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संजय कृष्ण के पुर्नसंपादन में नौ दशक बाद फिर आया ’महावीर’ का सत्याग्रह अंक

संजय कृष्ण के पुर्नसंपादन में नौ दशक बाद फिर आया ’महावीर’ का सत्याग्रह अंक
February 01
10:57 2019

पत्रकार व लेखक संजय कृष्ण

’महावीर’ का अंक दुबारा प्रकाशित हुआ है। करीब नौ दशक बाद। रांची प्रेस क्लब में गणतंत्र दिवस पर इसका लोकार्पण राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश जी ने किया। यह पत्रिका बिहार और झारखंड के लिए एक दस्तावेज है। 1931 में प्रकाशित इस अंक में हर जिले के सत्याग्रह का लेखा जोखा है। सत्याग्रहियों की सूची है और दुर्लभ तस्वीरें हैं।

दुर्भाग्य है कि बिहार के पटना से प्रकाशित इस साप्ताहिक के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है। पटना से प्रकाशित यह पत्र हिंदी के पहले पत्र ’उदंत मात्र्तंड’ के प्रकाशन के ठीक सौ साल बाद 1926 में निकला। यह भी अल्पायु ही रहा। प्रायरू हर क्रांतिकारी पत्र दीर्घायु नहीं रह सके। ’महावीर’ भी नहीं रहा। इसके संपादक जगतनारायण लाल को भी जेल जाना पड़ा था।

इस पत्रिका का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है कि इसका एक विशेषांक श्सत्याग्रह्य पर आया था और दुर्भाग्य से हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में इस ऐतिहासिक पत्र का कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता। 1926 में इस पत्रा का प्रकाशन शुरू हुआ और 21 जून, 1931 को इसका श्सत्याग्रह्य का अंक आया। इस अंक के बारे में संपादक ने बहुत ईमानदारी से लिखा है, इन पंक्तियों में उन्हीं घटनाओं का संक्षिप्त विवरण देने का प्रयत्न किया गया है।

हम जानते हैं कि सत्याग्रह आंदोलन का ठीक-ठीक वर्णन करने में हजारों-हजार पृष्ठों को रंगना पड़ेगा, और तब की अपेक्षा? कहीं अधिक खोजढूंढ और जांच पड़ताल करनी पड़ेगी और उसके लिए तो महान् साधनों की आवश्यकता है, जिसका हमारे पास सर्वथा अभाव है। इन्हीं बातों और कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए हम ने इस अंक में सत्याग्रह सिद्धांतों के संक्षिप्त विवेचन के साथ भारतीय सत्याग्रह का थोड़ा वर्णन करते हुए बिहार प्रांत में होने वाली घटनाओं पर अधिक जोर दिया है।

यह पत्र साप्ताहिक था। व्यवसाय इसका उद्देश्य नहीं था। स्वाधीनता और जनजागरण से प्रेरित था। साधन का अभाव स्वाभाविक था। इस तरह की पत्रिकाओं के साथ दिक्कत तब भी थी, आज भी है। साधनों का अभाव और समय पर लेखकों का पर्याप्त और अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाना। इस के बावजूद जो अंक निकला, वह कम महत्वपूर्ण नहीं है। दुर्भाग्य से, ’महावीर’ का यही श्सत्याग्रह्य विशेषांक ही उपलब्ध है। डबल डिमाई आकार में यह पत्रिका छपी थी। अंक के मुख्य पृष्ठ पर गांधीजी लाठी लिये हुए सबसे आगे हैं और उनके पीछे सत्याग्रहियों की श्एस्य आकार में लंबी कतार है। नीचे मध्य में विजय-यात्रा लिखा हुआ है और फिर उसके नीचे सम्पादक का नाम- विश्वनाथ सहाय वर्मा। सबसे ऊपर बाएं संस्थापक श्री जगतनारायण लाल और दाहिने में पंजीयन- नं पी-186।

पटना से प्रकाशित ’महावीर’ के बारे में कहीं कोई विस्तृत या अपेक्षाकृत पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। हिंदी पत्राकारिता के इतिहास ग्रंथों में भी कहीं-कहीं ही इसका जिक्र बहुत ही चलताउ$ ढंग से एकाध पंक्तियों में मिलता है। चूंकि अपने इतिहास के प्रति आलस्य प्रवृत्ति, अपने समय को नजरअंदाज करने के कारण कई चीजें हमारी आंखों के सामने ही ओझल हो जाती हैं या नष्ट। या फिर जो चीजें हमारे विचारों में फिट नहीं बैठतीं, उसे नजरअंदाज करना ही उचित प्रतीत होता है। यह प्रवृत्ति कई पत्रिकाओं के साथ दिखाई पड़ती है। और, यह आत्महंता प्रवृत्ति आज भी हमारे मस्तिष्क में बैठी हुई है, इसलिए हम आज भी बेशक लापरवाह बने हुए हैं।

