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स्वकल्प भावना से स्वास्थ सुधार में होता है चमत्कार

स्वकल्प भावना से स्वास्थ सुधार में होता है चमत्कार
June 17
12:43 2013

डी. राय
मनुष्य अपने जीवन में या तो आत्मबल सम्पन्न होता है या आत्महीनता का शिकार होकर परवश जीवन जीता है। उसी तरह या तो स्वस्थ मन और स्वस्थ शरीर के साथ चंचल, उत्साहप्रद और साहसी होकर नीरोगी जीवन जीता है या सदैव रोगी होने की आशंका के साथ सच में धीरे-धीरे विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त होकर जीवन जीता है। ऐसे हजारों-लाखों लोग इस दुनिया में भरे पड़े हैं जो मन की कमजोरी के कारण ही नारकीय जीवन जी रहे हैं और ऐसे भी हजारों लाखों लोग हैं जो महज मजबूत मन के साथ उन्नत जीवन जीते हैं। यहां तक कि विकलांगता भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती है। सामान्य जन इस तरह की दैहिक-मानसिक भिन्नता को देखकर चमत्कृत होते रहते हैं, लेकिन सयाने मनोविज्ञानी और चिकित्सा-विज्ञानी इस तरह के सुपरिणाम को स्वकल्प-भावना का चमत्कार मानते हैं।

 

वस्तुतः स्वकल्प भावना एक साधना है, जिसके सदुपयोग से दुर्बलता और हीन मनोवृत्ति पर आसानी से विजय प्राप्त की जा सकती है। इस समाज में उच्छृंखल लोगों की कमी नहीं है। समाज में चंचल, क्रोधी, शराबी और कामुक प्रवृति के लोगों की भी भरमार है। ऐसे लोग स्वकल्प-भावना के माध्यम से अपने स्वभाव में सुधार की कामना को बार-बार दुहरा कर पूर्ण आत्म संयम लाभ और सुधार कर सकते हैं। हमने यह देखा भी है कि ऐसी कुप्रवृति वाले अनेक लोग अप्रत्याशित रूप से सुधरे व्यक्तित्व के साथ जीवन जीने लगते हैं। यह उनकी स्वकल्प-भावना के संकल्प और पश्चाताप से ही सम्भव हो पाता हैं दुर्बलता और हीन मनोवृत्ति पर आसानी से विजय प्राप्त करना बहुत मुश्किल होता है। किन्तु मन में सबलता और शक्ति आ जाने के कारण ये अपने आप ही दूर हो जाते हैं।

एक महान प्राकृतिक चिकित्सा और मनोविज्ञानी डॉक्टर गोकुला नन्द मुखर्जी का कहना है कि ‘इस संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो स्वभावतः अत्यंत डरपोक, नाजुकऔर अत्यधिक विनयी होते हैं, लेकिन ऐसे लोगों में यह प्रवृति दुर्बलता बनकर हानि पहुंचाती है। उन्हें धोखा ही मिलता है। ऐसे लोग गुण सम्पन्न होते हुए भी न विकास कर पाते हैं न प्रसिद्धि प्राप्त कर पाते हैं। संसार में त्याग करना खराब बात नहीं है, लेकिन यह कमजोरी नहीं बननी चाहिए। कमजोर बनने में कोई लाभ नहीं है। कमजोरी पाप है। क्योंकि दुर्बलता को त्यागी बनकर छिपाया नहीं जा सकता है।

अनुभवी चिकित्सकों की राय है कि इस प्रवृति से ग्रस्त दुर्बल मानसिकता वाले लोग भी स्वकल्प-भावना द्वारा धीरे-धीरे साहसी, निर्भीक, संकोचहीन एवं आत्मसम्मान युक्त हो सकते हैं। यहां दुहरा लेना आवश्यक है कि स्वकल्प-भावना अपने मन को बार-बार समझाने की क्रिया है। पश्चिमी-चिकित्सा विज्ञानी हरबर्ट ए पारकीन, एम.डी. ने अपनी अनुसंधान-पुस्तक ‘ऑटो-सजेशन (स्वकल्प-भावना)’ के पृष्ठ 18 पर लिखा है कि जो लेग मानसिक पीड़ा से व्यथित हैं वे इस तरह स्वकल्प भावना ले सकते हैं कि दिन-दिन मेरा मन सबल होता जाएगा, मैं किसी के पास जाने में शर्म नहीं करूंगा, सबके साथ निःसंकोच बात कर सकूंगा, अपने को कभी भी छोटा नहीं समझूंगा, मेरी शक्ति का धीरे-धीरे पूर्ण विकास होगा, मैं जिस किसी भी आदमी के समान हूँ, जीवन में मैं संघर्ष करूंगा और संघर्ष में विजय प्राप्त करूंगा।

 

’ डा0 हरबर्ट कहते हैं कि ‘इस तरह की स्वकल्प-भावना बार-बार दुहराने और तदनुसार आचरण करने से मन धीरे-धीरे मजबूत होता जाता है। मन में नवीनता आ जाती है।’ सचमुच हमारे आसपास भी ऐसे अनेक लोग दिखते हैं, जो बहुत ही आरामप्रिय तथा कमजोर होते हैं। ऐसे लोग भी स्वकल्प भावना से कष्टसहिष्णु और परिश्रमी होकर उन्नत व्यक्तित्व के धनी हो सकते हैं।

अन्य व्यक्तियों को भी यह अनुभव हुआ होगा कि मन की मजबूती से सर्दी और गर्मी के अप्रत्याशित कष्ट को कभी न कभी सहन करना पड़ा है। यहां भी स्वकल्प भावना ही काम आती है। कुछ लोग हमेशा खुले बदन रहते हैं। साधु-सन्यासी या अन्य आम लोग भी यदि इस तरह रहते हैं, जिनपर मौसम की प्रतिकूलता का कुप्रभाव नहीं दिखता तो यह भी उनकी स्वकल्प भावना का ही प्रभाव है।

बहुत लोगों की भोजन ग्रहण में विषम रूचि रहती है। अस्वास्थ्यकर भोजन ग्रहण करते रहते हैं और स्वास्थ्यकर आहार की ओर ताकते तक नहीं। बहुतों को फल आदि खाने में कोई रूचि नहीं रहती। ऐसा पूर्वाग्रह ग्रस्त होने से भी होता है या पारिवारिक परंपरा से भी ऐसी लत लग जाती है। मादक द्रवय के सेवन और धूम्रपान जैसी असवास्थ्यकर आदत को स्वकल्प-भावना से बदला जा सकता है। भोजन में फल, सलाद, शाक-सब्जी, दूध, दही आदि के प्रति भी स्वकल्प भावना से रूचि अनुकूल की जा सकती है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि स्वकल्प-भावना रोग निदान में जिस प्रकार सहायक है उसी प्रकार व्यक्तित्व निर्माण के लिए भी यह एक कारगर हथियार साबित हुआ है। वैसे रोग-निदान में स्वकल्प-भावना के सदुपयोग के साथ शरीर को भी हमेशा दोष मुक्त रखने की चेष्टा करनी चाहिए। ऐसा इसलिए कि शरीर के संचित दूषित पदार्थ ही रोगों के मूल कारण हैं। जब शरीर को इन विकारों से मुक्त किया जाता है, तभी शरीर वास्तव में स्वस्थ बन पाता है।

शरीर और मन का पारस्परिक संबंध है। दोनों का घनिष्ठ लगाव है। मानसिक हालट में शरीर एवं शारीरिक हालत से मन हमेशा ही प्रभावित होता रहता है। सुस्वादु भोजन की कल्पना मात्र से मुंह में पानी भर आना और बुरा सपना देखने से ही घबराहट और पाचन क्रिया बंद हो जाने की क्रिया, शरीर और मन के सम्बन्धों का परिचायक है। कई लोग खून देखकर ही बेहोश हो जाते हैं। किसी चर्मरोगी के कपड़े छू जाने से ही कुछ लोगों के शरीर में खुजलाहट शुरू हो जाती है। हृदयरोग की बात सोचने से कितने लोग घबराकर चिकित्सकों तक दौड़ पड़ते हैं। बुरी भावनाओं से जिस प्रकार विभिन्न रोग पैदा होते हैं उसी तरह अच्छी भावनाओं से विभिन्न रोग ठीक हो सकते हैं एवं जीवन संकटमय होने पर भी जीवन रक्षा की जा सकती है।

समाज में ओझा-गुनी, डायन, साधु-संन्यासी, तीर्थ-व्रत, गंडा-ताबीज, भस्म-भभूत, अंगूठी, जप-माला-यज्ञ आदि का टोटका इसी तरह की भावना पैदा करने के लिए बहुतेरे धंधेबाज प्रयोग में लाते हैं। इन टोटकों का प्रचलन भी कम नहीं है। भूत-प्रेत-रोग-व्याधि आदि से मुक्ति की चाह, नौकरी, धन, शादी, पढ़ाई, यात्रा की कुशलता आदि से सम्बद्ध परिस्थिति को लेकर भी समाज में स्वकल्प-भावना जागृत करने के पर्याय के रूप में ‘गुनी लोग’अपना धंधा जमाए हुए हैं। उनका धंधा पीड़ित की ‘स्वकल्प भावना’ के विकास पर ही चलता है। यदि चिकित्सक का व्यक्त्वि आकर्षक और प्रभावी हो, बोलचाल प्रेम और विश्वास उत्पन्न करनेवाले हो तो गंभीर रोग से पीड़ित व्यक्ति शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर लेता है। यह मन के विश्वास के कारण ही सम्भव हो पाता है।

चिकित्सक बताते हैं कि यह कोई आश्चर्य जनक घटना नहीं है। यदि अवचेतन मन में यह विश्वास पैदा हो कि रोग अच्छा ही हो गया या अच्छा हो रहा है तो शत-प्रतिशत फायदा हो जाता है। यह एक वैज्ञानिक सत्य है। इस प्रणाली को व्यवहारिक मनोविज्ञान का प्रधान अंग माना जा रहा है। इस प्रकार विश्वास पैदा करनेवाली पद्धति को सलाह कहते हैं जबकि स्वयं ही स्वस्थ भावनाओं द्वारा अपनी बुरी आदतों और रोगों से छुटकरा पाने की चेष्टा की जाती है, तब उसे आत्म-सलाह या स्वकल्प-भावना कहते हैं। क्या रात में सोते समय तड़के उठने की बात सोचकर सोने के बाद समय पर निश्चित रूप से नींद टूटने की घटना क्या कहती है? निश्चय ही यह स्वकल्प भावना का परिचायक है। इसी तरह कोई भी धारणा अवचेतन में पहुंचाने से उसी के अनुसार काम होने लगता है।

चिकित्सक भी मानते हैं कि केवल दवा खाने मात्र से रोगी चंगा नहीं होता। विश्वास भी आरोग्य साधन का एक प्रधान अंग होता है। औषधि खाने पर रोगी सोचता है कि वह निरोग होने लगा है और इस तरह वह बिल्कुल रोग मुक्त हो जाता है। स्वकल्प-भावना द्वारा इसी तरह लाभ प्राप्त होता है। बहुत लोगों की यह आदत होती है कि दूसरों की सहानुभूति पाने के लिए अपने को बीमार बताते हुए अन्य प्रकार के जाल-जंजाल से पीड़ित होने की बात बार-बार दुहराते रहते हैं। इससे भी वह स्वयं तो अपनी छवि खराब करते ही हैं, दूसरे भी उनके सामने असहाय साबित होते हैं।

हमारे शरीर में अवचेतन मन ही समस्त शक्ति का आधार है। हमारे शरीर की समस्त जैविक क्रियाएं इसी शक्ति से परिचालित होती हैं। जब कोई स्वस्थ विचार स्वकल्प-भावना से अवचेतन मन में उत्पन्न कर दिया जाता है, तब उसी के अनुसार काम होने लगता है।

डा0 अर्नोल्ड लॉर्रेन्ड के अनुसार स्वकल्प-भावना की आवृति हमेशा किसी एकांत स्थान में या एकांत अवस्था में करनी चाहिए। उस समय मन में कोई अन्य विचार नहीं आना चाहिए। शरीर जितना शिथिल होगा, अवचेतन मन की शक्ति उतनी ही अधिक होगी। फिर अभ्यास हो जाने पर उठते-बैठते, चलते-फिरते, कहीं भी, किसी भी समय स्वकल्प-भावना से वांछित फल प्राप्त करने की दिशा में सफल हो जाते हैं। स्वकल्प भावना से जो भी लाभ प्राप्त होता है, वह केवल अविश्वास से ही व्यर्थ हो सकता है। इसलिए हमारे देश में कहावत है कि जिसकी जैसी भावना होती है, उसकी सिद्धि भी वैसी ही होती है।

अनुभवी चिकित्सकों का दावा है कि यदि स्वकल्प भावना विश्वास और नियम से की जाए तो अधिकांश रोग ठीक हो सकते हैं। स्नायु रोगों में तो यह प्रणाली कारगर साबित हुई है। अनिद्रा, हिस्टीरिया, मृगी, अंगों में खिंचाव, मूत्र की रूकावट में अक्षमता, स्मरण शक्ति की कमी इत्यादि रोगों के लिए स्वकल्प भावना एक प्रधान चिकित्सा है। मानसिक कष्ट, यंत्रणा, अशांति में भी यह लाभकारी है। यह अवचेतन मन में किसी भी रोग के प्रति स्वस्थ धारणा उत्पन्न कर आरोग्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है। मैं अच्छा हो जाऊंगा, अच्छा हो रहा हूँ, अच्छा हो गया-यही है स्वकल्प भावना का मूल मंत्र।

 

कब्ज और दमा सहित दर्द के सभी रोगों में स्वकल्प भावना से लाभ होता है। स्नायु-शूल, दांत दर्द, स्नायविक सिर दर्द आदि आसानी से ठीक होते हैं। एक साथ अनेक रोगों से पीड़ित रोगी भी औषधीय प्रयोग के साथ स्वकल्प-भावना का प्रयोग नियमित रूप से कर सकते हैं। रोगों के प्रधान लक्षणों के लिए स्वकल्प-भावना करने में कोई हानि नहीं है। उससे दुख आरोग्य होता है।

वस्तुतः स्वकल्प-भावना ऐसी पद्धति है, जिससे न केवल रोगों से मुक्ति मिलती है, शरीर दोष मुक्त होता है बल्कि इससे चरित्र निर्माण भी होता है। ‘मैं बुरा काम नहीं करूंगा’ यह भावना ही चरित्र निर्माण में सहायक है। अपने को कभी भी अभागा और कमजोर नहीं समझना चाहिए। आत्मविश्वास स्वकल्प-भावना से ही आता है। जीवन के अधिकांश मनोरथ पूरा करने वाली कोई पूंजी है तो वह है स्वकल्प भावना। इसे सहेजना और सदुपयोग करना ही असली आरोग्य है।

जैसा हम महात्मा गाँधी के जीवन में पाते हैं।

 

स्वकल्प भावना से स्वास्थ सुधार में होता है चमत्कार - overview
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