है, और इसका इस्तेमाल उन वजहों में है, जिसके लिये सुरक्षा परिषद अस्तित्व में है, ताकि इस तरह की आपात परिस्थितियों में प्रयास किये जा सकें. 
इसलिये, सवाल यह उठता है, क्या किया जाए, किस तरह कार्रवाई हो, और कार्रवाई का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा क्या है?
कुछ लोगों का विश्वास है – जोकि ग़लत है – कि रक्षा का दायित्व या R2P का अर्थ सैन्य कार्रवाई से है. इसका यह मन्तव्य नहीं है. सैन्य कार्रवाई एक विकल्प है, मगर यह R2P नहीं है.
R2P का अर्थ सर्वोत्तम ढंग से रक्षा करने के प्रयास करना है. हमें कुछ मापदण्डों के भीतर ही विकल्पों पर नज़र डालने की आवश्यकता है.
वे विकल्प जिनका सत्ताधारी सेना पर सबसे अधिक असर हो, और साथ ही, जो लोगों को कम से कम प्रभावित करें. म्याँमार के लोगों की रक्षा कीजिये.
और मुझे डर है कि किसी भी प्रकार के सैन्य हस्तक्षेप से व्यापक पैमाने पर लोगों की मौत होगी.
पहले से ही सेना, मौजूदा हालात पर कहानियाँ बुन रही है. शुरुआत से ही सेना ने कहा है कि हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के लिये अधिकतम संयम बरता जा रहा है. मगर हमने ऐसा कुछ नहीं देखा है.
हमने सेना द्वारा बढ़ती क्रूरता और बढ़ती हिंसा देखी. और हमने बेहद शान्तिपूर्ण निहत्थे प्रदर्शनकारियों को देखा.
और यही वजह है कि सूचना को रोक दिया गया है. जिस वजह से, सैन्य नेतृत्व सूचना के प्रवाह को रोकने के लिये हरसम्भव कोशिशें कर रहा है, वो इसलिये क्योंकि उसे मालूम होने लगा था कि हमारे अपनों पर विश्वास करने के बजाय, उसके दुष्प्रचार पर भरोसा करने की कोशिशें कामयाब नहीं हो रही थीं.
मेरे विचार में, सत्ताधारी सेना, युद्ध में इस्तेमाल हथियारों को लहराने वाले शत्रु से निपटने के लिये प्रशिक्षित है. उनका प्रशिक्षण ऐसे ही हुआ है.
उनके पास भारी मात्रा में हथियारों का ज़ख़ीरा है, और एक बहुत बड़ा सैन्य बल भी. मगर वे एक ऐसे विरोधी से निपटने में ख़ुद को अक्षम पा रहे हैं, जोकि शान्ति के हथियारों का उपयोग कर रहा है.
हमें देश भर में एक अविश्वसनीय, सविनय अवज्ञा आन्दोलन दिखाई दे रहा है, जोकि शक्तिशाली, सृजनात्मक, और अटल है.
और इसमें लोग चतुराई से, विविध प्रकार की तरक़ीबों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसेकि सविनय अवज्ञा और सेना के स्वामित्व वाले व्यवसायों का बहिष्कार.
यह बेहद शक्तिशाली है और इससे दुनिया में, यहाँ के लोगों के लिये व्यापक स्तर पर आदर व सराहना के भाव ने जन्म लिया है.
इसलिये, अगर यह पूर्ण रूप से सैन्य टकराव बनता है तो यह असल में एक ग़लती होगी.
इसके बाद, मेरे विचार में अभी जो हम देख रहे हैं, उससे भी ज़्यादा भयावह क्रूरता का सहारा लिया जाएगा. यह बड़ी संख्या में मासूम लोगों की जान जाने की वजह बनेगी, जिसे टाले जाने की ज़रूरत है.
मैं समझता हूँ, अगर इस सैन्य शासन के हाथों, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे भाई या बहन की मौत या हत्या हो गई होती, तो मैं भी बदला चाहता.
मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही रही होती. मैं इस सम्बन्ध में लोगों के मानस को पूर्ण रूप से समझता हूँ, मगर मेरे विचार में, यह एक ग़लती होती, एक बड़ी गम्भीर ग़लती है.
और मुझे आशा है कि हालात वहाँ तक नहीं पहुंचेंगे.

Unsplash/Anika Mikkelsonम्याँमार के यंगून शहर में, एक पगोड़ा के निकट से गुज़रता एक बौद्ध साधु.

