म्याँमार: सेना की पूरी कोशिश, ‘दुनिया के सामने सच्चाई ना आए’

म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर सयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर टॉम एण्ड्रयूज़ ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास इण्टरव्यू में बताया है कि सैन्य नेतृत्व पूरी कोशिश कर रहा है कि देश से सच को बाहर जाने से रोका जा सके. उनके मुताबिक़ सेना नहीं चाहती है कि म्याँमार में हालात के बारे में, दुनिया को सही जानकारी मिल सके. यूएन विशेषज्ञ ने उन उपायों का इस्तेमाल किये जाने की सिफ़ारिश की है कि जोकि अतीत में सफल साबित हो चुके हैं.  

म्याँमार में लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गई सरकार को सेना ने, एक फ़रवरी को, सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.
इसके बाद से जारी विरोध प्रदर्शनों पर सुरक्षा बलों की दमनात्मक कार्रवाई के दौरान 700 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, हज़ारों घायल हुए हैं जिनमें अनेक की हालत गम्भीर है. लगभग तीन हज़ार लोगों को हिरासत में रखा गया है.
संयुक्त राष्ट्र के स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ टॉम एण्ड्रयूज़ ने यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत में ज़ोर देकर कहा है कि एकजुट व समन्वित प्रतिबन्धों के ज़रिये, म्याँमार के सैन्य नेतृत्व के विरुद्ध कार्रवाई को सुनिश्चित करना होगा. विशेष रैपोर्टेयर के अनुसार अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा अब तक की गई कार्रवाई अपर्याप्त साबित हुई है.
यह इण्टरव्यू संक्षिप्तता और स्पष्टता के लिये सम्पादित किया गया है.
यूएन न्यूज़: म्याँमार से जानकारी मिल पाना लगातार मुश्किल हो रहा होगा, लेकिन फिर भी जहाँ तक आपको मालूम है, ज़मीनी स्तर पर क्या हालात हैं?
विशेष रैपोर्टेयर: आपका कहना सही है. सैन्य नेतृत्व ने सूचना को दुनिया तक ना पहुँचने देने के लिये बहुत ज़्यादा प्रयास किये हैं. ना सिर्फ़ इण्टरनेट पर रोक लगा कर, बल्कि अब ब्रॉडबैण्ड वायरलैस सेवाओं में भी व्यवधान आया है.
मुझे, कम से कम, ऐसे 64 पत्रकारों के बारे में जानकारी है जिन्हें या तो गिरफ़्तार किया गया है या फिर हिरासत में लिया गया है.
इसलिये, काफ़ी ज़्यादा कोशिशें हुई हैं जो बढ़ती रही हैं, ताकि सच्चाई को देश में ही रखा जाए और दुनिया को ना देखने दिया जाए कि यहाँ क्या हो रहा है.

UN Newsम्याँमार पर, स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ थॉमस एण्ड्रयूज़

इसके बावजूद, हम जानते हैं कि म्याँमार में हालात बदतर हो रहे हैं. हम जानते हैं कि कम से कम 700 लोगों की मौतों की पुष्टि हो चुकी है, कम से कम तीन हज़ार लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया है और 45 बच्चों की भी मौत हुई है.
हम जानते हैं कि क्रूरता की तीव्रता लगातार बढ़ रही है और तिकड़में ज़्यादा वीभत्स हो रही हैं. युद्ध में इस्तेमाल किये जाने वाले हथियारों से अहिंसक, निहत्थे लोगों को निशाना बनाया जा रहा है.
व्यथित कर देने वाली जिन घटनाओं की हम निगरानी कर रहे हैं, उनमें ना सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों को बेहद नज़दीक से गोली मारे जाने के मामले हैं, असल में सिर में गोली मारने के मामले हैं.
बल्कि उन्होंने सरकारी टीवी पर चेतावनी जारी की थी कि युवाओं को सिर में गोली लग सकती है.
हम जानते हैं कि म्याँमार के इलाक़ों में, सैनिकों को आतंक का राज फैलाने, सम्पत्तियों को बर्बाद करने, लोगों को हिरासत में लेने और अंधाधुंध गोली चलाने के लिये कहा गया है.
हम जानते हैं कि जिन कुछ बच्चों की मौत हुई है, वो इन्ही आतंकी तिकड़मों का इस्तेमाल किये जाने की वजह से हुई हैं.
अभी स्थिति ख़राब है, और बदतर होती जा रही है. सैन्य नेतृत्व द्वारा इस्तेमाल की जा रही तिकड़में, क्रूर और निर्दयी होती जा रही हैं. लेकिन रोक लगाने की उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद, सच्चाई बाहर आ रही है, और यह एक वीभत्स सच है.
यूएन न्यूज़: अब तक जो अन्तरराष्ट्रीय कार्रवाई हुई है, उसका आप किस तरह से आकलन करेंगे?
विशेष रैपोर्टेयर: अन्तरराष्ट्रीय समुदाय में भारी चिन्ता है. मैं, दुनिया में अनेक ऐसे लोगों को जानता हूँ, जो ख़बरें सुनने और म्याँमार में घटनाक्रम को जानने पर भयभीत हैं.
हमने देखा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तीन बार बैठक हुई और चिन्ताएँ ज़ाहिर की गई हैं. हम जानते हैं कि मानवाधिकार परिषद का भी, इस संकट पर एक विशेष सत्र का आयोजन हुआ, जिसे मैंने सम्बोधित किया.
हालात के बारे में जानकारी पाने के लिये, यूएन महासभा की भी एक बैठक हुई. विभिन्न मसलों पर संयुक्त राष्ट्र के ज़रिये, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय में सम्पर्क व सम्वाद हुआ है.

