संयुक्त राष्ट्र कैसे करता है संघर्ष रोकथाम व निवारण

जब सदस्य देशों ने 75 वर्ष पहले यूएन चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे, इसका मक़सद आने वाली पीढ़ियों को तीसरे विश्व युद्ध से बचाना था. इसका मक़सद संघर्ष टालना व रोकना भी था. इसलिये संयुक्त राष्ट्र के लिये संघर्ष निवारण अब भी एक केन्द्रीय प्राथमिकता है. फिर भी, सम्बन्ध पक्षों को शान्ति के लिये राज़ी करना बहुत कठिन काम है, ख़ासतौर से तब, जब वो शान्ति नहीं चाहते हों.

ऐसे में सवाल उठता है, कि संघर्ष की रोकथाम व निवारण का कामकाज कैसे होता है?
हमारे अनुभव में, ये तब सही काम करता है जब ये पाँच तत्व उसमें शामिल हों:
पहला, नब्ज़ पर आपकी उँगली होना. ज़मीनी स्थिति के नज़दीक होना और स्थिति को अच्छी तरह से समझना. इसीलिये ये काम करने के लिये हमारे पास दुनिया भर में 35 विशेष राजनैतिक मिशन मौजूद हैं.
दूसरा, राजनैतिक पटरी पर जल्दी काम शुरू करना. इसके लिये सभी पक्षों के बारे में गहरी समझ विकसित करने की ज़रूरत होती है. ना केवल सरकार में अधिकारियों, बल्कि समाज के सभी हिस्सों में मौजूद पक्षों को.

Giles Clarke/UN OCHAयमन को विश्व का सबसे ख़राब मानवीय संकट बताया गया है.

न्यूयॉर्क में हमारे राजनैतिक मामलों के अधिकारी, सभी 193 सदस्य देशों को कवर करते हैं और वो इन कर्ताओं के साथ निकट सम्पर्क क़ायम रखते हैं, और आरम्भिक राजनैतिक सम्पर्क शुरू करने में सहायता के लिये महत्वपूर्ण विश्लेषण मुहैया कराते हैं.
तीसरा, बहुत से पक्षों की आवाज़ों को शामिल करना, जिनमें महिलाएँ और युवा शामिल हैं.
चौथा, क्षेत्रीय संगठनों और अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के साथ साझेदारी क़ायम करना और तात्कालिक अवधि वाले राजनैतिक कामकाज को दीर्घकालीन शान्ति निर्माण विकास प्रयासों के साथ जोड़ना.
पाँचवाँ, और सबसे ज़्यादा अहम, तमाम पक्षों में संघर्ष को रोकने की राजनैतिक इच्छा शक्ति का होना.
जब ये तत्व मौजूद होते हैं तो संघर्ष निवारण के प्रयास कामयाब होते हैं. जब रोकथाम के प्रयास नाकाम हो जाते हैं, तो उसके नतीजे साफ़ दिखाई देते हैं जो आमतौर पर विनाशकारी होते हैं.
जैसाकि पिछले वर्षों के दौरान देखा है, अनेक स्थानों पर चुनाव लड़े गए हैं, जन प्रदर्शन हुए हैं, और राजनैतिक परिवर्तन, हमारे सामने करने के लिये बहुत काम है.
लेकिन, हम यहाँ संयुक्त राष्ट्र में मौजूद रहकर, दुनिया भर में तमाम राष्ट्रीय पक्षों, पुरुषों और महिलाओं को, संघर्ष रोकथाम व निवारण के प्रयासों में समर्थन देने के लिये अपने कठिन प्रयास जारी रखने के लिये संकल्पबद्ध हैं. 
मध्यस्थों की भूमिका
पिछले कुछ वर्षों के दौरान कोलम्बिया और दक्षिणी फ़िलिपीन्स में दशकों से चले आ रहे संघर्षों का हल निकालने के लिये समझौते कराने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है.
कोलम्बिया में संघर्ष समाप्त करने के लिये वैसे तो कोई औपचारिक मध्यस्थता नहीं हुई, मगर क्यूबा और नॉर्वे सहित अनेक अन्तरराष्ट्रीय पक्षों ने कुछ सहायता मुहैया कराई, जिनमें संयुक्त राष्ट्र भी शामिल था.
मलेशिया ने दक्षिणी फ़िलिपीन्स में संघर्ष समाप्त करने में मध्यस्थता की जिसे एक अन्तरराष्ट्रीय सम्पर्क समूह का समर्थन मिला जिसमें कुछ देशों और ग़ैर-सरकारी संगठन शामिल थे.
इसके अतिरिक्त, एक यूएन मध्यस्थ ने ग्रीस और “पूर्व यूगोस्लाव गणतन्त्र मैसीडोनिया” के बीच, एक नाम का मुद्दा, आख़िरकार हल कर दिया. इस समझौते के बाद दूसरे पक्ष को “उत्तर मैसीडोनिया गणराज्य” के रूप में मान्यता मिल गई. सिर्फ़ इतना सा बदलाव करने के लिये ये मुद्दा सुलझाने में 25 वर्ष का समय लग गया और इससे नज़र आता है कि कितनी संवेदनशीलताएँ दाव पर लगी थीं.
अन्य स्थानों पर भी, संयुक्त राष्ट्र और उसके मध्यस्थों को अक्सर बहुत विषैली और विभाजनकारी भू-राजनैतिक परिस्थियों का सामना करन पड़ा है.
रूस और अमेरिका के बीच फिर से तनाव बढ़ने, चीन और अमेरिका के बीच तनाव का नया दौर, अरब देशों और उससे भी आगे शिया-सुन्नी मुसलमानों का झगड़ा, देशों के भीतर बढ़ता लोकलुभावनवाद जिसने नाराज़गियाँ और असुरक्षा के हालात पैदा कर दिये हैं. 
टैक्नॉलॉची के फ़ायदे व चुनौतियाँ
सूचना व संचार प्रोद्योगिकी (ICT) में क्रान्तिकारी प्रगति ने असाधारण लाभदायक बदलाव किये हैं, मगर नई चुनौतियाँ भी पेश की हैं.
इण्टरनेट की उपलब्धता ने लोकतान्त्रिक विचार और सूचनाएँ फैलाने, शिक्षा, महिलाधिकारों, और आज़ादी का माहौल बनाने में मदद मिली है. साथ ही सूचना व संचार प्रोद्योगिकी ने उन लोगों को भी सक्रिय कर दिया है जो बदलाव की माँग कर रहे हैं, ख़ासतौर से युवजन. 
लेकिन सोशल मीडिया ने नफ़रत पर आधारित हिंसा और असहिष्णुता को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय स्तर से परे बहुत सी ख़तरनाक गतिविधियों में अहम भूमिका भी निभाई है.
इनमें हथियारों व लोगों की तस्करी जिहादी गतिविधियों के लिये भर्ती किया जाना भी शामिल हैं जिनके ज़रिये सशस्त्र संघर्ष लम्बे और गम्भीर बनते हैं.

