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लोहरदगा लोस सीट: चमरा लिंडा के वोटबैंक पर भाजपा, कांग्रेस और झापा की नजरें

लोहरदगा लोस सीट: चमरा लिंडा के वोटबैंक पर भाजपा, कांग्रेस और झापा की नजरें
April 22
17:47 2019

गुमला, 22 अप्रैल (हि.स.)। पिछले तीन लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत पर कांग्रेस का चुनावी गणित बिगाड़ देने वाले बिशुनपुर विधायक चमरा लिंडा इसबार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। लिंडा के जोरदार प्रदर्शन की वजह से पिछले दो लोकसभा चुनावों में जीत का सेहरा भाजपा उम्मीदवार सुदर्शन भगत के सिर बंध सका था। लिंडा के वोटबैंक पर भाजपा, कांग्रेस और झारखंड पार्टी की नजरें हैं।
लोहरदगा लोकसभा सीट पर 2004, 2009 व 2014 के लोकसभा चुनाव में अपनी ताकत का प्रदर्शन करने वाले झामुमो विधायक चमरा लिंडा इसबार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। लिहाजा, चमरा लिंडा के 18 प्रतिशत वोटबैंक पर भाजपा व कांग्रेस की नजरें हैं। दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के साथ झारखंड पार्टी भी इस वोटबैंक को अपने पाले में करने को प्रयासरत है। 2004 के लोकसभा चुनाव में चमरा लिंडा ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था। लिंडा को इस चुनाव में 58947 वोट मिले थे और वे तीसरे स्थान पर रहे। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में लिंडा पुन: चुनावी मैदान में उतरे तो कांग्रेस ने उन्हें रोकने की भरकस कोशिश की। इस चुनाव में भी लिंडा ने अपना सर्वोतम प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। चमरा लिंडा इस चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे थे। उन्हें 1 लाख 36 हजार 345 वोट (26 प्रतिशत) मिले थे।
लोहरदगा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने लिंडा के नामांकन पत्र रद्द कराने का भरपूर प्रयास किया था। बाहर से वकील भी बुलाए थे मगर कांग्रेस लिंडा की दावेदारी को निरस्त कराने में नाकामयाब रही। इस चुनाव में लिंडा भले ही तीसरे स्थान पर रहे, मगर कांग्रेस की लुटिया डूबो कर रख दी थी। लिंडा को कुल 1 लाख 18 हजार 355 वोट (18 प्रतिशत) प्राप्त हुए। दोनों चुनाव में जीत भाजपा के सुदर्शन भगत को मिली थी।
लोहरदगा संसदीय सीट पर अब सवाल यह है कि चमरा लिंडा की गैरमौजूदगी में उनके वोटबैंक का रुख किधर होगा। लिंडा इस बात को बखूबी जानते हैं कि उनका वोटबैंक एकबार बिखर गया तो फिर उसे समेटने में किस तरह की मुश्किलें होंगी। यदि यह वोट कांग्रेस की तरफ गया तो हमेशा के लिए इस सीट पर झामुमो की दावेदारी समाप्त हो जाएगी। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनाव में झामुमो के चमरा लिंडा बिशुनपुर से विजयी हुए थे। वहीं, गुमला और सिसई विधानसभा क्षेत्र में झामुमो दूसरे स्थान पर रही थी। कांग्रेस को एकमात्र सफलता लोहरदगा में मिली थी और वह मांडर में दूसरे स्थान पर रही थी। इसलिए देखा जाए तो पूरे संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस के मुकाबले झामुमो की स्थिति कहीं ज्यादा बेहतर है। इस चुनावी कुरुक्षेत्र में गठबंधन धर्म का अनुपालन होगा, इस पर काफी संशय की स्थिति है। ऐसा भी नहीं है कि गठबंधन होने के बाद मतदाता इस संसदीय सीट को तश्तरी में सजाकर कांग्रेस को उपहार स्वरूप दे देगा। लोहरदगा विधायक व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत को कांग्रेस उम्मीदवार बनाए जाने के बाद गुमला जिला के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में मायूसी देखी जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सुखदेव भगत को पहले अपने ही घर को दुरुस्त करना होगा। कांग्रेस की तुलना में भाजपा की संगठनात्मक स्थिति काफी मजबूत है। चमरा लिंडा के सहयोगी रह चुके जिला परिषद के सदस्य तेम्बु उरांव, जिला परिषद के वर्तमान अध्यक्ष किरण माला बाड़ा, पूर्व जिप अध्यक्ष सतवंती देवी, बिशुनपुर क्षेत्र के तेजतर्रार नेता अशोक उरांव को संगठन में शामिल कर भाजपा ने सरना मतदाताओं को अपने पाले में करने के मंसूबे दिखा दिखा दिए हैं। वहीं राज्यसभा सांसद समीर उरांव के नेतृत्व में कार्यकर्ता पूरे संसदीय क्षेत्र के हरेक कोने को खंगाल रहे हैं। दूसरी तरफ झापा उम्मीदवार व कांग्रेस के पूर्व विधायक देव कुमार धान भी सरना मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए कोशिश कर रहे हैं।

हिन्दुस्थान समाचार 

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