शरीर से कहीं ज़्यादा दिमाग़ पर असर करता है कोविड-19! – ब्लॉग

जब मार्च 2020 में कोविड-19 का फैलाव शुरू हुआ तो किसी ने सोचा भी न था कि आगे क्या मंज़र देखने को मिलेगा. आज, जबकि कोरोनावायरस महामारी को शुरू हुए पूरा साल बीत चुका है, हालात बहुत भयावह हैं. सभी स्तब्ध हैं – हममें से हर एक के जीवन को यह छूकर या फिर छिन्न-भिन्न करके निकल चुका है और हम नि:शब्द हैं.  भारत में कोरोनावायरस के संक्रमण की दूसरी और अत्यन्त भयावह लहर पर, यूएन न्यूज़ – हिन्दी की अंशु शर्मा का ब्लॉग, जो ख़ुद भी कोविड-19 के प्रभावों की भुक्तभोगी हैं…

ऐसी महामारी जो न कभी देखी-सुनी, न महसूस की – अपने जीवन में ही नहीं, हमारे माता-पिता या दादा-दादी की कहानियों में भी इस तरह की त्रासदी का कभी कोई ज़िक्र नहीं आया.
हाँ, विज्ञान कल्पनाओं में ज़रूर इससे मिलती-जुलती कहानियाँ टीवी पर देखते रहे हैं, लेकिन वो तो रूपहले पर्दे की कहानियाँ होती हैं और उनमें आख़िर में नायक इस तरह के वायरस पर विजय प्राप्त करके मानवता को बचा लेता है. 
इस बार नायक असंख्य हैं – कोरोना से लड़ने वाले वो अनगिनत डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी जो लगातार इस वायरस से जंग लड़ रहे हैं – मगर अन्त है कि नज़र ही नहीं आ रहा!
यूएन समाचार के लिये काम करने की वजह से मैं शुरू से ही कोविड-19 को लेकर जागरूक थी. भारत में यूएन एजेंसियों के सहयोग से, इस महामारी को लेकर जागरूकता फैलाने से लेकर, दक्षिण एशिया में इसके प्रभाव और भ्रान्तियों पर मेरी हर रिपोर्ट की शुरूआत होती थी कोविड-19 से, और मानो, इस शब्द को आसानी से टाइप करके मैं आगे निकल जाती. चारों ओर दहशत का माहौल था और मेरा काम था, इसके बारे में जानकारी इकट्ठा करके, रिपोर्टिंग करना.
लेकिन इस शब्द के मायने मेरे लिये पूरी तरह तब बदल गए, जब अकस्मात मेरे परिवार के एक सदस्य की मृत्यु हो गई – कोविड से नहीं, लेकिन कोविड के कारण अस्पतालों में मची अफ़रा-तफ़री के कारण इलाज में देरी से. मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. सबसे बड़ा दर्द था कि उन्हें अन्तिम विदाई देने भी न जा सके, आपस में गले लगकर दुख तक नहीं बाँट सके. पूरा परिवार अपने-अपने घरों से एक-दूसरे को सांत्वना देता रहा. अजीब समय था – सब कुछ एक बुरा सपना सा लग रहा था.
