विश्व में नौ लाख दाइयों की कमी से उपजी चिन्ता – नई रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और साझीदार संगठनों की एक नई रिपोर्ट, दुनिया में व्यापक स्तर पर दाइयों (Midwives) की कमी को दर्शाती है, जिनकी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में लाखों महिलाओं व नवजात शिशुओं की या तो मौत हो रही है या फिर वे अस्वस्थता के शिकार हो रहे हैं. रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2035 तक इन स्वास्थ्य सेवाओं में समुचित निवेश के ज़रिये, हर वर्ष 43 लाख ज़िन्दगियों को बचाया जा सकता है.

‘2021 State of World’s Midwifery’ नामक इस रिपोर्ट को यौन एवँ प्रजनन मामलों की संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (UNFPA), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), दाइयों के अन्तरराष्ट्रीय परिसंघ (ICM) और अन्य साझीदार संगठनों ने तैयार किया है.   
ताज़ा रिपोर्ट में, 194 देशों में प्रसव सेवाओं से जुड़े कार्यबल और और सम्बन्धित स्वास्थ्य संसाधनों की समीक्षा की गई है.
नई रिपोर्ट बताती है कि विश्व में फ़िलहाल नौ लाख दाइयों की कमी है, जोकि प्रसव-सेवाओं के लिये आवश्यक वैश्विक कार्यबल का एक-तिहाई है.  
कोविड-19 संकट के दौरान ये समस्याएँ और गहरी हुई हैं, और महिलाओं व नवजात शिशुओं की स्वास्थ्य ज़रूरतें प्रभावित हुई हैं.
दाइयों को अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिये तैनात किये जाने के कारण प्रसव सेवाओं में भी व्यवधान आया है.  
दाइयों की गम्भीर कमी की वजह से ऐसी मौतों की संख्या बढ़ रही है जिनकी रोकथाम की जा सकती है.
एक अनुमान के मुताबिक, लगभग 93 फ़ीसदी दाइयाँ और 89 प्रतिशत नर्सें महिलाएँ हैं.
अहम भूमिका
दाइयों की भूमिका महज़ शिशु जन्म तक सीमित नहीं है. वे गर्भावस्था के दौरान और उसके उपरान्त भी अनेक प्रकार की यौन एवँ प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करती हैं.
इनमें परिवार नियोजन, यौन-संचारित संक्रमण का पता लगाना व उपचार और वयस्कों के लिये यौन एवँ प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ हैं.
आदरपूर्ण देखभाल व महिला अधिकारों को बरक़रार रखते हुए, वे इन सेवाओं को सुनिश्चित करती हैं.
दाइयों की संख्या बढ़ने और उनके द्वारा प्रदत्त सेवाओं के लिये सामर्थ्यवान माहौल के निर्माण से, महिलाओं व नवजात शिशुओं का स्वास्थ्य बेहतर होता है, जिससे सर्वसमाज का लाभ होता है.
रिपोर्ट के अनुसार दाइयों द्वारा जीवनरक्षक सेवाओं को दिये जाने वाले योगदान को जारी रखने के लिये बड़े पैमाने पर उनकी शिक्षा व प्रशिक्षण में निवेश की आवश्यकता पर बल दिया गया है.

© UNICEF/Seyba Keïtaमाली के एक स्वास्थ्य केन्द्र में, एक दाई, वर्ष 2021 के प्रथम बच्चों में से एक को, उठाते हुए. इस बच्चे को नव वर्ष की उम्मीद समझा जा सकता है.

यूएन जनसंख्या कोष की कार्यकारी निदेशक नतालिया कानेम ने कहा कि यौन, प्रजनन, मातृत्व और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिये अतिरिक्त 11 लाख स्वास्थ्यकर्मियों की आवश्यकता है.  
उन्होंने कहा कि एक क्षमतावान, बेहतर-प्रशिक्षित दाई से प्रसव के दौरान महिलाओं और उनके परिवारों पर बड़ा असर हो सकता है, जोकि अक्सर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बढ़ता है.
निवेश की दरकार
एक विश्लेषण दर्शाता है कि दाइयों के ज़रिये दी जाने वाली स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के वित्त पोषण से वर्ष 2035 तक 67 फ़ीसदी मातृत्व मौतों को टाला जा सकता है.
साथ ही इससे नवजात शिशुओं की 64 प्रतिशत मौतों को टालना और हर साल कुल 43 लाख ज़िन्दगियों को बचा पाना सम्भव होगा.
इससे पहले, वर्ष 2014 में भी इस विषय पर जारी की गई रिपोर्ट में चिन्ता व्यक्त की गई थी और इस कमी को पाटने के लिये रोडमैप भी सुझाया गया था.
रिपोर्ट के मुताबिक पिछले आठ वर्षों में इस दिशा में प्रगति की रफ़्तार धीमी रही है, और मौजूदा दर यूँ ही जारी रही तो वर्ष 2030 तक हालात में मामूली बदलाव ही हो पाएगा.
इस भारी क़िल्लत की एक बड़ी वजह लैंगिक विषमता को बताया गया है, जिसकी आमतौर पर शिनाख़्त नहीं की जाती.
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रसव सेवा कार्यबल में पूर्ण रूप से संसाधनों को उपलब्ध ना कराया जाना चिन्ताजनक है.
यह दर्शात है कि स्वास्थ्य प्रणालियों में ना तो महिलाओं व लड़कियों के लिये यौन एवँ प्रजनन सेवाओं को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है, और ना ही इन ज़रूरतों को पूरा करने के लिये दाइयों की भूमिका को पहचाना जा रहा है., संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और साझीदार संगठनों की एक नई रिपोर्ट, दुनिया में व्यापक स्तर पर दाइयों (Midwives) की कमी को दर्शाती है, जिनकी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में लाखों महिलाओं व नवजात शिशुओं की या तो मौत हो रही है या फिर वे अस्वस्थता के शिकार हो रहे हैं. रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2035 तक इन स्वास्थ्य सेवाओं में समुचित निवेश के ज़रिये, हर वर्ष 43 लाख ज़िन्दगियों को बचाया जा सकता है.

