म्यामाँर: राजनैतिक संकट के बीच लोगों तक भोजन पहुँचाने की मुहिम

संयुक्त राष्ट्र का विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP), म्याँमार में मौजूदा राजनैतिक संकट के कारण उत्पन्न हालात के बीच खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे लाखों लोगों के लिये भोजन व अन्य सहायता पहुँचाने के प्रबन्ध करने में सक्रिय है. म्याँमार में यूएन खाद्य एजेंसी के उप निदेशक मार्कस प्रायर ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में बताया कि बैंकिग व्यवस्था चरमराने के कारण, लोगों को, भोजन असुरक्षा के साथ-साथ, भोजन ख़रीदने के लिये नक़दी का इन्तेज़ाम करने की भी परेशानी भी हो रही है…

म्याँमार, फ़रवरी से राजनैतिक संकट से ग्रस्त है. ऐसे में देश के लिये डब्ल्यूएफ़पी की सबसे बड़ी चिन्ता क्या है?
खाद्य सुरक्षा की स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो, यह सुनिश्चित करने के लिये ज़िम्मेदार संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी के रूप में, हम काफ़ी समय से चिन्तित हैं और देश के कई हिस्सों में बदतर होती स्थिति पर लगातार नज़र रख रहे थे. सबसे पहले तो म्याँमार में पहले से ही गम्भीर रूप से ग़रीबी व्याप्त है.
हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में हालात सुधरे भी हैं. फिर पिछले साल, कोविड-19 के कारण बहुत से लोगों के रोज़गार चले गए, आजीविकाएँ छिन गईं, विदेशों में  रहने वाले देशवासियों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि भी आनी बन्द हो गई क्योंकि थाईलैण्ड और अन्य देशों से ज़्यादातर प्रवासी श्रमिक घर वापस लौट आए. 
यह प्रभाव शहरी केन्द्रों पर विशेष रूप से बहुत गम्भीर था, जिससे घरों में पौष्टिक भोजन की क्षमता पर असर पड़ा, जो स्वस्थ आहार के लिये ज़रूरी होता है. हम जानते हैं कि कोविड से पहले भी, बहुत से लोग मात्र अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिये केवल पर्याप्त भोजन ही जुटाने में सक्षम थे.
इसलिये इस समस्या के ऊपर अब राजनैतिक संकट आने से, हमारी चिन्ताएँ और बढ़ गई हैं, विशेष रूप से जब हम देश के शहरी क्षेत्रों पर नज़र डालते हैं, जहाँ लोगों को दैनिक आहार भी मयस्सर नहीं है.