यूएन न्यूज़: तो रक्षा के दायित्व (R2P) के लिये हाँ, मगर सैन्य हस्तक्षेप के लिये मनाही?
विशेष रैपोर्टेयर: हाँ, यह सही है.
यूएन न्यूज़: तो फिर, R2P के कौन से अन्य रूपों का इस्तेमाल किया जाए?
विशेष रैपोर्टेयर: वही, जो कुछ हम अभी देख रहे हैं, मगर पहले से अधिक केन्द्रित ढंग से, ठोस तरीक़े से.
मैं उन देशों की एक शिखर वार्ता को आयोजित होते देखना चाहूंगा, जोकि कार्रवाई के इच्छुक हैं, ताकि वे साथ मिलकर काम करते हुए अपनी कार्रवाई को जोड़ सकें.
इससे वे सुसंगत, स्पष्ट और आपस में जुड़ी हुई होंगी. यह बेहद महत्वपूर्ण है.
और कूटनैतिक पहलें, जिनसे सैन्य शासन को अलग-थलग किये जाने में तेज़ रफ़्तार बढ़ाई जाए, CRPH कमेटी (सेना द्वारा निर्वासित प्रतिनिधियों व सांसदों की समिति), सविनय अवज्ञा आन्दोलन व उन सभी लोगों के साथ नज़दीकी तौर पर ज़्यादा प्रयास किये जाएँ जो कि देश पर हमले के बजाय, उसकी वास्तव में रक्षा के प्रयास कर रहे हैं.
मानवीय सहायता में भी ठोस बढ़ोत्तरी किये जाने की आवश्यकता है, और इसे सैन्य नेतृत्व के ज़रिये नहीं दिया जाना होगा. वे निश्चित रूप से इसे चुरा लेंगे.
मानवीय सहायता को ज़मीनी स्तर पर कार्यरत अन्तरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज संगठनों के ज़रिये पहुँचाया जाना होगा.
और R2P का अर्थ शरणार्थी संकट के लिये तैयार होना है. अगर हालात यूँ ही जारी रहे तो इसे टाला जाना सम्भव नहीं है.
हमने पहले से ही लोग सीमाओं की ओर जाते हुए देखे हैं. मेरे विचार में हमें सुनिश्चित करना होगा कि पड़ोसी देश, उनके यहाँ प्रवेश करने के लोगों के बुनियादी अधिकार का सम्मान करें.
क्योंकि वे इस क्रूरता से अपने जीवन की रक्षा के लिये भाग रहे हैं. उन्हें लोगों की रक्षा व देखभाल करने की आवश्यकता है. और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को, शरणार्थियों की देखभाल कर रहे इन देशों को समर्थन देना होगा.
यह सभी कुछ, रक्षा का दायित्व या R2P के तहत तय रास्तों में आता है.
यूएन न्यूज: आपके विचार में म्याँमार में आगे क्या होगा. क्या म्याँमार में सेना का नियन्त्रण होगा, क्या सड़कों पर लड़ाई लड़ रहे लोगों की जीत होगी, या इन दोनों के बीच में कुछ होगा?
विशेष रैपोर्टेयर: यह एक बहुत, बहुत अच्छा सवाल है. यह एक बेहद अच्छा सवाल है.
मैं मानता हूँ कि मैं सही भविष्यवाणी नहीं कर सकता. जब लोग मुझसे तख़्तापलट से पहले पूछते थे कि क्या तख़्तापलट होगा, तो मेरा अनुमान था कि नहीं.
मैंने कहा कि जनरलों ने संविधान तैयार किया है, वे अपने ही बनाए संविधान को उठाकर फेंक नहीं सकते, उनके पास विशाल नियन्त्रण, ताक़त, सम्पदा और बहुत कुछ है.
इसलिये मेरी कही बातों को सही प्रसंग में समझना होगा.
लेकिन सैन्य तख़्तापलट विफल हो गया है. सैनिक शासन देश को अपने नियन्त्रण में ले पाने में विफल रहा है.
हज़ारों नौकरशाह हड़ताल पर हैं. देश भर में सविनय अवज्ञा आन्दोलन और हड़तालों से अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है.
सैन्य शासन के प्रति विरोध गहरा और व्यापक है. मैंने इससे पहले ऐसा कुछ कभी नहीं देखा. इसने देश को इस हद तक एकजुट कर दिया है, जितना मैंने कभी नहीं देखा.
हर आयु, जातीयता, सामाजिक व आर्थिक समूह के लोग विरोध में एकजुट हैं.
और फिर इस आन्दोलन के अग्रिम मोर्चे पर नेतृत्व कर रहे युवाओं ने अविश्वसनीय साहस, अटलता व रचनात्मकता को प्रदर्शित किया है. देश को बचाने के लिये अपने भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयासों के साथ.

