हॉलोकॉस्ट की याद में… ब्लॉग

भारत में इसराइल के राजदूत रॉन माल्का, जर्मनी के राजदूत, वाल्टर जे लिण्डनर और बाँग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल व श्रीलंका के लिये यूनेस्को के नई दिल्ली कार्यालय के निदेशक व प्रतिनिधि एरिक फॉल्ट ने हॉलोकॉस्ट स्मरण दिवस पर एक संयुक्त ब्लॉग में ज़ोर देते हुए कहा है कि लोगों को नफ़रत से प्रेरित अपराधों के मूल कारण और अंजाम समझने के लिये सशक्त बनाना बेहद आवश्यक है.

संयुक्त राष्ट्र यहूदी विरोधी भावना, नस्लवाद और असहिष्णुता के अन्य रूपों का मुक़ाबला करने की अपनी अटूट प्रतिबद्धता जताने के लिये, हर साल 27 जनवरी को हॉलोकॉस्ट के पीड़ितों का सम्मान करता है. इस दिन, 1945 में सोवियत सैनिकों ने नात्सी आउशवित्ज़-बर्केनाउ यातना शिविर को मुक्त कराया था और इसलिये घृणा के चरम रूपों के असली ख़तरों पर विचार करने के लिये यह उपयुक्त दिवस है.
“हम सब यहाँ देशों के ठंडे रवैये और उपेक्षित उदासीनता के बीच पिस रहे हैं, दुनिया ने और ज़िन्दगी ने हमें भुला दिया है.” यद वशेम की दीवारों पर उकेरे गए एक शिविर क़ैदी का यह मार्मिक कथन हम सभी को झकझोर कर यह ध्यान दिलाता है कि यह इतिहास के पन्नों के भूले बिसरे भाव नहीं हैं. यह आज भी एक जीवन्त अहसास है. समय-समय पर, हमने देखा है कि कैसे नफ़रत की भाषा आम लोगों को पूर्वाग्रहों और शत्रुता के रास्ते पर ले जा सकती है. क्या “कभी न भूलने” का अनन्त वादा अभी भुला दिया गया है?
नफ़रत की भाषा तीव्र हो गई है
वर्तमान में, इंटरनेट पर गुमनामी और महामारी के दौरान स्क्रीन के सामने अधिक समय बिताने के कारण नफ़रत भरी भाषा में वृद्धि हुई है.
ऑनलाइन माध्यमों से, नफ़रत भरे भाषणों का फैलाव बढ़ता है, जिससे हमारे समाज में यहूदी-विरोध और अन्य तरह के नस्लवाद में बढ़ोत्तरी होती है.
तेल अवीव विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार, कोविड-19 महामारी के कारण व्याप्त अनिश्चितता, अलगाव और अस्वीकृति की भावनाओं ने यहूदियों पर इसकी ज़िम्मेदारी डालकर, उन्हें बलि का बकरा बनाया, जिससे दुनिया भर में यहूदी विरोधी भावना बढ़ी. इस महत्वपूर्ण समय में, जब सभी को एकजुट होने की आवश्यकता है, सोशल मीडिया पर यहूदी-विरोधी भावनाओं के प्रसार ने पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को पुनर्जीवित किया है, जो समाज को विभाजित करते हैं.
इसी वजह से, हॉलोकॉस्ट के महत्व को समझना आज बहुत अहम हो जाता है. हॉलोकॉस्ट एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण था जिसने नफ़रत और उसके अंजाम की बहुत सी अभिव्यक्तियों को उजागर किया. इसलिये संयुक्त राष्ट्र, सदस्य देशों से नफ़रत भरी विचारधाराओं के प्रति लोगों की प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत करने के आग्रह के साथ-साथ, शान्ति की संस्कृति विकसित करने के लिये शिक्षा को एक मज़बूत औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर देता है.
यूनेस्को हिंसक चरमपंथ की रोकथाम और वैश्विक नागरिकता सम्बन्धी शिक्षा पर अपने कार्यक्रमों के ढाँचे के तहत, लगातार यहूदी-विरोधी गतिविधियों के उग्र व समस्त रूपों को रोकने की दिशा में काम करता रहा है.
हालाँकि, शिक्षा को, असहिष्णुता दूर करने के सर्वगुण सम्पन्न औज़ार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये. नस्लवादी विचारधारा और घृणा फैलाने वाले भाषण किस तरह हॉलोकॉस्ट जैसी त्रासदियों का कारण बन सकते हैं, पाठ्यपुस्तक से परे जाकर इन पर सबक पढ़ाए जाने चाहिये. ऐसा इसलिये भी है, क्योंकि अक्सर हमने बहुत उच्च शिक्षा प्रप्त लोगों को घृणा फैलाते हुए देखा है.
इनकार और विकृति
हॉलोकॉस्ट को नकारने और विकृत करने की भावना ऑनलाइन पनप रही है. इसे अन्तरराष्ट्रीय हॉलोकॉस्ट स्मरण गठबन्धन द्वारा समकालीन विरोधवाद की एक विवादास्पद अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है.
विश्व यहूदी कांग्रेस द्वारा पहले जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिदिन औसतन 100 से अधिक ऑनलाइन पोस्ट हॉलोकॉस्ट के खंडन में जारी की जाती हैं. इससे असलियत को नकारने और घृणा फैलाने में ऑनलाइन मंचों के बढ़ते ख़तरे उजागर होते हैं.
हाल ही में यूनेस्को ने, अन्तरराष्ट्रीय हॉलोकॉस्ट स्मरण गठबन्धन, संयुक्त राष्ट्र और योरोपीय आयोग द्वारा विकसित #ProtectTheFacts अभियान शुरू किया है, जो हॉलोकॉस्ट को नकारने वाली नीतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाकर, हॉलोकॉस्ट के पीड़ितों को याद करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है.
आज की ध्रुवीकृत दुनिया में, लोगों को सवाल करने और घृणा से प्रेरित अपराधों के कारण व नतीजे के बारे में सोचने के लिये सशक्त बनाना आवश्यक है.
हर एक व्यक्ति के अन्दर अच्छा या बुरा करने की शक्ति होती है, चाहे उसे उसका अहसास हो या न हो. उनकी इस शक्ति को जगाना ही शान्तिपूर्ण और टिकाऊ समाज बनाने का एकमात्र तरीक़ा होगा., भारत में इसराइल के राजदूत रॉन माल्का, जर्मनी के राजदूत, वाल्टर जे लिण्डनर और बाँग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल व श्रीलंका के लिये यूनेस्को के नई दिल्ली कार्यालय के निदेशक व प्रतिनिधि एरिक फॉल्ट ने हॉलोकॉस्ट स्मरण दिवस पर एक संयुक्त ब्लॉग में ज़ोर देते हुए कहा है कि लोगों को नफ़रत से प्रेरित अपराधों के मूल कारण और अंजाम समझने के लिये सशक्त बनाना बेहद आवश्यक है.