© UNICEF/Khalil Ashawiसीरिया के इदलिब इलाक़े में लड़ाई झगड़े से बचने के लिये बहुत से परिवारों ने सुरक्षा के लिये आफ़रीन में पनाह ली जो उत्तरी गवर्नरेट अलेप्पो का एक ग्रामीण इलाक़ा है.

वर्तमान दौर के संघर्षों की चुनौतियों का सामना करने के लिये मध्यस्थता की माँग बहुत तात्कालिक व जटिल है.
अचानक कुछ ऐसे बदलाव भी हो जाते हैं जिन पर मध्यस्थकार का कोई नियन्त्रण नहीं होता, मसलन नेतृत्व में अचानक परिवर्तन, या फिर कोई प्राकृतिक आपदा जैसा कोई बाहरी झटका. आज के दौर के ज़्यादातर संघर्षों में मध्यस्थता करना लम्बी अवधि तक चलने वाले प्रयास हैं.
एक मध्यस्थ की ज़िम्मेदारियों पर नज़र डालें तो उन्हें धीमी चाल की तरह अपने प्रयास जारी रखने होते हैं, मुश्किल से ही तेज़ दौड़ की तरह कोशिशें करनी होती हैं.
उन्हें इस रास्ते पर चलते हुए अनेक स्तरों पर रणनीति व विभिन्न पक्षों के साथ तालमेल बिठाने और उन्हें साथ लेकर चलने के बारे में सोचना पड़ता है.
उन्हें अपने प्रयासों में नई टैक्नॉलॉजी की सम्भावनाओं का फ़ायदा उठाने के बारे में भी सोचना होता है, साथ ही अगली पीढ़ियों के हितों पर भी ध्यान देना होता है, और अर्थव्यवस्था जैसे कुछ बुनियादी मुद्दों के बारे में भी सोचना होता है जो सभी मिलकर एक टिकाऊ शान्ति की तरफ़ प्रगति हासिल करने में सहायक बनते हैं., जब सदस्य देशों ने 75 वर्ष पहले यूएन चार्टर पर हस्ताक्षर किये थे, इसका मक़सद आने वाली पीढ़ियों को तीसरे विश्व युद्ध से बचाना था. इसका मक़सद संघर्ष टालना व रोकना भी था. इसलिये संयुक्त राष्ट्र के लिये संघर्ष निवारण अब भी एक केन्द्रीय प्राथमिकता है. फिर भी, सम्बन्ध पक्षों को शान्ति के लिये राज़ी करना बहुत कठिन काम है, ख़ासतौर से तब, जब वो शान्ति नहीं चाहते हों.

