रोहिंज्या द्वारा, रोहिंज्याओं के लिये, एक अनूठा फ़िल्म स्कूल

फ़ारुक़ मोहम्मद एक रोहिंज्या शरणार्थी हैं, और बांग्लादेश के कॉक्सेस बाज़ार में ‘उमर फ़िल्म स्कूल’ के सह-संस्थापक हैं. यह स्कूल, अनौपचारिक रूप से युवा रोहिंज्या शरणार्थियों को फ़ोटोग्राफी और वीडियोग्राफ़ी में प्रशिक्षित करता है, ताकि वे अपनी कहानियों को ख़ुद बयाँ करने में सक्षम हो सकें. कोविड-19 महामारी की शुरूआत से ही, यह फ़िल्म स्कूल, शरणार्थी समुदाय में वायरस के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिशों में जुटा है. 33-वर्षीय फ़ारुक़ मोहम्मद ने यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के साथ अपने सफ़र और भविष्य के लिये उम्मीदों को साझा किया है…

“मैं 1992 से कॉक्सेस बाज़ार में शरणार्थी शिविर में रह रहा हूँ.
मैंने अपना लगभग पूरा जीवन विभिन्न शिविरों में बिताया है. मुझे याद नहीं है कि मेरे परिवार को किन परिस्थितियों में म्याँमार छोड़कर जाना पड़ा, चूँकि जब मेरे माता-पिता बांग्लादेश आए तो मैं तब बहुत छोटा था.
मुझे सही स्कूली शिक्षा नहीं मिली. मैंने शरणार्थी शिविर के एक स्कूल में केवल कक्षा 5 तक पढ़ाई की.
लेकिन मुझे लगा कि हमें अंग्रेज़ी आनी चाहिए, ताकि दुनिया को यह बता सकें कि हम यहाँ किस तरह जी रहे हैं – हमारी उम्मीदें क्या हैं, और हमें अपनी समस्याओं का समाधान किस तरह निकालना चाहिये.
तो मुझे जो भी मिलता, मैं उसे पढ़ता और अंग्रेज़ी फिल्में देखता था. मैंने विदेशियों और अपने आसपास के लोगों से बात करके अंग्रेज़ी बोलना सीखा.

Cox’s Bazar is getting much-needed COVID-19 information to Rohingya refugees, by Rohingya refugees thanks to Omar’s Film School. https://t.co/Vdna77yBEF— UNHCR, the UN Refugee Agency (@Refugees) May 20, 2021