Unsplash/Zinko Heinम्याँमार के यंगून शहर में, विभिन्न नस्लीय व धार्मीक पृष्ठभूमि के लोग, प्रार्थना सभा में शिरकत करते हुए.

हम जानते हैं कि कुछ देश कार्रवाई कर रहे हैं, और महज़ चिन्ता नहीं जता रहे हैं, वास्तव में कार्रवाई कर रहे हैं. और यह प्रतिबन्धों के रूप में हुई है.
दुनिया भर में देशों ने पाबन्दियों और हथियार प्रतबिन्धों के अनेक रूप लागू किये हैं. प्रतिबन्ध लगाने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है, और पाबन्दियों का स्तर भी बढ़ रहा है.
हम जानते हैं कि अन्य देश भी कार्रवाई पर सोच-विचार कर रहे हैं, मुख्यत: प्रतिबन्धों के ज़रिये.
लोग डरे हुए हैं. लेकिन मेरा विश्वास है कि अभी तक हुई कार्रवाई अपर्याप्त है, और यह उन चुनौतियों के अनुरूप नहीं है, जिनका सामना दुनिया, म्याँमार में कर रही है और जहाँ भयावह हालात हर दिन देखे जा सकते हैं.
अन्तरराष्ट्रीय समुदाय और ज़्यादा प्रयास कर सकता है, और इससे अधिक जवाबी कार्रवाई होनी चाहिये.
यूएन न्यूज़: क्या आप हमें इन प्रतिबन्धों के बारे में जानकारी दे सकते हैं? क्या म्याँमार में सैन्य नेतृत्व को, मान्यता स्वीकृति पाने के प्रयासों में कुछ प्रगति हासिल हुई है?
विशेष रैपोर्टेयर: नहीं, यह तो पक्के तौर पर नहीं हुआ है. मुझे लगता है कि सेना की क्रूरता ने हर किसी को डरा दिया है.
इसे एक सेना के रूप में देखा जाना भी मुश्किल है. मैं अमेरिकी कांग्रेस की सशस्त्र सेवा समिति में सेवारत रहा हूँ, और हमारा दायित्व सेना थी. एक सेना की ज़िम्मेदारी देश व अपने लोगों की सुरक्षा व उनकी रक्षा करना होती है. यह उसका काम है.
म्याँमार की सेना, इसके ठीक विपरीत काम कर रही है. ये लोगों पर हमले कर रही है, नाकि उनकी रक्षा कर रही है.
यह एक तरह का आपराधिक उद्यम है, जिसने अवैध रूप से देश के नेताओं को अग़वा किया है, तख़्तापलट किया है, एक ग़ैरक़ानूनी तख़्तापलट.
उसी संविधान का उल्लंघन किया है जिसका मसौदा उसने तैयार किया था और उसके बाद से लोगों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जा रहा है.
दुनिया ने अनेक प्रकार की जवाबी कार्रवाई को दर्शाया है, अनेक प्रकार की चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं. मैं जानता हूँ कि चीन ने देश में मौजूदा घटनाक्रम पर चिन्ता ज़ाहिर की है और सभी राजनैतिक बन्दियों की रिहाई की माँग की है.
चीन ने स्पष्ट किया है कि म्याँमार में जो कुछ भी चल रहा है, चीन वैसा बिल्कुल नहीं चाहता है. पूरे क्षेत्र में इस सम्बन्ध में चिन्ताएँ व्यक्त की गई हैं.
यह निश्चित है कि सैन्य नेतृत्व का समर्थन खिसक रहा है. क्रूरता की हर कार्रवाई के साथ, इसके समर्थन में कमी आती है, और यह दुनिया की आँखों में अवैध होती जा रही है.
प्रतिबन्धों की एक बड़ी संख्या है. योरोपीय संघ ने कुछ ही समय पहले पाबन्दियाँ पारित करते हुए, अपने प्रतिबन्धों का स्तर बढ़ाया है. अमेरिका ने तीन अलग-अलग अवसरों पर अपने प्रतिबन्ध बढ़ाए हैं.
और ये पाबन्दियाँ भिन्न-भिन्न रूपों में आती है. ये उन व्यक्तियों के विरुद्ध हो सकती हैं, जोकि इन क्रूरतापूर्ण कार्रवाइयों के लिये ज़िम्मेदार हैं.
मगर अब रुझान ना सिर्फ़ लक्षित व्यक्तियों को निशाना बनाने का है, बल्कि व्यवसायिक व व्यापारिक हितों को भी लपेटे में लेने का है.
ब्रिटेन ने भी अपने प्रतिबन्धों का स्तर बढ़ाया है, और मैं अन्य देशों के बारे में जानता हूँ, जोकि ऐसे ही क़दम उठाने की सोच रहे हैं.
यूएन न्यूज़: म्याँमार में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष दूत ने कहा है कि सैन्य नेतृत्व में उप कमाण्डर ने उन्हें सीधे तौर पर बताया कि सेना को प्रतिबन्धों से भय नहीं है. उन पर पहले भी पाबन्दियाँ लगाई जा चुकी हैं और उन्हें अलग-थलग पड़ने से भी डर नहीं है. तो फिर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के पास, ज़मीनी हालात में बदलाव लाने का क्या चारा रह जाता है?
विशेष रैपोर्टेयर: इसकी शुरुआत, उन पर विश्वास ना करके की जा सकती है. सैन्य नेतृत्व ने हमेशा कहा है कि पाबन्दियाँ कारगर नहीं है. उन्होंने हमेशा कहा कि अन्तरराष्ट्रीय रूप से अलग-थलग पड़ने का उन्हें कोई डर नहीं है. और वे शायद हमेशा यही कहेंगे. इसलिये ये कोई नई बात नहीं है. मगर हम जानते हैं कि ये सच नहीं है.
हम जानते हैं कि सुधार, जिन्हें तख़्तापलट के दौरान उखाड़ फेंका गया, वो इसलिये नहीं हुए क्योंकि सैन्य नेता एक दिन जागे, और उन्हें लगा कि हमसे शायद ग़लतियाँ हो रही हैं.