ऐसे में सवाल उठता है, कि संघर्ष की रोकथाम व निवारण का कामकाज कैसे होता है?

हमारे अनुभव में, ये तब सही काम करता है जब ये पाँच तत्व उसमें शामिल हों:

पहला, नब्ज़ पर आपकी उँगली होना. ज़मीनी स्थिति के नज़दीक होना और स्थिति को अच्छी तरह से समझना. इसीलिये ये काम करने के लिये हमारे पास दुनिया भर में 35 विशेष राजनैतिक मिशन मौजूद हैं.

दूसरा, राजनैतिक पटरी पर जल्दी काम शुरू करना. इसके लिये सभी पक्षों के बारे में गहरी समझ विकसित करने की ज़रूरत होती है. ना केवल सरकार में अधिकारियों, बल्कि समाज के सभी हिस्सों में मौजूद पक्षों को.


Giles Clarke/UN OCHA
यमन को विश्व का सबसे ख़राब मानवीय संकट बताया गया है.

न्यूयॉर्क में हमारे राजनैतिक मामलों के अधिकारी, सभी 193 सदस्य देशों को कवर करते हैं और वो इन कर्ताओं के साथ निकट सम्पर्क क़ायम रखते हैं, और आरम्भिक राजनैतिक सम्पर्क शुरू करने में सहायता के लिये महत्वपूर्ण विश्लेषण मुहैया कराते हैं.

तीसरा, बहुत से पक्षों की आवाज़ों को शामिल करना, जिनमें महिलाएँ और युवा शामिल हैं.

चौथा, क्षेत्रीय संगठनों और अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के साथ साझेदारी क़ायम करना और तात्कालिक अवधि वाले राजनैतिक कामकाज को दीर्घकालीन शान्ति निर्माण विकास प्रयासों के साथ जोड़ना.

पाँचवाँ, और सबसे ज़्यादा अहम, तमाम पक्षों में संघर्ष को रोकने की राजनैतिक इच्छा शक्ति का होना.

जब ये तत्व मौजूद होते हैं तो संघर्ष निवारण के प्रयास कामयाब होते हैं. जब रोकथाम के प्रयास नाकाम हो जाते हैं, तो उसके नतीजे साफ़ दिखाई देते हैं जो आमतौर पर विनाशकारी होते हैं.

जैसाकि पिछले वर्षों के दौरान देखा है, अनेक स्थानों पर चुनाव लड़े गए हैं, जन प्रदर्शन हुए हैं, और राजनैतिक परिवर्तन, हमारे सामने करने के लिये बहुत काम है.

लेकिन, हम यहाँ संयुक्त राष्ट्र में मौजूद रहकर, दुनिया भर में तमाम राष्ट्रीय पक्षों, पुरुषों और महिलाओं को, संघर्ष रोकथाम व निवारण के प्रयासों में समर्थन देने के लिये अपने कठिन प्रयास जारी रखने के लिये संकल्पबद्ध हैं. 

मध्यस्थों की भूमिका

पिछले कुछ वर्षों के दौरान कोलम्बिया और दक्षिणी फ़िलिपीन्स में दशकों से चले आ रहे संघर्षों का हल निकालने के लिये समझौते कराने में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है.

कोलम्बिया में संघर्ष समाप्त करने के लिये वैसे तो कोई औपचारिक मध्यस्थता नहीं हुई, मगर क्यूबा और नॉर्वे सहित अनेक अन्तरराष्ट्रीय पक्षों ने कुछ सहायता मुहैया कराई, जिनमें संयुक्त राष्ट्र भी शामिल था.

मलेशिया ने दक्षिणी फ़िलिपीन्स में संघर्ष समाप्त करने में मध्यस्थता की जिसे एक अन्तरराष्ट्रीय सम्पर्क समूह का समर्थन मिला जिसमें कुछ देशों और ग़ैर-सरकारी संगठन शामिल थे.

