‘विषमता के वायरस’ से विनाश का ख़तरा – संकट पर क़ाबू पाने के लिये एकजुटता अहम

संयुक्त राष्ट्र उपमहासचिव आमिना मोहम्मद ने आगाह किया है कि कोविड-19 महामारी की वजह से दुनिया पहले से ज़्यादा विषमतापूर्ण हालात की ओर क़दम बढ़ा रही है और अनेक निम्नतर आय वाले देशों में अब तक हुई प्रगति पर जोखिम मंडरा रहा है. उन्होंने गुरुवार को विकास के लिये वित्त पोषण (Financing for Development) मंच के समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है.

यूएन उपमहासचिव ने कहा कि इस चार-दिवसीय फ़ोरम के दौरान कोविड-19 महामारी के असर का पूर्ण आकलन किया गया.

Development that is not risk-informed cannot be sustainable. Read our latest #Fin4Dev report: https://t.co/mecJTrqpBt #FinancingOurFuture pic.twitter.com/FtxsbDurVk— UN DESA (@UNDESA) April 15, 2021

“हमारे जीवनकाल की सबसे ख़राब स्वास्थ्य व आर्थिक मन्दी ने हमारी अर्थव्यवस्थाओं और समाजों की कमज़ोरियों को उजागर और पहले से ज़्यादा पैना किया है. इसकी वजह से कुछ लोग कोविड-19 को विषमता वायरस के रूप में बयाँ करते हैं.”
विकासशील देशों को बढ़ते कर्ज़ के भार, वित्तीय बजट की विवशताओं और उधार लेने की ऊँची क़ीमतों का सामना करना पड़ा है. इन हालात में महामारी पर जवाबी कार्रवाई के लिये उनकी क्षमता सीमित है.
“यह नैतिक रूप से सही और आर्थिक नज़रिये से तर्कसंगत है कि विकासशील देशों को इस संकट से उबरने में मदद प्रदान की जाए.”
विकास के लिये एक दशक के खो जाने के जोखिम की रोकथाम के लिये अभूतपूर्व स्तर पर सार्वजनिक व्यय की अहमियत को रेखांकित किया गया है ताकि निर्बल अर्थव्यवस्थाओं को सम्बल दिया जा सके.
साथ ही, इस प्रक्रिया में वैश्विक अर्थव्यवस्था की भावी संकटों से रक्षा हेतु ढाँचागत रूपान्तरकारी बदलावों को सुनिश्चित किया जाना होगा.
‘नैतिकता पर दाग’
यूएन उपमहासचिव ने कहा कि विश्व के सभी नागरिकों तक त्वरित गति से वैक्सीन पहुँचाया जाना इस समय शीर्ष प्राथमिकता है.
ग़ौरतलब है कि अफ़्रीकी देशों में कोविड टीके, औसतन एक फ़ीसदी से भी कम नागरिकों को ही मिल पाए हैं.
“यह अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की नैतिकता पर धब्बा है.”
उन्होंने सरकारों, विकास साझीदारों और निजी क्षेत्र के पक्षकारों के नाम एक अपील जारी करते हुए, न्यायसंगत वैक्सीन के वितरण को प्राथमिकता के तौर पर लेते हुए, वित्तीय संसाधन मुहैया कराए जाने होंगे.
इसके अतिरिक्त, कर्ज़ व नकदी सम्बन्धी दबावों से देशों को राहत प्रदान करने पर ज़ोर दिया गया है, जिसे ऋण अदायगी पर अस्थाई रोक की पहल को जारी रखकर और उसका दायरा बढ़ाकर सम्भव बनाया जा सकता है.
उन्होंने कहा कि कर्ज़ राहत के लिये पैमाना, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बजाय, वास्तविक आवश्यकता को रखा जाना होगा, विशेष रूप से ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन की बड़ी चुनौती का सामना कर रही है.
निवेश को बढ़ावा
कोरोनावायरस संकट के दौरान सामाजिक संरक्षा उपायों में निवेशों की अहमयित भी स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई है.
उपमहासचिव आमिना मोहम्मद ने कहा कि सरकारों को अपनी आबादी के कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी और निशुल्क शिक्षा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल और मज़बूत स्वास्थ्य प्रणालियों में भारी निवेश करना होगा.
उनके मुताबिक लोगों की आजीविका के साधनों को, वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ावों से अलग करते हुए आय की गारण्टी दी जानी होगी.
इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये दुनिया को वित्तीय संसाधनों को नई दिशा देनी होगी, ख़ासतौर पर आवश्यकता वाले क्षेत्रों में, एक रणनीतिक दृष्टि के साथ.
यूएन उपमहासचिव ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि मौजूदा दौर की चुनौतियाँ कोविड-19 से परे जाती हैं, और इनमें जलवायु संकट, सूखा, भुखमरी व बढ़ती असुरक्षा है.
विषमता वायरस के फैलने और उसके आर्थिक असर से ये सभी चुनौतियाँ और ज़्यादा पैनी हो गई है.
यूएन उपप्रमुख आमिना मोहम्मद ने कहा कि पुनर्बहाली प्रयासों में इन सभी चुनौतियों का सामना सीधे तौर पर करना होगा.
इस क्रम में सामयिक और पर्याप्त वैश्विक जवाबी कार्रवाई के लिये तत्काल कार्रवाई पर बल दिया गया है ताकि एक समृद्ध, टिकाऊ और समानता आधारित विश्व का निर्माण सम्भव हो सके.
विकास के लिये वित्त पोषण की छठी फ़ोरम का आयोजन 12 से 15 अप्रैल तक, न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में किया गया, जिसमें प्रतिनिधियों ने वर्चुअल और व्यक्तिगत तौर पर हिस्सा लिया., संयुक्त राष्ट्र उपमहासचिव आमिना मोहम्मद ने आगाह किया है कि कोविड-19 महामारी की वजह से दुनिया पहले से ज़्यादा विषमतापूर्ण हालात की ओर क़दम बढ़ा रही है और अनेक निम्नतर आय वाले देशों में अब तक हुई प्रगति पर जोखिम मंडरा रहा है. उन्होंने गुरुवार को विकास के लिये वित्त पोषण (Financing for Development) मंच के समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए यह बात कही है.