’महावीर’ के साथ ऐसा ही हुआ। हमने इसे सुरक्षित नहीं रखा। जगतनारायण लाल के परिवार के पास कुछ अंक थे, लेकिन वह भी रद्दी का शिकार हो गए। बहुत खोजते हुए रांची के संतुलाल पुस्तकालय में यही एक मात्रा विशेषांक मिला। जाहिर है कि यह दुर्लभ अंक है। हो सकता है कि कहीं कोई और पुराने पुस्तकालयों में इसकी एकाध फाइलें पड़ी हों, लेकिन ऐसा कम ही जान पड़ता है, क्योंकि बिहार की पत्रा-पत्रिकाओं पर शोधपूर्ण काम करने वाले पं रामजी मिश्र श्मनोहर्य भी इस बारे में कोई उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दे पाते। वे अपनी शोधपूर्ण कृति श्बिहार में हिंदी-पत्राकारिता का विकास्य में बस एक पैराग्राफ की संक्षिप्त सूचनात्मक जानकारी देते श्श्सन् 1926ं-27 में बाबू जगतनारायण लाल ने साप्ताहिक ’महावीर’ निकाला, जिसके वे स्वयं संपादक भी थे।

यह अपने समय का बड़ा ही संदर्भपूर्ण एवं सुसंपादित पत्र था। जगत बाबू राजनीति से सक्रिय रूप से जुड़े थे, अतरू समयाभाव तथा अर्थाभाव के कारण यह मुश्किल से पांच-छह वर्ष ही चल सका। इसके कई महत्वपूर्ण विशेषांक निकले, जिनमें बिहार के राजनीतिक आंदोलन का महत्वपूर्ण अंश छिपा पड़ा है। दुर्भाग्यवश इसकी फाइलें न तो जगत बाबू के परिवार वालों के पास है और न कहीं पुस्तकालयों में ही सुरक्षित हैं।

जगतनारायण राजनीति में सक्रिय थे। 1937 में वे एमएलए बने थे। छोटानागपुर में भी उनका आना-जाना था। यहां भी वे सक्रिय रहे। रांची के गुलाब नारायण तिवारी कह पुस्तक श्हिंदू जाति के भयंकर संहार अर्थात् छोटानागपुर में ईसाई धम्र्म्य की भूमिका उन्होंने लिखी थी। इस पुस्तक को बिहार प्रांतीय हिंदू सभा, पटना ने प्रकाशित किया था। रामेश्वर प्रसाद, श्रीकृष्ण प्रेस, मुरादपुर, पटना से यह पुस्तिका छपी थी। जगतबाबू ने एक संस्मरणात्मक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी थी-श्लाइट अंटू ए सेल्य। इसके अलावा इनकी कविताओं का एक संकलन श्ज्योत्सना्य नाम से प्रकाशित हुआ। इन्होंने श्हिंदू धर्म्य नामक एक और पुस्तक की भी रचना की थी।

कुछ और पुस्तकों का भी जिक्र मिलता है। उनकी रचनाएं भी अब अनुपलब्ध हो गई हैं। इतने महत्वपूर्ण राजनीतिकर्मी, लेखक और पत्राकार के बारे में कोई जानकारी का न होना हमारी उदासीनता को ही दर्शाता है। जिस बिहार से 1872 में श्बिहार बंधु्य नामक पत्रा निकला, उस राजनतिक रूप से सक्रिय प्रदेश में ऐसी उदासीनता गले नहीं उतरती। सब जानते हैं कि बिहार भी आजादी के आंदोलन का एक प्रमुख केंद्र था। चंपारण आंदोलन इस बिहार को एक राष्ट्रीय पहचान दी और भारतीय राजनीति को एक नई दिशा दिखाई। गांधी को भी इस आंदोलन ने प्रशिक्षित किया और भारत में सत्याग्रह का एक नया पाठ प्रस्तुत किया।

इस आंदोलन से बिहार ही नहीं, देश में एक राजनीतिक वातावरण बना और फिर पत्रा-पत्रिकाओं की जरूरत महसूस होने लगी। यही कारण है कि चंपारण आंदोलन के बाद बिहार से कई तेजस्वी साप्ताहिक तथा मासिक पत्रा निकले। जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी ने श्हिंदी पत्रकारिता का इतिहास्य में श्बिहार के पत्र्य बिहार की पत्राकारिता की चर्चा करते हुए लिखा है 1926 में पटना से श्री गंगाशरण सिंह, श्री जयप्रकाश नारायण और श्री रामवृक्ष बेनीपुरी ने श्युवक्य पत्र निकाला, जिसमें दिनकरजी राष्ट्रीय कविताएं सबसे पहले प्रकाशित हुईं। सन् 1930 में श्रीदेवव्रत शास्त्री ने साप्ताहिक श्नवशक्त्यि का प्रकाशन किया, जो स्वाधीनता-प्राप्ति तक बिहार का सबसे लोकप्रिय साप्ताहिक था।