संयुक्त राष्ट्र यहूदी विरोधी भावना, नस्लवाद और असहिष्णुता के अन्य रूपों का मुक़ाबला करने की अपनी अटूट प्रतिबद्धता जताने के लिये, हर साल 27 जनवरी को हॉलोकॉस्ट के पीड़ितों का सम्मान करता है. इस दिन, 1945 में सोवियत सैनिकों ने नात्सी आउशवित्ज़-बर्केनाउ यातना शिविर को मुक्त कराया था और इसलिये घृणा के चरम रूपों के असली ख़तरों पर विचार करने के लिये यह उपयुक्त दिवस है.

“हम सब यहाँ देशों के ठंडे रवैये और उपेक्षित उदासीनता के बीच पिस रहे हैं, दुनिया ने और ज़िन्दगी ने हमें भुला दिया है.” यद वशेम की दीवारों पर उकेरे गए एक शिविर क़ैदी का यह मार्मिक कथन हम सभी को झकझोर कर यह ध्यान दिलाता है कि यह इतिहास के पन्नों के भूले बिसरे भाव नहीं हैं. यह आज भी एक जीवन्त अहसास है. समय-समय पर, हमने देखा है कि कैसे नफ़रत की भाषा आम लोगों को पूर्वाग्रहों और शत्रुता के रास्ते पर ले जा सकती है. क्या “कभी न भूलने” का अनन्त वादा अभी भुला दिया गया है?