UNICEF/Minzayar Ooम्यांमार में लगभग दस लाख लोगों को मानवीय राहत व संरक्षा की आवश्यकता है.

इसलिये मुझे लगता है कि विरोध की विजय होगी. मेरी भविष्यवाणी है कि यह बेहद चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है.
मुझे डर है कि रौशनी दिखाई देने से पहले, बहुत से अन्धेरा भरे दिन होंगे. मगर देश में सैन्य नेतृत्व के लिये कोई आदर या विश्वसनीयता नहीं है.
सैन्य शासन के पास बस बन्दूकें हैं. और मेरे विचार में लोग उनकी शिनाख़्त एक आपराधिक गैंग के रूप में करते हैं.
एक ऐसा आपराधिक उद्यम जोकि इस उम्मीद में लोगों को लूट रहा है, हत्याएँ और लोगों को आतंकित कर रहा है, कि आतंक व हत्याओं में तेज़ी से लोग अन्तत: उसके अधीन हो जाएंगे.
ऐसा ना होने देने के लिये लोग पहले से कहीं ज़्यादा संकल्पबद्ध हो रहे हैं.
इसलिये भविष्य पर नज़र डालें तो महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जो कुछ कर सकते हैं, वो करें, देश के भीतर उन लोगों को समर्थन देते हुए, जोकि म्याँमार के वास्तव में देशभक्त हैं और जो अपने देश की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं.
उनके साथ खड़ा होने के लिये अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को उन्हें हरसम्भव समर्थन प्रदान करना चाहिये. पहले तो, हिंसा व मौतों पर विराम लगाने के लिये और दूसरे, बन्दियों, अग़वा किये गए लोगों को रिहा करने के लिये.
देश के निर्वाचित नेताओं को रिहा किया जाए और फिर इस अवैध कृत्य से पीछे हटा जाए.
और मैं ये ज़रूर कहना चाहूँगा – मैं म्याँमार के लोगों से अभिभूत हूँ, उन्होंने जिस साहस व संकल्प का प्रदर्शन किया है, उससे मुझे विश्वास है कि वे सफल होंगे.
फ़िलहाल, अभी और इसके निपटने तक अनेक स्याह दिनों से गुज़रना होगा.
यूएन न्यूज: तो आपको अब भी भरोसा है.
विशेष रैपोर्टेयर: हाँ, मुझे है. मुझे भरोसा है. बिल्कुल., म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ टॉम एण्ड्रयूज़ ने ध्यान दिलाया है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय का यह दायित्व है कि म्याँमार में, अपने ही देश की सेना द्वारा किये जा रहे हमलों का सामना कर रहे लोगों की रक्षा की जाए. यूएन न्यूज़ के साथ उनकी ख़ास बातचीत का यह दूसरा हिस्सा है, जिसमें विशेष रैपोर्टेयर ने म्याँमार के पड़ोसी देशों से, सुरक्षा की ख़ातिर भाग रहे लोगों को शरण देने का आग्रह किया है.

म्याँमार में, सेना ने लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गई सरकार को, एक फ़रवरी को, बेदख़ल कर दिया था.

इसके बाद से जारी विरोध प्रदर्शनों पर सुरक्षा बलों की दमनात्मक कार्रवाई के दौरान 700 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, हज़ारों घायल हुए हैं जिनमें अनेक की हालत गम्भीर है. लगभग तीन हज़ार लोगों को हिरासत में रखा गया है.

देश में हालात पर स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ टॉम एण्ड्रयूज़ की यूएन न्यूज़ के साथ ख़ास बातचीत का पहला हिस्सा यहाँ पढ़ा जा सकता है.

इस विस्तृत इन्टरव्यू के दूसरे हिस्से में, विशेष रैपोर्टेयर ने म्याँमार के लोगों की हिंसा से रक्षा करने के दायित्व, और देश के भविष्य के लिये उम्मीदों पर चर्चा की है.

यह इण्टरव्यू संक्षिप्तता और स्पष्टता के लिये सम्पादित किया गया है.

