सामाजिक न्याय दिवस: एक नज़र महिलाओं के साथ भेदभाव पर…

20 फ़रवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाया जाता है. इस वर्ष, इस दिवस के साथ ही, दुनिया एक नए दशक में क़दम रख रही है, और इसका अर्थ है कि हमारे पास, टिकाऊ विकास लक्ष्यों का लैंगिक समानता पर वैश्विक लक्ष्य #5, हासिल करने के लिये केवल 10 वर्ष का समय बचा है. दुख के साथ कहना पड़ता है कि हमें अभी लम्बा रास्ता तय करना है. यहाँ तक कि भोजन जैसी बुनियादी आवश्यकता पूरी करने के लिये भी, विश्व के लगभग दो तिहाई देशों में, ऐसी अधिक सम्भावना है कि पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महिलाएँ, भूख और खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगी.

असमानता वाले एक कार्य या गतिविधि से, अन्य इसी तरह के बर्तावों को भी मज़बूती मिलती है, जिनके परिणामस्वरूप महिलाएँ अभाव, निर्धनता और भुखमरी के कुचक्र में फँस जाती हैं.
ये 6 प्रमुख कारण हैं जिनके कारण महिलाएँ ज़्यादा ज़रूरतमन्द हैं: भोजन के लिये. समानता के लिये. बदलाव के लिये.
दुनिया के हर क्षेत्र में, पुरुषों की तुलना में, ज़्यादा महिलाएँ ग़रीबी के जोखिम में
ऐसा मुख्य रूप से इसलिये होता है कि क्योंकि महिलाओं को, उनके श्रम के लिये या तो बहुत कम पगार या आमदनी मिलती है, या बिल्कुल भी नहीं. पुरुषों की तुलना में, महिलाएं 2.6 गुना ज़्यादा ऐसा देखभाल और घरेलू कामकाज करती हैं जिनके लिये उन्हें कोई पगार या वेतन नहीं मिलता. यहाँ तक कि पगार या वेतन वाला कामकाज करने पर भी उन्हें पुरुषों की तुलना में 23 प्रतिशत कम मेहनताना मिलता है.

WFP/Gabriela Vivacquaदक्षिण सूडान में, अदूत होल सब्ज़ियों के बाग़ीचों की सिंचाई ख़ुद ही करती है. उन्हें विश्व खाद्य कार्यक्रम ने प्रशिक्षित किया है. वो कहती हैं, “मैं कड़ी मेहनत करती हूँ क्योंकि इससे मेरी आजीविका चलती है.” ”

ये घाटा घर पर और भी ज़्यादा बढ़ जाता है क्योंकि जब महिलाएँ सवैतनिक कामकाज करती हैं तो वो अपनी आमदनी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अपने परिवारों पर ही ख़र्च करती हैं, जबकि पुरुष, अपनी आमदनी का केवल 35 प्रतिशत हिस्सा ही ख़र्च करते हैं.
महिलाओं को सम्पत्ति का स्वामित्व अधिकार नहीं है.
कुछ इलाक़ों में तो महिलाएँ ख़ुद ही एक सम्पत्ति समझी जाती हैं. अलबत्ता, महिलाएँ किसान, कारोबार मालिक और उद्योगपति व उद्यमी के रूप में ख़ासी महत्वपूर्ण परिस्थितियों में होती हैं, मगर फिर भी उन्हें उन अधिकारों व संसाधनों से वंचित रखा जाता है जो पुरुषों को हासिल होते हैं.
एक प्रमुख उदाहरण कृषि क्षेत्र में मिलता है: लघु स्तर के किसानों में, लगभग आधी संख्या महिलाओं की है, फिर भी, वो जिस भूमि पर खेतीबाड़ी करती हैं, उसका केवल 13 प्रतिशत ही, महिलाओं के स्वामित्व में है.
इस लैंगिक असमानता को समाप्त करके, महिलाओं द्वारा की जाने वाली खेतीबाड़ी में आदमनी 20-30 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती है.
संक्षिप्त में कहें तो, महिला किसानों को बेहतर बीज, उर्वरक और उपकरण मुहैया कराकर, हर वर्ष 10 से 15 करोड़ अतिरिक्त लोगों की भोजन ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं.
भेदभावपूर्ण क़ानून
उदाहरण के लिये, पुरुषों को कामकाजी जीवन में जो क़ानूनी संरक्षण मिलता है, उसकी तुलना में, औसतन, केवल तीन-चौथाई महिलाओं को ही ऐसा संरक्षण हासिल होता है.
मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के देशों में, ये स्थिति और भी अधिक ख़राब है, जहाँ महिलाओं को, पुरुषों की तुलना में, आधे से भी कम, यानि लगभग 47 प्रतिशत क़ानूनी अधिकार हासिल होते हैं.

