हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा – रोकथाम ही ‘एकमात्र उपाय’

संयुक्त राष्ट्र की एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा में जीवित बचे पीड़ित, लम्बे समय तक जिन विनाशकारी दुष्परिणामों को भुगतने के लिये मजबूर हैं, उनसे निपटने का सर्वोत्तम और एकमात्र इलाज, ऐसे मामलों की पूर्ण रोकथाम है. हिंसक संघर्ष में यौन हिंसा के मुद्दे पर यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने बुधवार को सुरक्षा परिषद को सम्बोधित करते हुए बताया कि यौन हिंसा को एक क्रूर युद्ध-नीति के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाता है.  

विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने कहा कि यह बैठक एक ऐसे समय में हो रही है जब इस अपराध को इतिहास के बन्द अध्याय में शामिल हो जाना चाहिये था, मगर यह अब भी ख़बरों का शीर्षक बना हुआ है. 

Read the remarks of @USGSRSGPatten at the 2021 Open Debate on CRSV: https://t.co/tyY1TNFuvm pic.twitter.com/Zb8fdzHlhD— UN Against Sexual Violence in Conflict (@endrapeinwar) April 14, 2021

उन्होंने कहा कि पहले से मौजूद, रची-बसी और नई व उभरती चुनौतियों की समीक्षा की जानी होगी ताकि हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा की समस्या को जड़ से उखाड़ फेंका जा सके. 
यूएन दूत ने इथियोपिया के टिगरे क्षेत्र में हालात का उल्लेख किया जहाँ महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध यौन हिंसा के बेहद क्रूर मामले सामने आए हैं – इनमें सामूहिक बलात्कार और अन्य ज़्यादतियाँ भी हैं.
उन्होंने ध्यान दिलाया कि सुरक्षा परिषद ने यौन हिंसा का मुक़ाबले करने के लिये अभूतपूर्व प्रस्ताव पारित किये हैं, लेकिन इसके बावजूद यह विचारणीय है कि टिगरे में ज़मीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा किस तरह की जा सकती है. 
उन्होंने, पिछले वर्ष, संयुक्त राष्ट्र द्वारा 18 देशों में हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा के ढाई हज़ार से ज़्यादा सत्यापित मामलों का ज़िक्र करते हुए कहा कि संकल्पों और वास्तविकता के बीच एक खाई है. 
“जब समय पीछे मुड़कर इस पीड़ादायी प्रकरण को देखेगा – उन लड़ाइयों की एक लम्बी सूची के हिस्से के रूप में, जिन्हें बोसनिया से रवाण्डा, इराक़, सीरिया और अन्य स्थानों पर महिलाओं के शरीरों पर लड़ा गया, तो हमसे यह पूछा जाना सही होगा कि अपने संकल्पों को पूरा करने के लिये हमने क्या किया था.”
विशेष प्रतिनिधि ने युद्ध के दौरान यौन हिंसा के वास्तविक आँकड़ों से बेहद कम संख्या में मामले दर्ज किये जाने की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया. 
इसकी वजह को कथित कलंक, असुरक्षा की भावना, बदला लिये जाने का डर और ज़रूरी सेवाओं की कमी को बताया गया है. 
मौजूदा कोरोनावायरस संकट के दौरान ऐहतियात के लिये लागू पाबन्दियों व अन्य उपायों के कारण हालात और ज़्यादा विकट हो गए हैं. 
प्रमिला पैटन ने कहा कि जीवितों के लिये सुरक्षित माहौल में आगे बढ़कर कष्ट निवारण के प्रयास पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं.  
उनके मुताबिक कुछ पीड़ितों ने अपनी चुप्पी तोड़ी है, मगर अनेक मामले शर्मिन्दगी, अलग-थलग पड़ने और ख़ारिज किये जाने के डर से सामने नहीं आ पाते. 
विशेष प्रतिनिधि ने कुछ जीवित बची महिलाओं की व्यथा को साझा करते हुए, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में एक माँ और बेटी का ज़िक्र किया जो गाँव में विद्रोहियों के हमले के दौरान जान बचाने के लिये भाग गईं. 
लेकिन फिर उन्हें विद्रोहियों से लड़ाई के लिये वहाँ पहुँचने वाले सरकारी सैनिकों से, यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा. 
वहीं, इस्लामिक स्टेट (दाएश) के चंगुल में फँसने वाली महिलाओं को सामाजिक अस्वीकार्यता के कारण उन बच्चों को मजबूरी में छोड़ना पड़ा, जिनका जन्म बलात्कार के बाद हुआ था. 
उन्होंने कहा कि ऐसा हर एक मामला न्याय की गुहार लगा रहा है. 
कोविड से उपजी चिन्ताएँ
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने महिलाधिकारों व नागरिक समाज के लिये सिकुड़ते स्थान से मुक़ाबला करने के लिये वैश्विक युद्धविराम की पुकार लगाई है. 
लेकिन कोविड-19 के कारण लिंग आधारित संरक्षा चिन्ताएँ भी जन्म ले रही हैं.
यूएन प्रणाली और अन्य पक्षों की ओर से हिंसक संघर्ष, विस्थापन और कोविड-19 से प्रभावित महिलाओं के लिये ऑनलाइन सहायता मुहैया कराई गई है.
इसके बावजूद प्रभावित महिलाएँ डिजिटल विभाजन रेखा के दूसरी ओर हैं, जहाँ उन तक पहुँच पाना कठिन है. 
प्रमिला पैटन ने ज़ोर देकर कहा कि महामारी से उबरते समय समावेशी और लैंगिक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, समाधानों की दिशा में बढ़ा जाना होगा – यह इतिहास में मोड़ आने का समय है. 
नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता डेनिस मुक्वेगे ने अपने सम्बोधन में कहा कि मानवता को सामूहिक रूप से शर्मिन्दगी का अनुभव करना चाहिये, चूँकि यौन हिंसा के मामलों के लिये ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बेहद कम प्रयास किये गए हैं.
युद्ध में यौन हिंसा के मुद्दे पर अन्तरराष्ट्रीय क़ानून में प्रगति होने के बावजूद, दुर्व्यवहार के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं, और उन पर जवाबी कार्रवाई करने के लिये ज़रूरी वित्त पोषण नहीं है.   , संयुक्त राष्ट्र की एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा में जीवित बचे पीड़ित, लम्बे समय तक जिन विनाशकारी दुष्परिणामों को भुगतने के लिये मजबूर हैं, उनसे निपटने का सर्वोत्तम और एकमात्र इलाज, ऐसे मामलों की पूर्ण रोकथाम है. हिंसक संघर्ष में यौन हिंसा के मुद्दे पर यूएन महासचिव की विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने बुधवार को सुरक्षा परिषद को सम्बोधित करते हुए बताया कि यौन हिंसा को एक क्रूर युद्ध-नीति के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाता है.  