Unsplash/Justin Minफ़रवरी 2021 में तख़्ता पलट के बाद से ही म्याँमार में विरोध प्रदर्शन जारी हैं.

उन्होंने सोचा कि अब हमें शायद मानवाधिकारों का सम्मान करना चाहिये और लोगों को, अपने नेताओं की जवाबदेही तय किये जाने का अवसर देना चाहिये.
नहीं, ये ऐसे नहीं हुआ. ये सुधार इन्हीं पाबन्दियों के कारण हुए, और हम जानते हैं कि इन नेताओं ने दुनिया से प्रतिबन्ध हटाए जाने की अपील की थी.
हम जानते हैं कि इससे स्थिति बदलती है. हम जानते हैं कि इन प्रतिबन्धों का उन पर असर हुआ था, और उसके बाद सुधार हुए.
सैन्य नेतृत्व हमेशा कहेगा कि प्रतिबन्धों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, और इससे किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिये.
इसलिये मुझे लगता है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को सबसे पहले, एक दूसरे के साथ बातचीत करनी होगी. सभी विकल्पों व आयामों पर पूर्ण चर्चा के लिये निरन्तर कूटनैतिक सम्वाद व सम्पर्क की आवश्यकता है ताकि हम एकजुट कार्रवाई के हरसम्भव प्रयास कर सकें.
यह समझने के लिये, हर देश एक ही रास्ते पर आगे बढ़ना नहीं चाहता, या एक ही प्रकार की कार्रवाई को होते हुए नहीं देखना चाहता. भले ही, मेरी नज़र में हर देश ने म्याँमार में घटनाक्रम पर गम्भीर चिन्ताएँ ज़ाहिर की हों.
वो देश, जोकि मानते हैं कि म्याँमार में भयावह हालात के मद्देनज़र कार्रवाई महत्वपूर्ण है, मुझे लगता है कि उन्हें ना सिर्फ़ प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना चाहिये, बल्कि समन्वित प्रतिबन्ध के बारे में भी सोचना चाहिये.
अनेक और भिन्न-भिन्न प्रकार की पाबन्दियों में एकजुटता होनी चाहिये, इन देशों को एक साथ आना चाहिये, अपने विकल्पों पर चर्चा करनी चाहिये, और फिर जहाँ तक सम्भव हो, अपने प्रतिबन्धों में सम्बन्ध क़ायम करते हुए सामूहिक असर के प्रयास करने चाहिये.
यही बात, हथियारों पर प्रतिबन्ध – दोहरे इस्तेमाल की टैक्नॉलॉजी, निगरानी और अन्य प्रकार की टैक्नॉलॉजी पर लागू होती है ताकि राजस्व पर अंकुश लगाने और सैन्य क्रूरता को बल प्रदान करने वाले प्रवाह को रोका जा सके.
ऐसे साधनों को हटाया जाना होगा जिनसे, सेना अपने आतंक का राज जारी रखे हुए है – प्रतिबन्धों, हथियार पर पाबन्दियों के ज़रिये, समन्वित कार्रवाई के तहत.
आदर्श परिस्थितियों में, यह कार्य सुरक्षा परिषद कर सकती है. इन क्रूरताओं के लिये ज़िम्मेदार लोगों पर, अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में कार्रवाई के लिये भी प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.
मुझे बताया गया है कि ऐसा होगा नहीं, लोगों का कहना है कि इस मुद्दे पर सुरक्षा परिषद में एकजुट नज़रिया नहीं है, और इस प्रकार के किसी भी क़दम को वीटो कर दिया जाएगा. शायद यह बात सच है, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि यह सच है. क्यों? क्योंकि इसे पहले आज़माया नहीं गया है.
सुरक्षा परिषद के समक्ष अभी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया, जिस पर चर्चा, बहस हुई हो और मतदान हुआ हो. ऐसा हुआ नहीं है. इसलिये ऐसा होने का विकल्प होगा. और अगर, ऐसे देश हैं, जोकि इस प्रकार की कार्रवाई के विरोध में हैं, चाहे वजह कुछ भी हो, तो वे इसके विरोध में मतदान कर सकते हैं, वीटो कर सकते हैं और अपने रुख़ को दुनिया के सामने रख सकते हैं.
सुरक्षा परिषद का यह काम है – ऐसे संकट के दौरान सम्पर्क व बातचीत, जिससे ना सिर्फ़ देश बल्कि क्षेत्र पर भी असर पड़ता हो.
यह एक मानवीय सकंट है, जिसके प्रभाव क्षेत्र में महसूस किये जा सकते हैं. यहाँ बहुत कुछ दाँव पर लगा है. सुरक्षा परिषद का गठन, इसी वजह से किया गया था.