WFP/Simon Pierre Dioufनाईजीरिया में ये एक मा, उन हज़ारों विस्थापित महिलाओं में से एक हैं जो विश्व खाद्य कार्यक्रम की सहायता पर निर्भर हैं.

18 देशों में, पतियों को, अपनी पत्नियों को, कामकाज करने से रोकने का क़ानूनी अधिकार हासिल होते हैं.
49 देशों में, ऐसे कोई क़ानून नहीं जो महिलाओं को, घरेलू हिंसा से बचने के लिये सुरक्षा मुहैया करा सकें.
संस्कृति और परम्पराएँ
इस तरह के नियमों व परम्पराओं में, बाल विवाह और महिला जननाँग विकृति (एफ़जीएम) यानि महिला ख़तना भी शामिल हैं. इस तरह की परम्पराओं का, लड़कियों व महिलाओं के स्वास्थ्य पर बहुत गम्भीर असर होता है, इनके कारण उनकी शिक्षा अधूरी रह सकती है, उनकी क्षमताएँ दब जाती हैं और ये परम्पराएँ, लड़कियों व महिलों को लगभग पूरी तरह पुरुषों पर निर्भर बना देती हैं.

WFP/Gabriela Vivacquaडेबोराह ने जब अपने सबसे छोटे बच्चे को जन्म दिया, उसके एक दिन बाद ही, उसके पति को मार दिया गया था. अब अपने परिवार का भरण-पोषण करने की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हें के कन्धों पर है.

संकट के समय में, ऐसी ज़्यादा सम्भावना होती है कि पुरुषों की तुलना में, ज़्यादा महिलाएँ भुखमरी से प्रभावित हों, और सहायता राशि तक उनकी पहुँच भी, लैंगिक भेदभाव के कारण सीमित हो सकती है. कुछ देशों में, परम्पराएँ ही ये तय करती हैं कि महिलाओं को सबसे बाद में भोजन खाना चाहिये, जब सभी पुरुष सदस्यों और बच्चों ने भोजन खा लिया हो.
अनेक देशों में किये गए सर्वेक्षणों में पाया गया है कि परिवारों में भोजन पकाने में जो जितना समय ख़र्च होता है, उसमें से 85-90 प्रतिशत समय, महिलाएँ ख़र्च करती हैं.
माहवारी, गर्भावस्था और प्रसव के कारण महिलाएँ, ज़्यादा कमज़ोर.
महिलाओं की प्रजनन आयु में, एक तिहाई को रक्त की कमी होती है जकि लौहतत्व (आयरन) की कमी वाली ख़ुराक खाने के कारण होती है. अगर ये कमी पूरी ना की जाय, या इसका समुचित इलाज ना किया जाय, तो इससे महत्वपूर्ण अंगों को भी नुक़सान पहुँच सकता है.
ऐसी ज़्यादा सम्भावना है कि कुपोषण का शिकार महिलाओं से, पैदा होने वाले बच्चों का वज़न कम होगा, और उनमें से भी लगभग 20 प्रतिशत बच्चों की, मौत, 5 वर्ष से की उम्र से पहले ही होने की बहुत सम्भावना होती है.
हाल ही में, नेपाल में एकत 22 वर्षीय महिला गौरी बायक की मौत की ख़बर ने सभी का दिल दहला दिया था जिसे माहवारी झोंपड़ी में बन्द कर दिया गया था.
ये घटना याद दिलाती है कि महिलाओं को माहवारी जैसी प्राकृतिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये भी, किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और क्या क़ीमत चुकानी पड़ती है.

