Bihar Assembly Election : एनडीए और यूपीए में होगा सीधा मुकाबला

  • नवगठित छोटे-छोटे मोर्चों को नाममात्र के मतों और सीटों से संतोष करना पड़ेगा

Insight Online News Team

पटना। अंततः बिहार विधानसभा का चुनाव 243 सीटों के लिए तीन चरणों में 1 अक्टूबर से प्रारंभ हो गया और इसके नतीजे 10 नवंबर को घोषित किये जायेंगे जबकि 29 नवंबर को वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। ये सारी प्रक्रिया 29 नवंबर से पहले पूरी कर ली जायेगी।

अटकलों के बीच जहां दो बड़े गठबंधन एनडीए और यूपीए चुनाव मैदान में नजर आयेंगे वहीं कई नवगठित छोटे मोर्चे भी अपनी किस्मत अजमाने की पुरजोर कोशिश में हैं। नवगठित छोटे मोर्चे एनडीए और यूपीए गठबंधन के असंतुष्ट नेताओं का खेमा है और इन मोर्चो का जनाधार वर्तमान परिस्थिति में उनकी जातीय समीकरण पर कितना कारगार होगा यह कहना मुश्किल है। नवगठित छोटे मोर्चे एनडीए और यूपीए दोनों के वोट बैंक में कुछ सेंध तो मारने में कामयाब होंगे पर बहुत अधिक नुकसान पहुँचाने की स्थिति में नहीं दिखते हैं।

बिहार के जागरूक मतदाताओं का मानना है कि 2020 के इस बिहार विधानसभा के चुनावी महासमर में सीधा मुकाबला यूपीए और एनडीए में ही लगभग होता दिख रहा है। अन्य छोटे दलों और मोर्चो में जागरूक मतदाताओं द्वारा जातीय समीकरण के बावजूद मत डालना संदिग्ध नजर आता है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में गठबंधन में बड़ा फेरबदल हुआ है और एनडीए के प्रमुख दल हैं भाजपा, जदयू तथा लोजपा वहीं यूपीए में प्रमुख दल हैं कांग्रेस, राजद एवं वामपंथी। 2015 में जदयू यूपीए के साथ था और 2020 में जदयू पुनः भाजपा से गठजोड़ कर एनडीए के साथ शामिल हो गया। बिहार के पिछले दो चुनाव में गठबंधन के समीकरण साफ दर्शाते हैं कि जदयू जिस गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में आता है वही गठबंधन पुर्ण बहुमत प्राप्त करता है। इसलिए राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जदयू जो वर्तमान में भाजपा के साथ एनडीए गठबंधन में है उनको बहुमत प्राप्त होगा यह सारे विषलेश्न और पूर्व के चुनावी आंकड़े बताते हैं। लोजपा की एनडीए गठबंधन से अलग होने की चर्चा है पर उसके 2015 और 2009 के मत प्रतिशत बताते हैं कि वो भाजपा, जदयू गठबंधन को कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

जहां एक ओर नीतीश कुमार एक बड़ा चेहरा एनडीए के पास है वहीं यूपीए में बड़े चेहरे का आभाव है। सीवोटर और एवीपी सर्वे भी बताते हैं कि भाजपा को पुनः बिहार में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का लाभ मिलेगा। इन दो बड़े चहरों के बीच यूपीए के चेरहे बहुत बौने नजर आते हैं क्या ऐसी परिस्थिति में यूपीए के पक्ष में कुछ करिश्मा होगा?

मीडिया में अलग-अलग ढंग से चुनाव की तस्वीरें पेश की जा रही है लेकिन देश में अलग-अलग प्रांतों में हुए विधानसभा के चुनाव में देखा गया है कि सीधा मुकाबला यूपीए और एनडीए के बीच में ही सीमित रह गया है चाहे वो मध्य प्रदेश हो, या राजस्थान हो या गुजरात हो अथवा झारखंड हो जहां हाल में चुनाव हुये।
नवगठित छोटे-छोटे मोर्चों को नाममात्र के मतों और सीटों से संतोष करना पड़ेगा ऐसा राजनीतिक विशलेषण दर्शाते हैं क्योंकि यही दशा देश के अन्य प्रांतों में लगभग रही है।

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