सन् 1936 में उसका दैनिक संस्करण प्रकाशित हुआ, परंतु वह अधिक समय तक नहीं चल सका।्य बिहार के पत्र-पत्रिकाओं का जिक्र चतुर्वेदीजी करते है, पर उनकी आंखों से ’महावीर’ ओझल ही रहा। उनकी आंखों से ही नहीं, बल्कि श्बिहार शताब्दी के सौ नायक्य में भी जगतनारायण लाल कहीं दिखाई नहीं देते हैं।

इस पत्रिका के बारे में मोहम्मद साजिद की पुस्तक श्मुस्लिम पालिटिक्स इन बिहाररू चेंचिंग कंटूर्य में कुछ जानकारी मिलती है। जगतनारायण लाल बिहार में हिंदूसभा और आल इंडिया हिंदू महासभा के जनरल सेक्रेटरी बने। इसके बाद 1926 में ’महावीर’ नामक साप्ताहिक पत्र की शुरुआत की। संपादन भी खुद ही करते थे। इसमें सांप्रदयिक लेख काफी प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। वे 1922 से 28 तक बिहार कांग्रेस के सहायक सचिव भी रहे।

1930 में पटना जिला कांग्रेस के सचिव रहे। इसी के साथ श्सेवा समित्यि से भी जुड़े रहे। इसी साल उन्होंने श्हिन्दुस्थान सेवा संघ्य की स्थापना की। 1934 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। 1937 में मदनमोहन मालवीय की इडीपेंडेंट पाटी के साथ जुड़े। जगतनारायण लाल ने अपने संस्मरण में लिखा है कि ’महावीर’ हिंदू विचारधारा का समर्थक पत्र है। 1926 में यह पत्र साप्ताहिक शुरू हुआ। 1932 में यह दैनिक हो गया और 1932 में ही सरकारी विरोध के कारण बंद हो गया।

बिहार के ही एक प्रसिद्ध इतिहासकार ओमप्रकाश प्रसाद अपनी पुस्तक श्बिहाररू एक ऐतिहासिक अध्ययन्य में जगतनारायण लाल के बारे में कुछ और लिखते हैं। लिखते हैं–जगतनारायण लाल, राजेंद्र प्रसाद के कारण स्वतंत्राता संग्राम में शामिल हुए और मालवीयजी के कारण हिंदू महासभा से उनकी निकटता हुई। 1937 के निर्वाचन के बाद जगतनारायण लाल बिहार मंत्रिमंडल में सभा सचिव बने। 1940-42 की लंबी जेल यात्राओं के बाद 1957 में वे बिहार सरकार में मंत्राी बनाए गए। सामाजिक क्षेत्रा में काम करने के लिए उन्होंने श्बिहार सेवा समित्यि का गठन किया। 1926 में उन्हें अखिल भारतीय हिंदू महासभा का महामंत्राी चुना गया। से सांप्रदायिक सौहार्द के समर्थक थे। छुआछूत का निवारण और महिलाओं के उत्थान के कार्यों में भी उनकी रुचि थी। वे प्रबुद्ध वक्ता और श्रोताओं को घंटों अपनी वाणी से मुग्ध रख सकते थे। अपने समय में बिहार के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में उनका महत्चपूर्ण स्थान था। 1966 में उनका देहांत हुआ। रांची के राधाकृष्ण ने एक तरह से पत्राकारिता जीवन की शुरुआत इसी पत्रिका से की। फिर कहानी लेखन की ओर मुड़ गए। कहानी के साथ-साथ व्यंग्य भी लिखा।

’महावीर’ के इस सत्याग्रह अंक में कुल 49 लेख शामिल हैं। अंतिम 49 वां लेख नहीं, बल्कि श्बिहार के रणबांकुरे्य नाम से पूरे प्रदेश के राजबंदियों की एक लंबी सूची है। पूरी नहीं। जितनी मिल सकी। संपादक ने इस बारे में पहले ही संपादकीय में आगाह कर दिया, श्हम अपनी त्रुटियों और साधनाभावों से सजग हैं। जिस थोड़े समय में और प्रतिकूल परिस्थिति में हमें इसका प्रकाशन करना पड़ा, उसे ख्याल कर घबराहट होती है और अपनी उन त्राुटियों के लिए हम पाठकों से क्षमा चाहते हैं। लेखों के चुनाव में भी हमें बहुत से विद्वानों के लेख और कवितायें अपनी इच्छा के विपरीत इसलिए रख छोडनी पड़ी कि हमारे पास अधिक स्थान ही न था। हम उन सज्जनों से क्षमा चाहते हैं। इसी प्रकार चित्रों के चुनाव में भी कई प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं के चित्रा हमें अभाग्यवश कोशिश करने पर भी नहीं मिल सके, जिसका हमें हार्दिक खेद है और यह अभाव ऐसा है जो हमें सदा खटकता रहेगा और उसके लिये भी हम क्षमा-प्रार्थी हैं। उसी तरह बिहार के राजबंदियों की नामावली भी अधूरी रह गई है। कई जिलों से तो राजबंदियों की सूची मिली ही नहीं, और कई जगहों की लिस्ट आने पर भी वह अधूरी निकली। इस कारण उन त्रुटियों का ख्याल हमें दुरूखित कर रहे हैं।