WFP/Kiyori Uenoये तीन लड़कियाँ उन बच्चों में शामिल हैं जिन्हें, स्कूली शिक्षा के दौरान, सुबह का नाश्ता मुहैया कराया जाता है, ताकि, वो भूखे पेट परेशान रहने के बजाय, शिक्षा पर ध्यान दे सकें.

वर्ष 2015 , लगभग 3 लाख महिलाओं की मौत, प्रसूति के दौरान, गर्भावस्था सम्बन्धी जटिलताओं के कारण हुई. ये लगभग हर दो मिनट में, एक महिला की मौत के बराबर है. 
लड़कों को ज़्यादा संसाधन व प्राथमिकता
ऐसे समाजों में, जहाँ, लड़कियों को ज़्यादा पसन्द किया जाता है और उन्हें लड़कियों की तुलना में, प्राथमिकता पर रखा जाता है, वहाँ लड़कियों को नज़रअन्दाज़ किये जाने, स्वास्थ्य देखभाल से वंचित रखने का जोखिम होता है, और उन्हें कम मात्रा में, या कम गुणवत्ता वाला भोजन दिया जाता है.
स्कूली शिक्षा हासिल करने के लिये भी, लड़कियों की तुलना में, लड़के ही ज़्यादा जाते हैं. संसाधनों और शिक्षा तक पहुँच में, पुरुषों और महिलाओं के बीच इस ग़ैर-बराबरी से ही, महिलाएँ आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े हालात का सामना करने को मजबूर होती हैं.
एक अध्ययन में पाया गया है कि महिलाओं की शिक्षा ने, बाल कुपोषण में, 43 प्रतिशत तक की कमी करने में योगदान किया. 
वर्ष 2017 में, निरक्षर वयस्कों में, दो-तिहाई महिलाएँ थीं.
 , 20 फ़रवरी को विश्व सामाजिक न्याय दिवस मनाया जाता है. इस वर्ष, इस दिवस के साथ ही, दुनिया एक नए दशक में क़दम रख रही है, और इसका अर्थ है कि हमारे पास, टिकाऊ विकास लक्ष्यों का लैंगिक समानता पर वैश्विक लक्ष्य #5, हासिल करने के लिये केवल 10 वर्ष का समय बचा है. दुख के साथ कहना पड़ता है कि हमें अभी लम्बा रास्ता तय करना है. यहाँ तक कि भोजन जैसी बुनियादी आवश्यकता पूरी करने के लिये भी, विश्व के लगभग दो तिहाई देशों में, ऐसी अधिक सम्भावना है कि पुरुषों की तुलना में ज़्यादा महिलाएँ, भूख और खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगी.

असमानता वाले एक कार्य या गतिविधि से, अन्य इसी तरह के बर्तावों को भी मज़बूती मिलती है, जिनके परिणामस्वरूप महिलाएँ अभाव, निर्धनता और भुखमरी के कुचक्र में फँस जाती हैं.

ये 6 प्रमुख कारण हैं जिनके कारण महिलाएँ ज़्यादा ज़रूरतमन्द हैं: भोजन के लिये. समानता के लिये. बदलाव के लिये.

दुनिया के हर क्षेत्र में, पुरुषों की तुलना में, ज़्यादा महिलाएँ ग़रीबी के जोखिम में

ऐसा मुख्य रूप से इसलिये होता है कि क्योंकि महिलाओं को, उनके श्रम के लिये या तो बहुत कम पगार या आमदनी मिलती है, या बिल्कुल भी नहीं. पुरुषों की तुलना में, महिलाएं 2.6 गुना ज़्यादा ऐसा देखभाल और घरेलू कामकाज करती हैं जिनके लिये उन्हें कोई पगार या वेतन नहीं मिलता. यहाँ तक कि पगार या वेतन वाला कामकाज करने पर भी उन्हें पुरुषों की तुलना में 23 प्रतिशत कम मेहनताना मिलता है.