बहुत से लोग विस्थापित हुए हैं, बहुत से लोगों रोज़गार ख़त्म हो गए हैं – वर्तमान में वहाँ ज़मीनी स्थिति क्या है?
लोगों के लिये पिछले कुछ महीने बहुत मुश्किल भरे रहे हैं. यह सच है कि विशेष रूप से यंगून से बड़े स्तर पर लोगों का विस्थापन हुआ है, लेकिन वर्तमान में कारख़ाने या तो बहुत कम चल रहे हैं या फिर पूरी तरह बन्द पड़े हैं. बन्दरगाह पर भी कोई ख़ास काम नहीं चल रहा और बैंकिंग प्रणाली अर्ध-पंगु हो चुकी है.
लोग, नक़द धनराशि निकालने के लिये आपको जगह-जगह लम्बी क़तार में दिख जाएंगे. इससे लोगों के ऑनलाइन ट्रान्सफर से नक़दी हस्तान्तरण की क्षमता पर भी असर पड़ा है – म्याँमार के भीतर और विदेशों से म्याँमार आने वाली धनराशि, दोनों पर. सब कुछ मिलाजुलाकर और चिन्ता की स्थिति पैदा हो गई है, जहाँ डब्ल्यूएफ़पी ने अनुमान लगाया है कि अगले छह महीनों में, 34 लाख से अधिक लोग, विभिन्न स्तरों पर खाद्य असुरक्षा के शिकार हो सकते हैं, व सम्भवत: उन्हें हमसे या अन्य संस्थाओं से सहायता की आवश्यकता होगी.
क्षेत्र में प्रभावितों के लिये खाद्य सुरक्षा और पोषण सम्बन्धी सहायता सुनिश्चित करने के लिये एजेंसी किस तरह काम कर रही है?
कोविड महामारी से पहले भी, म्याँमार में हमारे बहुत व्यापक कार्यक्रम चल रहे थे, जिनमें विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से लगभग दस लाख लोगों को खाद्य सहायता उपलब्ध कराई जा रही थी. उनमें लगभग 3 लाख 60 हज़ार लोग ऐसे हैं जो या तो विस्थापित हो चुके हैं या फिर संघर्ष से प्रभावित हैं.
हमें यह याद रखना होगा कि नई ज़रूरतें आने पर हम पुरानी ज़रूरतों से ध्यान नहीं हटा सकते, न ही उन लोगों को प्राथमिकता देने से हट सकते हैं जो बहुत सम्वेदनशील परिस्थितियों में रहते हैं व हमारी सहायता पर निर्भर हैं. इसलिये वे हमारी पहली प्राथमिकता बने हुए हैं. लेकिन साथ ही हमें उन नए विस्थापित लोगों की भी चिन्ता है, जो या तो हाल के हफ़्तों या महीनों में सैन्य गतिविधि में वृद्धि होने से बेघर हुए हैं, या फिर यंगून, माण्डले जैसे बड़े शहरों में रहते हैं जहाँ ख़ासतौर पर राजनैतिक संकट का आर्थिक प्रभाव अधिक पड़ा है.
मौजूदा राजनैतिक संकट के कारण, आप और आपकी टीम को किन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
सबसे पहले तो, जिस पैमाने पर सहायता की ज़रूरत है, वो एक बड़ी चुनौती है. इसमें कोई सन्देह नहीं है कि विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में ज़रूरतमन्द लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, और दूसरी बात यह है कि इन कठिन परिस्थितियों में किस तरह योजनाएँ बनाई जाएँ कि हम ज़रूरतमन्दों तक मदद पहुँचाने में सक्षम हों. हम आपात खाद्य स्थिति के लिये पहले ही योजना तैयार कर चुके हैं, जिससे अब, अगर कहीं बाज़ार में पूरी आपूर्ति न हो, वहाँ भी भोजन की जगह नक़द धनराशि देने का प्रावधान भी किया जा सकता है.

Unsplash/Gayatri Malhotraम्याँमार में, 1 फ़रवरी 2021 को सेना द्वार तख़्तापलट के बाद शुरू हुए राजनैतिक संकट ने भी खाद्य असुरक्षा की स्थिति को और कठिन बना दिया है.