अंक के विषय सूची से कुछ अनुमान लगा सकते हैं। सबसे पहले भारतीय नेताओं के दिव्य संदेश हैं। उस समय के बड़े नेताओं के संदेश प्रकाशित हैं। महात्मा गांधी के तीन लेख श्कष्ट सहन का नियम्य, श्स्वराज्य का एक लक्षण एवं अहिंसा्य है। बाबू राजेंद्र प्रसाद का श्सत्य और सत्याग्रह्य नामक लेख है। श्री प्रकाश का श्सत्याग्रह का खतरा्य, जगतनारायण लाल की श्राजबंदी जीवन व सत्याग्रह की मीमांसा्य के साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती का लेख श्सत्याग्रह की कमजोरियां और उनके नेवारण के उपाय्य आदि शामिल हैं।

संजय कृष्ण के पुर्नसंपादन में नौ दशक बाद फिर आया ’महावीर’ का सत्याग्रह अंक

कविताओं में श्री अरविंद का श्माता का संदेश्य, रामधारी सिंह दिनकर की कविता भव्य, श्बेगूसराय गोली कांड- श्री कपिलदेव नारायण सिंह सुहृद, बिस्मिल इलाहाबादी की श्फरियादे बिस्मिल्य आदि कविताएं प्रकाशित हैं। इसके श्अलावा सत्याग्रह और महिलाएं, श्बिहार में सत्याग्रह्य, श्बिहार में चैकीदारी कर बंदी्य, श्बिहार के शहीद आदि दुर्लभ, जानकारीपरक और महत्वपूर्ण लेख हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि जिलों के सत्याग्रह की रिपोर्ट है। तब झारखंड भी बिहार का हिस्सा था। कुछ जिलों की रिपोर्ट प्रकाशित है- सारन में सत्याग्रह, चम्पारण में सत्याग्रह, दरभंगा में सत्याग्रह, शाहाबाद में सत्याग्रह, भागलपुर में सत्याग्रह, प्रांत के कुल जेलयात्राी, बीहपुर सत्याग्रह, मुंगेर के सत्याग्रह, पटना नगर में सत्याग्रह, पटना जिला में सत्याग्रह, गया में सत्याग्रह, पूर्णिया में सत्याग्रह, रांची में सत्याग्रह, तमिलनाडु में सत्याग्रह आदि।

इन लेखों में सत्याग्रह के बारे में संक्षिप्त जानकारी है और किनके नेतृत्व में सत्याग्रह हुए, किन-किन लोगों ने भाग लिया, इसकी भी जानकारी दी गई है। उस समय के कई महत्वपूर्ण लेखकों ने इस अंक में योगदान दिया। प्रांत के कुल जेलयात्राी के अलावा बिहार के वीर बांकुड़े 12 पेज में दिया गया है। इसमें वृहद बिहार के जिलों के सत्याग्रह और राजबंदियों की सूची है। यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए, महावीर के इस अंक का महत्व बढ़ जाता है। इसके अलावा इसमें उस समय के कई बड़े नेताओं की तस्वीरें भी हैं।

सौ साल बाद प्रकाशित हुई भवानी दयाल संन्यासी की कृति ‘सत्याग्रही महात्मा गांधी’

आज यहां हम ऐसी ही किताब की चर्चा करने जा रहे हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है। यह किताब, सौ साल बाद दुबारा प्रकाशित हो रही है। पुस्तक का नाम है-श्सत्याग्रही महात्मा गान्धी अर्थात् मोहनदास कर्मचन्द गांधी्य। लेखक हैं भवानी दयाल। इसका लोकार्पण गणतंत्र दिवस के मौके पर रांची प्रेस क्लब में राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश ने किया। लेखक तब दक्षिण अफ्रिका के डरबन, नेटाल में रहते थे जन्म भी वहीं हुआ था, लेकिन मूल भारत था। भवानी दयाल ने यह पुस्तक 1916 में लिखी थी, क्योंकि प्रकाशन की तिथि 1917 है। जो संस्करण है, उस पर लिखा है, द्वितीयबार। यानी दूसरा संस्करण।

