Bhagwan Mahavir : भगवान महावीर, अहिंसा और सत्य के महानायक

  • उस विराट सत्ता का अंश है मनुष्य

भारत और विश्व के अन्य भूभागों पर समय-समय पर अनेक दार्शनिक, अध्यात्मवेत्ता और आत्म मनीषी हुए हैं। जीवन और जगत, आत्मा और परमात्मा के विषय में उनका विशद चिंतन मानव की अमूल्य धरोहर है। उन द्वारा अनुभूत चिंतन-सूत्र आज भी मानव को रोशनी का प्रसाद दे रहे हैं। अध्यात्मदर्शियों की परम्परा में तीर्थंकर महावीर विशिष्ट और उच्च स्थान रखते हैं। उनके द्वारा अनुभव किए गए और कहे गए सत्य सूत्र ऐसे हैं, जिनका अनुसरण कर मनुष्य इस सृष्टि को ही स्वर्ग बना सकता है। तीर्थंकर महावीर का एक वचन है-एगे आया! यानी आत्मा एक है।

किसी पुस्तक या धर्मग्रंथ से पढ़कर या किसी सिद्ध-साधक से सुनकर महावीर ने एक बात नहीं कही। साढ़े बारह वर्षों तक एकांत शांत वनों में ध्यान और तप की साधना द्वारा उन्होंने आत्मा से साक्षात्कार किया। आत्म-साक्षात्कार से उन्होंने अनुभव किया और जाना कि जो आत्मतत्त्व मेरे भीतर विद्यमान है, वही आत्मतत्त्व प्रत्येक प्राणी के भीतर भी अस्तित्वमान है। आत्मा के बल पर और आत्मानुभूति के बल पर कहीं किंचित भी भिन्नता नहीं है।

सामान्य लोगों के मन में प्रश्न उत्पन्न हो सकता है कि इस विराट विश्व में अरबों मनुष्य निवास करते हैं। अरबों-खरबों की संख्या में पशु-जगत है। कीट-कीटाणुओं की संख्या का तो पारावार ही नहीं है। फिर ‘एगे आया’ यानी आत्मा एक है-इस सूत्र को सच कैसे माना जा सकता है? इस प्रश्न का समाधान है-सत्ता की दृष्टी से आत्माएं भले ही भिन्न-भिन्न हैं, परंतु ज्ञान और चैतन्य की दृष्टि से सभी आत्माएं एक हैं, तुल्य हैं, अभिन्न हैं। भिन्न-भिन्न लोगों में ज्ञान की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है, परंतु ज्ञान-शून्य कोई आत्मा नहीं है। चेतना का विस्तार और विकास भी भिन्न-भिन्न आत्माओं में न्यून या अधिक हो सकता है, पर चैतन्य का अस्तित्व प्रत्येक आत्मा में है। वस्तुतः ज्ञान और चैतन्य के अस्तित्व से ही आत्मा, आत्मा है। अन्यथा वह अनात्मा है, जड़ है!

‘आत्मा एक है’ इस सच्चाई को अनुभव करने वाला व्यक्ति समस्त द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है। वह राग और द्वेष, ‘स्व’ और ‘पर’, अपने और पराये के भेद से ऊपर उठ जाता है। उसके जीवन से सभी विवाद खो जाते हैं। ईर्ष्या-द्वेष, लोभ और अहंकार हमेशा के लिए विदा हो जाते हैं। पूरी सृष्टि में, समस्त जीव जगत में उसे अपनी ही आत्मा के दर्शन होते हैं।

आज परिवार, समाज, प्रांत, देश और विश्व को देखें, तो हर जगह संघर्ष दिखाई देता है। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ है। न्याय-अन्याय, नीति-अनीति, धर्म-अधर्म के प्रश्न गौण हो गए हैं।

यह सब क्यों है? वस्तुतः क्षुद्र-लक्ष्यों में जीवन के ध्येय तलाशना ही मूढ़ता है। जीवन अमूल्य है। मूढ़ मानव ही क्षुद्र-लक्ष्यों के लिए जीवन को नष्ट करते हैं।

एगे आया! आत्मा एक है। जो तू है, वहीं मैं हूं। जो मैं हूूं, वही तू है। मुझे कांटा चुभता है, तो मुझे पीड़ा होती है। तुझे कांटा चुभता है, तो तुझे भी पीड़ा होती है। मुझे सुख प्रिय है। तुझे भी सुख प्रिय है। हरेक को सुख प्रिय है। हरेक को दुख अप्रिय है। फिर दूसरों के मार्ग में कांटे बिछाना, बुद्धिमानी कैसे हो सकता है। किसी के मार्ग में कांटे बिछाना, स्वयं अपने मार्ग में कांटे बिछाना, स्वयं अपने मार्ग में कांटे बिछाना है। तीर्थंकर महावीर ने कहा-जिसे तू मारना चाहता है, वह तू ही है।

जिसे तू पराजित करना चाहता है, वह तू ही है। मनुष्य की महत्ता इसी में है कि वह सभी का भला करे। सभी को सुख बांटे। किसी के आंसू पोंछकर मुस्कराने का अवसर उपलब्ध कराए, क्योंकि मनुष्य जो करता है, वही लौटकर उसे उपलब्ध होता है। मार्ग पर कोई अनजान व्यक्ति मिले, यदि मुस्कान के साथ आप उसका आदर करते हैं, तो उस अपरिचित व्यक्ति के मन-मानस में भी स्नेह और सम्मान के पुष्प खिल जाते हैं। कितना सहज-सरल सूत्र है समष्टि को अपना बना लेने का! ‘द्वैत’ से द्वेष उत्पन्न होता है। दूरियां निर्मित होती है। अद्वैत से प्रेम के प्रसून खिलते हैं। दूरियां खो जाती हैं। सम्प्रदायों, जातियों और भाषाओं के द्वंद्व खो जाते हैं।

‘एकोऽहं द्वितीयोनास्ति।’

अध्यात्म का यह सर्वश्रेष्ठ वचन है। जातियां, सम्प्रदाय, भाषाएं, ये सभी व्यवस्थागत हैं। इन्हें इतना ही मूल्य मिलना चाहिए। ‘मानव’ एक विराट सत्ता का अंग है। समय की धारा को बदलने की उसमें क्षमता है। उस क्षमता का विकास होना चाहिए। तीर्थंकर महावीर और अन्य अध्यात्मवेताओं के वचन अमूल्य हैं। अनुभूत सच्चाइयां है। मानव को उनसे प्रकाश की प्रेरणा लेनी चाहिए।

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