Unsplash/Macau Photo Agencyम्याँमार की लोकतान्त्रिक सरकार के समर्थन में, चीन के मकाऊ में एक प्रदर्शन. ये लोग म्याँमार की सेना (तत्मादाव) द्वारा तख़्तापलट का विरोध कर रहे हैं.

इसलिये यह मानना तर्कसंगत है कि इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी और कार्रवाई पर विचार-विमर्श होगा.
यूएन न्यूज़: बड़ी संख्या में देशों ने कहा है कि वे एकतरफ़ा प्रतिबन्धों के पक्ष में नहीं हैं, और कि ऐसे उपायों से सेना और ज़्यादा हिंसा के लिये भड़केगी और हालात बदतर हो जाएंगे. क्या आप कुछ टिप्पणी करना चाहेंगे?
विशेष रैपोर्टेयर: एकतरफ़ा प्रतिबन्धों की तुलना में बहुपक्षीय प्रतिबन्ध बेहतर हैं, इसलिये मैं देशों से साथ मिलकर पाबन्दियाँ लगाने का आग्रह कर रहा हूँ.
अब यह तर्क कि प्रतिबन्ध लगाने से हालात और ख़राब हो जाएँगे. पहले तो, जैसाकि मैंने कहा, हम इतिहास से जानते हैं कि प्रतिबन्धों से सैन्य नेताओं के व्यवहार में बेहतरी के लिये बदलाव आया है. इनका सकारात्मक असर रहा है.
हम जानते हैं कि चिन्ता की अभिव्यक्ति और भिन्न-भिन्न प्रतिबन्धों की सीमित कार्रवाई या असमन्वित रूप से पाबन्दियों के बाद सेना द्वारा हिंसा व क्रूरता में बढ़ोत्तरी हुई है.
मुझे लगता है कि यह एक बेहद मज़बूत तर्क है, कि वे रणनीतियाँ, जिनका अतीत में इस्तेमाल करना कारगर रहा है, वे मौजूदा समय में भी काम आ सकती हैं.
हम जानते हैं कि दुनिया द्वारा की गई सीमित कार्रवाई से म्याँमार की जनता के विरुद्ध हिंसा व क्रूरता में कमी नहीं आई है. इसलिये मेरी नज़र में, देशों द्वारा समन्वित प्रतिबन्धों, मज़बूत व अर्थपूर्ण कार्रवाई के विकल्प की तलाश करने के पक्ष में एक मज़बूत तर्क हैं.
वो प्रयास करने के लिये जिनके बारे में हमें जानकारी है कि वे अतीत में सफल रहे हैं, उन्हें केन्द्रित, समन्वित ढँग से इस्तेमाल किया जाए, प्रतिबन्धों व हथियार की ख़रीद-फ़रोख्त पर पाबन्दियों के ज़रिये.
मुझे लगता है कि इसे आज़मा कर देखा जाना चाहिये, यह कोशिश की जानी चाहिये क्योंकि हम जानते हैं कि हालात ख़राब हैं और वे बदतर होते जा रहे हैं.
इसलिये क्यों ना कुछ ऐसा आज़माया जाए जिसके अतीत में सफलता के तथ्य मौजूद हैं. उसके अब प्रयास क्यों ना किये जाएँ? मैं देशों से इसी बात पर सोच-विचार करने का अनुरोध कर रहा हूँ., म्याँमार में मानवाधिकारों की स्थिति पर सयुक्त राष्ट्र के विशेष रैपोर्टेयर टॉम एण्ड्रयूज़ ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास इण्टरव्यू में बताया है कि सैन्य नेतृत्व पूरी कोशिश कर रहा है कि देश से सच को बाहर जाने से रोका जा सके. उनके मुताबिक़ सेना नहीं चाहती है कि म्याँमार में हालात के बारे में, दुनिया को सही जानकारी मिल सके. यूएन विशेषज्ञ ने उन उपायों का इस्तेमाल किये जाने की सिफ़ारिश की है कि जोकि अतीत में सफल साबित हो चुके हैं.  