सौ साल बाद प्रकाशित हुई भवानी दयाल संन्यासी की कृति 'सत्याग्रही महात्मा गांधी’

संभव है, एक साल में इसका दूसरा संस्करण निकला हो। यह भी संभव है कि गांधी पर हिंदी में यह पहली पुस्तक हो। क्योंकि गांधी भारत 1915 में आते हैं। एक साल तक देश का भ्रमण करते हैं। किसी भारतवासी ने इतनी तत्परता दिखाते हुए उस समय कोई किताब लिख दी हो, मुश्किल लगता है। एक तीसरी उल्लेखनीय बात यह है कि भवानी दयाल ने 1916 में ही उन्हें महात्मा का नाम दे दिया था। चूंकि भवानी दयाल दक्षिण अफ्रिका में उनके साथ रहे। काम किया। उनके पिता जयराम सिंह का गांधी के प्रति अपूर्व प्रेम था। इसलिए गांधी के कर्म और चिंतन से भवानी दयाल काफी प्रभावित हुए।

इतने प्रभावित कि अपनी इस पुस्तक में उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है-श्महात्मा गान्धी का चरित्र लिखकर वास्तव में मैंने अनधिकार चेष्टा की है। उस महान पुरुष के जीवन का सच्चा चित्र खींचना मेरे लिये कठिन ही नहीं किन्तु असम्भव है। तो भी जो कुछ अपनी तुच्छातितुच्छ बुद्धि के अनुसार लिखा है, वह हिन्दी प्रेमियों की सेवा में सादर समर्पित है।…थोड़े दिनों तक महात्मा गान्धी के साथ रहकर उनके राजनैतिक सिद्धान्तों के जानने में जो कुछ सफलता प्राप्त की है, उसे मैंने श्दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह का इतिहास्य, श्हमारी कारावास की कहानी्य और इस पुस्तक में दर्शाने का प्रयास किया है।

पुस्तक के लेखक, भवानी दयाल को भी जानना चाहिए, जो बाद में आर्य समाज से दीक्षा लेकर संन्यास धारण कर भवानी दयाल संन्यासी कहलाए और जिनके बारे में हमारी पीढ़ी बहुत कुछ नहीं जानती और वह प्रदेश भी, जहां से उनका वास्ता रहा।
भवानी दयाल संन्यासी का पैतृक गांव बहुआरा है। यह बिहार के सासाराम जिले में है। कुदरा से 10-12 किलोमीटर की दूरी पर। पहले यह आरा जिले में था। श्प्रवासी की कहानी्य में भवानी दयाल संन्यासी अपने माता-पिता के बारे में जानकारी देते हैं- श्मेरी माता का नाम मोहिनी देवी था। उनका जन्म अवध में हुआ था। एक अच्छे जमींदार की बेटी थीं।…मेरे पिता का नाम जयराम सिंह था। वे बिहार के रहने वाले थे। बचपन में ही उनके मां-बाप मर गए थे।

मां-पिता के मिलने की कहानी किसी नाटक से कम नहीं। एब बार सरयू स्नान के मेले में संन्यासी की मां घर और गांव वालों के साथ स्नान करने अयोध्या गईं। वहां अचानक साथियों से विलग हो जाने के कारण वह भटक गईं। परिजनों को तलाशने की कोशिश की, लेकिन विफल रहीं। लाचार, मेले में एक किनारे बैठ रोने लगीं। इसी बीच एक ब्राह्मण वेशधारी आरकाटी उसके पास पहुंचा और अपने लोभ में फंसा दिया कि वह उनके परिजन से मिला देगा, लेकिन वह उसे कलकत्ते के डीपो पहुंचा दिया, जहां से जहाज लोगों को बेहतर जिंदगी का लालच देकर गोरे दक्षिण अफ्रिका ले जाते थे। इधर, जयराम सिंह भी गांव में बनियारी करते हुए काफी डांट-फटकार पाते थे। जमींदार से डांट सुनकर एक बार वे भी अपना गांव छोड़ नौकरी की आस में काशी पहुंचे और फिर यहां से वे भी आरकाटी के फंदे में फंस गए। पर, यहां का जीवन देख वह यहां से भागना चाहते थे। आरकाटी ने कहा, पांच रुपये तुम पर खर्च हुए हैं, वह दे दो, तो चले जाओ। न पांच रुपया हुआ न वे भाग सके और अंततरू वे भी उसी जहाज पर सवार कर दिए गए।

