Bengal Election Update: ममता की टीएमसी और भाजपा में सीधी टक्कर

रोशी की रिपोर्ट

पांच राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका है जिसमें बंगाल, आसम, तमिलनाडू, केरल और पुड्डुचेरी जैसे उत्तर एवं दक्षिण के राज्य हैं। वैसे तो सभी राज्य महत्वपूर्ण है और इनका योगदान अगले लोकसभा चुनाव में भी पुड्डुचेरी को छोड़कर केंद्र में सरकार बनाने में मायने रखता है।

समाचारों और विभिन्न स्त्रोतों से प्रतित होता है कि केंद्र की भाजपा सरकार एवं उसके कर्ताधर्ताओं का पूरा दम-खम बंगाल और असम में ही लगा हुआ है। भाजपा को पता है कि तमिलनाडू और केरल में उनकी संगठनात्मक स्थिति बहुत सुदृढ नहीं है। वहीं पुड्डुचेरी में आज की परिस्थिति में भाजपा मजबूत नजर आ रही है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पिछले दो चुनावों में सीपीएम और कांग्रेस को प्रचंड बहुमत से पछाड़कर सत्ता में काबिज है। ममता बनर्जी अपने लगातार संघर्ष से जहां मां, माटी, मानुष और लेकतंत्र बचाओ नारे के साथ बंगाल में पिछले 10 सालों से सत्तासीन है वहीं इस नारे पर भाजपा भी दावं खेल रही हैै। जानकार कहते हैं कि इस नारे में भी दरार आ गई है और इसका बड़ा हिस्सा खिसक कर भाजपा की तरफ जाता दिखाई दे रहा है।

ममता बनर्जी के मां, माटी, मानुष और लोकतंत्र

ममता बनर्जी के मां, माटी, मानुष और लोकतंत्र नारे का भाजपा पार्टी ने ममता पर पिछले 10 वर्षों के शासन में अति मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाते हुये फीका कर दिया और यह नारा बेमायने हो गया और भाजपा ने इसकी हवा निकाल दी।

दिलचस्प होगा पश्चिम बंगाल में चुनाव मुकाबला?

सवाल यह है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पुनः सत्ता पर काबिज हो पायेंगी या नहीं? बहुत सी अनकही बातों का बंगाल में राजनीतिक दलों के प्रचार से एक संशय का माहौल बना हुआ है और आम मतदाता का बड़ा हिस्सा कहीं-कहीं बिल्कुल मन बनाये हुये हैं जैसी खबरें देश भर में आ रही है लेकिन कुछ मूक मतदाता जिनके मत कहीं-कहीं निर्णायक भूमिका निभाते हैं वो ’’वेट एंड वाॅच’’ की स्थिति में हैं।

पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में मतदान होगा और 02 मई को नतीजे आयेंगे, जिसकी प्रतिक्षा की बेसब्री काफी फैली हुई है।

पश्चिम बंगाल में मतों के ध्रुवीकरण की चर्चा ने समाचार पत्रों में और आमजनों में विक्राल रूप ले लिया है। यहां कहना उचित होगा कि जहां एक तरफ पूरे बंगाल के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में 73 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं वहीं कुछ क्रिश्चिन जैसे अल्पसंख्यक मतदाताओं को मिलाकर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 27 प्रतिशत है। कुछ-कुछ विधानसभा क्षेत्रों में तो ये 40 और 50 प्रतिशत से भी उपर हैं।

भाजपा जय श्रीराम के नारे से पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरी है और उसकी मंशा है कि 73 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं को लुभा कर अपनी झोली में डाल लिया जाये। अगर ऐसा होता है तो भाजपा को पश्चिम बंगाल जहां 294 विधानसभा सीट हैं में सत्ता में काबिज होने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यह ममता की टीएमसी को मुश्किल में डाल देगी।

ममता की टीएमसी को पिछले दो चुनावों से मुस्लिम समुदाय एवं अन्य अल्पसंख्यकों का एक मुश्त मत प्राप्त होता रहा है जो ममता को सत्ता में काबिज होने का बड़ा कारण बनता रहा है, लेकिन इस चुनाव में परिस्थिति ने कुछ नया मोड़ ले लिया है और मुस्लिम समुदाय और अल्पसंख्यक के मतों में सेेंध लगाने के लिए मुस्लिम धर्मगुरु पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेक्युलर फ्रंटए लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन और ओवैसी की एआईएमआईएम भी मैदान में पूरे जोर-शोर से उतरी है। यदि ये पार्टियां मुस्लिम और अल्पसंख्यक मतदाताओं में कुछ प्रतिशत भी सेंध मार पायेंगी तो ममता के टीएमसी को भारी नुकसान पहुंचायेंगी। यदि यह परिस्थिति बनी तो ममता बंगाल की सत्ता से बेदखल हो जायेंगी।

चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं कार्यकर्ता और नेताओं की सक्रियता बढ़ती जा रही है। ममता की टीएमसी में बड़े-बड़े और स्थापित नेताओं की भगदड़ मची हुई है जिसे भाजपा अपनी झोली में समेट रही है, फिर भी ममता जरा भी अस्थिर और अडिग नहीं दिखाई देती यह उसकी एक बहादुरी का प्रतिक है।

भगोड़े नेताओं पर जनता की क्या प्रतिक्रिया होगी यह आने वाला चुनाव बतायेगा। झारखंड में रघुवर दास ने भी बहुत से भगोड़े नेताओं की टीम बनाई थी जो सब के सब धराशायी हो गये। क्या यह बंगाल में भी दोहराया जायेगा?

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