शताब्दी के अन्त तक प्रवाल भित्तियों के विलुप्त होने की आशंका

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी कमी नहीं होती, तो सदी के अन्त तक दुनिया की सभी प्रवाल भित्तियाँ यानि कोरल रीफ़ ख़त्म हो जाएँगी. 

यूएन पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) की समुद्री व ताज़ा पानी शाखा की प्रमुख, लेटिसिया कार्वाल्हो का कहना है कि कार्रवाई न होने की स्थिति में, प्रवाल भित्तियाँ जल्दी ही ग़ायब हो जाएँगे.”

🆕report: Coral bleaching is happening faster than anticipated.Time is of the essence for marine species, human livelihoods and the still unknown treasures in our vastly unexplored oceans.#GlowingGone #ClimateCrisis https://t.co/Wz7S44IxFd— UN Environment Programme (@UNEP) December 21, 2020

उन्होंने कहा, “इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, मानवता को महासागरों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की पूर्व चेतावनी को समझकर, पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्तमान पथ बदलने के लिये सबूत-आधारित तात्कालिकता, महत्वाकाँक्षा और नवाचार के साथ कार्रवाई करनी चाहिये.”
प्रवाल भित्तियाँ बेहद महत्वपूर्ण हैं और समुद्री जीवन की विस्तृत विविधता को बनाए रखने के लिये बेहद अहम हैं.
वे लहरों और तूफ़ानों से होने वाले क्षरण से भी सुरक्षित रहते हैं, कार्बन और नाइट्रोजन को सोख़ते हैं और पोषक तत्वों को फिर से इस्तेमाल लायक़ बनाने यानि री-सायकिल करने में मदद करते हैं.
उनका नुक़सान होने से न केवल समुद्री जीवन के लिये विनाशकारी परिणाम होंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर उन एक अरब से अधिक लोगों को भी हानि पहुँचेगी, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनसे लाभान्वित होते हैं. 
‘कोरल ब्लीचिंग’
जब पानी का तापमान बढ़ता है, तो कोरल अपने ऊतकों में रहने वाले जीवन्त सूक्ष्म शैवाल को बाहर निकाल देते हैं. इसे कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है.
हालाँकि ब्लीच हुए कोरल अब भी जीवित होते हैं और यदि स्थिति में सुधार होता है, तो वे अपने शैवाल को पुनर्बहाल कर सकते हैं.
लेकिन, इसके ख़त्म होने से उनके तनाव में वृद्धि होती है और अगर यह ब्लीचिंग जारी रहती है, तो कोरल मर जाते हैं.
इससे पहली वैश्विक ब्लीचिंग की घटना 2014 में शुरू हुई और 2017 तक चली. यह प्रशान्त, भारतीय और अटलांटिक महासागरों में फैली, और अब तक की सबसे लम्बी, सबसे व्यापक और विनाशकारी कोरल ब्लीचिंग की घटना के रूप में दर्ज है.
यूनेप की Projections of Future Coral Bleaching Conditions रिपोर्ट के अनुमानों में कोरल ब्लीचिंग और जलवायु परिवर्तन के बीच की कड़ी को रेखांकित किया है.
यह रिपोर्ट दो सम्भावित परिदृश्य दर्शाती है: जीवाश्म ईंधन द्वारा भारी रूप से संचालित विश्व अर्थव्यवस्था की “सबसे ख़राब स्थिति”; और एक “बीच का रास्ता”, जिसमें देशों ने कार्बन उत्सर्जन को 50 प्रतिशत तक सीमित करने के लिये अपनी वर्तमान प्रतिबद्धताओं को पूरा कर लिया है. 

The Ocean Agency/WL Catlin Seaviकोरल ब्लीचिंग: बाद में (बाएँ) और पहले (दाएँ)