इसी जहाज पर दोनों साथ आए और शादी हो गई। नेटाल में दोनों ने पांच साल किसी तरह गुजारे और किसी तरह कुछ पैसा भी बचा लिए। पता चला कि नेटाल के पास ट्रांसवाल सुंदर शहर है। यहां सोने की खान है। इसलिए नेटाल से ट्रांसवाल चले आए। यहां आकर जोहान्सबर्ग में डेरा डाला और व्यापार करने लगे। इससे आर्थिक स्थिति काफी सुधर गई। वे यहां हिंदुस्थानियों के बीच बाबूजी के नाम से ख्यात हो गए। जब यहां ट्रांसवाल इंडियन एसोसिएशन की स्थापना हुई तो जयराम सिंह प्रधान चुने गए। यहीं ट्रांसवाल के जोहान्सबर्ग में दस सितंबर, 1892 को भवानी दयाल का जन्म हुआ। हालांकि दुखद यह रहा कि सात साल बाद उनकी माता का 1899 में निधन हो गया। इसी समय यहां अंग्रेज और बोअरों के बीच युद्ध छिड़ गया था। गांधीजी ने अंग्रेेजों की इस युद्ध में बहुत मदद की।

1904 में भवानी दयाल परिवार संग पहली बार अपनी जन्मभूमि से मातृभूमि भारत आए। यहां रहने के बाद 1907 में भवानी दयाल का विवाह हुआ। पिता ने भी यहां अपनी दूसरी शादी कर ली थी। पिताजी का जब 1911 में देहांत हुआ तो घर में कलह भी शुरू हो गया। विमाता का व्यवहार भी अनुकूल नहीं था। इसलिए 1912 में साढ़े आठ साल व्यतीत कर अपनी जन्मभूमि लौट गए। अपने पत्नी, छह महीने के पुत्र, छोटे भाई देवीदयाल और उनकी पत्नी के साथ। जिस दिन वहां पहुंचे तो वहां उन्हें जहाज से उतरने ही नहीं दिया गया। कानूनी अड़चन सामने आ गया। इसके बाद गांधीजी ने हस्तक्षेप किया और उनके वकील मित्र पोलक मामले को कोर्ट ले गए। किसी तरह जहाज से उतरे तो वे सीधे गांधी के आश्रम पहुंचे। पिताजी के रहते ही गांधीजी से परिचय हो गया था। पिताजी भी गांधी के आंदोलन में साथ रहे। हर स्तर पर मदद की। यहां संन्यासी ने धोबी का भी काम किया। वे गांधीजी को मजदूरों की तरह काम करते हुए देख चुके थे। इसलिए इस काम को करने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई। वे बाबू लालबहादुर सिंह के धोबीखाने यानी लांड्री में काम करते थे। बाबू साहब ट्रांसवाल के प्रसिद्ध सत्याग्रही थे। कई बार उन्होंने जेल की यात्रा की।

संन्यासी यहां कुछ दिनों में ही पक्का धोबी बन गए, लेकिन यह काम टिकाऊ न हो सका, क्योंकि 1913 के सितंबर में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का शंख फूंक दिया। सत्याग्रह में केवल भवानी दयाल ही शामिल नहीं हुए, पत्नी जगरानी देवी ने भी साथ दिया। संग्राम तेज हो गया। जेल भी जाना पड़ा। जेल से छूटे तो गांधीजी ने पत्र लिखकर कहा, फिनिक्स जाकर इंडियन ओपिनियन के हिंदी अंश का संपादन करें। यहां आकर संपादन किया। फिर सोने की खान में मजदूरी की। काम करते हुए हिंदी प्रचारिणी सभा, हिंदी रात्रि पाठशाला और हिंदी फुटबाल क्लब की स्थापना भी की। इसी समय 1914 में उन्होंने श्दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह का इतिहास्य लिखा। दो साल बाद 1916 में यह प्रकाशित हुआ। हिंदी प्रचार का काम भी चलता रहा। 1915 में जब नेटाल आए तो यहां दो साल तक हिंदी की सेवा करते रहे। इसके बाद दक्षिण अफ्रिका हिंदी साहित्य सम्मेलन का प्रथम अधिवेशन भी संन्यासी ने कराया। डरबन से धर्मवीर का सम्पादन किया। इसी बीच संन्यासी ने हमारी कारावास की कहानी, महात्मा गांधी का जीवन-चरित्र, वैदिक धर्म और आर्य सभ्यता, शिक्षित और किसान और नेटाली हिंदू नामक पुस्तकें लिख डालीं।

संन्यासी ने अपने परिवार के भविष्य के लिए यहां 1919 में गन्ने की खेती शुरू कर दी थी। उस समय उनके दो पुत्र थे। यह सब काम करते हुए भवानी दयाल संन्यासी उन चंद भारतीयों में शामिल थे, जिन्होंने महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में चलाए गए सत्याग्रह आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभायी थी। उन्होंने भारत ही नहीं दक्षिण अफ्रीका के इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी से पहले सत्याग्रह का इतिहास लिखा। वहीं अपनी पत्नी के साथ मिल कर श्जगरानी प्रेस्य स्थापित किया और श्हिंदी्य नाम से पत्रिका निकाल कर हिंदी का प्रसार-प्रचार किया। 1919 में वे दूसरी बार भारत आए और अपने बच्चों को वृंदावन के गुरुकुल में प्रवेश करा दिया। यह सब हो गया तो उनकी भेंट पं बनारसी दास चतुर्वेदी से हुई। यहां रहते हुए अमृतसर में कांग्रेस का अधिवेशन दिसंबर में हुआ तो वे अफ्रिका के हिंदुस्तानियों के प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। इसके बाद राजेंद्र प्रसाद से परिचय हुआ। 1920 के अगस्त में संन्यासी जी दक्षिण अफ्रिका चले गए।

