Amazing Tradition in India : अद्भुत है भारत की संस्कृति, जहां भगवान शिव के विवाह की रस्में मो. काजिम की शहनाई की धुन पर होती हैं पूरी

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आस्थाओं की भिन्नता, मो. काजिम हुसैन की शहनाई प्यार के मोतियों की माला में पिरोती हैं

झारखण्ड/दुमका। अद्भुत है हमारे देश की संस्कृति, जहां न उम्र की पाबंदी और न ही धर्म का बंधक रोक पाता है एक मुस्लिम आस्था के शहनाई वादक मो. काजिम हुसैन को, जो सारे भेद-भाव को भूलकर पिछले 27 वर्षों से हिंदू संस्कृति में शामिल होते आ रहे हैं और अपने शहनाई की धुन से लोगों को भक्तिमय बना देते हैं। जिसमें गंगा-जमुनी तहजीब की झलक देखने को मिलती है।

मो. काजिम हर वर्ष महाशिवरात्रि में शहनाई बजाने बनारस से दुमका के बासुकीनाथ बिना शुल्क के पहुंचते हैं। मो. काजिम हुसैन दुमका के बासुकीनाथ स्थित मंदिर में शहनाई वादन करना अपना सौभाग्य मानते हैं।

भगवान शिव के माता पार्वती से विवाह की सारी रस्में गुरूवार की रात 80 साल के वाराणसी के इस फनकार और उसके शागिर्दों की छेड़ी गई शहनाई की धुनों पर संपन्न हुई। काजिम बासुकीनाथ में हर वर्ष महाशिवरात्रि में शहनाई वादन करने आते हैं। करीब 27 साल से यह सिलसिला अनवरत चल रहा है। वे कहते हैं- मेरे बाद हमारे वारिस इस परंपरा को निभाएंगे। गुरूवार को जब उनकी शहनाई से संगीत की स्वर लहरी निकली, तो वहां मौजूद भक्त कला की अप्रतिम प्रस्तुति व भोले की भक्ति में डूब गए।

काजिम ने कहा- प्रभु का विवाह संपन्न कराने के बाद दूसरे दिन घूंघट व अन्य रस्मों पर भी हम शहनाई बजाते हैं। हम तो कला के माध्यम से भक्ति के साथ-साथ सामाजिक समरसता एवं भाईचारे का संदेश देते हैं। कहा कि उनके साथ परिवार के जाबिर हुसैन, ताहिर हुसैन, शमशेर अब्बास, शाहिद अब्बास तबला, हारमोनियम, झांझ व तानपुरा पर संगत करते हैं। इन फनकारों के कला कौशल के बीच ही सारे मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं।

काजिम कहते हैं- यहां शहनाई वादन से जो शांति और सुकून मिलता है। उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकते। बेशक शहनाई वादन हमारा पुश्तैनी धंधा है। मगर यहां पैसा कमाने के मकसद से नहीं आते। बाबा की भक्ति उन्हें उम्र के इस दौर में भी यहां खींच लाती है। हर वर्ष इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता है। उनके बाद पुत्र, भतीजे व अन्य वारिस इस परंपरा को आगे बढाएंगे। बाबा दरबार के गुंबद पर लहराते ध्वज को देख मुस्कुरा कर कहते हैं- उनकी ही कृपा है, जो उम्र के इस दौर में भी यहां आ जाते हैं।

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