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लोभ-लालच के रोगी पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भानुप्रताप शाही अपने दल-बल के साथ लील गये सारी दवाइयां

लोभ-लालच के रोगी पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भानुप्रताप शाही अपने दल-बल के साथ लील गये सारी दवाइयां
July 08
09:42 2019

पूर्व आईएएस प्रदीप कुमार सहित भगना एवं परिवार के अन्य सदस्यों का लूट में था हिस्सा

धर्मराज राय

झारखण्ड अलग राज्य के गठन के बाद यहां लगातार बनी अस्थिर सरकारों से राज्य को कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन यहां की राजनीति में ऐसे ‘बहादुर लुटेरे’ जरूर पैदा हुए जिन्होंने सरकार में शामिल होकर ‘सरकार, राज्य और जनता के हित’ की ही ऐसी तैसी कर दी।

ऐसे लोग ‘अति निर्लज’, ‘हद तक बेईमान’ और ‘राज्यद्रोही’ के रूप में जनता के बीच बदनाम तो हुए ही ‘स्वयं’ और ‘स्वयं के परिवार’ के लिए राहु भी साबित हुए। झारखण्ड के ऐसे कुप्रसिद्ध ‘नगीनों’ में राज्य के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री भानु प्रताप शाही भी शामिल हैं।

शाही के खिलाफ दवा खरीद में घोटाले का ऐसा आरोप लगा कि सीबीआई सहित ईडी ने भी जांच पड़ताल की और आरोपित पूर्व मंत्री शाही को गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार भी होना पड़ा। यहां तक कि लगातार फरार होने पर अदालत के आदेश पर शाही के आवास और अन्य ठिकानों पर कुर्की-जब्ती की नोटिस चिपकाई गई। झारखण्ड के इस आर्थिक अपराधी के विरूद्ध आय से अधिक सम्पति अर्जित करने और दवा खरीद में घोटाले का आरोप है।

नवगठित झारखण्ड राज्य को खोखला करने वाले इस चर्चित दवा खरीद घोटाले में शाही के कार्यकाल में आई ए एस डा0 प्रदीप कुमार स्वास्थ्य सचिव के पद पर कार्यरत थे। इसी अधिकारी के ‘लूट-ज्ञान’ से शाही का भी ‘लूट-ज्ञान’ समृद्ध हुआ, जिसके कारण इस घोटाले की उत्पति हुई।

गिरफ्तारी से बचने के लिए ‘मंत्री शाही’ और ‘सचिव डा0 प्रदीप कुमार को फरार भी होना पड़ा था। इस मामले में इडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने पूर्व स्वास्थ्य सचिव डा0 प्रदीप कुमार की सम्पति तो जब्त की ही पूर्व मंत्री शाही और उनके भांजे प्रशांत कुमार की भी सम्मिलित करोड़ों की सम्पति जब्त की। इससे पूर्व मनी लाउंड्रिंग के आरोपी शाही की 7,97 करोड़ की सम्पति जब्त हुई।

लोगों को शायद याद नहीं हो लेकिन इस घोटाले में सीबीआई ने डा0 प्रदीप कुमार और शाही को गिरफ्तार कर जेल भी भेजा था। इस मामले की जांच पहले निगरानी ब्यूरो ने की थी। बाद में सीबीआई ने जांच का जिम्मा अपने हाथ में लिया। शाही और उसके रिश्तेदारों पर वर्ष 2005 से 2009 के बीच आय के अज्ञात श्रोत से सात करोड़ 97 लाख से भी अधिक की सम्पति अर्जित करने का आरोप है।

शाही के विरूद्ध तब जांच शुरू हुई जब एक विभागीय जांच में स्वास्थ्य विभाग में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा हुआ। अगस्त 2009 में तत्कालीन राज्यपाल के शंकर नारायणन ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे। शाही और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने नियमों को दरकिनार करते हुए 130 करोड़ रूपये मूल्य की दवाएं और उपकरण 19 निजी कंपनियों से खरीद ली थी। यह घोटाला बहुचर्चित रहा है और इसकी जांच में सभी तथ्य उजागर हो चुके हैं।

गवाहों ने भी तथ्यों को उजागर किया है। पूर्व मंत्री शाही और उसके भांजे की रांची, बिहार और उत्तर प्रदेश में भी चल-अचल सम्पति है। यहां राॅंची के ओल्ड-कमिशनर कम्पाउण्ड के प्रबोध टावर में इडी ने दो दुकानों को जब्त किया, जिनमें एक दुकान मंत्री के नाम और एक दुकान उनके भांजे प्रशांत कुमार के नाम पर है।

बिहार एवं उत्तर प्रदेश के भी कई क्षेत्रों में मामा-भांजे के नाम पर मिली सम्पति पर इडी ने नजर डालकर जब्त किया है। बैंक खाते भी सील किए गए हैं। इडी की सभी जब्ती को एडजुकेटिंग अथाॅरिटी ने सत्यापित भी कर दिया है। हरियाणा के गुड़गांव में भी दुकान और दफ्तर जब्त किए गए, तो राॅंची और हटिया में भी जमीन के रूप में अवैध सम्पति जब्त की गई है। शाही और उसके भांजे के पास से जब्त चल-अचल सम्पति का ब्यौरा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही भवनाथपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे हैं।