सौ साल बाद प्रकाशित हुई भवानी दयाल संन्यासी की कृति 'सत्याग्रही महात्मा गांधी’

जिस दिन वे दक्षिण अफ्रिका पहुंचे, उसी दिन उन्हें तिलक के देहावसान व गांधीजी के असहयोग आंदोलन के श्रीगणेश का समाचार मिला। दक्षिण अफ्रिका में गांधीजी ने 1894 में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की थी। यह 1913 तक हिंदुस्तानियों की सेवा करती रही। जब 1914 में दक्षिण अफ्रिका से गांधीजी सदा के लिए विदा हो गए कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने सुप्रीम कौंसिल में दरख्वास्त देकर उसकी सारी जायदाद जब्त करा दी। इसके बाद लंबी लड़ाई के बाद 1921 को उसे पुनर्जीवित किया गया। तब भवानी दयाल को उसका प्रधान चुना गया। इस पद पर वे 18 साल तक रहे।

भवानी दयाल ने 1922 में छापाखाना खोला। इसमें उनकी पत्नी जगरानी देवी की बड़ी भूमिका रही। यहां से हिंदी समाचार पत्र का प्रकाशन हुआ। दुर्भाग्य यह रहा कि जगरानी देवी का अप्रैल के दूसरे सप्ताह में निधन हो गया। अखबार का पहला अंक मई में आना था। अंक तो निश्चित समय पर आया, लेकिन जगरानी देवी जग से विदा ले चुकी थीं। भवानी दयाली ने उनकी स्मृति में छापेखाने का नाम श्जगरानी प्रेस्य रखा। अभी पत्नी के देहांत से उबरे नहीं थे कि मातृभूमि से भी खबर आई कि विमाता और उनका इकलौता पुत्र भी अब दुनिया में नहीं रहे। फिर वे भारत आए। यहां फिर 1922 के दिसंबर में होने वाले गया कांग्रेस में भाग लिया। 1926 में अपने गांव बहुअरा में प्रवासी भवन बनवाया। 1927 के चैत्र की रामनवमी पर इस भवन का वार्षिकोत्सव हुआ और इसी अवसर पर भवानी दयाल आर्य समाज से दीक्षित होकर संन्यासी बन गए। आर्य समाज का प्रचार के साथ-साथ देश की आजादी के आंदोलन का काम भी साथ-साथ चलता रहा। मातृभूमि से जन्मभूमि की यात्रा भी होती रही।

आजादी का आंदोलन भी। इसी क्रम में 1929 नमक कानून तोडने और जनता को भड़काने के एवज में गिरफ्तार कर लिए गए और आरा से इन्हें में 11 अप्रैल की शाम को उन्हें हजारीबाग जेल के लिए रवाना कर दिया गया। 12 को जेल में दाखिल हुए। यहां पर रहते हुए उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका निकाली। प्रारंभ में रामवृक्ष बेनीपुरी ने श्कैदी्य निकाला। बाद में श्कारागार्य नाम की पत्रिका निकाली। उसके संपादन का भार उन्हें सौंपा गया। बिहार के सभी नेता कारागार के लिए लेख लिखकर देते थे। कारागार का प्रथमांक श्कृष्णांक्य था, जो जन्माष्टमी के समय प्रकाशित हुआ थाा। दूसरा अंक दीपावली अंक था और तीसरा सत्याग्रह अंक। प्रवासी की यह अधूरी कहानी है। श्प्रवासी की कहानी्य की भूमिका में डॉ राजेंद्र प्रसाद ने लिखा है- श्श्स्वामी भवानी दयाल संन्यासी से मेरी मुलाकात कई बरसों से है।

मुलाकात के पहले ही जब मुझे दक्षिण अफ्रिका के भारतियों इतिहास से कुछ परिचय हुआ, स्वामीजी के नाम और काम से परिचय हो चुका था। साक्षात् से वह परिचय और भी गहरा हो गया, और जैसे-जैसे परिचय बढ़ता गया उनके गुणों और कार्रवाइयों से अभिज्ञता होती गईय आदर और स्नेह बढ़ते गए। जब स्वामीजी 1930 में हिंदुस्तान आये और यहां के सत्याग्रह में आरा जिला में काम करने लगे, तो उनकी कार्यशक्ति, और अस्वस्थ शरीर से भी कितना परिश्रम वह कर सकते थे, इसका भी पता चला।

