यूएन प्रमुख का आग्रह – आर्थिक नीतियों में परिलक्षित हो ‘प्रकृति का वास्तविक मूल्य’

सयुंक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने ज़ोर देकर कहा है कि एक टिकाऊ भविष्य के लिये यह ज़रूरी है कि आर्थिक प्रगति से पर्यावरण को होने वाली क्षति का भी आकलन किया जाए और अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य की पहचान की जाए. यूएन प्रमुख ने मंगलवार को एक अपील जारी कर, प्रकृति के प्रति नज़रिये में बदलाव लाने और नीतियों व आर्थिक प्रणालियों में उसके योगदान को पहचाने जाने की बात कही है.

यूएन प्रमुख ने कहा कि पिछले 50 वर्षों में, वैश्विक अर्थव्यवस्था का आकार पाँच गुना बढ़ा है, लेकिन इस प्रगति की, पर्यावरण ने एक बड़ी क़ीमत चुकाई है. 

Up to now, humanity has treated nature as a free commodity. The price is climate change, pollution and mass extinction. It is high time to #MakeNatureCount 🌱, and to go beyond GDP as the only measure of economic success (video via @UNDESA). pic.twitter.com/v6e5oUdfO9— UN Climate Change (@UNFCCC) March 1, 2021

“प्रकृति के संसाधन अब भी, देशों की सम्पदा की गणना में शामिल नहीं किये जाते. यह मौजूदा प्रणाली, संरक्षण नहीं, विध्वंस की ओर झुकी हुई है.”
उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति नज़रिये में बदलाव लाने और उसके मूल्य को पहचाने जाने की आवश्यकता है. 
“प्रकृति का वास्तविक मूल्य, हमारी सभी नीतियों, योजनाओं और आर्थिक प्रणालियों में परिलक्षित होना चाहिये.”
उन्होंने कहा कि इस आकलन के ज़रिये ऐसी कार्रवाई में निवेश किया जा सकता है, जिनसे प्रकृति की रक्षा व बहाली होती हो. 
“इसके अपार लाभ होंगे.”
संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने यह अपील, यूएन सांख्यिकी आयोग (UN Statistical Commission) की बैठक से पहले जारी की है, जिसमें आर्थिक समृद्धि और मानव कल्याण को मापने के लिये, नए सांख्यिकी फ़्रेमवर्क पर चर्चा होनी है. 
इसमें प्रकृति का योगदान भी शामिल है.
जीडीपी से परे 
इस फ़्रेमवर्क को ‘System of Environmental-Economic Accounting – Ecosystem Accounting’ नाम दिया गया है, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से आगे बढ़कर, वन, महासागर और अन्य पारिस्थितिकी तन्त्रों जैसी प्राकृतिक पूँजी के अर्थव्यवस्था में योगदान का समावेशन सुनिश्चित किया गया है. 
बताया गया है कि इस प्रणाली के ज़रिये, जलवायु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक आपदाओं और जैवविविधता लुप्त होने की चुनौतियों से, बेहतर ढँग से निपटने में मदद मिलेगी. 
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अर्थशास्त्री और सहायक महासचिव एलियट हैरिस ने बताया, “हमने प्रकृति के साथ इस तरह बर्ताव किया है, जैसे कि यह मुफ़्त और असीमित हो.”
“इसलिये, हम अभी तक प्रकृति का क्षरण करते रहे हैं, और इसका दोहन असल में, यह जाने- समझे बिना कर रहे हैं, कि हम कर क्या रहे हैं, और कि इस प्रक्रिया में हम कितना कुछ खो रहे हैं.” 
नए फ़्रेमवर्क की मदद से यह जानने में मदद मिलेगी कि आर्थिक गतिविधियों से पारिस्थितिकी तन्त्रों पर किसना असर पड़ सकता है, प्रकृति की उपस्थिति हमें कितना प्रभावित करती है.
साथ ही यह समझना भी सम्भव होगा कि मानवीय गतिविधियों में बदलाव लाकर, प्रकृति को क्षति पहुँचाए या उसे नष्ट किये बिना, किस तरह से समृद्धि हासिल की जा सकती है.
संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवँ सामाजिक मामलों के विभाग के अनुसार, यूएन सांख्यिकी आयोग की बैठक में इस नए फ़्रेमवर्क पर मंगलवार को चर्चा होगी. 
इसके बाद शुक्रवार, 5 मार्च से, अगले 72 घण्टों के भीतर, यदि कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई जाती है, तो फिर इसे पारित किये जाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा. 
यूएन सांख्यिकी आयोग
संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग का गठन वर्ष 1947 में किया गया था, और अन्तरराष्ट्रीय सांख्यिकी गतिविधियों के सम्बन्ध में यह, यूएन की सर्वोच्च निर्णय-निर्धारक संस्था है. 
यूएन आयोग की ज़िम्मेदारी सांख्यिकी मानक स्थापित करना, सिद्धान्त व पद्धतियाँ विकसित करना और राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उनका क्रिर्यान्वयन सुनिश्चित करना है.
हर वर्ष मार्च में, इस यूएन आयोग का चार-दिवसीय सत्र आयोजित किया जाता है, जिसमें यूएन के सदस्य देशों के विशेषज्ञ, नीतिनिर्धारक, प्रमुख सांख्यिकी विशेषज्ञ और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शिरकत करते हैं. 
कोरोनावायरस संकट के मद्देनज़र, इस वर्ष का सत्र वर्चुअल रूप से आयोजित किया जा रहा है. , सयुंक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने ज़ोर देकर कहा है कि एक टिकाऊ भविष्य के लिये यह ज़रूरी है कि आर्थिक प्रगति से पर्यावरण को होने वाली क्षति का भी आकलन किया जाए और अर्थव्यवस्था में प्राकृतिक संसाधनों के मूल्य की पहचान की जाए. यूएन प्रमुख ने मंगलवार को एक अपील जारी कर, प्रकृति के प्रति नज़रिये में बदलाव लाने और नीतियों व आर्थिक प्रणालियों में उसके योगदान को पहचाने जाने की बात कही है.