विशेष प्रतिनिधि प्रमिला पैटन ने कहा कि यह बैठक एक ऐसे समय में हो रही है जब इस अपराध को इतिहास के बन्द अध्याय में शामिल हो जाना चाहिये था, मगर यह अब भी ख़बरों का शीर्षक बना हुआ है. 

उन्होंने कहा कि पहले से मौजूद, रची-बसी और नई व उभरती चुनौतियों की समीक्षा की जानी होगी ताकि हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा की समस्या को जड़ से उखाड़ फेंका जा सके. 

यूएन दूत ने इथियोपिया के टिगरे क्षेत्र में हालात का उल्लेख किया जहाँ महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध यौन हिंसा के बेहद क्रूर मामले सामने आए हैं – इनमें सामूहिक बलात्कार और अन्य ज़्यादतियाँ भी हैं.

उन्होंने ध्यान दिलाया कि सुरक्षा परिषद ने यौन हिंसा का मुक़ाबले करने के लिये अभूतपूर्व प्रस्ताव पारित किये हैं, लेकिन इसके बावजूद यह विचारणीय है कि टिगरे में ज़मीनी स्तर पर महिलाओं की सुरक्षा किस तरह की जा सकती है. 

उन्होंने, पिछले वर्ष, संयुक्त राष्ट्र द्वारा 18 देशों में हिंसक संघर्ष के दौरान यौन हिंसा के ढाई हज़ार से ज़्यादा सत्यापित मामलों का ज़िक्र करते हुए कहा कि संकल्पों और वास्तविकता के बीच एक खाई है. 