‘2021 State of World’s Midwifery’ नामक इस रिपोर्ट को यौन एवँ प्रजनन मामलों की संयुक्त राष्ट्र एजेंसी (UNFPA), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), दाइयों के अन्तरराष्ट्रीय परिसंघ (ICM) और अन्य साझीदार संगठनों ने तैयार किया है.   

ताज़ा रिपोर्ट में, 194 देशों में प्रसव सेवाओं से जुड़े कार्यबल और और सम्बन्धित स्वास्थ्य संसाधनों की समीक्षा की गई है.

नई रिपोर्ट बताती है कि विश्व में फ़िलहाल नौ लाख दाइयों की कमी है, जोकि प्रसव-सेवाओं के लिये आवश्यक वैश्विक कार्यबल का एक-तिहाई है.  

कोविड-19 संकट के दौरान ये समस्याएँ और गहरी हुई हैं, और महिलाओं व नवजात शिशुओं की स्वास्थ्य ज़रूरतें प्रभावित हुई हैं.

दाइयों को अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिये तैनात किये जाने के कारण प्रसव सेवाओं में भी व्यवधान आया है.  

दाइयों की गम्भीर कमी की वजह से ऐसी मौतों की संख्या बढ़ रही है जिनकी रोकथाम की जा सकती है.

एक अनुमान के मुताबिक, लगभग 93 फ़ीसदी दाइयाँ और 89 प्रतिशत नर्सें महिलाएँ हैं.

अहम भूमिका

दाइयों की भूमिका महज़ शिशु जन्म तक सीमित नहीं है. वे गर्भावस्था के दौरान और उसके उपरान्त भी अनेक प्रकार की यौन एवँ प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करती हैं.

इनमें परिवार नियोजन, यौन-संचारित संक्रमण का पता लगाना व उपचार और वयस्कों के लिये यौन एवँ प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ हैं.

आदरपूर्ण देखभाल व महिला अधिकारों को बरक़रार रखते हुए, वे इन सेवाओं को सुनिश्चित करती हैं.

दाइयों की संख्या बढ़ने और उनके द्वारा प्रदत्त सेवाओं के लिये सामर्थ्यवान माहौल के निर्माण से, महिलाओं व नवजात शिशुओं का स्वास्थ्य बेहतर होता है, जिससे सर्वसमाज का लाभ होता है.

रिपोर्ट के अनुसार दाइयों द्वारा जीवनरक्षक सेवाओं को दिये जाने वाले योगदान को जारी रखने के लिये बड़े पैमाने पर उनकी शिक्षा व प्रशिक्षण में निवेश की आवश्यकता पर बल दिया गया है.


© UNICEF/Seyba Keïta
माली के एक स्वास्थ्य केन्द्र में, एक दाई, वर्ष 2021 के प्रथम बच्चों में से एक को, उठाते हुए. इस बच्चे को नव वर्ष की उम्मीद समझा जा सकता है.

यूएन जनसंख्या कोष की कार्यकारी निदेशक नतालिया कानेम ने कहा कि यौन, प्रजनन, मातृत्व और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं के लिये अतिरिक्त 11 लाख स्वास्थ्यकर्मियों की आवश्यकता है.  

उन्होंने कहा कि एक क्षमतावान, बेहतर-प्रशिक्षित दाई से प्रसव के दौरान महिलाओं और उनके परिवारों पर बड़ा असर हो सकता है, जोकि अक्सर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बढ़ता है.

निवेश की दरकार

एक विश्लेषण दर्शाता है कि दाइयों के ज़रिये दी जाने वाली स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के वित्त पोषण से वर्ष 2035 तक 67 फ़ीसदी मातृत्व मौतों को टाला जा सकता है.

साथ ही इससे नवजात शिशुओं की 64 प्रतिशत मौतों को टालना और हर साल कुल 43 लाख ज़िन्दगियों को बचा पाना सम्भव होगा.

इससे पहले, वर्ष 2014 में भी इस विषय पर जारी की गई रिपोर्ट में चिन्ता व्यक्त की गई थी और इस कमी को पाटने के लिये रोडमैप भी सुझाया गया था.

रिपोर्ट के मुताबिक पिछले आठ वर्षों में इस दिशा में प्रगति की रफ़्तार धीमी रही है, और मौजूदा दर यूँ ही जारी रही तो वर्ष 2030 तक हालात में मामूली बदलाव ही हो पाएगा.

इस भारी क़िल्लत की एक बड़ी वजह लैंगिक विषमता को बताया गया है, जिसकी आमतौर पर शिनाख़्त नहीं की जाती.

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रसव सेवा कार्यबल में पूर्ण रूप से संसाधनों को उपलब्ध ना कराया जाना चिन्ताजनक है.

यह दर्शात है कि स्वास्थ्य प्रणालियों में ना तो महिलाओं व लड़कियों के लिये यौन एवँ प्रजनन सेवाओं को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है, और ना ही इन ज़रूरतों को पूरा करने के लिये दाइयों की भूमिका को पहचाना जा रहा है.

,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *