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सीएजी रिपोर्ट में अनिल अंबानी का जिक्र क्यों नहीं

सीएजी रिपोर्ट में अनिल अंबानी का जिक्र क्यों नहीं
February 24
09:13 2019

इंजीनियरिंग सपोर्ट के बाद यह डील पहले के मुकाबले 6.5 फीसदी महंगी पड़ेगी

जय शंकर गुप्त 

राफेल युद्धक विमानों की खरीद पर सीएजी यानी नियंत्रक महालेखा परीक्षक की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट में इस बात का खुलासा नहीं किया गया है कि आखिर किस वजह या मजबूरी से इस सौदे का ‘ऑफसेट  कांट्रैक्ट’ दिवालिएपन की कगार पर पहुंच चुके उद्योगपति अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को दिया गया जिसके पास इससे पहले विमान तो क्या सुई बनाने का भी अनुभव नहीं था और जो ऐन सौदे के समय ही अस्तित्व में आई थी।

बुधवार, 13 फरवरी को सोलहवीं लोकसभा के अंतिम सत्र और अंतिम दिन सदन में पेश की गई इस रिपोर्ट में आफसेट कांट्रैक्ट का जिक्र ही नहीं है।

सीएजी की तरफ से बताया गया कि इस पर बाद में रिपोर्ट आएगी। यानी सीएजी की रिपोर्ट अधूरी है जिसे जानबूझकर सोलहवीं लोकसभा के अंतिम दिन हड़बड़ी में पेश किया गया ताकि इस पर कोई चर्चा नहीं हो सके लेकिन उसके जरिए यह बताया जा सके कि सीएजी के अनुसार राफेल डील यूपीए सरकार के मुकाबले 2.86 फीसदी सस्ती है।

हालांकि सीएजी ने तकरीबन डेढ़ साल की मशक्कत से तैयार अपनी रिपोर्ट में राफेल की कीमतों का जिक्र किए बगैर ही कहा है कि यह डील पहले के सौदे के मुकाबले 2.86 फीसदी सस्ती है। लेकिन लीपापोती की इस कवायद में सीएजी ने यह भी बता दिया कि इंजीनियरिंग सपोर्ट के बाद यह डील पहले के मुकाबले 6.5 फीसदी महंगी पड़ेगी।

सीएजी ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आरोपों एवं दि हिन्दू में एन राम के खुलासों पर मुहर लगाते हुए कहा है कि अगर राफेल सौदे पर भारतीय नेगोशिएशन टीम की बात मान ली गई होती तो यह डील 14 फीसदी सस्ती होती और 20 फीसदी की बैंक गारंटी भी मिल जाती। इस तरह से देखें तो सीएजी ने भी नेगोशिएशन टीम के तीन सदस्यों की आपत्तियों को जायज माना है।

इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लगातार निशाने पर रहे अनिल अंबानी की मुसीबतें बढ़ती ही जा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान बहुराष्ट्रीय संचार कंपनी एरिक्शन ने अनिल अंबानी पर तंज कसा कि राफेल में निवेश के लिए उनके पास पैसे कहां से आ रहे हैं जबकि उसका तकरीबन 550 करोड़ रु. का बकाया नहीं चुका पाने के बचाव में वह खुद को दिवालिया बता रहे हैं।

सीएजी रिपोर्ट में अनिल अंबानी का जिक्र क्यों नहीं

एरिक्शन के वकील दुष्यंत दवे

मामले की सुनवाई के दौरान एरिक्शन के वकील दुष्यंत दवे ने श्री अंबानी पर अपनी कुछ परिसंपत्तियां बेचकर 5000 करोड़ रु. जुटाने की बात छिपाने का आरोप लगाया।

इसके जवाब में अनिल अंबानी के वकील ने कहा कि उनके रिलायंस कम्युनिकेशन और उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी की कंपनी जियो के बीच स्पेक्ट्रम, टाॅवर आदि बेचने को लेकर अनुबंध हुआ था लेकिन जियो करार से पलट गई।

लिहाजा करार से पलटने के एवज में उन्हें केवल 788 करोड़ रु। ही मिले। वह भी कर्ज दाता बैंकों ने ले लिए।

रिलायंस कम्युनिकेशन को कुछ नहीं मिला। उन्हीं अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को राफेल युद्धक विमानों का ऑफसेट अनुबंध मिला है।

भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टाॅलरेंस’ का दावा करने वाली मोदी सरकार ने राफेल सौदे से भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधान हटवा दिए थे। इस मामले पर देश के जाने माने पत्रकार और ‘दि हिन्दू’ प्रकाशन समूह के चेयरमैन एन राम ने पिछले सोमवार, 11 फरवरी को एक और धमाका किया।

राफेल सौदे से भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधान नदारद

‘दि हिन्दू’ प्रकाशन समूह

उनकी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि राफेल सौदे में मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधान को खत्म कर दिया था। साथ ही, भारत सरकार ने ‘एस्क्रो एकाउंट’ के जरिए दसॉ कंपनी को भुगतान करने से भी इनकार कर दिया था। सरकार के इन दो बड़े फैसलों पर सरकार के ही वरिष्ठ अधिकारियों ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। लेकिन सरकार ने इसकी अनदेखी की।

एन राम ने लिखा है कि रक्षा खरीद परिषद (डीएसी), जिसके प्रमुख उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर थे, ने सितंबर 2016 में एक बैठक की और अंतरदेशीय करार में आठ बदलाव करने पर अपनी मुहर लगाई।

इस बैठक के पहले 24 अगस्त, 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति की बैठक में इन बदलावों की सिफारिश की गई थी। ‘दि हिन्दू’ की खबर के अनुसार इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह था कि रक्षा उपकरण देने वाली कंपनी अगर किसी तरह का अनावश्यक दबाव किसी एजेंट या एजेंसी या कमीशन के द्वारा डालती है और कंपनी के खाते में घुसपैठ करती तो उसको इसकी सजा दी जाती। रक्षा खरीद के मामलों में जो नियम बने हैं, उसमें इस प्रावधान को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। इसे हटा दिया गया।

सरकार की दलील थी कि चूंकि करार दो सरकारों के बीच हो रहा था, इसलिए ऐसे किसी दंड या जुर्माने की जरूरत नहीं थी। लेकिन, भारत सरकार की तरफ से दसॉ कंपनी से बात करने वाली टीम के सात में से तीन सदस्यों-एम. पी. सिंह, ए. आर. सुले, और राजीव वर्मा ने सरकार के इस कदम पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी।

इन लोगों का कहना था कि दो देशों के बीच करार के बावजूद पैसा निजी कंपनी यानी दसॉ को दिया जाना था, ऐसे में इस मामले में वित्तीय समझदारी के लिए करार में भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधान रखना जरूरी था।

गौरतलब है कि रक्षा खरीद प्रक्रिया के तहत किसी भी रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधानों को रखना अनिवार्य होता है। ऐसे में मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधानों को हटाने का फैसला क्यों किया, यह समझ से परे है, क्योंकि इन प्रावधानों के रहने से दसॉ कंपनी पर एक तरह का अंकुश बना रहता और इस बात की आशंका कम होती कि दसॉ किसी तरह की गड़बड़ी की जुर्रत करे और उसके ऐसा करने पर भारत सरकार का पक्ष मजबूत होता।

‘द हिन्दू’ अखबार के मुताबिक मोदी सरकार के एक और फैसले पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। अमूमन, रक्षा सौदों में जिस देश की कंपनी होती है, वहां की सरकार एक संप्रभु गारंटी खरीदने वाली सरकार को देती है ताकि रक्षा उपकरण बेचने वाली कंपनी कोई गड़बड़ी करे तो वहां की सरकार उसकी भरपाई करे या उस कंपनी को गड़बड़ी करने से रोके। राफेल सौदे में सबसे हैरानी की बात यह है कि भारत सरकार की तरफ से न तो संप्रभु गारंटी की मांग की गई, न ही बैंक गारंटी मांगी गई।

फ्रांस की सरकार की तरफ से वहां के प्रधानमंत्री ने 8 सितंबर 2016 को ‘लेटर ऑफ कंफर्ट’ जारी किया गया था। यह ‘लेटर ऑफ कंफर्ट’ एक तरह से फ्रांस की सरकार की तरफ से दिया हुआ आश्वासन था कि यदि दसॉ कंपनी रक्षा उपकरण देने में नाकाम रहती है और ऐसी स्थिति में उसे मिला हुआ पैसा वह भारत सरकार को वापस नहीं कर पाती है तो फ्रांस की सरकार ऐसे कदम उठाएगी, जिससे भारत सरकार को पूरा पैसा वापस मिल जाए।

गौरतलब है कि ‘लेटर ऑफ कंफर्ट’ सिर्फ एक आश्वासन होता है, उसकी कोई कानूनी वैधता नहीं होती है। इतना ही नहीं, मोदी सरकार ने दसॉ के भुगतान के लिए ‘एसक्रो अकाउंट’ खोलने से भी इनकार कर दिया।

24 अगस्त 2016 को सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति ने इस पर अपनी मुहर लगा दी। एसक्रो अकाउंट का अर्थ यह होता है कि खरीदने वाली कंपनी या सरकार पैसा एक ऐसे अकाउंट में जमा करती है, जिसमें जब तक वह न कहे, तब तक सप्लाई करने वाली कंपनी को भुगतान नहीं होता है।

रक्षा मंत्रालय में वित्तीय सलाहकार सुंधाशु मोहंती ने एसक्रो अकाउंट की वकालत की थी। यह एसक्रो अकाउंट फ्रांसीसी सरकार के जरिए चलना था। मोहंती का कहना था कि चूंकि भारत सरकार के पास राफेल सौदे में न तो संप्रभु गारंटी है न ही बैंक गारंटी है, ऐसे में दसॉ को मिलने वाले पैसों के भुगतान के लिए फ्रांसीसी सरकार को जोड़ना बहुत जरूरी है।

इसके लिए एसक्रो अकाउंट या इस तरीके का कोई और खाता खोला जाए। यानी, मोहंती चाहते थे कि भारत सरकार और फ्रांसीसी सरकार के बीच एक ऐसा करार हो, जिसमें फ्रांस की सरकार भारतीय पैसे की अमानत ले। यानी जब तक भारत सरकार न कहे तब तक फ्रांस की सरकार दसॉ को भुगतान करने के लिए न कहे।

यानी एक तरह से भारतीय पैसे के लिए फ्रांस की सरकार गारंटर का काम करती और अगर भारत सरकार दसॉ के दिए विमान से संतुष्ट नहीं होती या सौदे में किसी तरह की गड़बड़ी होती तो भारत सरकार फ्रांस से कह कर भुगतान रोक सकती थी। लेकिन न जाने क्यों, मोहंती की इस सलाह को दरकिनार कर दिया गया।

मोदी सरकार के इन दो कदमों से यह तो साफ है कि वह राफेल मामले में दसॉ पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान दिख रही थी। भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधानों को हटाना और एसक्रो अकाउंट न खुलवाने के पीछे कोई ठोस तर्क नहीं था। अगर ये दोनों बातें करार में होतीं तो दसॉ पर एक तरीके का अंकुश लगा होता।

ये दोनों कदम देश के हित में थे और सरकार में बैठे बड़े अफसरों ने ऐसा न करने पर अपनी आपत्ति भी जताई थी। यह सवाल इसलिए भी अहम है कि दसॉ की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, उसकी आर्थिक सेहत को लेकर भारत सरकार के अफसरों ने ही गंभीर सवाल किए थे। इस मेहरबानी का राज क्या था? प्रधानमंत्री मोदी दावा करते हैं कि ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’, तो फिर भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधानों को क्यों खत्म कर दिया गया।

बोफोर्स के हीरो एन राम अब ‘दल्ला एन राम’?

लगता है कि सरकार और भाजपा के रणनीतिकारों के पास दि हिन्दू और एन राम के इन रहस्योद्घाटनों का ठोस और भरोसेमंद जवाब नहीं है। शायद यह भी एक कारण है कि इन सवालों को जोर शोर से उठानेवाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को झूठा साबित करने के साथ ही दि हिन्दू प्रकाशन समूह के चेयरमैन, वरिष्ठ पत्रकार एन राम के विरुद्ध खासतौर से सोशल मीडिया के जरिए निंदा अभियान शुरू कर दिया गया।

भाजपा और उससे जुड़े लोगों ने एन राम की खबर छपने के तुरंत बाद ही उस पर सवालिया निशान लगाने और उसे पूर्वाग्रह से ग्रस्त साबित करने की कोशिश शुरू कर दी थी। सोशल मीडिया पर भाजपा समर्थकों की साइबर आर्मी के लोग बड़ी तादाद में सक्रिय हो गए। एन राम को खरी-खोटी सुनाई, उनके प्रति ‘दल्ला’ जैसे अपशब्द कहे गए। कुछ लोगों ने उनकी पत्रकारिता पर सवालिया निशान उठाए और उनका अखबार पढ़ने पर शर्मिंदगी जाहिर की।

कौन हैं ‘दि हिन्दू’ के एन. राम

सुंधाशु मोहंती ने एसक्रो अकाउंट की वकालत

दि हिन्दू अखबार में संपादक एन राम

मजेदार बात यह है कि कभी, अस्सी के दशक के अंत में एन राम और उनका अखबार ‘दि हिन्दू’ भाजपा समेत तत्कालीन विपक्ष की आंखों का तारा हुआ करता था। यह वह समय था, जब दि हिन्दू’ बोफोर्स तोपों की खरीद में कथित दलाली लिए जाने के मामले में जम कर रिपोर्टिंग कर रहा था और उसने ऐसी कई सनसनीखेज जानकारियां छापी थीं, जिससे राजीव गांधी की सरकार कठघरे में घिर गई थी।

उस समय किसी ने यहां तक कि कांग्रेस के लोगों ने भी उन पर विपक्ष या भाजपा का ‘दलाल’ होने का आरोप नही लगाया था। बल्कि हर जगह उनकी और उनके अखबार की स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता की तारीफ की जाती थी। 1990 में उन्हें भारत सरकार ने ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया था।

पत्रकारिता के क्षेत्र में तमाम बड़े और सम्मानित पुरस्कार उन्हें प्राप्त हुए। वह अपनी खबरों की वजह से बोफोर्स के जमाने में भी खबरों में थे और अब राफेल खरीद के समय भी वह एक बार फिर अपनी खबरों की वजह से खबरों में हैं।

फर्क बस इतना है कि जो लोग उस समय उनकी पत्रकारिता को निर्भीक और निष्पक्ष करार देते हुए उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ते थे, अब उसी जमात के लोग उन्हें ‘दल्ला’ कह रहे हैं। लेकिन एन राम के करीबी सूत्रों के अनुसार बोफोर्स की तरह ही राफेल खरीद घोटाले में भी उनके पिटारे में तथ्यों का इतना बड़ा जखीरा है कि वह इसे निर्णायक मुकाम तक पहुंचा सकते हैं।

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