फिर शरणार्थी शिविर में एक शिक्षक के रूप में काम किया और कभी-कभार संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों के लिये दुभाषिए का काम भी किया.
इस तरह का फ़िल्म स्कूल स्थापित करने के विचार और प्रेरणा की शुरुआत 2017 में हुई, जब नए रोहिंज्या शरणार्थियों का प्रवाह बना हुआ था और मेरा भाई, उमर और मैं, मीडिया के साथ काम कर रहे थे.
उस समय वहाँ बड़ी संख्या में पत्रकार और लोग कैमरे के साथ आते थे और हम उनसे सम्पर्क कर कहते थे: मैं अंग्रेज़ी बोल सकता हूँ, मैं रोहिंज्या हूँ, मुझे यहाँ की स्थिति पता है. मैं आपकी मदद कर सकता हूँ.
सीखने-सिखाने का सफ़र
मैंने और मेरे भाई ने अनेक अन्तरराष्ट्रीय समाचार संगठनों के लिये मददग़ार के रूप में काम किया.
उमर ने रॉयटर्स के फ़ोटो पत्रकारों के साथ बहुत काम किया और फ़ोटोग्राफी व वीडियो के लिये उसका जुनून बढ़ता गया.
उसने उन लोगों से सीखना शुरू किया जिनके साथ वह काम कर रहा था. रॉयटर्स भी अपने पत्रकारों की अनुपस्थिति में तस्वीरें लेने के लिये उन्हें एक कैमरा देना चाहता था.
हमने यूट्यूब के ज़रिये भी पढ़ाई की, और बाद में अन्तरराष्ट्रीय फ़ोटोग्राफ़रों से ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया.
हम रोहिंज्याओं को शिविर में बसने में मदद कर रहे थे, और मीडिया साक्षात्कार के लिये दुभाषिए का काम भी भी कर रहे थे.
मैं अपना परिचय देता और कहता कि मैं ख़ुद एक रोहिंज्या हूँ, मैं आपका साथी हूँ, भाई हूँ, मैं आपका बेटा हूँ.
तब वो खुलकर मुझसे अपना दुख बयान करते. अपनी भाषा में दुख व्यक्त करने से एक अलग ही भावना सामने आती है, जो अक्सर अंग्रेज़ी में उतनी निकलकर नहीं आ पाती.
मैंने जो महसूस किया और समझा, वो यह था कि अगर एक रोहिंज्या दूसरे रोहिंज्या को संदेश देता है, तो उनके लिये इसे समझना बहुत आसान है; उससे वे आश्वस्त होते हैं. तो इरादा बना लिया – रोहिंज्या ही रोहिंज्याओं के लिये, रोहिंज्याओं को सन्देश दें.
इस तरह हमने उनके लिये एक फ़िल्म स्कूल बनाने का सपना देखा.
हम शरणार्थी शिविरों में ‘शरणार्थियों द्वारा शरणार्थियों के लिये’ काम कर रहे लोगों में से सबसे उम्दा मंच बनने की उम्मीद रखते हैं.
रोहिंज्या संस्कृति को फ़ोटो, वीडियो व सोशल मीडिया के माध्यम से दिखाकर हम अपनी विरासत का संरक्षण कर रहे हैं और इसे सार्वजनिक महत्व दे रहे हैं.
हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन व संघर्षों का दस्तावेज़ीकरण करना चाहते हैं.
कोविड-19 का साया
मार्च 2020 में, बांग्लादेश में पहले कोविड पॉजिटिव मरीज़ की पहचान की गई थी. इससे पहले, दुनिया भर से ख़बरें आ रही थीं कि कोविड-19 एक वैश्विक महामारी का रूप ले रही है और लोगों की मौत हो रही है.
हम बहुत डरे हुए थे क्योंकि हम घनी आबादी वाले इलाक़े में रहते हैं. हमारे यहाँ सामाजिक दूरी की कोई गुंजाइश ही नहीं है.
हमने सोचा कि हमें अपने साथी रोहिंज्याओं के साथ वास्तविक ताज़ा जानकारी साझा करनी चाहिए.
इसलिए, हमने विश्व स्वास्थ्य संगठन से जानकारी लेकर कुछ वीडियो बनाए. हमने इसे मोबाइल के ज़रिये साझा करना शुरू किया और लोगों को अपने परिवारों के साथ देखने के लिये कहा.
हमारे दोस्त उस्मान ने एक वीडियो बनाया और कोविड-19 के बारे में एक गीत की भी रचना की. यह काफ़ी लोकप्रिय हुआ.
फ़िल्म स्कूल शुरू करने और कोविड जागरूकता में मदद करने के कुछ ही समय बाद, मेरे भाई उमर की अचानक मौत हो गई. आज तक उसका कारण समझ नहीं आया.
हमने उसे श्रृद्धांजलि देने और उसे अपनी गतिविधियों के ज़रिये जीवित रखने के लिये स्कूल का नाम ‘रोहिंज्या फ़िल्म स्कूल’ से बदलकर ‘उमर फ़िल्म स्कूल’ कर दिया.
जब हम देखते हैं कि लोग हमारे वीडियो देख रहे हैं, हमारी माध्यम से मिली जानकारी से सीखकर सामाजिक दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, तो हमें बहुत गर्व महसूस होता है.
जब हम देखते हैं कि हमसे प्रशिक्षण लेकर युवा, फ़ोटो खींचकर फ़ेसबुक, ट्विटर और अन्तरराष्ट्रीय समाचारों में प्रकाशित हो रहे हैं, तो हमें वास्तव में उन पर गर्व महसूस होता है कि वे अपनी क्षमता, अपने कौशल का पूर्ण उपयोग कर रहे हैं.
मुझे उम्मीद है कि एक दिन हम सुरक्षा और सम्मान के साथ अपने देश वापस जा सकेंगे. साथ ही, हमारी धार्मिक और नस्लीय पहचान के आधार पर अब हमारे साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा, हम शान्ति से रह सकेंगे और अपने देश के विकास में योगदान कर सकेंगे.
मैं म्याँमार वापस जाकर समाज सेवा करना चाहता हूँ और समुदायों के बीच शान्ति स्थापित करने को बढ़ावा देना चाहता हूँ.”
फ़ारुक़ मोहम्मद के साथ बातचीत पर आधारित यह कहानी पहले यहाँ प्रकाशित हुई., फ़ारुक़ मोहम्मद एक रोहिंज्या शरणार्थी हैं, और बांग्लादेश के कॉक्सेस बाज़ार में ‘उमर फ़िल्म स्कूल’ के सह-संस्थापक हैं. यह स्कूल, अनौपचारिक रूप से युवा रोहिंज्या शरणार्थियों को फ़ोटोग्राफी और वीडियोग्राफ़ी में प्रशिक्षित करता है, ताकि वे अपनी कहानियों को ख़ुद बयाँ करने में सक्षम हो सकें. कोविड-19 महामारी की शुरूआत से ही, यह फ़िल्म स्कूल, शरणार्थी समुदाय में वायरस के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिशों में जुटा है. 33-वर्षीय फ़ारुक़ मोहम्मद ने यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के साथ अपने सफ़र और भविष्य के लिये उम्मीदों को साझा किया है…