यूएन न्यूज़: म्याँमार के लोगों की ओर से ‘रक्षा के दायित्व’ (Responsibility to Protect/R2P) की कई बार पुकार लगाई गई है. इन अपीलों के सम्बन्ध में आपकी क्या राय है… क्या R2P ऐसी सम्भावना है, जिस पर मौजूदा हालात में विचार किया जाना चाहिये? या फिर यह बहुत ज़्यादा या अवास्तविक है?

विशेष रैपोर्टेयर: नहीं, मेरे विचार में यह बहुत तर्कसंगत है. पहले तो, ‘रक्षा का दायित्व’ में यह स्पष्ट है कि अपने लोगों की रक्षा का दायित्व, सरकारों और राष्ट्रों का स्वयं है. लेकिन फिर इसमें आगे इस बात को माना गया है कि अक्सर, वे देश, हमेशा, अपने नागरिकों को सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकते. और इस मामले में, ये एक ऐसा देश है जोकि अपने ही लोगों पर हमले कर रहा है.

इसलिये ‘रक्षा के दायित्व’ के मुताबिक़ अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की यह ज़िम्मेदारी है कि उन देशों में मासूम लोगों के जीवनों की रक्षा के लिये हरसम्भव प्रयास किये जाएँ, जोकि ऐसा करने में अक्षम या अनिच्छुक हैं, या असल में उन पर हमले कर रहे हैं.


John Boal
म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर यूएन के विशेष रैपोर्टेयर टॉम एण्ड्रयूज़.

मेरा सोचना है कि यह पूरी तरह से उपयुक्त है, यह वैसी ही स्थिति ही है जिसमें हमारा रक्षा का दायित्व बनता है.

यूएन चार्टर के सातवें अध्याय के तहत सुरक्षा परिषद बल प्रयोग कर सकती है, और इसका इस्तेमाल उन वजहों में है, जिसके लिये सुरक्षा परिषद अस्तित्व में है, ताकि इस तरह की आपात परिस्थितियों में प्रयास किये जा सकें. 

इसलिये, सवाल यह उठता है, क्या किया जाए, किस तरह कार्रवाई हो, और कार्रवाई का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा क्या है?

कुछ लोगों का विश्वास है – जोकि ग़लत है – कि रक्षा का दायित्व या R2P का अर्थ सैन्य कार्रवाई से है. इसका यह मन्तव्य नहीं है. सैन्य कार्रवाई एक विकल्प है, मगर यह R2P नहीं है.

R2P का अर्थ सर्वोत्तम ढंग से रक्षा करने के प्रयास करना है. हमें कुछ मापदण्डों के भीतर ही विकल्पों पर नज़र डालने की आवश्यकता है.

वे विकल्प जिनका सत्ताधारी सेना पर सबसे अधिक असर हो, और साथ ही, जो लोगों को कम से कम प्रभावित करें. म्याँमार के लोगों की रक्षा कीजिये.

और मुझे डर है कि किसी भी प्रकार के सैन्य हस्तक्षेप से व्यापक पैमाने पर लोगों की मौत होगी.

पहले से ही सेना, मौजूदा हालात पर कहानियाँ बुन रही है. शुरुआत से ही सेना ने कहा है कि हिंसक प्रदर्शनों से निपटने के लिये अधिकतम संयम बरता जा रहा है. मगर हमने ऐसा कुछ नहीं देखा है.

हमने सेना द्वारा बढ़ती क्रूरता और बढ़ती हिंसा देखी. और हमने बेहद शान्तिपूर्ण निहत्थे प्रदर्शनकारियों को देखा.

और यही वजह है कि सूचना को रोक दिया गया है. जिस वजह से, सैन्य नेतृत्व सूचना के प्रवाह को रोकने के लिये हरसम्भव कोशिशें कर रहा है, वो इसलिये क्योंकि उसे मालूम होने लगा था कि हमारे अपनों पर विश्वास करने के बजाय, उसके दुष्प्रचार पर भरोसा करने की कोशिशें कामयाब नहीं हो रही थीं.

मेरे विचार में, सत्ताधारी सेना, युद्ध में इस्तेमाल हथियारों को लहराने वाले शत्रु से निपटने के लिये प्रशिक्षित है. उनका प्रशिक्षण ऐसे ही हुआ है.

उनके पास भारी मात्रा में हथियारों का ज़ख़ीरा है, और एक बहुत बड़ा सैन्य बल भी. मगर वे एक ऐसे विरोधी से निपटने में ख़ुद को अक्षम पा रहे हैं, जोकि शान्ति के हथियारों का उपयोग कर रहा है.