यूएन उपमहासचिव ने कहा कि इस चार-दिवसीय फ़ोरम के दौरान कोविड-19 महामारी के असर का पूर्ण आकलन किया गया.

“हमारे जीवनकाल की सबसे ख़राब स्वास्थ्य व आर्थिक मन्दी ने हमारी अर्थव्यवस्थाओं और समाजों की कमज़ोरियों को उजागर और पहले से ज़्यादा पैना किया है. इसकी वजह से कुछ लोग कोविड-19 को विषमता वायरस के रूप में बयाँ करते हैं.”

विकासशील देशों को बढ़ते कर्ज़ के भार, वित्तीय बजट की विवशताओं और उधार लेने की ऊँची क़ीमतों का सामना करना पड़ा है. इन हालात में महामारी पर जवाबी कार्रवाई के लिये उनकी क्षमता सीमित है.

“यह नैतिक रूप से सही और आर्थिक नज़रिये से तर्कसंगत है कि विकासशील देशों को इस संकट से उबरने में मदद प्रदान की जाए.”

विकास के लिये एक दशक के खो जाने के जोखिम की रोकथाम के लिये अभूतपूर्व स्तर पर सार्वजनिक व्यय की अहमियत को रेखांकित किया गया है ताकि निर्बल अर्थव्यवस्थाओं को सम्बल दिया जा सके.

साथ ही, इस प्रक्रिया में वैश्विक अर्थव्यवस्था की भावी संकटों से रक्षा हेतु ढाँचागत रूपान्तरकारी बदलावों को सुनिश्चित किया जाना होगा.

‘नैतिकता पर दाग’

यूएन उपमहासचिव ने कहा कि विश्व के सभी नागरिकों तक त्वरित गति से वैक्सीन पहुँचाया जाना इस समय शीर्ष प्राथमिकता है.

ग़ौरतलब है कि अफ़्रीकी देशों में कोविड टीके, औसतन एक फ़ीसदी से भी कम नागरिकों को ही मिल पाए हैं.

“यह अन्तरराष्ट्रीय समुदाय की नैतिकता पर धब्बा है.”

उन्होंने सरकारों, विकास साझीदारों और निजी क्षेत्र के पक्षकारों के नाम एक अपील जारी करते हुए, न्यायसंगत वैक्सीन के वितरण को प्राथमिकता के तौर पर लेते हुए, वित्तीय संसाधन मुहैया कराए जाने होंगे.

इसके अतिरिक्त, कर्ज़ व नकदी सम्बन्धी दबावों से देशों को राहत प्रदान करने पर ज़ोर दिया गया है, जिसे ऋण अदायगी पर अस्थाई रोक की पहल को जारी रखकर और उसका दायरा बढ़ाकर सम्भव बनाया जा सकता है.

उन्होंने कहा कि कर्ज़ राहत के लिये पैमाना, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बजाय, वास्तविक आवश्यकता को रखा जाना होगा, विशेष रूप से ऐसे समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन की बड़ी चुनौती का सामना कर रही है.

निवेश को बढ़ावा

कोरोनावायरस संकट के दौरान सामाजिक संरक्षा उपायों में निवेशों की अहमयित भी स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आई है.

उपमहासचिव आमिना मोहम्मद ने कहा कि सरकारों को अपनी आबादी के कल्याण को प्राथमिकता देनी होगी और निशुल्क शिक्षा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल और मज़बूत स्वास्थ्य प्रणालियों में भारी निवेश करना होगा.

उनके मुताबिक लोगों की आजीविका के साधनों को, वैश्विक अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ावों से अलग करते हुए आय की गारण्टी दी जानी होगी.

इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये दुनिया को वित्तीय संसाधनों को नई दिशा देनी होगी, ख़ासतौर पर आवश्यकता वाले क्षेत्रों में, एक रणनीतिक दृष्टि के साथ.

यूएन उपमहासचिव ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि मौजूदा दौर की चुनौतियाँ कोविड-19 से परे जाती हैं, और इनमें जलवायु संकट, सूखा, भुखमरी व बढ़ती असुरक्षा है.

विषमता वायरस के फैलने और उसके आर्थिक असर से ये सभी चुनौतियाँ और ज़्यादा पैनी हो गई है.

यूएन उपप्रमुख आमिना मोहम्मद ने कहा कि पुनर्बहाली प्रयासों में इन सभी चुनौतियों का सामना सीधे तौर पर करना होगा.

इस क्रम में सामयिक और पर्याप्त वैश्विक जवाबी कार्रवाई के लिये तत्काल कार्रवाई पर बल दिया गया है ताकि एक समृद्ध, टिकाऊ और समानता आधारित विश्व का निर्माण सम्भव हो सके.

विकास के लिये वित्त पोषण की छठी फ़ोरम का आयोजन 12 से 15 अप्रैल तक, न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में किया गया, जिसमें प्रतिनिधियों ने वर्चुअल और व्यक्तिगत तौर पर हिस्सा लिया.

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