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सत्गुरु के सानिध्य से स्वयंमेव हो जाती है सुख-शांति की प्राप्ति : चम्पा भाटिया

सत्गुरु के सानिध्य से स्वयंमेव हो जाती है सुख-शांति की प्राप्ति : चम्पा भाटिया
November 25
09:57 2018

चम्पा भाटिया

 

 सुख प्राप्ति का साधन सदा रहा है एक युग चाहे हो कोई

निरंकार का संस्पर्श ही सबसे उत्तम सुख है

सुख शांति दे चाह वानो जान ते लयो सुख किस दा नां

सत्गुरु का सानिध्य मिले तो जीवन में सुख एवं शांति स्वयंमेव आ जाते हैं। तकनीकी तरक्कियों से सुखों के बेशुमार साधन उपलब्ध होते हुए भी आज मानव के जीवन में सुख और शान्ति की कमी है। सत्गुरु का शुक्र है इन्होंने हमें अपने चरणों में स्थान दिया। पल पल सत्गुरु का, निरंकार का आधार महसूस करते हैं तो शुकराने के लिए शब्द नहीं मिलते।
युग चाहे कोई भी रहा हो सुख प्राप्त करने का साधन सदा एक ही रहा है।

श्रीमद्भवगद् गीता में श्री कृष्ण जी ने सुख की व्याख्या की हैः-

युञ्जन एवम् सदा आत्मानम् योगी विगत कल्मषः।
सुखेन ब्रह्म-सर्स्पशम् अत्यन्तम् सुखम् अश्नुते।। 6-28

इस सदा रहने वाली आत्मा (सत्ता) से जुड़कर ही योगी (जिस की आत्मा का जोड़ (योग) परमात्मा से ही गया है वही योगी है) सारे दुखों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्म का स्पर्श (अंग के संग निरंकार का संस्पर्श) ही सुखों में सबसे उत्तम सुख है।

‘‘जिस दे दिल निरंकार दा वासा,
हर दम वसे सुख दे धाम। सः अः बाणी

भाव जीवन में सुख देने वाला और सदा सुख में रखने वाला केवल एक दाता ही होता है।
सत्गुरु ने हमें पूर्ण निरंकार का ज्ञान देकर इसके साथ जोड़ा है। पूर्ण विश्वास के साथ इसका आनंद अनुभव करते रहें। गीता में स्पष्ट किया है-

श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत-परः संयत इन्द्रियः।
ज्ञानम् लब्ध्वा पराम अचिरेण शान्तिम् अधिगच्छति।। 4-39

श्रद्धावान ज्ञान प्राप्त करके अपनी इन्द्रियों को संचित करते हैं, भाव ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य अपने कर्मों के प्रति सजग हो जाता है। सत्गुरु माता जी अपने विचारों में फरमाते हैं कि संतों का जीवन उनके कर्म ही प्रचार करते हैं। ज्ञान प्राप्त करके वे ‘‘अचिरेण’ उसी क्षण परम शान्ति को प्राप्त कर लेते हें। सुख और शान्ति की दात सत्गुरु ही देता है और कोई साधन नहीं अवतार बाणी में कहा हैः-

‘‘दुखां तो तू बच नई सकदा,
जे पाया सुख दाता नहीं।
गीता के श्लोक में भी इसे इस प्रकार बतायाः-
न अस्ति बुद्धि अयुक्तस्य न च आयुक्तस्य भावना।
न च अभावयतः शान्तिः अशानतस्य कुतः सुखम्।। 2-66

जो परमात्मा से युक्त, जुड़ा हुआ नहीं है उसकी बुद्धि भावना स्थिर नहीं। जिसकी भावना स्थिर नहीं उसे शान्ति कहाँ और शान्ति के बिना सुख कहाँ? परमात्मा का बोध पाकर ही सुख एवं शान्ति सम्भव है।

सत्गुरु माता जी कृपा करें अपने चरणों से जोड़े रखें क्योंकि ‘‘तेरे दर तो दूर जे रहिए कंडेया दे विच बासा हुदै‘‘ गीता में भी इसे इस प्रकार बताया है

अज्ञः च अश्रद्धान च संशय आत्मा विनश्यति।
न अयम् लोकः अस्ति न परः न सुखम् संशय आत्मनः।। 4-40

श्रद्धा रहित मूर्ख (अज्ञानी) संशय, संदेह करने वाली आत्मा का नाश हो जाता है। संशय युक्त आत्मा को न तो इस लोक में, न परलोक में सुख है। सत्गुरु ने हमें चुना, अपना लिया और हमारी झोली सुखों से भर दी।

लोक सुखी परलोक सुहेला करने वाला सत्गुरु है।
कहे हरदेव आनंद रस से भरने वाला सत्गुरु है।।

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