“मैं 1992 से कॉक्सेस बाज़ार में शरणार्थी शिविर में रह रहा हूँ.

मैंने अपना लगभग पूरा जीवन विभिन्न शिविरों में बिताया है. मुझे याद नहीं है कि मेरे परिवार को किन परिस्थितियों में म्याँमार छोड़कर जाना पड़ा, चूँकि जब मेरे माता-पिता बांग्लादेश आए तो मैं तब बहुत छोटा था.

मुझे सही स्कूली शिक्षा नहीं मिली. मैंने शरणार्थी शिविर के एक स्कूल में केवल कक्षा 5 तक पढ़ाई की.

लेकिन मुझे लगा कि हमें अंग्रेज़ी आनी चाहिए, ताकि दुनिया को यह बता सकें कि हम यहाँ किस तरह जी रहे हैं – हमारी उम्मीदें क्या हैं, और हमें अपनी समस्याओं का समाधान किस तरह निकालना चाहिये.

तो मुझे जो भी मिलता, मैं उसे पढ़ता और अंग्रेज़ी फिल्में देखता था. मैंने विदेशियों और अपने आसपास के लोगों से बात करके अंग्रेज़ी बोलना सीखा.

Cox’s Bazar is getting much-needed COVID-19 information to Rohingya refugees, by Rohingya refugees thanks to Omar’s Film School. https://t.co/Vdna77yBEF

— UNHCR, the UN Refugee Agency (@Refugees) May 20, 2021

फिर शरणार्थी शिविर में एक शिक्षक के रूप में काम किया और कभी-कभार संयुक्त राष्ट्र के कर्मचारियों के लिये दुभाषिए का काम भी किया.

इस तरह का फ़िल्म स्कूल स्थापित करने के विचार और प्रेरणा की शुरुआत 2017 में हुई, जब नए रोहिंज्या शरणार्थियों का प्रवाह बना हुआ था और मेरा भाई, उमर और मैं, मीडिया के साथ काम कर रहे थे.

उस समय वहाँ बड़ी संख्या में पत्रकार और लोग कैमरे के साथ आते थे और हम उनसे सम्पर्क कर कहते थे: मैं अंग्रेज़ी बोल सकता हूँ, मैं रोहिंज्या हूँ, मुझे यहाँ की स्थिति पता है. मैं आपकी मदद कर सकता हूँ.

सीखने-सिखाने का सफ़र

मैंने और मेरे भाई ने अनेक अन्तरराष्ट्रीय समाचार संगठनों के लिये मददग़ार के रूप में काम किया.

उमर ने रॉयटर्स के फ़ोटो पत्रकारों के साथ बहुत काम किया और फ़ोटोग्राफी व वीडियो के लिये उसका जुनून बढ़ता गया.

उसने उन लोगों से सीखना शुरू किया जिनके साथ वह काम कर रहा था. रॉयटर्स भी अपने पत्रकारों की अनुपस्थिति में तस्वीरें लेने के लिये उन्हें एक कैमरा देना चाहता था.

हमने यूट्यूब के ज़रिये भी पढ़ाई की, और बाद में अन्तरराष्ट्रीय फ़ोटोग्राफ़रों से ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया.

हम रोहिंज्याओं को शिविर में बसने में मदद कर रहे थे, और मीडिया साक्षात्कार के लिये दुभाषिए का काम भी भी कर रहे थे.

मैं अपना परिचय देता और कहता कि मैं ख़ुद एक रोहिंज्या हूँ, मैं आपका साथी हूँ, भाई हूँ, मैं आपका बेटा हूँ.