कोविड महामारी का प्रभाव अब केवल मेरी रिपोर्टिंग तक ही सीमित नहीं था, बल्कि मेरे घर तक पहुँच गया था.
इसी दौरान, हमारे ममेरे भाई नाइजीरिया में फंसे थे और महीनों से उनको वापस लाने की जद्दो-जहद चल रही थी. फिर जुलाई में अचानक हालात बदले और मालूम हुआ कि वो भारत के लिये रवाना हो चुके हैं. परिवार को रौशनी की किरण नज़र आई. वो वापस आए और नियमानुसार 14 दिन के एकान्तवास के लिये शहर के एक होटल में रुक गए. अचानक एक दिन उनकी तबीयत बिगड़ी. कोविड की आशंका के बीच, उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया लेकिन, जब तक डॉक्टर कुछ समझ पाते, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. बाद में पता चला कि वो दक्षिण अफ्रीकी मलेरिया के शिकार हुए थे. कोविड ने परोक्ष रूप से परिवार और छोटा कर दिया था.
अब समझ आ गया था – हालात के सामने हम सभी असहाय थे.
कोविड-19 से रूबरू
लेकिन बेबसी क्या होती है इसका सामना करना अभी बाक़ी था. छह महीने बाद, सितम्बर में, मैं अपनी माँ और भाई से मिलने दूसरे शहर गई – पूरी सतर्कता बरतते हुए – कि कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए. सोचा कुछ समय माँ के साथ बिता आऊँ.
दो दिन बाद ही, मेरा गला ख़राब हुआ और फिर बुख़ार – मन मानने को तैयार नहीं था कि कोविड हो सकता है – मलेरिया, डेंगू, टायफॉयड और वायरल सभी के टेस्ट करवाए – और फिर निकला वही जिसका डर था – कोविड-19. मेरे साथ ही पूरे परिवार को भी संक्रमण लगा और हम सभी बीमार पड़ गए. 
सबसे ज़्यादा चिन्ता थी, माँ की. 14-15 दिन हालात से जूझते रहे. कभी ख़ुद पर ग़ुस्सा आता कि मैं तो बहुत सावधानी बरत रही थी. कहाँ ग़लती हो गई जिससे यह संक्रमण लगा. हर दिन पहाड़ सा कटता. कोविड-19 में कल क्या होगा, पता नहीं रहता. घर में सबके लिये चिन्ता होती लेकिन कमज़ोरी होने के कारण कुछ कर भी नहीं पाती. समाचार देखकर मन में बुरे ख़याल आते, फिर तुरन्त सोच को सकारात्मक विचारों की तरफ मोड़ती. ऐसे में, परिवार के डॉक्टर ने बहुत संबल दिया. उन्होंने भरोसा दिया कि किसी को कुछ नहीं होने देंगे और शायद यही भरोसा था, जिसने सभी को ताक़त दी. हमारे 70 साल के डॉक्टर ही थे, हमारे हीरो.   

