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राग, रंग और रस का उत्सव है होली

राग, रंग और रस का उत्सव है होली
March 18
19:39 2019

कहीं किचर तो कहीं लट्ठमार होली खेली जाती है

इनसाईट आॅनलाईन न्यूज

रंगों का त्योहार होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।

रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। होली प्रेम की वह रसधारा है, जिसमें समाज भीगता है. ऐसा उत्सव है, जो हमारे भीतर के कलुष को धोता है। होली में राग, रंग, हंसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती है।

उमंग, उल्लास और उद्दाम काम से प्रेरित होली भारतीय उपमहादीप का न केवल सांसकृतिक और सामाजिक बल्कि प्राकृतिक और आध्यात्मिक त्योहार भी है।

वैदिक काल से ही इस त्योहार के मनाए जाने के प्रमाण हैं। परंपरा के अनुसार यह दो दिन दो अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। पहली संध्या होलिका दहन होता है।

राग, रंग और रस का उत्सव है होली

इसमें गांव हो या शहर एक विशेष स्थल पर जलावन जुटाकर अग्नि दाह किया जाता है जिसे होलिका दहन कहते हैं। अग्नि पुंज में लोग अपनी-अपनी ओर से पवित्र आहुति देते हैं। होली समाज की उदासी दूर करती है। होली पुराने साल की विदाई और नए साल के आने का भी उत्सव है।

“रंगों से भरी इस दुनियां में, रंग रंगीला त्यौहार है होली,
गिले शिक्वे भुलाकर खुशियां मनाने का त्यौहार है होली,
रंगीन दुनियां का रंगीन पैगाम है होली,
हर तरफ यहीं धूम है मची “बुरा ना मानों होली है होली ”..

होलिका दहन के दूसरे दिन रंग, अबीर-गुलाल के साथ एक दूसरे को सराबोर कर प्रेम और सौहार्द पूर्ण होली मनाने का दौर शुरू होता है। इसी दिन को धूमिलवंदन भी कहा जाता है।

अब इस खेल का स्वरूप विकृत हो चुका है। धूल-मिट्टी के स्थान पर कोलहार आदि पदार्थों के अतिरिक्त दूषित नालियों से कीचड़ आदि का भी बेहिचक प्रयोग हो रहा है। धूलिवंदन खेल के साथ रंग भी लगाया जाता है।

इसके बाद स्नान कर दोपहर बाद नए कपड़े पहन कर परिजनों और पड़ोसियों के साथ रंग, अबीर, गुलाल लगाकर प्रेम प्रदर्शन के साथ त्योहार मनाते हैं।

राग, रंग और रस का उत्सव है होली

गांवों में शहरों की तुलना में अभी भी परंपरा के अनुसार होली मनायी जाती है। ढोल, झाल के साथ होली गीत गाते हुए रंगों से सराबोर लोग घर-घर जाकर होली खेलते हैं।

आज के दिन दोस्त और दुश्मन का भेद मिट जाता है। शत्रुता को भूलकर एक दूसरे के साथ होली खेलते हैं। आज से पांच दशक पूर्व तक इस त्योहार में अधिक परंपरा और पवित्रता देखी जाती थी जो अभी कम होती जा रही है।

वैसे उल्लास और उमंग होली का मूल अंग है, जिसका रूप भले बदल गया है, कम नहीं हुआ है।

होली मनाने की शुरूआत 40 दिन पूर्व बसंत पंचमी से ही हो जाती है। उसी दिन सरस्वती पूजा भी मनायी जाती है। उसी दिन गांवों में कुल परंपरा के अनुसार अपने-अपने देवी-देवताओं पर गुलाल-अबीर चढ़ाकर पूजा की जाती है और परस्पर अबीर-गुलाल लगाकर और उड़ाकर होली भी गाई जाती है। यही बसंत का आगमन होता है।

प्राचीन इतिहास और पुराणों में होली से जुड़ी अनेक कहानियां मिलती हैं, जिनमें दैत्य राज हिरण्यकश्यप और उसके पुत्र प्रह्लाद की कथा अधिक कही जाती है।

हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद् इ्र्रश्वर का भक्त हो गया। उसे ईश्वर विमुख करने के लिए उसके पिता हिरण्यकश्यप ने अनेक उपाय किए। उसे अनेक कष्ट दिये। परन्तु प्रह्लाद अटल रहा। प्राण लेने जैसी यातनाओं से भी प्रह्लाद बच निकलता था।

हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के पास एक ऐसी चादर थी जिसको ओढ़कर अग्नि में बैठ जाने पर भी होलिका को नहीं जलने का वरदान प्राप्त था।

भाई हिरण्यकश्यप ने होलिका को राजी कर स्वयं चादर ओढ़ लेने और प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाने को कहा। ऐसा ही हुआ।