“जब समय पीछे मुड़कर इस पीड़ादायी प्रकरण को देखेगा – उन लड़ाइयों की एक लम्बी सूची के हिस्से के रूप में, जिन्हें बोसनिया से रवाण्डा, इराक़, सीरिया और अन्य स्थानों पर महिलाओं के शरीरों पर लड़ा गया, तो हमसे यह पूछा जाना सही होगा कि अपने संकल्पों को पूरा करने के लिये हमने क्या किया था.”

विशेष प्रतिनिधि ने युद्ध के दौरान यौन हिंसा के वास्तविक आँकड़ों से बेहद कम संख्या में मामले दर्ज किये जाने की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया. 

इसकी वजह को कथित कलंक, असुरक्षा की भावना, बदला लिये जाने का डर और ज़रूरी सेवाओं की कमी को बताया गया है. 

मौजूदा कोरोनावायरस संकट के दौरान ऐहतियात के लिये लागू पाबन्दियों व अन्य उपायों के कारण हालात और ज़्यादा विकट हो गए हैं. 

प्रमिला पैटन ने कहा कि जीवितों के लिये सुरक्षित माहौल में आगे बढ़कर कष्ट निवारण के प्रयास पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं.  

उनके मुताबिक कुछ पीड़ितों ने अपनी चुप्पी तोड़ी है, मगर अनेक मामले शर्मिन्दगी, अलग-थलग पड़ने और ख़ारिज किये जाने के डर से सामने नहीं आ पाते. 

विशेष प्रतिनिधि ने कुछ जीवित बची महिलाओं की व्यथा को साझा करते हुए, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य में एक माँ और बेटी का ज़िक्र किया जो गाँव में विद्रोहियों के हमले के दौरान जान बचाने के लिये भाग गईं. 

लेकिन फिर उन्हें विद्रोहियों से लड़ाई के लिये वहाँ पहुँचने वाले सरकारी सैनिकों से, यौन हिंसा का शिकार होना पड़ा. 

वहीं, इस्लामिक स्टेट (दाएश) के चंगुल में फँसने वाली महिलाओं को सामाजिक अस्वीकार्यता के कारण उन बच्चों को मजबूरी में छोड़ना पड़ा, जिनका जन्म बलात्कार के बाद हुआ था. 

उन्होंने कहा कि ऐसा हर एक मामला न्याय की गुहार लगा रहा है. 

कोविड से उपजी चिन्ताएँ

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने महिलाधिकारों व नागरिक समाज के लिये सिकुड़ते स्थान से मुक़ाबला करने के लिये वैश्विक युद्धविराम की पुकार लगाई है. 

लेकिन कोविड-19 के कारण लिंग आधारित संरक्षा चिन्ताएँ भी जन्म ले रही हैं.

यूएन प्रणाली और अन्य पक्षों की ओर से हिंसक संघर्ष, विस्थापन और कोविड-19 से प्रभावित महिलाओं के लिये ऑनलाइन सहायता मुहैया कराई गई है.

इसके बावजूद प्रभावित महिलाएँ डिजिटल विभाजन रेखा के दूसरी ओर हैं, जहाँ उन तक पहुँच पाना कठिन है. 

प्रमिला पैटन ने ज़ोर देकर कहा कि महामारी से उबरते समय समावेशी और लैंगिक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए, समाधानों की दिशा में बढ़ा जाना होगा – यह इतिहास में मोड़ आने का समय है. 

नोबेल शान्ति पुरस्कार विजेता डेनिस मुक्वेगे ने अपने सम्बोधन में कहा कि मानवता को सामूहिक रूप से शर्मिन्दगी का अनुभव करना चाहिये, चूँकि यौन हिंसा के मामलों के लिये ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के बेहद कम प्रयास किये गए हैं.

युद्ध में यौन हिंसा के मुद्दे पर अन्तरराष्ट्रीय क़ानून में प्रगति होने के बावजूद, दुर्व्यवहार के मामले अक्सर सामने आते रहे हैं, और उन पर जवाबी कार्रवाई करने के लिये ज़रूरी वित्त पोषण नहीं है.   

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