हमें देश भर में एक अविश्वसनीय, सविनय अवज्ञा आन्दोलन दिखाई दे रहा है, जोकि शक्तिशाली, सृजनात्मक, और अटल है.

और इसमें लोग चतुराई से, विविध प्रकार की तरक़ीबों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसेकि सविनय अवज्ञा और सेना के स्वामित्व वाले व्यवसायों का बहिष्कार.

यह बेहद शक्तिशाली है और इससे दुनिया में, यहाँ के लोगों के लिये व्यापक स्तर पर आदर व सराहना के भाव ने जन्म लिया है.

इसलिये, अगर यह पूर्ण रूप से सैन्य टकराव बनता है तो यह असल में एक ग़लती होगी.

इसके बाद, मेरे विचार में अभी जो हम देख रहे हैं, उससे भी ज़्यादा भयावह क्रूरता का सहारा लिया जाएगा. यह बड़ी संख्या में मासूम लोगों की जान जाने की वजह बनेगी, जिसे टाले जाने की ज़रूरत है.

मैं समझता हूँ, अगर इस सैन्य शासन के हाथों, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे, मेरे भाई या बहन की मौत या हत्या हो गई होती, तो मैं भी बदला चाहता.

मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही रही होती. मैं इस सम्बन्ध में लोगों के मानस को पूर्ण रूप से समझता हूँ, मगर मेरे विचार में, यह एक ग़लती होती, एक बड़ी गम्भीर ग़लती है.

और मुझे आशा है कि हालात वहाँ तक नहीं पहुंचेंगे.


Unsplash/Anika Mikkelson
म्याँमार के यंगून शहर में, एक पगोड़ा के निकट से गुज़रता एक बौद्ध साधु.

यूएन न्यूज़: तो रक्षा के दायित्व (R2P) के लिये हाँ, मगर सैन्य हस्तक्षेप के लिये मनाही?

विशेष रैपोर्टेयर: हाँ, यह सही है.

यूएन न्यूज़: तो फिर, R2P के कौन से अन्य रूपों का इस्तेमाल किया जाए?

विशेष रैपोर्टेयर: वही, जो कुछ हम अभी देख रहे हैं, मगर पहले से अधिक केन्द्रित ढंग से, ठोस तरीक़े से.

मैं उन देशों की एक शिखर वार्ता को आयोजित होते देखना चाहूंगा, जोकि कार्रवाई के इच्छुक हैं, ताकि वे साथ मिलकर काम करते हुए अपनी कार्रवाई को जोड़ सकें.

इससे वे सुसंगत, स्पष्ट और आपस में जुड़ी हुई होंगी. यह बेहद महत्वपूर्ण है.

और कूटनैतिक पहलें, जिनसे सैन्य शासन को अलग-थलग किये जाने में तेज़ रफ़्तार बढ़ाई जाए, CRPH कमेटी (सेना द्वारा निर्वासित प्रतिनिधियों व सांसदों की समिति), सविनय अवज्ञा आन्दोलन व उन सभी लोगों के साथ नज़दीकी तौर पर ज़्यादा प्रयास किये जाएँ जो कि देश पर हमले के बजाय, उसकी वास्तव में रक्षा के प्रयास कर रहे हैं.

मानवीय सहायता में भी ठोस बढ़ोत्तरी किये जाने की आवश्यकता है, और इसे सैन्य नेतृत्व के ज़रिये नहीं दिया जाना होगा. वे निश्चित रूप से इसे चुरा लेंगे.

मानवीय सहायता को ज़मीनी स्तर पर कार्यरत अन्तरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज संगठनों के ज़रिये पहुँचाया जाना होगा.

और R2P का अर्थ शरणार्थी संकट के लिये तैयार होना है. अगर हालात यूँ ही जारी रहे तो इसे टाला जाना सम्भव नहीं है.

हमने पहले से ही लोग सीमाओं की ओर जाते हुए देखे हैं. मेरे विचार में हमें सुनिश्चित करना होगा कि पड़ोसी देश, उनके यहाँ प्रवेश करने के लोगों के बुनियादी अधिकार का सम्मान करें.

क्योंकि वे इस क्रूरता से अपने जीवन की रक्षा के लिये भाग रहे हैं. उन्हें लोगों की रक्षा व देखभाल करने की आवश्यकता है. और अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को, शरणार्थियों की देखभाल कर रहे इन देशों को समर्थन देना होगा.

यह सभी कुछ, रक्षा का दायित्व या R2P के तहत तय रास्तों में आता है.