UNICEF/Vinay Panjwani कोविड के ख़िलाफ़ जंग में महिला स्वास्थ्यकर्मियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है.

ग़नीमत थी कि अस्पताल जाने की नौबत नहीं आई, लेकिन तबीयत बहुत अच्छी भी नहीं रही. स्टेरॉयड के इन्जेक्शन लगने से तबीयत सुधरने लगी. वो इन्जेक्शन उस समय संजीवनी की तरह लगते थे. हर दिन हम इन्जेक्शन लगने का इन्तज़ार करते कि इसके बाद आज तबीयत कुछ और बेहतर होगी. कहना ग़लत नहीं होगा कि कोविड-19 बहुत हद तक दिमाग़ का खेल है.
14 दिन का वनवास बीता और मैं कोविड नैगेटिव होकर अपने घर में वापस दाख़िल हुई अपने बेटे और पति को देखकर शायद ही पहले कभी मैंने इतनी ख़ुशी महसूस की हो. 
साथ ही, ज़िन्दगी के प्रति नज़रिया अब पूरी तरह बदल चुका था. जीवन का मूल्य समझ आ गया था. किसके पास कितना समय है, मालूम नहीं. इसलिये जीवन अभी पूरी तरह जी लो, अपनों के साथ समय बिताओ और सबसे अहम प्रकृति का सम्मान करना सीखो और सिखाओ. 
कोविड-19 आपके दिलो-दिमाग़ पर कितना असर करता है, यह शायद मेरा परिवार बेहतर समझता होगा क्योंकि इससे उबरने के बाद मैं, परिवार में कोविड-19 को लेकर सावधानी बरतने को लिये और ज़्यादा कड़ाई बरतने लगी. बाहर जाने से रोकने से लेकर, हर चीज़ को स्वच्छ करने, घरेलू काम में मदद के लिये बाहर से किसी को न बुलाना आदि – मैं सभी पर रोक लगा रही थी – नहीं चाहती थी कि जो समय मैंने देखा, मेरा यह परिवार भी उससे गुज़रे.
फिर भारत में कोविड संक्रमण के मामले कम होने लगे. एक समय आया जब विश्व भर में प्रशंसा होने लगी कि भारत ने कोविड पर विजय प्राप्त कर ली है या फिर हर्ड-इम्युनिटी हासिल कर ली है. इसी के साथ, वैक्सीन आई और भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू किया. 
लगा कि कोविड-19 का अन्त अब नज़दीक है. सब कुछ सामान्य होने लगा – बाज़ारों में रौनक लौट आई, मॉल फिर से व्यस्त होने लगे – यहाँ तक कि मेले भी शुरू होने लगे. व्यापक स्तर पर सावधानी अब भी बरती जा रही थी, लेकिन लोग बेपरवाह होने लगे. हमारे घरों में भी फिर चहल-पहल शुरू हो गई. घरेलू कामगार भी वापस आए और हमें घर के कामकाज से राहत मिली. 
दूसरी लहर
और फिर आई कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर, जिसे नया क़हर बरपा कर दिया!
पहले महाराष्ट्र में तेज़ी से बढ़ते मामले और फिर पूरे भारत में कुछ हज़ार से बढ़कर, वर्तमान में प्रतिदिन 3 लाख से ज़्यादा कोविड-19 के मामले आ रहे हैं. जिस तेज़ी से यह नया वायरस रूप फैला, उससे सभी चकित रह गए हैं.
और चकित मैं भी रह गई – जब मेरे पति को बुख़ार हुआ और परिवार के सभी सदस्यों का कोविड टेस्ट होने पर 5 में से 3 लोग पॉज़िटिव निकले. आश्चर्य की बात यह थी कि इस बार कोविड के लक्षण बिल्कुल अलग थे – और शायद यही वजह थी कि जब तक किसी सदस्य को बुख़ार नहीं हुआ, हम लक्षण पहचान नहीं पाए.
अब दूसरी बार कोविड-19 से जद्दो-जहद! यह तो मैंने कभी सोचा न था. घर के सदस्यों में फिर कोविड पॉज़िटिव रिपोर्ट देखकर मेरे हाथ-पैर सुन्न पड़ गए. 
केवल मैं और मेरा 15 साल का बेटा बाहर थे, बाकि सभी एकान्तवास में अपने-अपने कमरों के अन्दर. बहुत ग़ुस्सा आया कि क्यों मैंने लापरवाही बरती, क्यों सारी सावधानियाँ ताक पर रख दीं, क्यों सबको लोगों से मिलने बाहर जाने दिया. 
इस बार मुझे कोविड-19 से लड़ने का अनुभव था. तय समय पर सभी को पौष्टिक भोजन देने से लेकर, बेटे को संक्रमण से दूर रखना. सबसे बड़ा सवाल था कि क्या मेरे अन्दर जो एण्टीबॉडीज़ बनी थीं, वो मुझे दोबारा संक्रमण से बचा पाएंगी?

UNICEF India/ Ruhani Kaurभारत में एक आशा कार्यकर्ता, रीना धाकड़ का कहना है कि वह कोविड से सुरक्षा पाने के लिये टीकाकरण करवाना चाहती हैं.

दूसरे ही दिन समझ आ गया कि घर में ही नहीं, बाहर भी हालात ख़राब हो चले हैं. भारत में कोविड संक्रमण एक नए उछाल पर है – हर दिन 1 लाख, फिर दो लाख और फिर तीन लाख 50 हज़ार से भी ज़्यादा कोविड-19 के मामले सामने आ रहे हैं – स्थिति बदतर होती जा रही है.
परिवार, दोस्तों को फोन करने पर मालूम हुई कि कितनों के क़रीबी सम्बन्धी अस्पतालों में ज़िन्दगी के लिये जंग लड़ रहे हैं. लगभग 2000 फ्लैटों वाली हमारी सोसायटी में ही 2-3 मामलों से बढ़कर पिछले सप्ताह में 100-200 मामले आ गए हैं. 
  
