Bihar by-election caste equation did not work : बिहार के दो उपचुनाव, समीकरण की राजनीति फिर हारी

उपेन्द्र प्रसाद

समीकरण की राजनीति पर उनकी अटूट आस्था है। मुस्लिम-यादव समीकरण की हार के बाद वे कभी मुस्लिम-यादव-राजपूत समीकरण बैठाते हैं, तो कभी मुस्लिम-यादव-राजपूत-पासवान समीकरण बैठाते हैं। लेकिन समीकरण उनको कभी नहीं जीतने देता। इस बार उन्होंने एक नया समीकरण अपनाया, लेकिन वह भी कुछ काम नहीं आया। इससे बेहतर तो पिछला विधानसभा चुनाव था, जिसमें लालू अनुपस्थित थे और उनके बेटे ने किसी समीकरण का महिमागान नहीं किया था।

बिहार के दो विधानसभा क्षेत्रों में हुए उपचुनावों के नतीजों से लालू यादव की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने की आकांक्षा को ध्वस्त कर दिया है। बहुत दिनों तक जेल में रहने और जेल से बाहर आकर स्वास्थ्य लाभ करने के बाद लालू यादव राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाह रहे थे। उनका राष्ट्रीय जनता दल बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है। दोनों उपचुनावों को जीतने के बाद राजद और उसके सुप्रीमो की प्रासंगिकता और भी केन्द्रीय राजनीति के लिए बढ़ जाती, इसलिए उन्होंनेे दोनों चुनाव जीतने के सपने पाल रखे थे और कांग्रेस से गठबंधन तोड़ने देने का खतरा लेकर भी उन्होंने दोनों सीटों से अपने उम्मीदवार उतार डाले। उन्हें लगा कि जातीय समीकरण की राजनीति कर दोनों सीटों से अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित कर देंगे।

कुशेश्वरस्थान विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। वहां से जदयू के विधायक पासवान जाति के थे, जिन्होंने कांग्रेस की रविदास जाति के उम्मीदवार को 7000  मतों से 2020 में हुए विधानसभा के आमचुनाव में हरा दिया था। तब कांग्रेस के उम्मीदवार को लालू का समर्थन मिल रहा  था।  इस उपचुनाव में लालू ने अपनी पार्टी से मुसहर उम्मीदवार खड़ा कर दिया। उनका आकलन था कि रविदास मतदाता कांग्रेस उम्मीदवार को वोट डालेंगे, पासवान मतदाताओं के मत जदयू और चिराग पासवान के उम्मीदवारों के बीच बंट जाएंगे और उनका उम्मीदवार मुसहर, यादव और मुस्लिम मतदाताओं के मत प्राप्त कर जीत जाएंगे। इसी समीकरण के भरोसे वे कुशेश्वरस्थान का चुनाव जीतना चाहते थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा भी कि उनका मतदाता अपनी मुसहर जाति और यादव-मुस्लिम का मत पाकर जीत जाएगा।

यह समीकरण लालू के काम नहीं आया। उनका उम्मीदवार साढ़े 12 हजार मतों से भी ज्यादा वोट से हारा। पिछली बार उनका समर्थक उम्मीदवार करीब 7 हजार वोटों से हारा था। जाहिर है इस बार उनकी हार कुछ ज्यादा बड़ी थी। बड़ी बात यह थी कि राजद, कांग्रेस और चिराग के लोजपा के उम्मीदवारों के सम्मिलित मतों से भी ज्यादा मत जदयू के उम्मीदवार को प्राप्त हुए और कुशेश्वरस्थान पर जीत का झंडा फहराने का लालू का सपना सपना ही रह गया।

कुशेश्वरस्थान की तरह ही तारापुर में भी लालू यादव ने जातीय समीकरण के द्वारा चुनाव जीतने की कोशिश की। उस चुनाव क्षेत्र में कोयरियों और यादवों की आबादी लगभग समान है। 2020 के विधानसभा चुनाव में लालू का यादव उम्मीदवार चुनाव हार गया था। वहां पिछले कई चुनावों से कोयरी उम्मीदवार ही जीतते हैं, क्योंकि उस जाति के उम्मीदवार को अन्य जातियों के मतदाताओं के वोट आसानी से मिल जाते हैं, जबकि यादव उम्मीदवार को अन्य जातियों के वोट आसानी से नहीं मिलते। उन्हें ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम मतदाताओं के वोट मिल पाते हैं।