इस समय हमारी प्रमुख चिन्ता है – बैंकिंग क्षेत्र का मौजूदा संकट, जिससे नक़दी निकालने में मुश्किल हो रही है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर लोगों को नक़दी मुहैया कराई जा सके. अब तक, नए और मौजूदा बैंकिंग वादों के संयोजन के माध्यम से, हम आपातकालीन ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम हैं. लेकिन इसका मतलब यह है कि हमें, शहरों में बड़े पैमाने पर, इस नए परिपेक्ष्य में काम करना होगा, जहाँ आपूर्ति तन्त्र चरमरा चुका है. 
ये यूएन खाद्य एजेंसी, लोगों को खाद्य मदद देने के अलावा, म्याँमार में और कौन से कार्यक्रम चला रही है?
हमारे सभी कार्यों के केन्द्र में खाद्य सहायता रहती है और अब भी ध्यान उसी पर केन्द्रित था – कोविड से पहले भी और राजनैतिक संकट से पहले भी. लेकिन अब हमारा ध्यान  नए विस्थापित लोगों की नई ज़रूरतों पर व उन लोगों पर भी है, जो यंगून जैसे शहरों में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.  
हमारे पास विस्थापन से उबरने वाले समुदायों और घोर ग़रीबी में जीवन यापन करने वाले लोगों के लिये आजीविका सम्बन्धी अन्य कार्यक्रम भी हैं. हम म्याँमार में एक स्कूली भोजन कार्यक्रम भी चला रहे हैं, जो देश के सबसे अधिक खाद्य असुरक्षित क्षेत्रों में ग़रीब स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैय्या कराने में मदद करता है. इसलिये ये गतिविधियाँ यथासम्भव जारी रहनी चाहियें और आपात कार्यक्रमों के अलावा, म्याँमार में डब्ल्यूएफ़पी के काम का एक अभिन्न हिस्सा रहेंगी.
डब्ल्यूएफ़पी के मुताबिक़ अगले छह महीनों में 34 लाख से अधिक लोग भुखमरी का शिकार होंगे, विशेषकर शहरों में. इस स्थिति के दुनिया के लिये और वैश्विक खाद्य सुरक्षा उपायों के लिये क्या मायने होंगे?
यह वास्तव में दर्शाता है कि कितने लाख लोग बहुत ही विषम परिस्थितियों में रह रहे हैं और कोविड-19 के कारण आवाजाही पर प्रतिबन्धों के कारण समस्याएँ और बढ़ी हैं. हम समझते हैं कि ये प्रतिबन्ध ज़रूरी हैं, लेकिन इससे लोगों तक तत्काल भोजन और पोषण पहुँचाने की  क्षमता पर वास्तविक प्रभाव को भी नकारा नहीं जी सकता. इसलिये हम वह सब कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं जो हम सबसे कमज़ोर लोगों की मदद के लिये कर सकते हैं. उदाहरण के लिये यह सुनिश्चित करना कि छोटे किसानों को खेती जारी रखने के लिये किन चीज़ों की ज़रूरत है.
म्याँमार में, 80% किसान छोटे पैमाने पर खेती करते हैं, लेकिन उनसे देश भर के भोजन की एक बड़ी मात्रा की आपूर्ति होती है. इससे यही सबक़ मिलता है कि हम जिस अनिश्चितता भरे समय में रह रहे हैं, उसमें हमें यह सोचना होगा कि ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति किस तरह दैनिक भोजन का प्रबन्ध करने में लगे हैं. , संयुक्त राष्ट्र का विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP), म्याँमार में मौजूदा राजनैतिक संकट के कारण उत्पन्न हालात के बीच खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे लाखों लोगों के लिये भोजन व अन्य सहायता पहुँचाने के प्रबन्ध करने में सक्रिय है. म्याँमार में यूएन खाद्य एजेंसी के उप निदेशक मार्कस प्रायर ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में बताया कि बैंकिग व्यवस्था चरमराने के कारण, लोगों को, भोजन असुरक्षा के साथ-साथ, भोजन ख़रीदने के लिये नक़दी का इन्तेज़ाम करने की भी परेशानी भी हो रही है…

म्याँमार, फ़रवरी से राजनैतिक संकट से ग्रस्त है. ऐसे में देश के लिये डब्ल्यूएफ़पी की सबसे बड़ी चिन्ता क्या है?

खाद्य सुरक्षा की स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो, यह सुनिश्चित करने के लिये ज़िम्मेदार संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी के रूप में, हम काफ़ी समय से चिन्तित हैं और देश के कई हिस्सों में बदतर होती स्थिति पर लगातार नज़र रख रहे थे. सबसे पहले तो म्याँमार में पहले से ही गम्भीर रूप से ग़रीबी व्याप्त है.

हालाँकि, पिछले कुछ वर्षों में हालात सुधरे भी हैं. फिर पिछले साल, कोविड-19 के कारण बहुत से लोगों के रोज़गार चले गए, आजीविकाएँ छिन गईं, विदेशों में  रहने वाले देशवासियों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि भी आनी बन्द हो गई क्योंकि थाईलैण्ड और अन्य देशों से ज़्यादातर प्रवासी श्रमिक घर वापस लौट आए. 

यह प्रभाव शहरी केन्द्रों पर विशेष रूप से बहुत गम्भीर था, जिससे घरों में पौष्टिक भोजन की क्षमता पर असर पड़ा, जो स्वस्थ आहार के लिये ज़रूरी होता है. हम जानते हैं कि कोविड से पहले भी, बहुत से लोग मात्र अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिये केवल पर्याप्त भोजन ही जुटाने में सक्षम थे.