WFP/Gabriela Vivacqua
दक्षिण सूडान में, अदूत होल सब्ज़ियों के बाग़ीचों की सिंचाई ख़ुद ही करती है. उन्हें विश्व खाद्य कार्यक्रम ने प्रशिक्षित किया है. वो कहती हैं, “मैं कड़ी मेहनत करती हूँ क्योंकि इससे मेरी आजीविका चलती है.” “

ये घाटा घर पर और भी ज़्यादा बढ़ जाता है क्योंकि जब महिलाएँ सवैतनिक कामकाज करती हैं तो वो अपनी आमदनी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अपने परिवारों पर ही ख़र्च करती हैं, जबकि पुरुष, अपनी आमदनी का केवल 35 प्रतिशत हिस्सा ही ख़र्च करते हैं.

महिलाओं को सम्पत्ति का स्वामित्व अधिकार नहीं है.

कुछ इलाक़ों में तो महिलाएँ ख़ुद ही एक सम्पत्ति समझी जाती हैं. अलबत्ता, महिलाएँ किसान, कारोबार मालिक और उद्योगपति व उद्यमी के रूप में ख़ासी महत्वपूर्ण परिस्थितियों में होती हैं, मगर फिर भी उन्हें उन अधिकारों व संसाधनों से वंचित रखा जाता है जो पुरुषों को हासिल होते हैं.

एक प्रमुख उदाहरण कृषि क्षेत्र में मिलता है: लघु स्तर के किसानों में, लगभग आधी संख्या महिलाओं की है, फिर भी, वो जिस भूमि पर खेतीबाड़ी करती हैं, उसका केवल 13 प्रतिशत ही, महिलाओं के स्वामित्व में है.

इस लैंगिक असमानता को समाप्त करके, महिलाओं द्वारा की जाने वाली खेतीबाड़ी में आदमनी 20-30 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती है.

संक्षिप्त में कहें तो, महिला किसानों को बेहतर बीज, उर्वरक और उपकरण मुहैया कराकर, हर वर्ष 10 से 15 करोड़ अतिरिक्त लोगों की भोजन ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं.

भेदभावपूर्ण क़ानून

उदाहरण के लिये, पुरुषों को कामकाजी जीवन में जो क़ानूनी संरक्षण मिलता है, उसकी तुलना में, औसतन, केवल तीन-चौथाई महिलाओं को ही ऐसा संरक्षण हासिल होता है.

मध्य पूर्व और उत्तर अफ्रीका के देशों में, ये स्थिति और भी अधिक ख़राब है, जहाँ महिलाओं को, पुरुषों की तुलना में, आधे से भी कम, यानि लगभग 47 प्रतिशत क़ानूनी अधिकार हासिल होते हैं.


WFP/Simon Pierre Diouf
नाईजीरिया में ये एक मा, उन हज़ारों विस्थापित महिलाओं में से एक हैं जो विश्व खाद्य कार्यक्रम की सहायता पर निर्भर हैं.

18 देशों में, पतियों को, अपनी पत्नियों को, कामकाज करने से रोकने का क़ानूनी अधिकार हासिल होते हैं.

49 देशों में, ऐसे कोई क़ानून नहीं जो महिलाओं को, घरेलू हिंसा से बचने के लिये सुरक्षा मुहैया करा सकें.

संस्कृति और परम्पराएँ

इस तरह के नियमों व परम्पराओं में, बाल विवाह और महिला जननाँग विकृति (एफ़जीएम) यानि महिला ख़तना भी शामिल हैं. इस तरह की परम्पराओं का, लड़कियों व महिलाओं के स्वास्थ्य पर बहुत गम्भीर असर होता है, इनके कारण उनकी शिक्षा अधूरी रह सकती है, उनकी क्षमताएँ दब जाती हैं और ये परम्पराएँ, लड़कियों व महिलों को लगभग पूरी तरह पुरुषों पर निर्भर बना देती हैं.


