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14 साल से कम उम्र में अवसाद की दहलीज पर होते हैं 50 प्रतिशत युवा : एम्स प्रोफसर

14 साल से कम उम्र में अवसाद की दहलीज पर होते हैं 50 प्रतिशत युवा : एम्स प्रोफसर
October 07
09:26 2018

(डॉ़ आशा मिश्रा उपाध्याय) 

नयी दिल्ली 07 अक्टूबर (वार्ता) पल-पल बिना वजह खुश रहने की अल्हड़ उम्र में बड़ी संख्या में बच्चे अवसाद के मकड़ जाल में उलझ रहे हैं और जिन्दगी के कोमल अहसास से वंचित हो रहे हैं। भारत में पिछले एक दशक में किशोरों में अवसाद तेजी से घर कर रहा है। पचास प्रतिशत मामलों में 14 साल से कम उम्र में के बच्चे इस रोग की चपेट में आ रहे हैं। 

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) में मनोविज्ञान के प्रोफसर डॉ़ राजेश कुमार सागर ने वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ (डब्ल्यूएफएमएच) द्वारा 10 अक्टूबर को मनाये जाने वाले ‘वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे ’ के मौके पर यूनीवार्ता से विशेष बातचीत में कहा कि विश्वभर में अवसाद गंभीर समस्या बन गया है और भारत का किशाेर और युवा वर्ग तेजी से इसकी गिरफ्त में आते जा रहा है।

प्रोफसर सागर ने कहा,‘‘ देश की आबादी में 34 प्रतिशत से अधिक 15 से 34 वर्ष आयु के लोग हैं लेकिन यह बेहद दुखद है कि विश्व के सबसे युवा देश में 50 प्रतिशत मामलों में 14 साल से कम उम्र के बच्चों में अवसाद की शुरूआत हो जाती है। यह उम्र का नाजुक मोड़ है और छुईमुई -सी जिंदगी को भावनात्मक से लेकर प्रोफेशनल स्तर तक संवारने में माता-पिता की भूमिका बहुत अहम है।” प्रोफसर सागर ने स्पस्ट किया कि डब्लूएफएमएच अवसाद के खिलाफ जागरूकता फैलाने और उसके खिलाफ अभियान में तेजी लाने के लिए प्रतिवर्ष एक विषय चुनता है। इस बार का विषय ,“ यंग पीपुल एंड मेंटल हेल्थ इन चेंजिग वर्ल्ड ’ है। 

विज्ञान की प्रतिष्ठत अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘लांसेट’ समेत कई पत्रिकाओं के लिए नियमित रूप से लिखने वाले प्रोफेसर सागर ने कहा कि अवसाद के लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके पीछे कई कारण हैं । बदलते सामाजिक – सांस्कृतिक परिवेश और आर्थिक दबाव प्रमुख करणों में शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि तेजी से बदल रहे विश्व में हर कदम पर प्रतियोगिता और तनाव है जिससे सबसे अधिक युवा वर्ग प्रभावित होता है। सामाजिक बदलाव का परिवार के संरचना पर गहरा असर पड़ा है और इसके कारण युवा वर्ग में अकेलापन बढ़ा है। कामकाजी माता-पिता के पास बच्चों के लिए बमुश्किल समय होता है और ऐसे में बच्चे अपना अधिक से अधिक समय ऑन लाइन गेम खेलने और नेट सर्फिंग करने में व्यतित करते हैं। यह विडंबना है कि बच्चे वास्तविक जीवन में ,बाहर हिंसा तो देख ही रहे हैं और वरचुयल वर्ल्ड में भी हिंसक खेल ही देख रहे हैं। 

उन्हाेंने कहा,“परिवार के बदले स्वरूप के तहत लोगों में एक बच्चा रखने का फैशन बन गया है। ‘ वनली चाइल्ड इज द लॉनेली चाइल्ड ’ की धारणा बच्चे के सर्वांगीण विकास में बाधक है। बच्चे अपने भाई-बहनों से ही आपस में मेल से रहने और एक दूसरे को हर चीज में बराबर के भागीदार समझने की पाठ सिखते हैं। बच्चे घर में हम उम्र नहीं होने से अकेलापन महसूस करते हैं जो आगे जाकर अवसाद का करण बन सकता है। इसके अलावा तलाक के बढ़ते मामले और सिंगल पैरेंट के चलन से उपजी स्थिति के साथ बच्चे तालमेल नहीं बैठा पाते हैं और उनमें निराशा होने लगती है। यह स्थिति भी उन्हें अवसाद की ओर अग्रसर करने में अहम है।” 

प्रोफेसर सागर ने कहा कि रोजमर्रा के काम करने में अनिच्छा, थकावट,अनिद्रा,भ्रम की स्थिति, भूख नहीं लगना अथवा अधिक भूख लगना , सोचने की शक्ति में कमी एवं बेवजह दुखी होना आदि समेत अवसाद के कई लक्षण हैं। अगर इन में से कोई भी लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक रहता है तो तुरंत मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। समय से इलाज शुरू होने पर अवसाद से शीघ्र छुटकारा पाया जा सकता है और कभी -कभी इलाज लंबा भी चल सकता है।अवसाद के कारण आत्महत्या की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। एम्स में अवसाद के इलाज के लिए किशोरों के लिए अगल प्रकोष्ठ है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी वर्ष 2016 के मन की बात के कार्यक्रम में युवाओं में बढ़ती अवसाद की घटनाओं पर चिंता जाहिर की थी। श्री मोदी ने कहा था कि घर से दूर होस्टल में रहने वाले बच्चे ज्यादा अकेलापन महसूस करते हैं।

लाेकनीति -सीएसडीएस यूथ सर्वेक्षण में 30 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे अकेलापन महसूस करते हैं ।सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अनुसार देश की आबादी में 34 प्रतिशत से अधिक 15 से 34 वर्ष आयु के लोग हैं लेकिन यह बेहद दुखद है कि बड़ी संख्या में युवा अवसाद में देखे जा रहे हैं। शहरी आबादी के 37 प्रतिशत युवा अवसाद में हैं। 

प्रोफेसर सागर ने कहा ,“ समय की मांग है कि ,सामाज ,शिक्षिण संस्थान, गैर सरकारी संगठन एवं सरकार के स्तर पर युवा वर्ग को अवसाद के दलदल से बचाने के लिए कदम उठाया जाये। समय आ गया है कि सामाजिक चिंतक और सरकार ‘डिजिटल वर्ल्ड ’ के युवाओं को अवसाद में जाने से रोकने के लिए गंभीरता से विचार करें।

 (वार्ता)

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