जीवाश्म-ईंधन-भारी परिदृश्य के तहत, रिपोर्ट का अनुमान है कि औसतन 2034 तक प्रत्येक वर्ष गम्भीर ब्लीचिंग होने से, दुनिया की हर एक रीफ़ चट्टान सदी के अन्त तक ख़त्म हो जाएगी, यानि तीन साल पहले प्रकाशित भविष्यवाणियों से नौ साल पहले ही. 
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इसके बाद प्रवाल भित्तियों की वापसी की कोई उम्मीद नहीं रहेगी, और भोजन, तटीय सुरक्षा, दवाओं और मनोरंजन के अवसरों सहित, पारिस्थितिक तन्त्र सेवाओं की एक पूरी श्रृँखला की आपूर्ति करने की उनकी क्षमता ख़त्म हो जाएगी. 
यूनेप ने कहा कि देशों को “मध्य-मार्ग” परिदृश्य को प्राप्त करना चाहिये, गम्भीर ब्लीचिंग को ग्यारह साल, यानि 2045 तक टाला जा सकता है.
अधिक गम्भीर स्थिति
अमेरिका के राष्ट्रीय समुद्री और वातावरणीय प्रशासन (NOAA) के प्रवाल भित्तियाँ शोधकर्ता व रिपोर्ट के प्रमुख लेखक, रूबेन वैन होईडोंक ने कहा, “दुखद बात यह है कि अनुमान पहले से कहीं अधिक भयावह हैं.”
“इसका मतलब है कि हमें वास्तव में इन भित्तियों को बचाने के लिये अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने की कोशिश करने की ज़रूरत है. इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि हमें इसके लिये तत्काल अधिक कार्रवाई की आवश्यकता है क्योंकि जो हमने सोचा था, हालात उससे अधिक ख़राब हैं.”
यूनेप के अनुसार, जबकि यह ठीक से मालूम नहीं है कि कोरल बदलते तापमान के साथ कैसे अनुकूलन करते हैं, रिपोर्ट में यह सम्भावना जताई गई है कि सम्भवत: यह अनुकूलन 0.25 डिग्री सेल्सियस और 2 डिग्री सेल्सियस के तापमान के बीच होता है.

UNDPसेशेल्स द्वीपसमूह के पानी में रीफ़ मछली और कोरल.

यह पाया गया कि हर चौथाई डिग्री अनुकूलन से वार्षिक ब्लीचिंग में अनुमानित सात साल की देरी हो सकती है: इसका मतलब है कि अगर कोरल 1 डिग्री सेल्सियस तापमान के मुताबिक अनुकूलन कर लें, तो उन्हें गम्भीर ब्लीचिंग से 30 साल और बचाया जा सकता है. 
हालाँकि, अगर मानवता अपने वर्तमान ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन पर क़ायम रहती है, तो कोरल 2 डिग्री सेल्सियस अनुकूलन के साथ भी जीवित नहीं रह पाएँगे.
रूबेन वैन होईडोंक ने कहा, “इससे यह स्पष्ट होता है कि अनुकूलन के साथ भी, हमें इन स्थानों पर थोड़ा समय हाथ में लेने के लिये, उत्सर्जन कम करने की आवश्यकता है, जिससे हम बहाली के प्रयास कर सकें और कोरल को जीवित रख सकें.” , संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी कमी नहीं होती, तो सदी के अन्त तक दुनिया की सभी प्रवाल भित्तियाँ यानि कोरल रीफ़ ख़त्म हो जाएँगी. 

यूएन पर्यावरण कार्यक्रम (यूनेप) की समुद्री व ताज़ा पानी शाखा की प्रमुख, लेटिसिया कार्वाल्हो का कहना है कि कार्रवाई न होने की स्थिति में, प्रवाल भित्तियाँ जल्दी ही ग़ायब हो जाएँगे.”

उन्होंने कहा, “इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, मानवता को महासागरों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की पूर्व चेतावनी को समझकर, पारिस्थितिकी तन्त्र का वर्तमान पथ बदलने के लिये सबूत-आधारित तात्कालिकता, महत्वाकाँक्षा और नवाचार के साथ कार्रवाई करनी चाहिये.”

प्रवाल भित्तियाँ बेहद महत्वपूर्ण हैं और समुद्री जीवन की विस्तृत विविधता को बनाए रखने के लिये बेहद अहम हैं.

वे लहरों और तूफ़ानों से होने वाले क्षरण से भी सुरक्षित रहते हैं, कार्बन और नाइट्रोजन को सोख़ते हैं और पोषक तत्वों को फिर से इस्तेमाल लायक़ बनाने यानि री-सायकिल करने में मदद करते हैं.

उनका नुक़सान होने से न केवल समुद्री जीवन के लिये विनाशकारी परिणाम होंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर उन एक अरब से अधिक लोगों को भी हानि पहुँचेगी, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनसे लाभान्वित होते हैं. 

‘कोरल ब्लीचिंग’

जब पानी का तापमान बढ़ता है, तो कोरल अपने ऊतकों में रहने वाले जीवन्त सूक्ष्म शैवाल को बाहर निकाल देते हैं. इसे कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है.

हालाँकि ब्लीच हुए कोरल अब भी जीवित होते हैं और यदि स्थिति में सुधार होता है, तो वे अपने शैवाल को पुनर्बहाल कर सकते हैं.

लेकिन, इसके ख़त्म होने से उनके तनाव में वृद्धि होती है और अगर यह ब्लीचिंग जारी रहती है, तो कोरल मर जाते हैं.