यों तो स्वामीजी प्रवासियों की ओर से भेजे हुए डेपुटेशन में भारत आते-जाते रहते हैं और वहां दक्षिण अफ्रिका में भी बराबर उनकी सेवा में ही लगे रहते हैं। पर हमको, जब-जब वह देश में आते हैं, अपने प्रेम और सहृदयता से बाधित करते हैं। वहां पर राजनीतिक और सामाजिक सेवा के अलावे स्वामीजी ने हिंदी प्रचार में भी बहुत बड़ा काम किया है। हम बिहारियों को इसका गौरव है कि वह हमारे ही प्रदेश के हैं और वह भारतीय होते हुए भी प्रान्त को नहीं भूले हैं। मैं समझता हूं कि ऐसे सज्जन की जीवनी से नवयुवकों को अपने जीवन बनाने में सहायता मिलेगी और स्वामीजी का त्याग, उनकी कार्यदक्षता और देश प्रेम उनके लिये एक आदर्श उपस्थित करके उनके लिए पथ-प्रदर्शक बनेगी।

प्रसाद ने अपनी आत्मकथा में भी जिक्र किया है, श्जेल में कुछ बातों में आपस में सुखद प्रतिद्वंद्विता हुई। कुछ लोगों ने श्बन्दी्य या श्कैदी्य नाम का एक हस्तलिखित मासिक पत्र निकाला। दूसरों ने श्कारागार्य नाम का दूसरा मासिक निकाला, जिसमें यह लिखा कि कैदी या बन्दी तो आते-जाते रहते हैं, बदलते रहते हैं़, पर कारागार तो स्थायी रूप से चलता रहता है! इन पत्रों में राष्ट्रीय आन्दोलन-सम्बंधी लेख लिखे जाते थे। एक विशेषांक में सभी जिलों के प्रमुख कार्यकर्ताओं से, अपने-अपने जिले में आन्दोलन की प्रगति पर, लेख लिखवाये जाते थे। मेरा ख्याल है कि उससे बहुत कुछ मसाला मिलता, जिससे आन्दोलन का इतिहास लिखा जा सकता। याद नहीं, वह विशेषांक कहां है। इन पत्रिकाओं के मुख्य प्रबन्धक और लेखकों में सर्वश्री भवानीदयाल, गया के बाबू मथुराप्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी और उत्साही युवक महामायाप्रसाद थे।

संन्यासी ने देश सेवा के साथ समाज की भी सेवा की। 1937 में लारेंस मारक्बिस में वेद मंदिर की आधारशिला रखी। 1944 में उन्हें काशी नागरी प्रचारिणी सभा की स्वर्णजयंती का अध्यक्ष चुना गया। उसी समय अजमेर से प्रकाशित श्प्रवासी्य पत्रिका का संचालन और सम्पादन किया। इसके पहले 1931 में बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के दसवें देवघर अधिवेशन में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए, बिहार की चिंत्य स्थिति पर बड़ा मार्मिक प्रकाश डाला था। उन्होंने कहा था, श्बिहार में न लेखकों की कमी है न पाठकों की, न सम्पादकों की, न सुकवियों की और साहित्यसेवियों की। अन्य क्षेत्रों की पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें बिहार में ही अधिक खपती हैं। फिर भी हमारी यह दीन दशा क्यों? कारण यह है कि हममें कल्पना और कार्यशक्ति का अभाव हो गया है। हमारी दिमागी उड़ान एवं बुद्धि गुलाम हो गई है तथा हम अपनी राष्ट्रभाषा के उज्ज्वल भविष्य में अविश्वास करने लगे हैं।

प्रवासीजी का देहान्त 9 मई 1950 को प्रवासी भवन अजमेर, में हुआ। गांधीजी की जब यह जीवनी लिखी, तब उनकी उम्र मात्रा 24 साल की थी। आप उनकी प्रतिभा, सोच और संस्कार का अनुमान लगा सकते हैं। प्रवासी की यह कहानी हम इसलिए अधूरी छोड़ रहे हैं कि आप उनके बारे में जानने के लिए कुछ और देखें और पढ़ें। आजादी के आंदोलन में इनकी महती भूमिका रही। विदेश में हिंदी के प्रचार में इनका सबसे बड़ा योगदान रहा है। हिंदी के इस सेवक के नाम पर अपने देश में न कोई पुरस्कार है न किसी मार्ग का नाम। देश तो भूला ही चुका है, बिहार ने भी कहां उन्हें मान-सम्मान और याद किया। बिहार शताब्दी के सौ नायकों में भी नहीं। यह पुस्तक को संजय कृष्ण के अथक प्रयास से दुबारा प्रकाशित हुई है। एक बार फिर उन्हें बधाई।

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