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लोहरदगा सुरक्षित संसदीय सीट पर पिछले दो चुनाव से भाजपा का रहा है कब्जा

लोहरदगा सुरक्षित संसदीय सीट पर पिछले दो चुनाव से भाजपा का रहा है कब्जा
April 22
17:47 2019

गुमला , 22 अप्रैल (हि.स.)।
लोहरदगा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र को कभी कांग्रेस का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था लेकिन पिछले दो लोकसभा चुनाव से इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने अपना परचम लहराया है। कांंग्रेस के आदिवासी नेता स्व.कार्तिक उरांव व भाजपा के दिग्गज स्व.ललित उरांव की कर्मभूमि के रूप में विख्यात लोहरदगा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र हमेशा से किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं रहा है। कांग्रेस ने इस बार लोहरदगा के विधायक सह पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखदेव भगत को मैदान में उतारा है। मगर सवाल उठता है कि क्या वे कांग्रेस का पुराना गौरव वापस दिला पाएंगे। लोहरदगा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का इतिहास 1957 से शुरू होता है। 1957 के लोक सभा चुनाव में यहां से झारखंड पार्टी के इग्नेस बेक ने जीत हासिल की थी। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी जेठन खेरवार को पराजित किया था। 1962 के आम सभा चुनाव में एसडब्लूए उम्मीद्वार डेविड मुंजनी ने कांग्रेस प्रत्याशी कार्तिक उरांव को पराजित कर इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व संसद में किया। 1967 के लोक सभा चुनाव में कार्तिक उरांव ने जनसंघ प्रत्याशी एस.बड़ाईक को पराजित करते हुए यहां से कांग्रेस युग की नींव डाली। 1971 में इंदिरा गांधी की प्रचंड लहर के बीच पून: कार्तिक उरांव ने दोबारा जीत हासिल की। उन्होंने बिहार के प्रथम आदिवासी राज्यमंत्री व जनसंघ प्रत्याशी रोपना उरांव को पराजित किया था। इसके बाद आपात काल का दौर शुरू हुआ। तमाम विपक्षी पार्टियां जनता पार्टी के बैनर तले जमा हो गई। 1977 के आम लोक सभा चुनाव में जनता पार्टी के टिकट पर पहली बार चुनाव लड़ रहे लालू उरांव ने कार्तिक उरांव को पराजित कर सनसनी फैला दी। मगर जनता पार्टी की सरकार बीच में ही धराशायी होने के बाद देश को मध्याविधि चुनाव का सामना करना पड़ा।
1980 में हुए लोकसभा चुनाव में कार्तिक उरांव अपनी इस पुरानी सीट पर एक बार फिर कांग्रेस का परचम लहरा दिया। उन्होंने जनता पार्टी उम्मीदवार करमा उरांव को पराजित किया था। इसी दौरान कार्तिक उरांव के निधन हो जाने पर 1982 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने कार्तिक उरांव की पत्नी सुमति उरांव को मैदान में उतारा। सुमति उरांव ने इस क्षेत्र में तेजी से उभर रहे भाजपा नेता ललित उरांव को पराजित कर कांग्रेस की सीट बरकरार रखी। 1984 व 1989 में भी सुमति उरांव विजयी रही। दोनों बार उन्होंने भाजपा नेता ललित उरांव को पराजित किया था। लगातार हार के बावजूद भाजपा पूरे संसदीय क्षेत्र में अपनी पैठ मजबूत करने में सफल रही। 1991 में भाजपा के ललित उरांव ने सुमति उरांव को पराजित कर पहली बार इस कांग्रेसी गढ़ पर भाजपा का परचम लहराया। 1996 को लोक सभा चुनाव में सुमति उरांव की मौत के बाद कांग्रेस ने कार्तिक उरांव के समधी व पूर्व आईपीएस अधिकारी बंदी उरांव को अपने प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतारा। मगर उन्हें भाजपा के ललित उरांव के हाथों कड़वी हार का सामना करना पड़ा। 1998 के चुनाव में कांग्रेस के इंद्रनाथ भगत ने भाजपा से यह सीट छीन ली। उन्होंने ललित उरांव को पराजित किया था। एक साल बाद ही 1999 में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रो.दुखा भगत ने कांग्रेस प्रत्याशी इंद्रनाथ भगत को हरा कर यह सीट पुुन: भाजपा के खाते में डाल दिया। 2004 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस ने पूर्व आईपीएस डा. रामेश्वर उरांव को मैदान में उतारा। कांग्रेस का यह दांव सही पड़ा । डा.उरांव ने भाजपा प्रत्याशी प्रो.दुखा भगत को पराजित कर फिर एक बार फिर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी । इसके बाज कांग्रेस का सफर यहीं समाप्त हो गया।
2009 व 2014 में भाजपा के लोकप्रिय नेता सुदर्शन भगत ने लगातार दो जीत हासिल कर कांग्रेस को हाशिये में धकेल दिया। इस बार भी सुदर्शन भगत भाजपा उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं और उनके सामने कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में सुखदेव भगत हैं। कांग्रेस को यह सीट महागठबंधन में मिली है। कांग्रेस के लिए फायदे की बात यह है कि भाजपा विरोध के नाम पर अल्पसंख्यक मुस्लिम व ईसाई मतदाताओं का एकमुश्त समर्थन उसे आसानी से मिल जाएगा। मगर सरना व सदान मतदाताओं को भगत कितना प्रभावित व आकर्षित कर पाते हैं,इस पर उनकी सफलता-असफलता निर्भर है। देखा जा रहा है कि दल तो मिले हैं मगर दिल नही । साथ ही पार्टी के अंदर भी कई ऐसे नेता है जो सुखदेव भगत की राह को मुश्किल बना सकते हैं। ऐसी स्थिति में सुखदेव भगत के लिए यह चुनावी सफर उतना आसान नहीं है, जितना कांग्रेस के नेता समझ रहें है। उनके सामने भाजपा का अनुशासित कार्यकर्ताओं की फौज है जो किसी भी हालत में मैदान छोड़ने वाले नहीं है। साथ ही उन्हें कांग्रेस के पुराने दिग्गज व पूर्व विधायक देव कुमार धान का भी मुकाबला करना पड़ेगा। धान कांग्रेस के चुनावी गणित को बिगाड़ने की पुरी क्षमता रखते हैं। कुल मिला कर कांग्रेस प्रत्याशी सुखदेव भगत के लिए यह चुनाव काफी चुनौतीपूर्ण है ।

हिन्दुस्थान समाचार 

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