दिल में फिर डर बैठ गया. हर दिन भय में कटने लगा. बाहर के हालात मन में अनजाना डर पैदा कर रहे थे. हर बार रक्त जाँच रिपोर्ट आती और थोड़ा भी इधर-उधर होने पर दिल में अनगिनत संशय उठते. एक अजीब सा डर मन में बैठ गया. शारीरिक थकान के साथ-साथ मानसिक तनाव – बहुत मुश्किल था दोबारा सामना करना. 
लेकिन दोनों ही बार, संयुक्त राष्ट्र की टीम ने एक परिवार की तरह मेरा हाथ थामे रखा. भारत में संयुक्त राष्ट्र ने ‘ड्यूटी ऑफ़ केयर’ के तहत अपने कर्मचारियों और उनके परिवार के लिये एम्बुलेंस और डॉक्टर की व्यवस्था कर रखी है. संस्थागत प्रणाली चरमराने के बावजूद, यह सन्तोष है कि एक फ़ोन करते ही संयुक्त राष्ट्र की एम्बुलेंस आ जाएगी और तुरन्त चिकित्सा मदद मिलेगी. 
लेकिन बाहर स्थिति भयावह है…
आज भारत के ज़्यादातर प्रदेशों में सप्ताहान्त में करफ़्यू लगा दिया गया है. सरकारी मशीनरी और स्वास्थ्यकर्मी पूरी शिद्दत से कोरोनावायरस की रोकथाम में लगे हैं. 
कहते हैं कि स्पेनिश फ्लू में भी दूसरी लहर ने सबसे ज़्यादा तबाही मचाई थी. तो हमने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? क्यों इतिहास से सबक नहीं सीखा? मीडिया डरावनी तस्वीरों से भरा है… चारों और त्राहि-त्राहि मची है. 
सोशल मीडिया कोविड-19 की त्रासदी से अटा पड़ा है. कोविड के शिकार हुए दोस्तों और जान-पहचान वालों के फ़ेसबुक पर हर रोज़ सन्देश – श्रृद्धांजलि लिखते-लिखते दिलो-दिमाग़ थक चुके हैं. स्वास्थ्य प्रणाली चरमरा चुकी है. ट्विटर पर, प्लाज़्मा, दवाइयों, इन्जेक्शन और अस्पताल व आईसीयू में बैड दिलवाने की, लोगों की बदहवास, मार्मिक अपीलें, ऑक्सीजन के लिये अस्पतालों में कशमकश – महामारी की इस लहर ने एक अरब 30 करोड़ की आबादी वाले इस देश को मानों घुटनों पर ला दिया है.  
इन हालात को देखती हूँ तो कोविड से अपना व्यक्तिगत संघर्ष बहुत छोटा लगने लगा है. 
एक अलग जज़्बा
लेकिन दूसरी लहर एक मायने में अलग भी है. जहाँ पहली बार कोविड मरीज़ों को हिकारत से देखा जाता था और समाज उनके प्रति बुरा रवैय्या दिखा रहा था, दूसरी लहर में लोग आपस में एक-दूसरे से पूरा सहयोग कर रहे हैं. पड़ोसी हिम्मत दे रहे हैं, दुकानदार आगे बढ़कर घर तक सामान पहुँचा रहे हैं, गार्ड पूरी मुस्तैदी से आपकी मदद में लगे हैं, दोस्त खाना भेज रहे हैं. 
गुरूद्वारों में ऑक्सीजन लंगर खोले गए हैं, अस्पतालों की कमी को पूरा करने के लिये धार्मिक स्थल, एकान्तवास स्थलों में तब्दील किये जा रहे हैं, मोहल्लों के सामुदायिक केन्द्रों में लोग धन इकट्ठा करके, ऑक्सीजन उपकरणों का इन्तज़ाम कर रहे हैं, जगह-जगह लोग कोविड पीड़ित परिवारों के लिये भोजन पहुँचा रहे हैं. 
पहली लहर में अगर स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना योद्धाओं की कहानियाँ सामने आईं तो दूसरी में आस-पास के लोगों, दोस्तों और अपनों की करुणा की कहानियाँ सामने आ रही हैं.
पहली लहर ने अपनों को अलग किया था, दूसरी ने मानो दिल मिला दिये हैं!
बस, सबके ज़ेहन में एक ही सवाल है – इस रात की सुबह कब होगी?
सब कुछ एक डरावने सपने जैसा लगता है. शायद थोड़ी देर में आँख खुलेगी और सपना टूट जाएगा… और फिर ज़िन्दगी पहले की तरह ख़ुशहाल होगी… जैसेकि, शायद, असल में, ऐसा, हुआ ही न होगा! काश !!, जब मार्च 2020 में कोविड-19 का फैलाव शुरू हुआ तो किसी ने सोचा भी न था कि आगे क्या मंज़र देखने को मिलेगा. आज, जबकि कोरोनावायरस महामारी को शुरू हुए पूरा साल बीत चुका है, हालात बहुत भयावह हैं. सभी स्तब्ध हैं – हममें से हर एक के जीवन को यह छूकर या फिर छिन्न-भिन्न करके निकल चुका है और हम नि:शब्द हैं.  भारत में कोरोनावायरस के संक्रमण की दूसरी और अत्यन्त भयावह लहर पर, यूएन न्यूज़ – हिन्दी की अंशु शर्मा का ब्लॉग, जो ख़ुद भी कोविड-19 के प्रभावों की भुक्तभोगी हैं…

