Bengal Election 2021: बंगाल चुनाव में 127 सीटों पर गेमचेंजर बना 23 प्रतिशत दलित वोट

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोट बैंक की बढ़-चढ़कर बात हो रही है। इस बार फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया है। वह कांग्रेस-लेफ्ट के अलायंस में अपनी पार्टी आईएसएफ के साथ साझीदार हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य में 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और माना जा रहा है कि उनके वोट निर्णायक भूमिका में हैं। हालांकि एक और बड़ा वोट बैंक है, जिसकी चर्चा कम होती है। हम बात कर रहे हैं एससी यानी अनुसूचित जाति की। मुस्लिमों के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा समुदाय है, जिस पर चुनावी दलों की नजरें टिकी हैं।

  • बंगाल में दलित वोट बैंक कितना

अनुसूचित जाति यानी दलित आबादी के मामले में बंगाल देश में तीसरे नंबर पर है। यहां 23.51 प्रतिशत दलित जनसंख्या है। राज्य में छोटे-बड़े कुल मिलाकर अनुसूचित जातियों के 60 समूह हैं। 9 जिलों में इनकी आबादी 25 प्रतिशत से ज्यादा है और 127 विधानसभा सीटों पर जीत-हार में इनका रुख अहम रहेगा। इसके अलावा 6 जिले ऐसे हैं, जहां की 78 विधानसभा सीटों पर 15 से 25 फीसदी दलित आबादी है।

  • बीजेपी के लिए कैसे गेमचेंजर बना दलित वोट

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 42 में से 18 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 68 में से 33 विधानसभा क्षेत्रों में उसे बढ़त मिली थी। इन 33 में से 26 विधानसभा मतुआ बहुल थीं। लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक टीएमसी को 34 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल हुई थी। इन आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि बीजेपी के पक्ष में दलित आबादी के बड़े हिस्से के वोट घूम गए। इन आंकड़ों की तुलना अगर 2016 विधानसभा चुनाव से करें तो उस वक्त टीएमसी 50 जबकि लेफ्ट 10 और कांग्रेस को 8 सीटों पर बढ़त मिली थी। हालांकि बीजेपी उस चुनाव में एक भी सीट पर बढ़त नहीं बना पाई थी। वहीं 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 37 सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं लेफ्ट को 20 और कांग्रेस को 10 सीटों पर जीत मिली थी। उस वक्त बीजेपी का कहीं नामोनिशान नहीं था।

  • बंगाल में नामशूद्र आबादी कितनी, बीजेपी की नजर

बंगाल की दलित आबादी में नामशूद्र समुदाय की तादाद 17.4 प्रतिशत है। 18.4 फीसदी आबादी वाले राजबंशी समुदाय के बाद नामशूद्र समुदाय राज्य में दूसरे नंबर पर है। नामशूद्र समूह में मतुआ समुदाय का सबसे बड़ा हिस्सा है। 1.5 करोड़ आबादी के साथ 42 विधानसभा सीटों पर मतुआ समाज की मौजूदगी है। बीजेपी इस वोट बैंक को पक्ष में करने के लिए पूरा जोर लगा रही है। अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने जोशेश्वरी काली मंदिर में दर्शन किए थे। मतुआ समुदाय के बीच इस मंदिर की काफी मान्यता है। उसी दौरान बंगाल में पहले चरण की वोटिंग हो रही थी। मतुआ समाज के आध्यात्मिक गुरु हरिचंद ठाकुर की जन्मस्थली ओराकांडी में भी पीएम गए थे।

  • मतुआ समुदाय का इतिहास क्या है

मतुआ समुदाय मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) का रहने वाला है। 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद बड़ी तादाद में मतुआ भारत विस्थापित हुए। हालांकि उनमें से एक बड़ी आबादी को अभी नागरिकता नहीं मिल पाई है। बीजेपी ने सीएए के जरिए दूसरे देशों से आए कुछ तबकों को भारतीय नागरिकता का वादा किया है। 2019 के चुनाव में मतुआ समाज के बीजेपी के प्रति झुकाव की एक बड़ी वजह यह भी रहा।

  • ममता बनर्जी का भी मतुआ समुदाय पर जोर

ममता बनर्जी भी इस वोट बैंक की ताकत अच्छी तरह समझती हैं। ममता सरकार ने नामशूद्रों के लिए डेवलपमेंट बोर्ड बनाए। इसके साथ ही उत्तर 24 परगना, नादिया, दक्षिण 24 परगना कोलकाता और कूचबिहार में फैली 244 रिफ्यूजी कॉलोनियों को नियमित किया गया। इस बार के चुनाव में टीएमसी ने 79 दलित कैंडिडेट खड़े किए हैं। यह राज्य में कुल सुरक्षित सीटों से 11 ज्यादा है।

  • कौन हैं हरिचंद ठाकुर जिनका मतुआ समुदाय पर असर

बांग्लादेश के ओराकांडी में 1812 में हरिचंद ठाकुर का एक दलित किसान परिवार में जन्म हुआ था। ठाकुर का परिवार वैष्णव था। वैष्णव हिंदुओं के एक नए मत का उनके परिवार ने आगाज किया, जिसे मतुआ नाम से जाना जाता है। इस संप्रदाय को नामशूद्र समुदाय के लोगों ने अपना लिया। उस वक्त नामशूद्रों को चांडाल कहा जाता था। ‘जगत माता’ के रूप में चर्चित शांति माता से हरिचंद ठाकुर का विवाह हुआ। उनके दो बच्चे थे। 1878 में बांग्लादेश के फरीदपुर में उनका निधन हो गया। बाद में उनके पुत्रों ने एक ब्रिटिश मिशनरी की मदद से चांडाल समुदाय को नामशूद्र के रूप में नई पहचान दिलाई।

  • बंगाल में राजबंशी दलित समुदाय क्यों महत्वपूर्ण

इस बार चुनाव से ठीक पहले ममता बनर्जी ने उत्तर बंगाल के राजबंशियों को ध्यान में रखते हुए नारायणी बटैलियन की स्थापना की। कूचबिहार के पूर्व राजपरिवार के नाम पर इसका नाम रखा गया है। वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव के ऐलान से पहले पैरा मिलिट्री फोर्स में नारायणी सेना सीएपीएफ बटैलियन का वादा किया। पश्चिम बंगाल में राजबंशी समुदाय का 54 विधानसभा सीटों पर अच्छा असर है। कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग के साथ ही मालदा और मुर्शिदाबाद में भी समुदाय की मौजूदगी है। कुर्मी, कामी और बागड़ी समुदाय के साथ-साथ ममता सरकार ने राजबंशी समुदाय के लिए अलग से डेवलपमेंट बोर्ड की स्थापना की है।

-Agency

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