तब वो खुलकर मुझसे अपना दुख बयान करते. अपनी भाषा में दुख व्यक्त करने से एक अलग ही भावना सामने आती है, जो अक्सर अंग्रेज़ी में उतनी निकलकर नहीं आ पाती.

मैंने जो महसूस किया और समझा, वो यह था कि अगर एक रोहिंज्या दूसरे रोहिंज्या को संदेश देता है, तो उनके लिये इसे समझना बहुत आसान है; उससे वे आश्वस्त होते हैं. तो इरादा बना लिया – रोहिंज्या ही रोहिंज्याओं के लिये, रोहिंज्याओं को सन्देश दें.

इस तरह हमने उनके लिये एक फ़िल्म स्कूल बनाने का सपना देखा.

हम शरणार्थी शिविरों में ‘शरणार्थियों द्वारा शरणार्थियों के लिये’ काम कर रहे लोगों में से सबसे उम्दा मंच बनने की उम्मीद रखते हैं.

रोहिंज्या संस्कृति को फ़ोटो, वीडियो व सोशल मीडिया के माध्यम से दिखाकर हम अपनी विरासत का संरक्षण कर रहे हैं और इसे सार्वजनिक महत्व दे रहे हैं.

हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन व संघर्षों का दस्तावेज़ीकरण करना चाहते हैं.

कोविड-19 का साया

मार्च 2020 में, बांग्लादेश में पहले कोविड पॉजिटिव मरीज़ की पहचान की गई थी. इससे पहले, दुनिया भर से ख़बरें आ रही थीं कि कोविड-19 एक वैश्विक महामारी का रूप ले रही है और लोगों की मौत हो रही है.

हम बहुत डरे हुए थे क्योंकि हम घनी आबादी वाले इलाक़े में रहते हैं. हमारे यहाँ सामाजिक दूरी की कोई गुंजाइश ही नहीं है.

हमने सोचा कि हमें अपने साथी रोहिंज्याओं के साथ वास्तविक ताज़ा जानकारी साझा करनी चाहिए.

इसलिए, हमने विश्व स्वास्थ्य संगठन से जानकारी लेकर कुछ वीडियो बनाए. हमने इसे मोबाइल के ज़रिये साझा करना शुरू किया और लोगों को अपने परिवारों के साथ देखने के लिये कहा.

हमारे दोस्त उस्मान ने एक वीडियो बनाया और कोविड-19 के बारे में एक गीत की भी रचना की. यह काफ़ी लोकप्रिय हुआ.

फ़िल्म स्कूल शुरू करने और कोविड जागरूकता में मदद करने के कुछ ही समय बाद, मेरे भाई उमर की अचानक मौत हो गई. आज तक उसका कारण समझ नहीं आया.

हमने उसे श्रृद्धांजलि देने और उसे अपनी गतिविधियों के ज़रिये जीवित रखने के लिये स्कूल का नाम ‘रोहिंज्या फ़िल्म स्कूल’ से बदलकर ‘उमर फ़िल्म स्कूल’ कर दिया.

जब हम देखते हैं कि लोग हमारे वीडियो देख रहे हैं, हमारी माध्यम से मिली जानकारी से सीखकर सामाजिक दूरी बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, तो हमें बहुत गर्व महसूस होता है.

जब हम देखते हैं कि हमसे प्रशिक्षण लेकर युवा, फ़ोटो खींचकर फ़ेसबुक, ट्विटर और अन्तरराष्ट्रीय समाचारों में प्रकाशित हो रहे हैं, तो हमें वास्तव में उन पर गर्व महसूस होता है कि वे अपनी क्षमता, अपने कौशल का पूर्ण उपयोग कर रहे हैं.

मुझे उम्मीद है कि एक दिन हम सुरक्षा और सम्मान के साथ अपने देश वापस जा सकेंगे. साथ ही, हमारी धार्मिक और नस्लीय पहचान के आधार पर अब हमारे साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा, हम शान्ति से रह सकेंगे और अपने देश के विकास में योगदान कर सकेंगे.

मैं म्याँमार वापस जाकर समाज सेवा करना चाहता हूँ और समुदायों के बीच शान्ति स्थापित करने को बढ़ावा देना चाहता हूँ.”

फ़ारुक़ मोहम्मद के साथ बातचीत पर आधारित यह कहानी पहले यहाँ प्रकाशित हुई.

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