ऐसी महामारी जो न कभी देखी-सुनी, न महसूस की – अपने जीवन में ही नहीं, हमारे माता-पिता या दादा-दादी की कहानियों में भी इस तरह की त्रासदी का कभी कोई ज़िक्र नहीं आया.

हाँ, विज्ञान कल्पनाओं में ज़रूर इससे मिलती-जुलती कहानियाँ टीवी पर देखते रहे हैं, लेकिन वो तो रूपहले पर्दे की कहानियाँ होती हैं और उनमें आख़िर में नायक इस तरह के वायरस पर विजय प्राप्त करके मानवता को बचा लेता है. 

इस बार नायक असंख्य हैं – कोरोना से लड़ने वाले वो अनगिनत डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी जो लगातार इस वायरस से जंग लड़ रहे हैं – मगर अन्त है कि नज़र ही नहीं आ रहा!

यूएन समाचार के लिये काम करने की वजह से मैं शुरू से ही कोविड-19 को लेकर जागरूक थी. भारत में यूएन एजेंसियों के सहयोग से, इस महामारी को लेकर जागरूकता फैलाने से लेकर, दक्षिण एशिया में इसके प्रभाव और भ्रान्तियों पर मेरी हर रिपोर्ट की शुरूआत होती थी कोविड-19 से, और मानो, इस शब्द को आसानी से टाइप करके मैं आगे निकल जाती. चारों ओर दहशत का माहौल था और मेरा काम था, इसके बारे में जानकारी इकट्ठा करके, रिपोर्टिंग करना.

लेकिन इस शब्द के मायने मेरे लिये पूरी तरह तब बदल गए, जब अकस्मात मेरे परिवार के एक सदस्य की मृत्यु हो गई – कोविड से नहीं, लेकिन कोविड के कारण अस्पतालों में मची अफ़रा-तफ़री के कारण इलाज में देरी से. मानों दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. सबसे बड़ा दर्द था कि उन्हें अन्तिम विदाई देने भी न जा सके, आपस में गले लगकर दुख तक नहीं बाँट सके. पूरा परिवार अपने-अपने घरों से एक-दूसरे को सांत्वना देता रहा. अजीब समय था – सब कुछ एक बुरा सपना सा लग रहा था.

कोविड महामारी का प्रभाव अब केवल मेरी रिपोर्टिंग तक ही सीमित नहीं था, बल्कि मेरे घर तक पहुँच गया था.

इसी दौरान, हमारे ममेरे भाई नाइजीरिया में फंसे थे और महीनों से उनको वापस लाने की जद्दो-जहद चल रही थी. फिर जुलाई में अचानक हालात बदले और मालूम हुआ कि वो भारत के लिये रवाना हो चुके हैं. परिवार को रौशनी की किरण नज़र आई. वो वापस आए और नियमानुसार 14 दिन के एकान्तवास के लिये शहर के एक होटल में रुक गए. अचानक एक दिन उनकी तबीयत बिगड़ी. कोविड की आशंका के बीच, उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया लेकिन, जब तक डॉक्टर कुछ समझ पाते, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. बाद में पता चला कि वो दक्षिण अफ्रीकी मलेरिया के शिकार हुए थे. कोविड ने परोक्ष रूप से परिवार और छोटा कर दिया था.

अब समझ आ गया था – हालात के सामने हम सभी असहाय थे.

