Latest News Site

News

सत्गुरु के सानिध्य से स्वयंमेव हो जाती है सुख-शांति की प्राप्ति : चम्पा भाटिया

सत्गुरु के सानिध्य से स्वयंमेव हो जाती है सुख-शांति की प्राप्ति : चम्पा भाटिया
March 19
08:27 2019

सुख प्राप्ति का साधन सदा रहा है एक युग चाहे हो कोई

निरंकार का संस्पर्श ही सबसे उत्तम सुख है

सुख शांति दे चाह वानो जान ते लयो सुख किस दा नां

सुख और शान्ति

सत्गुरु का सानिघ्य मिले तो जीवन में गम और दुःख समाप्त हो जाते हैं। तकनीकी तरक्कियों से सुखों के बेशुमार साधन उपलब्ध होते हुए भी सुख और शान्ति की कमी है। सत्गुरु का शुक्र है इन्होंने हमें अपने चरणों में स्थान दिया। पल-पल सत्गुरु का निरंकार का आधार महसूस करते हैं तो शुकराने के लिए शब्द नहीं मिलते।

युग चाहे कोई भी रहा हो सुख प्राप्त करने का साधन सदा एक ही रहा है। श्रीमद्भगवद्गीता  में श्री कृष्ण जी ने सुख की व्याख्या की हैः-

युज्जन एवम् सदा आत्मानम् योगी विगत कल्मषः।
सुखेन ब्रह्म-सस्पर्शम् अत्यन्तम् सुखम् अश्नुते।। 6-28

इस सदा रहने वाली आत्मा (सत्ता) से जुड़कर ही योगी (जिस की आत्मा का जोड़ (योग) परमात्मा से हो गया है वही योगी है) सारे दुखों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्म का स्पर्श (अंग के संग निरंकार का स्पर्श) ही सुखों में सबसे उत्तम सुख है।

‘‘जिस से दिल निरंकार दा वासा,
हर दम वसे सुख दे धाम। सः अः बाणी

भाव जीवन में सुख देने वाला और सदा सुख में रखने वाला केवल एक दाता ही होता है।

सत्गुरु ने हमें पूर्ण निरंकार का ज्ञान देकरइसके साथ जोड़ा है। पूर्ण विश्वास के साथ इसका आनन्द अनुभव करते रहें। गीता में भी स्पष्ट किया हैः-

श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयत-इन्द्रियः ।
ज्ञानम् लब्ध्वा पराम् शान्तिम् अचिरेणाधिगच्छति ॥

श्रद्धावान ज्ञान प्राप्त करके अपनी इन्द्रियों को संयित करते हैं, भाव ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य अपने कर्मों के प्रति सजग हो जाता है। सत्गुरु माता जी अपने विचारों में फरमाते हैं कि संतों का जीवन उनके कर्म ही प्रचार करते हैं। ज्ञान प्राप्त करके वे ‘‘अचिरेण’’ उसी क्षण परम शान्ति को प्राप्त कर लेते हैं। सुख और शान्ति को दात सत्गुरु ही देता है और कोई साधन नहीं अवतार बाणी में कहा हैः-

‘‘दुखां तो तू बच नई सकदा,

जे पाया सुख दाता नहीं।’’

गीता के श्लोक में भी इसे इस प्रकार बतायाः-

न अस्ति बुद्धिः अयुक्तस्य न च अयुक्तस्य भावना ।
न च अभावयतः शान्तिः अशान्तस्य कुतः सुखम् ॥

जो परमात्मा से युक्त, जुड़ा हुआ नहीं है उसकी बुद्धि भावना स्थिर नहीं। जिसकी भावना स्थिर नहीं उसे शान्ति कहाँ और शान्ति के बिना सुख कहां? परमात्मा का बोध पाकर ही सुख एवं शान्ति सम्भव है।

सत्गुरु माता जी कृपा करें अपने चरणों से जोड़ें रखें क्योंकि ‘‘तेरे दर तो दूर जे रहिए कंडेया दे विच वासा हुदै’’ गीता में भी इसे इस प्रकार बताया है

अज्ञः च अश्रद्धानः च संशय आत्मा विनश्यति।
न अयम् लोकः अस्ति न परः न सुखम् संशय आत्मनः।।

श्रद्धा रहित मूर्ख (अज्ञानी) संशय, संदेह, करने वाली आत्मा का नाश हो जाता है। संशय युक्त आत्मा को न तो इस लोक में, न परलोक में सुख है। सत्गुरु ने हमें चुना, अपना लिया और हमारी झोली सुखों से भर दी।

लोक सुखी परलोक सुहेला करने वाला सत्गुरु है।
कहे हरदेव आनंद रस से भरने वाला सत्गुरु है।।

चम्पा भाटिया
राॅंची
9334424508

Shop Association
kallu
Novelty Fashion Mall
Fly Kitchen
Harsha Plastics
Status
Prem-Industries
Tanishq
Akash
Swastik Tiles
Reshika Boutique
Paul Opticals
New Anjan Engineering Works
The Raymond Shop
Metro Glass
Krsna Restaurant
Motilal Oswal
Chotanagpur Handloom
Kamalia Sales
Home Essentials
Abhushan
Raymond

About Author

admin_news

admin_news

Related Articles

0 Comments

No Comments Yet!

There are no comments at the moment, do you want to add one?

Write a comment

Write a Comment

Sponsored Ad

SPONSORED ADS SPONSORED ADS SPONSORED ADS

LATEST ARTICLES

    Musk to Nadella, Artificial General Intelligence is new buzzword

Musk to Nadella, Artificial General Intelligence is new buzzword

0 comment Read Full Article

Subscribe to Our Newsletter