शाही के साथ उनके तत्कालीन ओएसडी उमाशंकर मालवीय के विरूद्ध भी आरोप गठित है। इस घोटाले में अन्य आरोपियों में भानु प्रताप शाही के साथ भांजा प्रशांत कुमार सिंह, चचेरी बहन संतोषी देवी, अजय सिंह सहित दिल्ली की दो कंपनी मेसर्स सोनांचल विल्डकान प्राइवेट लिमिटेड एवं मेसर्स अंगेश टेªडिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। उमाशंकर मालवीय ने भानुप्रताप शाही की बहन संतोषी देवी को जमीन खरीदने में मदद की थी।

भानु के देहाती न्यास ट्रस्ट में भी गड़बड़ी मिली। इडी के अनुसंधान में सभी डोनर्स फर्जी पाए गये थे। फर्जी डोनर्स के कागज बनाने में और कालाधन को सफेद बनाने के प्रयास में तत्कालीन ओएसडी उमाशंकर मालवीय की ही प्रमुख भूमिका रही थी।

यह विडंबना पूर्ण तथ्य है कि मार्च 2005 से लेकर जनवरी 2009 तक झारखण्ड में बनी चार सरकारों को बनाने और गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पांच नेताओं (विधायकों) में पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही भी एक हैं। अन्यों में मधु कोड़ा, कमलेश सिंह, एनोस एक्का और हरिनारायण राय शामिल हैं, जिनकी ‘दूषित करनी’ से झारखण्ड के गठन का उद्देश्य ही पूरा नहीं हुआ।

भानु प्रताप शाही ने इस ‘आया राम, गया राम’ की स्थिति का फायदा उठाकर अपने 70 वर्ष से भी अधिक उम्र के पिता हेमेन्द्र प्रताप शाही को मंत्रिमंडल में शामिल करवा कर स्वास्थ्य मंत्री बनवा दिया।

इस बीच भानु प्रताप शाही एक सरकारी अधिकारी पर हमला करने के एक लंबित आपराधिक मामले में न्यायिक हिरासत में जेल चले गये थे। जब भानु प्रताप शाही को जमानत मिल गई तब अपने बेटे के लिए पिता हेमेन्द्र प्रताप देहाती ने कुर्सी खाली कर दी, जिस पर भानु विराजमान होकर मनमानी करने लगे। झारखण्ड का यह संक्रांति काल था, जिसमें सरकार के साथ जनता के हकों को भी रौंदा जा रहा था, जनता बेबस होकर सबकुछ देख रही थी।

मंत्री के रूप में ‘पंच महापापी’ के नाम से जनता के बीच चर्चित भानुप्रताप शाही, एनोस एक्का, कमलेश सिंह, हरिनारायण राय एवं मधु कोड़ा ने कानून को ठेंगा दिखा कर झारखण्ड की ऐसी-तैसी कर दी। मनमानी पर इसलिए रोक नहीं लग पा रही थी कि सरकार बनाने के लालची राजनीतिक दल इनका साथ ले रहे थे। शिबू सोरेन जैसे शीर्ष आन्दोलनकारी दिशोम गुरू को भी इन लोगों ने ‘लंगी’ मारकर गिराने में संकोच नहीं किया। अंततः पाप का घड़ा फूटता ही है।

इन लोगों के साथ भानु प्रताप शाही के पाप का भी घड़ा फूट गया और सबको जेल की हवा खानी पड़ी। जनता को इनके विरूद्ध अंतिम फैसले का इंतजार है। भानु प्रताप शाही जैसे नव-जवान के लिए कहां तो झारखण्ड के नवनिर्माताओं में शामिल होने का स्वर्ण अवसर मिला था, जबकि अब ‘झारखण्ड के लुटेरों की सूची में शामिल होकर बदनामी के दिन काटने पड़ रहे हैं। सजा का इंतजार है-सो अलग।

गौरतलब है कि नवगठित झारखण्ड राज्य के इन शोषक मंत्रियों के द्वारा अवैध रूप से अर्जित सम्पिित का कुछ ही अंश अब तक बरामद हो पाया है। जबकि जानकारों का मानना है कि झारखण्ड के ऐसे कलंक पात्रों के पास अब भी छुपाई गई करोड़ों की नकद राशि और जमीन मकान के रूप में अवैध रूप से है, जो पकड़ में नहीं आयी है और कानून की नजर से ओझल है।

यह विडम्बना है कि राजनीति में सक्रिय ऐसे विवादित अपराधियों को भले ही न्यायालय से सजा मिल जाती है। जबकि जनता की नजर में ऐसे लोग आज भी राजनैतिक सजा के हकदार नहीं बन पाते हैं। ऐसे अपराधि भी बारबार चुनाव जीत जाते हैं और सरकार में शामिल होकर मनमानी करते हैं। झारखण्ड ऐसे हीं लोगों के कारण त्रस्त है।

 

झारखंड के पूर्व आईएएस अधिकारी डाॅ. प्रदीप कुमार का भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल आने-जाने का सिलसिला जारी

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