इससे पहली वैश्विक ब्लीचिंग की घटना 2014 में शुरू हुई और 2017 तक चली. यह प्रशान्त, भारतीय और अटलांटिक महासागरों में फैली, और अब तक की सबसे लम्बी, सबसे व्यापक और विनाशकारी कोरल ब्लीचिंग की घटना के रूप में दर्ज है.

यूनेप की Projections of Future Coral Bleaching Conditions रिपोर्ट के अनुमानों में कोरल ब्लीचिंग और जलवायु परिवर्तन के बीच की कड़ी को रेखांकित किया है.

यह रिपोर्ट दो सम्भावित परिदृश्य दर्शाती है: जीवाश्म ईंधन द्वारा भारी रूप से संचालित विश्व अर्थव्यवस्था की “सबसे ख़राब स्थिति”; और एक “बीच का रास्ता”, जिसमें देशों ने कार्बन उत्सर्जन को 50 प्रतिशत तक सीमित करने के लिये अपनी वर्तमान प्रतिबद्धताओं को पूरा कर लिया है. 


The Ocean Agency/WL Catlin Seavi
कोरल ब्लीचिंग: बाद में (बाएँ) और पहले (दाएँ)

जीवाश्म-ईंधन-भारी परिदृश्य के तहत, रिपोर्ट का अनुमान है कि औसतन 2034 तक प्रत्येक वर्ष गम्भीर ब्लीचिंग होने से, दुनिया की हर एक रीफ़ चट्टान सदी के अन्त तक ख़त्म हो जाएगी, यानि तीन साल पहले प्रकाशित भविष्यवाणियों से नौ साल पहले ही. 

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इसके बाद प्रवाल भित्तियों की वापसी की कोई उम्मीद नहीं रहेगी, और भोजन, तटीय सुरक्षा, दवाओं और मनोरंजन के अवसरों सहित, पारिस्थितिक तन्त्र सेवाओं की एक पूरी श्रृँखला की आपूर्ति करने की उनकी क्षमता ख़त्म हो जाएगी. 

यूनेप ने कहा कि देशों को “मध्य-मार्ग” परिदृश्य को प्राप्त करना चाहिये, गम्भीर ब्लीचिंग को ग्यारह साल, यानि 2045 तक टाला जा सकता है.

अधिक गम्भीर स्थिति

अमेरिका के राष्ट्रीय समुद्री और वातावरणीय प्रशासन (NOAA) के प्रवाल भित्तियाँ शोधकर्ता व रिपोर्ट के प्रमुख लेखक, रूबेन वैन होईडोंक ने कहा, “दुखद बात यह है कि अनुमान पहले से कहीं अधिक भयावह हैं.”

“इसका मतलब है कि हमें वास्तव में इन भित्तियों को बचाने के लिये अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने की कोशिश करने की ज़रूरत है. इस रिपोर्ट से स्पष्ट है कि हमें इसके लिये तत्काल अधिक कार्रवाई की आवश्यकता है क्योंकि जो हमने सोचा था, हालात उससे अधिक ख़राब हैं.”

यूनेप के अनुसार, जबकि यह ठीक से मालूम नहीं है कि कोरल बदलते तापमान के साथ कैसे अनुकूलन करते हैं, रिपोर्ट में यह सम्भावना जताई गई है कि सम्भवत: यह अनुकूलन 0.25 डिग्री सेल्सियस और 2 डिग्री सेल्सियस के तापमान के बीच होता है.


UNDP
सेशेल्स द्वीपसमूह के पानी में रीफ़ मछली और कोरल.

यह पाया गया कि हर चौथाई डिग्री अनुकूलन से वार्षिक ब्लीचिंग में अनुमानित सात साल की देरी हो सकती है: इसका मतलब है कि अगर कोरल 1 डिग्री सेल्सियस तापमान के मुताबिक अनुकूलन कर लें, तो उन्हें गम्भीर ब्लीचिंग से 30 साल और बचाया जा सकता है. 

हालाँकि, अगर मानवता अपने वर्तमान ग्रीनहाउस-गैस उत्सर्जन पर क़ायम रहती है, तो कोरल 2 डिग्री सेल्सियस अनुकूलन के साथ भी जीवित नहीं रह पाएँगे.

रूबेन वैन होईडोंक ने कहा, “इससे यह स्पष्ट होता है कि अनुकूलन के साथ भी, हमें इन स्थानों पर थोड़ा समय हाथ में लेने के लिये, उत्सर्जन कम करने की आवश्यकता है, जिससे हम बहाली के प्रयास कर सकें और कोरल को जीवित रख सकें.” 

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