म्याँमार में लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गई सरकार को सेना ने, एक फ़रवरी को, सत्ता से बेदख़ल कर दिया था.

इसके बाद से जारी विरोध प्रदर्शनों पर सुरक्षा बलों की दमनात्मक कार्रवाई के दौरान 700 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई है, हज़ारों घायल हुए हैं जिनमें अनेक की हालत गम्भीर है. लगभग तीन हज़ार लोगों को हिरासत में रखा गया है.

संयुक्त राष्ट्र के स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ टॉम एण्ड्रयूज़ ने यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत में ज़ोर देकर कहा है कि एकजुट व समन्वित प्रतिबन्धों के ज़रिये, म्याँमार के सैन्य नेतृत्व के विरुद्ध कार्रवाई को सुनिश्चित करना होगा. विशेष रैपोर्टेयर के अनुसार अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा अब तक की गई कार्रवाई अपर्याप्त साबित हुई है.

यह इण्टरव्यू संक्षिप्तता और स्पष्टता के लिये सम्पादित किया गया है.

यूएन न्यूज़: म्याँमार से जानकारी मिल पाना लगातार मुश्किल हो रहा होगा, लेकिन फिर भी जहाँ तक आपको मालूम है, ज़मीनी स्तर पर क्या हालात हैं?

विशेष रैपोर्टेयर: आपका कहना सही है. सैन्य नेतृत्व ने सूचना को दुनिया तक ना पहुँचने देने के लिये बहुत ज़्यादा प्रयास किये हैं. ना सिर्फ़ इण्टरनेट पर रोक लगा कर, बल्कि अब ब्रॉडबैण्ड वायरलैस सेवाओं में भी व्यवधान आया है.

मुझे, कम से कम, ऐसे 64 पत्रकारों के बारे में जानकारी है जिन्हें या तो गिरफ़्तार किया गया है या फिर हिरासत में लिया गया है.

इसलिये, काफ़ी ज़्यादा कोशिशें हुई हैं जो बढ़ती रही हैं, ताकि सच्चाई को देश में ही रखा जाए और दुनिया को ना देखने दिया जाए कि यहाँ क्या हो रहा है.


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म्याँमार पर, स्वतन्त्र मानवाधिकार विशेषज्ञ थॉमस एण्ड्रयूज़

इसके बावजूद, हम जानते हैं कि म्याँमार में हालात बदतर हो रहे हैं. हम जानते हैं कि कम से कम 700 लोगों की मौतों की पुष्टि हो चुकी है, कम से कम तीन हज़ार लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया है और 45 बच्चों की भी मौत हुई है.

हम जानते हैं कि क्रूरता की तीव्रता लगातार बढ़ रही है और तिकड़में ज़्यादा वीभत्स हो रही हैं. युद्ध में इस्तेमाल किये जाने वाले हथियारों से अहिंसक, निहत्थे लोगों को निशाना बनाया जा रहा है.

व्यथित कर देने वाली जिन घटनाओं की हम निगरानी कर रहे हैं, उनमें ना सिर्फ़ प्रदर्शनकारियों को बेहद नज़दीक से गोली मारे जाने के मामले हैं, असल में सिर में गोली मारने के मामले हैं.

बल्कि उन्होंने सरकारी टीवी पर चेतावनी जारी की थी कि युवाओं को सिर में गोली लग सकती है.

हम जानते हैं कि म्याँमार के इलाक़ों में, सैनिकों को आतंक का राज फैलाने, सम्पत्तियों को बर्बाद करने, लोगों को हिरासत में लेने और अंधाधुंध गोली चलाने के लिये कहा गया है.

हम जानते हैं कि जिन कुछ बच्चों की मौत हुई है, वो इन्ही आतंकी तिकड़मों का इस्तेमाल किये जाने की वजह से हुई हैं.

अभी स्थिति ख़राब है, और बदतर होती जा रही है. सैन्य नेतृत्व द्वारा इस्तेमाल की जा रही तिकड़में, क्रूर और निर्दयी होती जा रही हैं. लेकिन रोक लगाने की उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद, सच्चाई बाहर आ रही है, और यह एक वीभत्स सच है.

यूएन न्यूज़: अब तक जो अन्तरराष्ट्रीय कार्रवाई हुई है, उसका आप किस तरह से आकलन करेंगे?