इसके अतिरिक्त, एक यूएन मध्यस्थ ने ग्रीस और “पूर्व यूगोस्लाव गणतन्त्र मैसीडोनिया” के बीच, एक नाम का मुद्दा, आख़िरकार हल कर दिया. इस समझौते के बाद दूसरे पक्ष को “उत्तर मैसीडोनिया गणराज्य” के रूप में मान्यता मिल गई. सिर्फ़ इतना सा बदलाव करने के लिये ये मुद्दा सुलझाने में 25 वर्ष का समय लग गया और इससे नज़र आता है कि कितनी संवेदनशीलताएँ दाव पर लगी थीं.

अन्य स्थानों पर भी, संयुक्त राष्ट्र और उसके मध्यस्थों को अक्सर बहुत विषैली और विभाजनकारी भू-राजनैतिक परिस्थियों का सामना करन पड़ा है.

रूस और अमेरिका के बीच फिर से तनाव बढ़ने, चीन और अमेरिका के बीच तनाव का नया दौर, अरब देशों और उससे भी आगे शिया-सुन्नी मुसलमानों का झगड़ा, देशों के भीतर बढ़ता लोकलुभावनवाद जिसने नाराज़गियाँ और असुरक्षा के हालात पैदा कर दिये हैं. 

टैक्नॉलॉची के फ़ायदे व चुनौतियाँ

सूचना व संचार प्रोद्योगिकी (ICT) में क्रान्तिकारी प्रगति ने असाधारण लाभदायक बदलाव किये हैं, मगर नई चुनौतियाँ भी पेश की हैं.

इण्टरनेट की उपलब्धता ने लोकतान्त्रिक विचार और सूचनाएँ फैलाने, शिक्षा, महिलाधिकारों, और आज़ादी का माहौल बनाने में मदद मिली है. साथ ही सूचना व संचार प्रोद्योगिकी ने उन लोगों को भी सक्रिय कर दिया है जो बदलाव की माँग कर रहे हैं, ख़ासतौर से युवजन. 

लेकिन सोशल मीडिया ने नफ़रत पर आधारित हिंसा और असहिष्णुता को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय स्तर से परे बहुत सी ख़तरनाक गतिविधियों में अहम भूमिका भी निभाई है.

इनमें हथियारों व लोगों की तस्करी जिहादी गतिविधियों के लिये भर्ती किया जाना भी शामिल हैं जिनके ज़रिये सशस्त्र संघर्ष लम्बे और गम्भीर बनते हैं.


© UNICEF/Khalil Ashawi
सीरिया के इदलिब इलाक़े में लड़ाई झगड़े से बचने के लिये बहुत से परिवारों ने सुरक्षा के लिये आफ़रीन में पनाह ली जो उत्तरी गवर्नरेट अलेप्पो का एक ग्रामीण इलाक़ा है.

वर्तमान दौर के संघर्षों की चुनौतियों का सामना करने के लिये मध्यस्थता की माँग बहुत तात्कालिक व जटिल है.

अचानक कुछ ऐसे बदलाव भी हो जाते हैं जिन पर मध्यस्थकार का कोई नियन्त्रण नहीं होता, मसलन नेतृत्व में अचानक परिवर्तन, या फिर कोई प्राकृतिक आपदा जैसा कोई बाहरी झटका. आज के दौर के ज़्यादातर संघर्षों में मध्यस्थता करना लम्बी अवधि तक चलने वाले प्रयास हैं.

एक मध्यस्थ की ज़िम्मेदारियों पर नज़र डालें तो उन्हें धीमी चाल की तरह अपने प्रयास जारी रखने होते हैं, मुश्किल से ही तेज़ दौड़ की तरह कोशिशें करनी होती हैं.

उन्हें इस रास्ते पर चलते हुए अनेक स्तरों पर रणनीति व विभिन्न पक्षों के साथ तालमेल बिठाने और उन्हें साथ लेकर चलने के बारे में सोचना पड़ता है.

उन्हें अपने प्रयासों में नई टैक्नॉलॉजी की सम्भावनाओं का फ़ायदा उठाने के बारे में भी सोचना होता है, साथ ही अगली पीढ़ियों के हितों पर भी ध्यान देना होता है, और अर्थव्यवस्था जैसे कुछ बुनियादी मुद्दों के बारे में भी सोचना होता है जो सभी मिलकर एक टिकाऊ शान्ति की तरफ़ प्रगति हासिल करने में सहायक बनते हैं.

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