कोविड-19 से रूबरू

लेकिन बेबसी क्या होती है इसका सामना करना अभी बाक़ी था. छह महीने बाद, सितम्बर में, मैं अपनी माँ और भाई से मिलने दूसरे शहर गई – पूरी सतर्कता बरतते हुए – कि कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए. सोचा कुछ समय माँ के साथ बिता आऊँ.

दो दिन बाद ही, मेरा गला ख़राब हुआ और फिर बुख़ार – मन मानने को तैयार नहीं था कि कोविड हो सकता है – मलेरिया, डेंगू, टायफॉयड और वायरल सभी के टेस्ट करवाए – और फिर निकला वही जिसका डर था – कोविड-19. मेरे साथ ही पूरे परिवार को भी संक्रमण लगा और हम सभी बीमार पड़ गए. 

सबसे ज़्यादा चिन्ता थी, माँ की. 14-15 दिन हालात से जूझते रहे. कभी ख़ुद पर ग़ुस्सा आता कि मैं तो बहुत सावधानी बरत रही थी. कहाँ ग़लती हो गई जिससे यह संक्रमण लगा. हर दिन पहाड़ सा कटता. कोविड-19 में कल क्या होगा, पता नहीं रहता. घर में सबके लिये चिन्ता होती लेकिन कमज़ोरी होने के कारण कुछ कर भी नहीं पाती. समाचार देखकर मन में बुरे ख़याल आते, फिर तुरन्त सोच को सकारात्मक विचारों की तरफ मोड़ती. ऐसे में, परिवार के डॉक्टर ने बहुत संबल दिया. उन्होंने भरोसा दिया कि किसी को कुछ नहीं होने देंगे और शायद यही भरोसा था, जिसने सभी को ताक़त दी. हमारे 70 साल के डॉक्टर ही थे, हमारे हीरो.   


UNICEF/Vinay Panjwani
कोविड के ख़िलाफ़ जंग में महिला स्वास्थ्यकर्मियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है.

ग़नीमत थी कि अस्पताल जाने की नौबत नहीं आई, लेकिन तबीयत बहुत अच्छी भी नहीं रही. स्टेरॉयड के इन्जेक्शन लगने से तबीयत सुधरने लगी. वो इन्जेक्शन उस समय संजीवनी की तरह लगते थे. हर दिन हम इन्जेक्शन लगने का इन्तज़ार करते कि इसके बाद आज तबीयत कुछ और बेहतर होगी. कहना ग़लत नहीं होगा कि कोविड-19 बहुत हद तक दिमाग़ का खेल है.

14 दिन का वनवास बीता और मैं कोविड नैगेटिव होकर अपने घर में वापस दाख़िल हुई अपने बेटे और पति को देखकर शायद ही पहले कभी मैंने इतनी ख़ुशी महसूस की हो. 

साथ ही, ज़िन्दगी के प्रति नज़रिया अब पूरी तरह बदल चुका था. जीवन का मूल्य समझ आ गया था. किसके पास कितना समय है, मालूम नहीं. इसलिये जीवन अभी पूरी तरह जी लो, अपनों के साथ समय बिताओ और सबसे अहम प्रकृति का सम्मान करना सीखो और सिखाओ. 

कोविड-19 आपके दिलो-दिमाग़ पर कितना असर करता है, यह शायद मेरा परिवार बेहतर समझता होगा क्योंकि इससे उबरने के बाद मैं, परिवार में कोविड-19 को लेकर सावधानी बरतने को लिये और ज़्यादा कड़ाई बरतने लगी. बाहर जाने से रोकने से लेकर, हर चीज़ को स्वच्छ करने, घरेलू काम में मदद के लिये बाहर से किसी को न बुलाना आदि – मैं सभी पर रोक लगा रही थी – नहीं चाहती थी कि जो समय मैंने देखा, मेरा यह परिवार भी उससे गुज़रे.

फिर भारत में कोविड संक्रमण के मामले कम होने लगे. एक समय आया जब विश्व भर में प्रशंसा होने लगी कि भारत ने कोविड पर विजय प्राप्त कर ली है या फिर हर्ड-इम्युनिटी हासिल कर ली है. इसी के साथ, वैक्सीन आई और भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू किया. 