विशेष रैपोर्टेयर: अन्तरराष्ट्रीय समुदाय में भारी चिन्ता है. मैं, दुनिया में अनेक ऐसे लोगों को जानता हूँ, जो ख़बरें सुनने और म्याँमार में घटनाक्रम को जानने पर भयभीत हैं.

हमने देखा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तीन बार बैठक हुई और चिन्ताएँ ज़ाहिर की गई हैं. हम जानते हैं कि मानवाधिकार परिषद का भी, इस संकट पर एक विशेष सत्र का आयोजन हुआ, जिसे मैंने सम्बोधित किया.

हालात के बारे में जानकारी पाने के लिये, यूएन महासभा की भी एक बैठक हुई. विभिन्न मसलों पर संयुक्त राष्ट्र के ज़रिये, अन्तरराष्ट्रीय समुदाय में सम्पर्क व सम्वाद हुआ है.


Unsplash/Zinko Hein
म्याँमार के यंगून शहर में, विभिन्न नस्लीय व धार्मीक पृष्ठभूमि के लोग, प्रार्थना सभा में शिरकत करते हुए.

हम जानते हैं कि कुछ देश कार्रवाई कर रहे हैं, और महज़ चिन्ता नहीं जता रहे हैं, वास्तव में कार्रवाई कर रहे हैं. और यह प्रतिबन्धों के रूप में हुई है.

दुनिया भर में देशों ने पाबन्दियों और हथियार प्रतबिन्धों के अनेक रूप लागू किये हैं. प्रतिबन्ध लगाने वाले देशों की संख्या बढ़ रही है, और पाबन्दियों का स्तर भी बढ़ रहा है.

हम जानते हैं कि अन्य देश भी कार्रवाई पर सोच-विचार कर रहे हैं, मुख्यत: प्रतिबन्धों के ज़रिये.

लोग डरे हुए हैं. लेकिन मेरा विश्वास है कि अभी तक हुई कार्रवाई अपर्याप्त है, और यह उन चुनौतियों के अनुरूप नहीं है, जिनका सामना दुनिया, म्याँमार में कर रही है और जहाँ भयावह हालात हर दिन देखे जा सकते हैं.

अन्तरराष्ट्रीय समुदाय और ज़्यादा प्रयास कर सकता है, और इससे अधिक जवाबी कार्रवाई होनी चाहिये.

यूएन न्यूज़: क्या आप हमें इन प्रतिबन्धों के बारे में जानकारी दे सकते हैं? क्या म्याँमार में सैन्य नेतृत्व को, मान्यता स्वीकृति पाने के प्रयासों में कुछ प्रगति हासिल हुई है?

विशेष रैपोर्टेयर: नहीं, यह तो पक्के तौर पर नहीं हुआ है. मुझे लगता है कि सेना की क्रूरता ने हर किसी को डरा दिया है.

इसे एक सेना के रूप में देखा जाना भी मुश्किल है. मैं अमेरिकी कांग्रेस की सशस्त्र सेवा समिति में सेवारत रहा हूँ, और हमारा दायित्व सेना थी. एक सेना की ज़िम्मेदारी देश व अपने लोगों की सुरक्षा व उनकी रक्षा करना होती है. यह उसका काम है.

म्याँमार की सेना, इसके ठीक विपरीत काम कर रही है. ये लोगों पर हमले कर रही है, नाकि उनकी रक्षा कर रही है.

यह एक तरह का आपराधिक उद्यम है, जिसने अवैध रूप से देश के नेताओं को अग़वा किया है, तख़्तापलट किया है, एक ग़ैरक़ानूनी तख़्तापलट.

उसी संविधान का उल्लंघन किया है जिसका मसौदा उसने तैयार किया था और उसके बाद से लोगों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जा रहा है.

दुनिया ने अनेक प्रकार की जवाबी कार्रवाई को दर्शाया है, अनेक प्रकार की चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं. मैं जानता हूँ कि चीन ने देश में मौजूदा घटनाक्रम पर चिन्ता ज़ाहिर की है और सभी राजनैतिक बन्दियों की रिहाई की माँग की है.

चीन ने स्पष्ट किया है कि म्याँमार में जो कुछ भी चल रहा है, चीन वैसा बिल्कुल नहीं चाहता है. पूरे क्षेत्र में इस सम्बन्ध में चिन्ताएँ व्यक्त की गई हैं.

यह निश्चित है कि सैन्य नेतृत्व का समर्थन खिसक रहा है. क्रूरता की हर कार्रवाई के साथ, इसके समर्थन में कमी आती है, और यह दुनिया की आँखों में अवैध होती जा रही है.

प्रतिबन्धों की एक बड़ी संख्या है. योरोपीय संघ ने कुछ ही समय पहले पाबन्दियाँ पारित करते हुए, अपने प्रतिबन्धों का स्तर बढ़ाया है. अमेरिका ने तीन अलग-अलग अवसरों पर अपने प्रतिबन्ध बढ़ाए हैं.

और ये पाबन्दियाँ भिन्न-भिन्न रूपों में आती है. ये उन व्यक्तियों के विरुद्ध हो सकती हैं, जोकि इन क्रूरतापूर्ण कार्रवाइयों के लिये ज़िम्मेदार हैं.