WFP/Gabriela Vivacqua
डेबोराह ने जब अपने सबसे छोटे बच्चे को जन्म दिया, उसके एक दिन बाद ही, उसके पति को मार दिया गया था. अब अपने परिवार का भरण-पोषण करने की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हें के कन्धों पर है.

संकट के समय में, ऐसी ज़्यादा सम्भावना होती है कि पुरुषों की तुलना में, ज़्यादा महिलाएँ भुखमरी से प्रभावित हों, और सहायता राशि तक उनकी पहुँच भी, लैंगिक भेदभाव के कारण सीमित हो सकती है. कुछ देशों में, परम्पराएँ ही ये तय करती हैं कि महिलाओं को सबसे बाद में भोजन खाना चाहिये, जब सभी पुरुष सदस्यों और बच्चों ने भोजन खा लिया हो.

अनेक देशों में किये गए सर्वेक्षणों में पाया गया है कि परिवारों में भोजन पकाने में जो जितना समय ख़र्च होता है, उसमें से 85-90 प्रतिशत समय, महिलाएँ ख़र्च करती हैं.

माहवारी, गर्भावस्था और प्रसव के कारण महिलाएँ, ज़्यादा कमज़ोर.

महिलाओं की प्रजनन आयु में, एक तिहाई को रक्त की कमी होती है जकि लौहतत्व (आयरन) की कमी वाली ख़ुराक खाने के कारण होती है. अगर ये कमी पूरी ना की जाय, या इसका समुचित इलाज ना किया जाय, तो इससे महत्वपूर्ण अंगों को भी नुक़सान पहुँच सकता है.

ऐसी ज़्यादा सम्भावना है कि कुपोषण का शिकार महिलाओं से, पैदा होने वाले बच्चों का वज़न कम होगा, और उनमें से भी लगभग 20 प्रतिशत बच्चों की, मौत, 5 वर्ष से की उम्र से पहले ही होने की बहुत सम्भावना होती है.

हाल ही में, नेपाल में एकत 22 वर्षीय महिला गौरी बायक की मौत की ख़बर ने सभी का दिल दहला दिया था जिसे माहवारी झोंपड़ी में बन्द कर दिया गया था.

ये घटना याद दिलाती है कि महिलाओं को माहवारी जैसी प्राकृतिक आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये भी, किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और क्या क़ीमत चुकानी पड़ती है.


WFP/Kiyori Ueno
ये तीन लड़कियाँ उन बच्चों में शामिल हैं जिन्हें, स्कूली शिक्षा के दौरान, सुबह का नाश्ता मुहैया कराया जाता है, ताकि, वो भूखे पेट परेशान रहने के बजाय, शिक्षा पर ध्यान दे सकें.

वर्ष 2015 , लगभग 3 लाख महिलाओं की मौत, प्रसूति के दौरान, गर्भावस्था सम्बन्धी जटिलताओं के कारण हुई. ये लगभग हर दो मिनट में, एक महिला की मौत के बराबर है. 

लड़कों को ज़्यादा संसाधन व प्राथमिकता

ऐसे समाजों में, जहाँ, लड़कियों को ज़्यादा पसन्द किया जाता है और उन्हें लड़कियों की तुलना में, प्राथमिकता पर रखा जाता है, वहाँ लड़कियों को नज़रअन्दाज़ किये जाने, स्वास्थ्य देखभाल से वंचित रखने का जोखिम होता है, और उन्हें कम मात्रा में, या कम गुणवत्ता वाला भोजन दिया जाता है.

स्कूली शिक्षा हासिल करने के लिये भी, लड़कियों की तुलना में, लड़के ही ज़्यादा जाते हैं. संसाधनों और शिक्षा तक पहुँच में, पुरुषों और महिलाओं के बीच इस ग़ैर-बराबरी से ही, महिलाएँ आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े हालात का सामना करने को मजबूर होती हैं.

एक अध्ययन में पाया गया है कि महिलाओं की शिक्षा ने, बाल कुपोषण में, 43 प्रतिशत तक की कमी करने में योगदान किया. 

वर्ष 2017 में, निरक्षर वयस्कों में, दो-तिहाई महिलाएँ थीं.
 

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