लगा कि कोविड-19 का अन्त अब नज़दीक है. सब कुछ सामान्य होने लगा – बाज़ारों में रौनक लौट आई, मॉल फिर से व्यस्त होने लगे – यहाँ तक कि मेले भी शुरू होने लगे. व्यापक स्तर पर सावधानी अब भी बरती जा रही थी, लेकिन लोग बेपरवाह होने लगे. हमारे घरों में भी फिर चहल-पहल शुरू हो गई. घरेलू कामगार भी वापस आए और हमें घर के कामकाज से राहत मिली. 

दूसरी लहर

और फिर आई कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर, जिसे नया क़हर बरपा कर दिया!

पहले महाराष्ट्र में तेज़ी से बढ़ते मामले और फिर पूरे भारत में कुछ हज़ार से बढ़कर, वर्तमान में प्रतिदिन 3 लाख से ज़्यादा कोविड-19 के मामले आ रहे हैं. जिस तेज़ी से यह नया वायरस रूप फैला, उससे सभी चकित रह गए हैं.

और चकित मैं भी रह गई – जब मेरे पति को बुख़ार हुआ और परिवार के सभी सदस्यों का कोविड टेस्ट होने पर 5 में से 3 लोग पॉज़िटिव निकले. आश्चर्य की बात यह थी कि इस बार कोविड के लक्षण बिल्कुल अलग थे – और शायद यही वजह थी कि जब तक किसी सदस्य को बुख़ार नहीं हुआ, हम लक्षण पहचान नहीं पाए.

अब दूसरी बार कोविड-19 से जद्दो-जहद! यह तो मैंने कभी सोचा न था. घर के सदस्यों में फिर कोविड पॉज़िटिव रिपोर्ट देखकर मेरे हाथ-पैर सुन्न पड़ गए. 

केवल मैं और मेरा 15 साल का बेटा बाहर थे, बाकि सभी एकान्तवास में अपने-अपने कमरों के अन्दर. बहुत ग़ुस्सा आया कि क्यों मैंने लापरवाही बरती, क्यों सारी सावधानियाँ ताक पर रख दीं, क्यों सबको लोगों से मिलने बाहर जाने दिया. 

इस बार मुझे कोविड-19 से लड़ने का अनुभव था. तय समय पर सभी को पौष्टिक भोजन देने से लेकर, बेटे को संक्रमण से दूर रखना. सबसे बड़ा सवाल था कि क्या मेरे अन्दर जो एण्टीबॉडीज़ बनी थीं, वो मुझे दोबारा संक्रमण से बचा पाएंगी?


UNICEF India/ Ruhani Kaur
भारत में एक आशा कार्यकर्ता, रीना धाकड़ का कहना है कि वह कोविड से सुरक्षा पाने के लिये टीकाकरण करवाना चाहती हैं.

दूसरे ही दिन समझ आ गया कि घर में ही नहीं, बाहर भी हालात ख़राब हो चले हैं. भारत में कोविड संक्रमण एक नए उछाल पर है – हर दिन 1 लाख, फिर दो लाख और फिर तीन लाख 50 हज़ार से भी ज़्यादा कोविड-19 के मामले सामने आ रहे हैं – स्थिति बदतर होती जा रही है.

परिवार, दोस्तों को फोन करने पर मालूम हुई कि कितनों के क़रीबी सम्बन्धी अस्पतालों में ज़िन्दगी के लिये जंग लड़ रहे हैं. लगभग 2000 फ्लैटों वाली हमारी सोसायटी में ही 2-3 मामलों से बढ़कर पिछले सप्ताह में 100-200 मामले आ गए हैं. 
  
दिल में फिर डर बैठ गया. हर दिन भय में कटने लगा. बाहर के हालात मन में अनजाना डर पैदा कर रहे थे. हर बार रक्त जाँच रिपोर्ट आती और थोड़ा भी इधर-उधर होने पर दिल में अनगिनत संशय उठते. एक अजीब सा डर मन में बैठ गया. शारीरिक थकान के साथ-साथ मानसिक तनाव – बहुत मुश्किल था दोबारा सामना करना. 