मगर अब रुझान ना सिर्फ़ लक्षित व्यक्तियों को निशाना बनाने का है, बल्कि व्यवसायिक व व्यापारिक हितों को भी लपेटे में लेने का है.

ब्रिटेन ने भी अपने प्रतिबन्धों का स्तर बढ़ाया है, और मैं अन्य देशों के बारे में जानता हूँ, जोकि ऐसे ही क़दम उठाने की सोच रहे हैं.

यूएन न्यूज़: म्याँमार में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की विशेष दूत ने कहा है कि सैन्य नेतृत्व में उप कमाण्डर ने उन्हें सीधे तौर पर बताया कि सेना को प्रतिबन्धों से भय नहीं है. उन पर पहले भी पाबन्दियाँ लगाई जा चुकी हैं और उन्हें अलग-थलग पड़ने से भी डर नहीं है. तो फिर अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के पास, ज़मीनी हालात में बदलाव लाने का क्या चारा रह जाता है?

विशेष रैपोर्टेयर: इसकी शुरुआत, उन पर विश्वास ना करके की जा सकती है. सैन्य नेतृत्व ने हमेशा कहा है कि पाबन्दियाँ कारगर नहीं है. उन्होंने हमेशा कहा कि अन्तरराष्ट्रीय रूप से अलग-थलग पड़ने का उन्हें कोई डर नहीं है. और वे शायद हमेशा यही कहेंगे. इसलिये ये कोई नई बात नहीं है. मगर हम जानते हैं कि ये सच नहीं है.

हम जानते हैं कि सुधार, जिन्हें तख़्तापलट के दौरान उखाड़ फेंका गया, वो इसलिये नहीं हुए क्योंकि सैन्य नेता एक दिन जागे, और उन्हें लगा कि हमसे शायद ग़लतियाँ हो रही हैं.


Unsplash/Justin Min
फ़रवरी 2021 में तख़्ता पलट के बाद से ही म्याँमार में विरोध प्रदर्शन जारी हैं.

उन्होंने सोचा कि अब हमें शायद मानवाधिकारों का सम्मान करना चाहिये और लोगों को, अपने नेताओं की जवाबदेही तय किये जाने का अवसर देना चाहिये.

नहीं, ये ऐसे नहीं हुआ. ये सुधार इन्हीं पाबन्दियों के कारण हुए, और हम जानते हैं कि इन नेताओं ने दुनिया से प्रतिबन्ध हटाए जाने की अपील की थी.

हम जानते हैं कि इससे स्थिति बदलती है. हम जानते हैं कि इन प्रतिबन्धों का उन पर असर हुआ था, और उसके बाद सुधार हुए.

सैन्य नेतृत्व हमेशा कहेगा कि प्रतिबन्धों से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, और इससे किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिये.

इसलिये मुझे लगता है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को सबसे पहले, एक दूसरे के साथ बातचीत करनी होगी. सभी विकल्पों व आयामों पर पूर्ण चर्चा के लिये निरन्तर कूटनैतिक सम्वाद व सम्पर्क की आवश्यकता है ताकि हम एकजुट कार्रवाई के हरसम्भव प्रयास कर सकें.

यह समझने के लिये, हर देश एक ही रास्ते पर आगे बढ़ना नहीं चाहता, या एक ही प्रकार की कार्रवाई को होते हुए नहीं देखना चाहता. भले ही, मेरी नज़र में हर देश ने म्याँमार में घटनाक्रम पर गम्भीर चिन्ताएँ ज़ाहिर की हों.

वो देश, जोकि मानते हैं कि म्याँमार में भयावह हालात के मद्देनज़र कार्रवाई महत्वपूर्ण है, मुझे लगता है कि उन्हें ना सिर्फ़ प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना चाहिये, बल्कि समन्वित प्रतिबन्ध के बारे में भी सोचना चाहिये.

अनेक और भिन्न-भिन्न प्रकार की पाबन्दियों में एकजुटता होनी चाहिये, इन देशों को एक साथ आना चाहिये, अपने विकल्पों पर चर्चा करनी चाहिये, और फिर जहाँ तक सम्भव हो, अपने प्रतिबन्धों में सम्बन्ध क़ायम करते हुए सामूहिक असर के प्रयास करने चाहिये.

यही बात, हथियारों पर प्रतिबन्ध – दोहरे इस्तेमाल की टैक्नॉलॉजी, निगरानी और अन्य प्रकार की टैक्नॉलॉजी पर लागू होती है ताकि राजस्व पर अंकुश लगाने और सैन्य क्रूरता को बल प्रदान करने वाले प्रवाह को रोका जा सके.

ऐसे साधनों को हटाया जाना होगा जिनसे, सेना अपने आतंक का राज जारी रखे हुए है – प्रतिबन्धों, हथियार पर पाबन्दियों के ज़रिये, समन्वित कार्रवाई के तहत.

