श्रीमद भगवद गीता के अनुसार, आत्मा का अनुभव होने तक जो दशा रहती है, वह स्थितप्रज्ञ दशा कहलाती है!

स्थित प्रज्ञ भक्त

सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने कृपा की और हमें ज्ञान की नजर बख्श कर भक्ति का मर्म समझाया। पावन अवतार बाणी में भक्ति की पहली सीढ़ी ’’रब नू पाना भक्ति ए’’ निरंकार को अंग संग जानकर, हर पल इसका सानिध्य पाकर इंन्द्रियाॅं जो भी कर्म करें वह हर कर्म भक्तिमय हो जाएगा। सत्गुरु ने हमें समझाया।

स्थित प्रज्ञ भक्त की यही विशेषता है वह खाता हुआ, पीता हुआ, उठता हुआ, सोता हुआ, त्याग्ता हुआ परमात्मा में ही अपने को देखता है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा मुझे स्थित प्रज्ञ भक्त विशेष प्यारा है। तो अर्जुन बोलेः-

स्थित-प्रज्ञस्य का भाषा समाधि-स्थस्य केशव ।
स्थित-धीः किम् प्रभाषेत किम् आसीत व्रजेत किम् ॥
2-54

हेे केशव! अध्यात्म में लीन चेतना वाले व्यक्ति स्थित प्रज्ञ के क्या लक्षण हैं। वह कैसे बोलता है! तथा उसकी भाषा क्या है? वह किस तरह बैठता और चलता है? आज हम कह सकते हैंः-

उठना बैना खाना पीना, सब सिखाया मुरशद ने।
जिसनूं पीके अमर हो गया, जाम पिलाया मुरशद ने।।

सत्गुरु हमें कदम-कदम पर समझा रहे हैं कि अध्यात्म में लीन रहकर दुनिया में कैसे विचरना है। गीता के दूसरे अध्याय के 56 वें एवं 57 वें श्लोक में श्री कृष्ण जी ने बताया जो व्यक्ति शुभ एवं सुख की प्राप्ति में हर्षित नहीं होता, जो आसक्ति, भय, क्रोध से मुक्त है और न ही अशुम को प्राप्त होने पर उससे घृणा करता है वह पूर्ण ज्ञान में स्थिर मनवाला मुनि कहलाता है।

धार्मिक ग्रंथों में स्पष्ट विदित है कि चार प्रकार के भक्तों में ज्ञानी भक्त की भक्ति, जो परमात्मा को जानकर निष्काम भक्ति करता है, प्रभु को वह भक्त बहुत प्यारा है। रामचरितमानस में लिखा हैः-

भगति हीन बिरंचि किन होई।
सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई॥
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी।
मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥ 85/5

भक्ति विहीन ब्रह्मा ही क्यों न हो, वे भी मुझे और सब जीवों के बराबर ही प्रिय है, किन्तु भक्तिवंत अत्यन्त नीच प्राणी भी अगर है तो मुझे प्राणों से भी प्यारा है। परमात्मा को केवल भक्ति से ही रिझाया जा सकता है। गीता में भी श्री कृष्ण जी ने 7वें अध्याय के 16वें एवं 17वें श्लोक में कहा है कि मेरे चार प्रकार के भक्त हैं। आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी। इनमें ज्ञानी भक्त की निरंतर एकनिष्ठ भक्ति विशेष है वह ज्ञानी भक्त मुझे अति प्यारा है।
सत्गुरु ने कृपा की, ज्ञान की नजर बख्शी, अब यही अरदास है दातार भक्ति का दान भी हमें बख्शना, ज्ञान और भक्ति दोनों का अंतर रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड के 114/6 श्लोक में बताया।

ग्यानहि भगतिहि अंतर केता।
सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता॥

प्रभु कृपा करके कहें ग्यान और भक्ति में क्या अंतर है? 114/7वें श्लोक बतायाः-

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा।
उभय हरहिं भव संभव खेदा॥

ज्ञान और भक्ति में कोई भेद नहीं है दोनों ही संसार में उत्पन्न क्लेशों को हराने वाले हैं। किन्तु फिर भी भक्ति का महत्व 44/2 में व्यक्त किया कि ज्ञानी भी अगर भक्ति रहित है तो वो भी मुझे प्रिय नहीं। ग्यानी होना ही पूर्ण होता तो उद्धव जी को भक्ति का मर्म जानने के लिए बज्र की गोपियों के पास प्रभु को भेजना न पड़ता। जिसके हृदय में भक्ति बस जाती है उसे स्वप्न में भी लेशमात्र भी दुख नहीं होता। वे चतुर प्राणी हैं जो भक्ति रूपी मणि के लिए यत्न करते हैं।
सत्गुरु माता जी का लाख-लाख शुकराना इन्होंने हमें चुना सहज में ही ज्ञान दिया और भक्ति का सलीका समझा रहे हैं। राम चन्द्र जी काकभशुंडि से प्रसन्न होकर वर मांगने के लिए कह रहे हैं। मैं तुम्हें ज्ञान, विवके, वैराग्य, विज्ञान और अनेकों गुण जो तुम्हे भावे मांग लो। प्रभु के वचन सुनकर वह अनुमान करने लगे कि प्रभु सब सुख दे रहे हैं, भक्ति देने की बात नहीं की, उसने प्रार्थना की

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे।
लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥
भजन हीन सुख कवने काजा।
अस बिचारि बोलेउँ खगराजा॥

कृपा निधान आप कृपा करके हमें भक्ति का दान बख्श दो। भक्ति के बिना बाकि सुखों की कामना व्यर्थ है।

आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान॥

सत्गुरु हमारी कदम-कदम पर सम्माल कर रहे हैं। भक्ति में दृढ़ता प्रदान करने के लिए संत समागम देकर जीवन को दिशा दिखा रहे हैं।

                                                           चंपा भाटिया,रांची
                                                            9334424508

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