इसलिये इस समस्या के ऊपर अब राजनैतिक संकट आने से, हमारी चिन्ताएँ और बढ़ गई हैं, विशेष रूप से जब हम देश के शहरी क्षेत्रों पर नज़र डालते हैं, जहाँ लोगों को दैनिक आहार भी मयस्सर नहीं है.

बहुत से लोग विस्थापित हुए हैं, बहुत से लोगों रोज़गार ख़त्म हो गए हैं – वर्तमान में वहाँ ज़मीनी स्थिति क्या है?

लोगों के लिये पिछले कुछ महीने बहुत मुश्किल भरे रहे हैं. यह सच है कि विशेष रूप से यंगून से बड़े स्तर पर लोगों का विस्थापन हुआ है, लेकिन वर्तमान में कारख़ाने या तो बहुत कम चल रहे हैं या फिर पूरी तरह बन्द पड़े हैं. बन्दरगाह पर भी कोई ख़ास काम नहीं चल रहा और बैंकिंग प्रणाली अर्ध-पंगु हो चुकी है.

लोग, नक़द धनराशि निकालने के लिये आपको जगह-जगह लम्बी क़तार में दिख जाएंगे. इससे लोगों के ऑनलाइन ट्रान्सफर से नक़दी हस्तान्तरण की क्षमता पर भी असर पड़ा है – म्याँमार के भीतर और विदेशों से म्याँमार आने वाली धनराशि, दोनों पर. सब कुछ मिलाजुलाकर और चिन्ता की स्थिति पैदा हो गई है, जहाँ डब्ल्यूएफ़पी ने अनुमान लगाया है कि अगले छह महीनों में, 34 लाख से अधिक लोग, विभिन्न स्तरों पर खाद्य असुरक्षा के शिकार हो सकते हैं, व सम्भवत: उन्हें हमसे या अन्य संस्थाओं से सहायता की आवश्यकता होगी.

क्षेत्र में प्रभावितों के लिये खाद्य सुरक्षा और पोषण सम्बन्धी सहायता सुनिश्चित करने के लिये एजेंसी किस तरह काम कर रही है?

कोविड महामारी से पहले भी, म्याँमार में हमारे बहुत व्यापक कार्यक्रम चल रहे थे, जिनमें विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से लगभग दस लाख लोगों को खाद्य सहायता उपलब्ध कराई जा रही थी. उनमें लगभग 3 लाख 60 हज़ार लोग ऐसे हैं जो या तो विस्थापित हो चुके हैं या फिर संघर्ष से प्रभावित हैं.

हमें यह याद रखना होगा कि नई ज़रूरतें आने पर हम पुरानी ज़रूरतों से ध्यान नहीं हटा सकते, न ही उन लोगों को प्राथमिकता देने से हट सकते हैं जो बहुत सम्वेदनशील परिस्थितियों में रहते हैं व हमारी सहायता पर निर्भर हैं. इसलिये वे हमारी पहली प्राथमिकता बने हुए हैं. लेकिन साथ ही हमें उन नए विस्थापित लोगों की भी चिन्ता है, जो या तो हाल के हफ़्तों या महीनों में सैन्य गतिविधि में वृद्धि होने से बेघर हुए हैं, या फिर यंगून, माण्डले जैसे बड़े शहरों में रहते हैं जहाँ ख़ासतौर पर राजनैतिक संकट का आर्थिक प्रभाव अधिक पड़ा है.

मौजूदा राजनैतिक संकट के कारण, आप और आपकी टीम को किन बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?

सबसे पहले तो, जिस पैमाने पर सहायता की ज़रूरत है, वो एक बड़ी चुनौती है. इसमें कोई सन्देह नहीं है कि विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में ज़रूरतमन्द लोगों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, और दूसरी बात यह है कि इन कठिन परिस्थितियों में किस तरह योजनाएँ बनाई जाएँ कि हम ज़रूरतमन्दों तक मदद पहुँचाने में सक्षम हों. हम आपात खाद्य स्थिति के लिये पहले ही योजना तैयार कर चुके हैं, जिससे अब, अगर कहीं बाज़ार में पूरी आपूर्ति न हो, वहाँ भी भोजन की जगह नक़द धनराशि देने का प्रावधान भी किया जा सकता है.


