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वृंदावन में अब प्रात:कालीन सेवा में भी हो सकेंगे फूल बंगले के दर्शन

वृंदावन में अब प्रात:कालीन सेवा में भी हो सकेंगे फूल बंगले के दर्शन
December 01
08:47 2018

मथुरा, 01 दिसम्बर : उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद श्रद्धालुओं को अब वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में नियमित रूप से प्रातःकालीन सेवा में भी फूल बंगले में विराजमान ठाकुर जी के दर्शन कर सकेंगे।

मंदिर के राजभोग सेवा अधिकारी ज्ञानेन्द्र गोस्वामी ने बताया कि अभी तक मंदिर में फूल बंगला बनाने की परम्परा चैत्र मास की एकादशी से सावन की अमावस्या तक केवल शयन भोग सेवा यानी शाम की सेवा में ही थी। फूल बंगले बहुत अधिक भव्य बनते हैं। श्रद्धालुओं का इनके प्रति जबरदस्त आकर्षण रहता है। फूल बंगले के दौरान मंदिर में बहुत अधिक भीड़भाड़ हो जाती है और दर्शन करना एक चुनौती बन जाता है। बंगले में बेला, चमेली, मोंगरा और कभी कभी तो विदेशी ऐसे पुष्पों का प्रयोग किया जाता है जिससे ठाकुर को शीतलता मिले। जो श्रद्धालु किसी कारण शाम को मंदिर में नहीं पहुंच पाते थे वे ठाकुर की फूल बंगला सेवा से वंचित हो जाते थे।

उन्होने बताया कि इस परेशानी को दूर करने के लिए लगभग 16 साल पहले मंदिर के सेवायत देवेन्द्र गोस्वामी ने सिविल जज जूनियर डिवीजन की अदालत में प्रार्थनापत्र देकर राजभेाग सेवा यानी सुबह की सेवा में फूलबंगला बनाने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। उस समय प्रबंधक एवं रिसीवर की संस्तुति पर सुबह भी फूल बंगला बनाने की इजाजत 23 दिसम्बर 2002 को दे दी गई थी। कुछ दिन फूल बंगले बने भी थे, लेकिन शयनभोग के सेवाधिकारी गौरव गोस्वामी ने उस समय मुंसिफ मथुरा के आदेश के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय से स्थगन आदेश ले लिया था।

श्री गोस्वामी ने बताया कि लगभग 15 साल बाद इस वाद की सुनवाई इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दिलीप बी0 भोसले एवं न्यायमूर्ति यशवन्त वर्मा की खण्डपीठ ने की थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने दो प्रमुख आपत्तियों पर भी विचार किया था जिन्हें गौरव गोस्वामी ने उठाया था तथा जिनमें शयनभोग के गोस्वामियों के हित पर कुठाराघात करने तथा परंपराओं को तोड़ने का प्रश्न भी उठाया गया था। न्यायमूर्तियों ने गंभीरता से विचार करने के बाद निर्णय में कहा था कि सुबह फूल बंगला बनने से न तो परंपराओं का हनन होता है और ना ही शयनभोग के गोस्वामियों का अहित ही होता है। पीठ का कहना था कि आपत्तियों के सबूत में कोई ठोस प्रमाण भी नहीं दिए गए।

मंदिर के राजभोग सेवा अधिकारी रजत गोस्वामी ने बताया कि खण्डपीठ ने गौरव गोस्वामी की याचिका को दो अगस्त 2018 को खारिज करते हुए सिविल जज जूनियर डिवीजन के 23 दिसम्बर 2002 के आदेश को बहाल कर दिया था। उन्होंने बताया कि इस आदेश के बाद इस बार राजभोग में केवल तीन दिन ही बंगले बन सके थे क्योंकि बंगला बनाने की अवधि समाप्त हो रही थी।

इस बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ राममूर्ति गोस्वामी एवं अन्य ने उच्चतम न्यायालय में  स्पेशल लीव पेटीशन दायर कर दी जिसमें रेस्पान्डेन्ट गौरव गोस्वामी एवं अन्य हैं। याचिका के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर स्टे लेने का प्रयास किया गया था। उच्चतम न्यायालय की जस्टिस मदन बी लोेकुर एवं जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने स्टे नहीं दिया था और 26 नवम्बर 2018 को ही इसका फैसला सुना दिया।

इस मामले में याचीे के अधिवक्ता ने याचिका को वापस लेने की इजाजत मांगी थी। पीठ ने इसकी अनुमति दे दी और आदेश में लिखा कि “स्पेशल लीव पेटीशन इज डिसमिस्ड ऐज विड्रान” यानी एसएलपी को वापस लेने के कारण उसे निरस्त किया जाता है।

बांकेबिहारी मंदिर के प्रबंधक मुनीश शर्मा ने बताया कि उच्चतम न्यायालय का आदेश सिविल जज जूनियर डिवीजन दुर्गेश नन्दिनी के पास पहुंच जाने के बाद वे जिस प्रकार का आदेेश देंगी उसका अनुपालन किया जाएगा। वैसे इस आदेश से मंदिर के राजभोग सेवा के गोस्वामियों में जश्न का माहौल है।

एजेंसी

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