आदर्श परिस्थितियों में, यह कार्य सुरक्षा परिषद कर सकती है. इन क्रूरताओं के लिये ज़िम्मेदार लोगों पर, अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय में कार्रवाई के लिये भी प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.

मुझे बताया गया है कि ऐसा होगा नहीं, लोगों का कहना है कि इस मुद्दे पर सुरक्षा परिषद में एकजुट नज़रिया नहीं है, और इस प्रकार के किसी भी क़दम को वीटो कर दिया जाएगा. शायद यह बात सच है, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि यह सच है. क्यों? क्योंकि इसे पहले आज़माया नहीं गया है.

सुरक्षा परिषद के समक्ष अभी ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं रखा गया, जिस पर चर्चा, बहस हुई हो और मतदान हुआ हो. ऐसा हुआ नहीं है. इसलिये ऐसा होने का विकल्प होगा. और अगर, ऐसे देश हैं, जोकि इस प्रकार की कार्रवाई के विरोध में हैं, चाहे वजह कुछ भी हो, तो वे इसके विरोध में मतदान कर सकते हैं, वीटो कर सकते हैं और अपने रुख़ को दुनिया के सामने रख सकते हैं.

सुरक्षा परिषद का यह काम है – ऐसे संकट के दौरान सम्पर्क व बातचीत, जिससे ना सिर्फ़ देश बल्कि क्षेत्र पर भी असर पड़ता हो.

यह एक मानवीय सकंट है, जिसके प्रभाव क्षेत्र में महसूस किये जा सकते हैं. यहाँ बहुत कुछ दाँव पर लगा है. सुरक्षा परिषद का गठन, इसी वजह से किया गया था.


Unsplash/Macau Photo Agency
म्याँमार की लोकतान्त्रिक सरकार के समर्थन में, चीन के मकाऊ में एक प्रदर्शन. ये लोग म्याँमार की सेना (तत्मादाव) द्वारा तख़्तापलट का विरोध कर रहे हैं.

इसलिये यह मानना तर्कसंगत है कि इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी और कार्रवाई पर विचार-विमर्श होगा.

यूएन न्यूज़: बड़ी संख्या में देशों ने कहा है कि वे एकतरफ़ा प्रतिबन्धों के पक्ष में नहीं हैं, और कि ऐसे उपायों से सेना और ज़्यादा हिंसा के लिये भड़केगी और हालात बदतर हो जाएंगे. क्या आप कुछ टिप्पणी करना चाहेंगे?

विशेष रैपोर्टेयर: एकतरफ़ा प्रतिबन्धों की तुलना में बहुपक्षीय प्रतिबन्ध बेहतर हैं, इसलिये मैं देशों से साथ मिलकर पाबन्दियाँ लगाने का आग्रह कर रहा हूँ.

अब यह तर्क कि प्रतिबन्ध लगाने से हालात और ख़राब हो जाएँगे. पहले तो, जैसाकि मैंने कहा, हम इतिहास से जानते हैं कि प्रतिबन्धों से सैन्य नेताओं के व्यवहार में बेहतरी के लिये बदलाव आया है. इनका सकारात्मक असर रहा है.

हम जानते हैं कि चिन्ता की अभिव्यक्ति और भिन्न-भिन्न प्रतिबन्धों की सीमित कार्रवाई या असमन्वित रूप से पाबन्दियों के बाद सेना द्वारा हिंसा व क्रूरता में बढ़ोत्तरी हुई है.

मुझे लगता है कि यह एक बेहद मज़बूत तर्क है, कि वे रणनीतियाँ, जिनका अतीत में इस्तेमाल करना कारगर रहा है, वे मौजूदा समय में भी काम आ सकती हैं.

हम जानते हैं कि दुनिया द्वारा की गई सीमित कार्रवाई से म्याँमार की जनता के विरुद्ध हिंसा व क्रूरता में कमी नहीं आई है. इसलिये मेरी नज़र में, देशों द्वारा समन्वित प्रतिबन्धों, मज़बूत व अर्थपूर्ण कार्रवाई के विकल्प की तलाश करने के पक्ष में एक मज़बूत तर्क हैं.

वो प्रयास करने के लिये जिनके बारे में हमें जानकारी है कि वे अतीत में सफल रहे हैं, उन्हें केन्द्रित, समन्वित ढँग से इस्तेमाल किया जाए, प्रतिबन्धों व हथियार की ख़रीद-फ़रोख्त पर पाबन्दियों के ज़रिये.

मुझे लगता है कि इसे आज़मा कर देखा जाना चाहिये, यह कोशिश की जानी चाहिये क्योंकि हम जानते हैं कि हालात ख़राब हैं और वे बदतर होते जा रहे हैं.

इसलिये क्यों ना कुछ ऐसा आज़माया जाए जिसके अतीत में सफलता के तथ्य मौजूद हैं. उसके अब प्रयास क्यों ना किये जाएँ? मैं देशों से इसी बात पर सोच-विचार करने का अनुरोध कर रहा हूँ.

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