यूएन न्यूज: आपके विचार में म्याँमार में आगे क्या होगा. क्या म्याँमार में सेना का नियन्त्रण होगा, क्या सड़कों पर लड़ाई लड़ रहे लोगों की जीत होगी, या इन दोनों के बीच में कुछ होगा?

विशेष रैपोर्टेयर: यह एक बहुत, बहुत अच्छा सवाल है. यह एक बेहद अच्छा सवाल है.

मैं मानता हूँ कि मैं सही भविष्यवाणी नहीं कर सकता. जब लोग मुझसे तख़्तापलट से पहले पूछते थे कि क्या तख़्तापलट होगा, तो मेरा अनुमान था कि नहीं.

मैंने कहा कि जनरलों ने संविधान तैयार किया है, वे अपने ही बनाए संविधान को उठाकर फेंक नहीं सकते, उनके पास विशाल नियन्त्रण, ताक़त, सम्पदा और बहुत कुछ है.

इसलिये मेरी कही बातों को सही प्रसंग में समझना होगा.

लेकिन सैन्य तख़्तापलट विफल हो गया है. सैनिक शासन देश को अपने नियन्त्रण में ले पाने में विफल रहा है.

हज़ारों नौकरशाह हड़ताल पर हैं. देश भर में सविनय अवज्ञा आन्दोलन और हड़तालों से अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है.

सैन्य शासन के प्रति विरोध गहरा और व्यापक है. मैंने इससे पहले ऐसा कुछ कभी नहीं देखा. इसने देश को इस हद तक एकजुट कर दिया है, जितना मैंने कभी नहीं देखा.

हर आयु, जातीयता, सामाजिक व आर्थिक समूह के लोग विरोध में एकजुट हैं.

और फिर इस आन्दोलन के अग्रिम मोर्चे पर नेतृत्व कर रहे युवाओं ने अविश्वसनीय साहस, अटलता व रचनात्मकता को प्रदर्शित किया है. देश को बचाने के लिये अपने भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयासों के साथ.


UNICEF/Minzayar Oo
म्यांमार में लगभग दस लाख लोगों को मानवीय राहत व संरक्षा की आवश्यकता है.

इसलिये मुझे लगता है कि विरोध की विजय होगी. मेरी भविष्यवाणी है कि यह बेहद चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है.

मुझे डर है कि रौशनी दिखाई देने से पहले, बहुत से अन्धेरा भरे दिन होंगे. मगर देश में सैन्य नेतृत्व के लिये कोई आदर या विश्वसनीयता नहीं है.

सैन्य शासन के पास बस बन्दूकें हैं. और मेरे विचार में लोग उनकी शिनाख़्त एक आपराधिक गैंग के रूप में करते हैं.

एक ऐसा आपराधिक उद्यम जोकि इस उम्मीद में लोगों को लूट रहा है, हत्याएँ और लोगों को आतंकित कर रहा है, कि आतंक व हत्याओं में तेज़ी से लोग अन्तत: उसके अधीन हो जाएंगे.

ऐसा ना होने देने के लिये लोग पहले से कहीं ज़्यादा संकल्पबद्ध हो रहे हैं.

इसलिये भविष्य पर नज़र डालें तो महत्वपूर्ण बात यह है कि हम जो कुछ कर सकते हैं, वो करें, देश के भीतर उन लोगों को समर्थन देते हुए, जोकि म्याँमार के वास्तव में देशभक्त हैं और जो अपने देश की रक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं.

उनके साथ खड़ा होने के लिये अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को उन्हें हरसम्भव समर्थन प्रदान करना चाहिये. पहले तो, हिंसा व मौतों पर विराम लगाने के लिये और दूसरे, बन्दियों, अग़वा किये गए लोगों को रिहा करने के लिये.

देश के निर्वाचित नेताओं को रिहा किया जाए और फिर इस अवैध कृत्य से पीछे हटा जाए.

और मैं ये ज़रूर कहना चाहूँगा – मैं म्याँमार के लोगों से अभिभूत हूँ, उन्होंने जिस साहस व संकल्प का प्रदर्शन किया है, उससे मुझे विश्वास है कि वे सफल होंगे.

फ़िलहाल, अभी और इसके निपटने तक अनेक स्याह दिनों से गुज़रना होगा.

यूएन न्यूज: तो आपको अब भी भरोसा है.

विशेष रैपोर्टेयर: हाँ, मुझे है. मुझे भरोसा है. बिल्कुल.

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