प्रह्लाद को लेकर बैठने को तैयार होलिका के शरीर पर से ऐन वक्त पर उड़ी चादर से प्रह्लाद ढक गया, जिससे वह जलने से बच गया, जबकि होलिका जल मरी।

राग, रंग और रस का उत्सव है होली

तब से होलिका दहन कर प्रह्लाद के बच जाने की खुशी में लोग होली मनाते हैं। इसी कथा को लोग अलग-अलग तरह से घटनात्मक रूप में दुहराते हैं।

होली से जुड़ी अन्य कथाओं में राधा और कृष्ण की प्रेम कथा, शिव पार्वती और कामदेव की कथा, कंास और पुतना की कथा तथा राक्षसी ढूंढी की कथपा का भी वर्णन मिलता है।

ऐसी सभी कथाओं में असत्य पर सत्य की विजय की समानता तो मिलती ही है आध्यात्मिक शक्तियों का जीवन में समावेश का भी आभास होता है।

यदि अयोध्या में राम चन्द्र के अपने भाइयों और सीता के साथ होली खेलने के लोक रंजक गीत मिलते हैं तो इससे पूर्व मिथिलापुर स्थित ससुराल में भी सीता और उनकी सहेलियों के साथ होली मनाने का लोक रंजक वर्णन मिलता है।

तभी तो आज तक गाया जाता है – ‘होली खेले रघुबीरा अवध में, होली खेले रघुवीरा।’ और मिथिलापुर में – ‘होली खेलैं राम मिथिलापुर में।’ अवधी हो, मैथिली हो, भोजपुरी हो सबसे राम के होली खेलने के वर्णन से युक्त यदि होली के गीत मिलते हैं तो व्रज में कृष्ण के होली खेलने के गीत गाए जाते हैं।

तभी तो गांव-गांव, नगर-नगर होली गीतों के साथ ढोलक की पहली थाप इसी गीत पर पड़ती है-‘व्रज में ऐसी होली मचाए, व्रज में ऐसी…।’ किसने मचायी ऐसी होली? कृष्ण ने। व्रज में होली की मस्ती देखने के लिए देश-विदेश से लोग प्रतिवर्ष आते हैं। बरसाने की लट्ठमार होली तो और भी चर्चित है।

इसमें कृष्ण के गांव नन्दगांव के पुरूष और राधा के गांव बरसाने की गोपियां जुटकर लठमार होली खेलती हैं। गोपियां लाठियांे से प्रहार करती हैं जबकि नन्दगांव के पुरूष उनपर रंगों की बौछान करते हुए लाठी की मार से बचने की चेष्टा करते हैं। साथ की टोलियां होरी गायन और कीत्र्तन मंडलियां कीत्र्तन करती चलती हैं। लाखों दर्शक इस लठमार होली को एक आध्यात्मिक परम्परा के रूप में स्वीकार करते हैं।

ब्रज की लट्ठमार होली सबसे विशेष होती है। खासतौर पर मथुरा,वृंदावन और बरसाना के इलाकों में। यहां की होली की मस्ती सप्ताह भर पहले से छाने लगती है।

यहां की लट्ठमार होली न सिर्फ देश में मशहूर बल्कि विदेशों में भी लोकप्रिय है। यहां पर महिलाएं लाठी से पुरुषों की पिटाई करती हैं जबकि पुरुष उनसे बचने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा यहां पर भगवान कृष्ण और राधा जी के साथ फूलों की होली खेली जाती है।

राम की अयोध्यापुरी में व्रज से अलग तरह से होली मनायी जाती है। यहां बसंत पंचमी से ही होली मनानी शुरू हो जाती है। छोटे बड़े मंदिरों में भगवान की स्थापित प्रतिमाओं पर भर-फागुन गुलाल लगाया जाता है।

राग, रंग और रस का उत्सव है होली

यहां मिथिला को केन्द्रित कर नियमित होली गीतों का गायन तो होता ही है एक दूसरे पर फूल-गुलाल भी फेके जाते हैं। अयोध्या में मंदिरों के साथ-साथ घर-घर में, गली-गली में होली को उल्लास मर्यादा पुरूषोतम राम की तरह मर्यादापूर्ण तरीके से दीखता हैं।

वैसे यह कहा जा सकता है कि लोक त्योहार होली की पवित्र और शालीन परंपरा कायम रखने के लिए समाज को विवेक के साथ प्रयास करने की जरूरत है। कारण, होली भारतीयता से जुड़ा सर्वाधिक लोकप्रिय त्योहार है जो देश के कोने-कोने में मनाया जाता है।

लेकिन व्यवसायिकता के कारण इसके आयोजन में विकृति बढ़ती जा रही है। सम्बन्धों में तनाव के कारा होली हिंसात्मक होती जा रही है। आयोजन में उदासीनता भी बढ़ रही है। इसे समझकर होली के रंग को बदरंग नहीं होने दना है। क्योंकि उल्लास ही होली का रंग है और सत्य-सम्बन्ध ही सुख प्रदाता है।

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