यूएन प्रमुख ने कहा कि पिछले 50 वर्षों में, वैश्विक अर्थव्यवस्था का आकार पाँच गुना बढ़ा है, लेकिन इस प्रगति की, पर्यावरण ने एक बड़ी क़ीमत चुकाई है. 

“प्रकृति के संसाधन अब भी, देशों की सम्पदा की गणना में शामिल नहीं किये जाते. यह मौजूदा प्रणाली, संरक्षण नहीं, विध्वंस की ओर झुकी हुई है.”

उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति नज़रिये में बदलाव लाने और उसके मूल्य को पहचाने जाने की आवश्यकता है. 

“प्रकृति का वास्तविक मूल्य, हमारी सभी नीतियों, योजनाओं और आर्थिक प्रणालियों में परिलक्षित होना चाहिये.”

उन्होंने कहा कि इस आकलन के ज़रिये ऐसी कार्रवाई में निवेश किया जा सकता है, जिनसे प्रकृति की रक्षा व बहाली होती हो. 

“इसके अपार लाभ होंगे.”

संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने यह अपील, यूएन सांख्यिकी आयोग (UN Statistical Commission) की बैठक से पहले जारी की है, जिसमें आर्थिक समृद्धि और मानव कल्याण को मापने के लिये, नए सांख्यिकी फ़्रेमवर्क पर चर्चा होनी है. 

इसमें प्रकृति का योगदान भी शामिल है.

जीडीपी से परे 

इस फ़्रेमवर्क को ‘System of Environmental-Economic Accounting – Ecosystem Accounting’ नाम दिया गया है, जिसमें सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से आगे बढ़कर, वन, महासागर और अन्य पारिस्थितिकी तन्त्रों जैसी प्राकृतिक पूँजी के अर्थव्यवस्था में योगदान का समावेशन सुनिश्चित किया गया है. 

बताया गया है कि इस प्रणाली के ज़रिये, जलवायु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक आपदाओं और जैवविविधता लुप्त होने की चुनौतियों से, बेहतर ढँग से निपटने में मदद मिलेगी. 

संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख अर्थशास्त्री और सहायक महासचिव एलियट हैरिस ने बताया, “हमने प्रकृति के साथ इस तरह बर्ताव किया है, जैसे कि यह मुफ़्त और असीमित हो.”

“इसलिये, हम अभी तक प्रकृति का क्षरण करते रहे हैं, और इसका दोहन असल में, यह जाने- समझे बिना कर रहे हैं, कि हम कर क्या रहे हैं, और कि इस प्रक्रिया में हम कितना कुछ खो रहे हैं.” 

नए फ़्रेमवर्क की मदद से यह जानने में मदद मिलेगी कि आर्थिक गतिविधियों से पारिस्थितिकी तन्त्रों पर किसना असर पड़ सकता है, प्रकृति की उपस्थिति हमें कितना प्रभावित करती है.

साथ ही यह समझना भी सम्भव होगा कि मानवीय गतिविधियों में बदलाव लाकर, प्रकृति को क्षति पहुँचाए या उसे नष्ट किये बिना, किस तरह से समृद्धि हासिल की जा सकती है.

संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवँ सामाजिक मामलों के विभाग के अनुसार, यूएन सांख्यिकी आयोग की बैठक में इस नए फ़्रेमवर्क पर मंगलवार को चर्चा होगी. 

इसके बाद शुक्रवार, 5 मार्च से, अगले 72 घण्टों के भीतर, यदि कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई जाती है, तो फिर इसे पारित किये जाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा. 

यूएन सांख्यिकी आयोग

संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी आयोग का गठन वर्ष 1947 में किया गया था, और अन्तरराष्ट्रीय सांख्यिकी गतिविधियों के सम्बन्ध में यह, यूएन की सर्वोच्च निर्णय-निर्धारक संस्था है. 

यूएन आयोग की ज़िम्मेदारी सांख्यिकी मानक स्थापित करना, सिद्धान्त व पद्धतियाँ विकसित करना और राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उनका क्रिर्यान्वयन सुनिश्चित करना है.

हर वर्ष मार्च में, इस यूएन आयोग का चार-दिवसीय सत्र आयोजित किया जाता है, जिसमें यूएन के सदस्य देशों के विशेषज्ञ, नीतिनिर्धारक, प्रमुख सांख्यिकी विशेषज्ञ और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शिरकत करते हैं. 

कोरोनावायरस संकट के मद्देनज़र, इस वर्ष का सत्र वर्चुअल रूप से आयोजित किया जा रहा है. 

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