नफ़रत की भाषा तीव्र हो गई है

वर्तमान में, इंटरनेट पर गुमनामी और महामारी के दौरान स्क्रीन के सामने अधिक समय बिताने के कारण नफ़रत भरी भाषा में वृद्धि हुई है.

ऑनलाइन माध्यमों से, नफ़रत भरे भाषणों का फैलाव बढ़ता है, जिससे हमारे समाज में यहूदी-विरोध और अन्य तरह के नस्लवाद में बढ़ोत्तरी होती है.

तेल अवीव विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार, कोविड-19 महामारी के कारण व्याप्त अनिश्चितता, अलगाव और अस्वीकृति की भावनाओं ने यहूदियों पर इसकी ज़िम्मेदारी डालकर, उन्हें बलि का बकरा बनाया, जिससे दुनिया भर में यहूदी विरोधी भावना बढ़ी. इस महत्वपूर्ण समय में, जब सभी को एकजुट होने की आवश्यकता है, सोशल मीडिया पर यहूदी-विरोधी भावनाओं के प्रसार ने पूर्वाग्रहों और रूढ़ियों को पुनर्जीवित किया है, जो समाज को विभाजित करते हैं.

इसी वजह से, हॉलोकॉस्ट के महत्व को समझना आज बहुत अहम हो जाता है. हॉलोकॉस्ट एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण था जिसने नफ़रत और उसके अंजाम की बहुत सी अभिव्यक्तियों को उजागर किया. इसलिये संयुक्त राष्ट्र, सदस्य देशों से नफ़रत भरी विचारधाराओं के प्रति लोगों की प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत करने के आग्रह के साथ-साथ, शान्ति की संस्कृति विकसित करने के लिये शिक्षा को एक मज़बूत औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने पर जोर देता है.

यूनेस्को हिंसक चरमपंथ की रोकथाम और वैश्विक नागरिकता सम्बन्धी शिक्षा पर अपने कार्यक्रमों के ढाँचे के तहत, लगातार यहूदी-विरोधी गतिविधियों के उग्र व समस्त रूपों को रोकने की दिशा में काम करता रहा है.

हालाँकि, शिक्षा को, असहिष्णुता दूर करने के सर्वगुण सम्पन्न औज़ार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये. नस्लवादी विचारधारा और घृणा फैलाने वाले भाषण किस तरह हॉलोकॉस्ट जैसी त्रासदियों का कारण बन सकते हैं, पाठ्यपुस्तक से परे जाकर इन पर सबक पढ़ाए जाने चाहिये. ऐसा इसलिये भी है, क्योंकि अक्सर हमने बहुत उच्च शिक्षा प्रप्त लोगों को घृणा फैलाते हुए देखा है.

इनकार और विकृति

हॉलोकॉस्ट को नकारने और विकृत करने की भावना ऑनलाइन पनप रही है. इसे अन्तरराष्ट्रीय हॉलोकॉस्ट स्मरण गठबन्धन द्वारा समकालीन विरोधवाद की एक विवादास्पद अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है.

विश्व यहूदी कांग्रेस द्वारा पहले जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिदिन औसतन 100 से अधिक ऑनलाइन पोस्ट हॉलोकॉस्ट के खंडन में जारी की जाती हैं. इससे असलियत को नकारने और घृणा फैलाने में ऑनलाइन मंचों के बढ़ते ख़तरे उजागर होते हैं.

हाल ही में यूनेस्को ने, अन्तरराष्ट्रीय हॉलोकॉस्ट स्मरण गठबन्धन, संयुक्त राष्ट्र और योरोपीय आयोग द्वारा विकसित #ProtectTheFacts अभियान शुरू किया है, जो हॉलोकॉस्ट को नकारने वाली नीतियों के प्रति जागरूकता बढ़ाकर, हॉलोकॉस्ट के पीड़ितों को याद करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है.

आज की ध्रुवीकृत दुनिया में, लोगों को सवाल करने और घृणा से प्रेरित अपराधों के कारण व नतीजे के बारे में सोचने के लिये सशक्त बनाना आवश्यक है.

हर एक व्यक्ति के अन्दर अच्छा या बुरा करने की शक्ति होती है, चाहे उसे उसका अहसास हो या न हो. उनकी इस शक्ति को जगाना ही शान्तिपूर्ण और टिकाऊ समाज बनाने का एकमात्र तरीक़ा होगा.

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