Unsplash/Gayatri Malhotra
म्याँमार में, 1 फ़रवरी 2021 को सेना द्वार तख़्तापलट के बाद शुरू हुए राजनैतिक संकट ने भी खाद्य असुरक्षा की स्थिति को और कठिन बना दिया है.

इस समय हमारी प्रमुख चिन्ता है – बैंकिंग क्षेत्र का मौजूदा संकट, जिससे नक़दी निकालने में मुश्किल हो रही है, ताकि ज़रूरत पड़ने पर लोगों को नक़दी मुहैया कराई जा सके. अब तक, नए और मौजूदा बैंकिंग वादों के संयोजन के माध्यम से, हम आपातकालीन ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम हैं. लेकिन इसका मतलब यह है कि हमें, शहरों में बड़े पैमाने पर, इस नए परिपेक्ष्य में काम करना होगा, जहाँ आपूर्ति तन्त्र चरमरा चुका है. 

ये यूएन खाद्य एजेंसी, लोगों को खाद्य मदद देने के अलावा, म्याँमार में और कौन से कार्यक्रम चला रही है?

हमारे सभी कार्यों के केन्द्र में खाद्य सहायता रहती है और अब भी ध्यान उसी पर केन्द्रित था – कोविड से पहले भी और राजनैतिक संकट से पहले भी. लेकिन अब हमारा ध्यान  नए विस्थापित लोगों की नई ज़रूरतों पर व उन लोगों पर भी है, जो यंगून जैसे शहरों में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं.  

हमारे पास विस्थापन से उबरने वाले समुदायों और घोर ग़रीबी में जीवन यापन करने वाले लोगों के लिये आजीविका सम्बन्धी अन्य कार्यक्रम भी हैं. हम म्याँमार में एक स्कूली भोजन कार्यक्रम भी चला रहे हैं, जो देश के सबसे अधिक खाद्य असुरक्षित क्षेत्रों में ग़रीब स्कूली बच्चों को पौष्टिक भोजन मुहैय्या कराने में मदद करता है. इसलिये ये गतिविधियाँ यथासम्भव जारी रहनी चाहियें और आपात कार्यक्रमों के अलावा, म्याँमार में डब्ल्यूएफ़पी के काम का एक अभिन्न हिस्सा रहेंगी.

डब्ल्यूएफ़पी के मुताबिक़ अगले छह महीनों में 34 लाख से अधिक लोग भुखमरी का शिकार होंगे, विशेषकर शहरों में. इस स्थिति के दुनिया के लिये और वैश्विक खाद्य सुरक्षा उपायों के लिये क्या मायने होंगे?

यह वास्तव में दर्शाता है कि कितने लाख लोग बहुत ही विषम परिस्थितियों में रह रहे हैं और कोविड-19 के कारण आवाजाही पर प्रतिबन्धों के कारण समस्याएँ और बढ़ी हैं. हम समझते हैं कि ये प्रतिबन्ध ज़रूरी हैं, लेकिन इससे लोगों तक तत्काल भोजन और पोषण पहुँचाने की  क्षमता पर वास्तविक प्रभाव को भी नकारा नहीं जी सकता. इसलिये हम वह सब कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं जो हम सबसे कमज़ोर लोगों की मदद के लिये कर सकते हैं. उदाहरण के लिये यह सुनिश्चित करना कि छोटे किसानों को खेती जारी रखने के लिये किन चीज़ों की ज़रूरत है.

म्याँमार में, 80% किसान छोटे पैमाने पर खेती करते हैं, लेकिन उनसे देश भर के भोजन की एक बड़ी मात्रा की आपूर्ति होती है. इससे यही सबक़ मिलता है कि हम जिस अनिश्चितता भरे समय में रह रहे हैं, उसमें हमें यह सोचना होगा कि ग़रीब से ग़रीब व्यक्ति किस तरह दैनिक भोजन का प्रबन्ध करने में लगे हैं. 

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