लेकिन दोनों ही बार, संयुक्त राष्ट्र की टीम ने एक परिवार की तरह मेरा हाथ थामे रखा. भारत में संयुक्त राष्ट्र ने ‘ड्यूटी ऑफ़ केयर’ के तहत अपने कर्मचारियों और उनके परिवार के लिये एम्बुलेंस और डॉक्टर की व्यवस्था कर रखी है. संस्थागत प्रणाली चरमराने के बावजूद, यह सन्तोष है कि एक फ़ोन करते ही संयुक्त राष्ट्र की एम्बुलेंस आ जाएगी और तुरन्त चिकित्सा मदद मिलेगी. 

लेकिन बाहर स्थिति भयावह है…

आज भारत के ज़्यादातर प्रदेशों में सप्ताहान्त में करफ़्यू लगा दिया गया है. सरकारी मशीनरी और स्वास्थ्यकर्मी पूरी शिद्दत से कोरोनावायरस की रोकथाम में लगे हैं. 

कहते हैं कि स्पेनिश फ्लू में भी दूसरी लहर ने सबसे ज़्यादा तबाही मचाई थी. तो हमने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? क्यों इतिहास से सबक नहीं सीखा? मीडिया डरावनी तस्वीरों से भरा है… चारों और त्राहि-त्राहि मची है. 

सोशल मीडिया कोविड-19 की त्रासदी से अटा पड़ा है. कोविड के शिकार हुए दोस्तों और जान-पहचान वालों के फ़ेसबुक पर हर रोज़ सन्देश – श्रृद्धांजलि लिखते-लिखते दिलो-दिमाग़ थक चुके हैं. स्वास्थ्य प्रणाली चरमरा चुकी है. ट्विटर पर, प्लाज़्मा, दवाइयों, इन्जेक्शन और अस्पताल व आईसीयू में बैड दिलवाने की, लोगों की बदहवास, मार्मिक अपीलें, ऑक्सीजन के लिये अस्पतालों में कशमकश – महामारी की इस लहर ने एक अरब 30 करोड़ की आबादी वाले इस देश को मानों घुटनों पर ला दिया है.  

इन हालात को देखती हूँ तो कोविड से अपना व्यक्तिगत संघर्ष बहुत छोटा लगने लगा है. 

एक अलग जज़्बा

लेकिन दूसरी लहर एक मायने में अलग भी है. जहाँ पहली बार कोविड मरीज़ों को हिकारत से देखा जाता था और समाज उनके प्रति बुरा रवैय्या दिखा रहा था, दूसरी लहर में लोग आपस में एक-दूसरे से पूरा सहयोग कर रहे हैं. पड़ोसी हिम्मत दे रहे हैं, दुकानदार आगे बढ़कर घर तक सामान पहुँचा रहे हैं, गार्ड पूरी मुस्तैदी से आपकी मदद में लगे हैं, दोस्त खाना भेज रहे हैं. 
गुरूद्वारों में ऑक्सीजन लंगर खोले गए हैं, अस्पतालों की कमी को पूरा करने के लिये धार्मिक स्थल, एकान्तवास स्थलों में तब्दील किये जा रहे हैं, मोहल्लों के सामुदायिक केन्द्रों में लोग धन इकट्ठा करके, ऑक्सीजन उपकरणों का इन्तज़ाम कर रहे हैं, जगह-जगह लोग कोविड पीड़ित परिवारों के लिये भोजन पहुँचा रहे हैं. 

पहली लहर में अगर स्वास्थ्यकर्मियों और कोरोना योद्धाओं की कहानियाँ सामने आईं तो दूसरी में आस-पास के लोगों, दोस्तों और अपनों की करुणा की कहानियाँ सामने आ रही हैं.

पहली लहर ने अपनों को अलग किया था, दूसरी ने मानो दिल मिला दिये हैं!

बस, सबके ज़ेहन में एक ही सवाल है – इस रात की सुबह कब होगी?

सब कुछ एक डरावने सपने जैसा लगता है. शायद थोड़ी देर में आँख खुलेगी और सपना टूट जाएगा… और फिर ज़िन्दगी पहले की तरह ख़ुशहाल होगी… जैसेकि, शायद, असल में, ऐसा, हुआ ही न होगा! काश !!

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