इस उपचुनाव में लालू ने एक सूंड़ी जाति के उम्मीदवार को टिकट दे दिया। सूंड़ी व्यापारिक जातियों से बने वैश्य समुदाय का हिस्सा है। वैश्य समुदाय की सभी जातियों का सम्मिलित मत यादव और कोयरी मतदाताओं के बराबर ही होगा। लालू यादव को लगा कि उनका वैश्य उम्मीदवार अपने वैश्य समुदाय के मतों को हासिल कर लेगा और उनका अपना मुस्लिम-यादव जनाधार मिलकर उसकी भारी जीत सुनिश्चित कर देगा।

मुस्लिम-यादव-वैश्य समीकरण की अजेयता को लेकर लालू यादव बहुत आश्वस्त थे और उन्होंने अपने आपको पूरी तरह आश्वस्त कर रखा था कि उनका उम्मीदवार अजय कुमार साह की जीत सुनिश्चित है और उनकी हार की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं है। मतगणना के शुरुआती चरणों में लालू अपनी उम्मीद पर खरे उतरते दिख रहे थे। 18 चरणों की मतगणना तक उनका उम्मीदवार आगे चल रहा था, लेकिन 19वें चक्र की मतगणना के बाद वह पिछड़ गया और पिछड़ता चला गया। अंत में लालू के उम्मीदवार की वहां भी हार हो गई।

इस तरह लालू यादव का तारापुर जीतने का सपना भी सच नहीं हो पाया। वहां भी समीकरण की हार हुई। लालू यादव की समस्या यह है कि वे जातीय और सांप्रदायिक समीकरणों पर बहुत ज्यादा जोर देते हैं। वे किसी समीकरण पर सवार होकर 1990 में मुख्यमंत्री नहीं बने थे। तब जनता दल की जीत हुई थी, जिसके नेता वीपी सिंह और देवीलाल थे। जनता दल की जीत कोई जातीय समीकरण की जीत नहीं थी। फिर 1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव हुए, जिसमें लालू के नेतृत्व वाले जनता दल और सहयोगी दलों को अविभाजित बिहार की कुल 54 में से 48 सीटों पर जीत हुई। यह लालू की राजनीति का चरम उत्कर्ष था। यह जीत भी किसी समीकरण का फल नहीं था। वीपी सिंह को फिर से प्रधानमंत्री बनाने के लिए बिहार के मतदाता मतदान कर रहे थे, जिसमें आरक्षण विरोधी तबके के सभी लोग शामिल थे।

लेकिन उस जीत के बाद लालू के ऊपर समीकरण की सनक सवार हुई। किसी ने उन्हें पढ़ा दिया मुस्लिम-यादव समीकरण अजेय है। फि र वे उसी समीकरण के दीवाने हो गए। इसके कारण ओबीसी की गैर यादव जातियों के लोग उनसे धीरे-धीरे अलग होने लगे। लाचारी में कुछ चुनावों में उन्होंने लालू यादव के दल को वोट भी दिए, लेकिन बाद में वे भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार के दल की ओर उन्मुख होने लगे। नीतीश कुमार लालू से बड़े ओबीसी नेता हो गए. पर जो वणिक ओबीसी जातियां थीं, वे भाजपा की ओर ज्यादातर मुखातिब हो गई। एक ऐसी सामाजिक- राजनैतिक स्थिति तैयार हो गई, जिसमें नीतीश के नेतृत्व में जदयू और भाजपा का गठबंधन अपराजेय हो गया। फिर लालू एक के बाद एक चुनाव हारते रहे। 2015 में उनका नीतीश से गठबंधन हुआ और यादव-गैर यादव ओबीसी  एकता हो गई, जिसने 1991 की जीत की पुनरावृति कर दी। नीतीश से जुड़कर लालू को नया राजनैतिक जीवन मिला। वरना, वे खुद, उनकी पत्नी और बेटी भी चुनावी हार का सामना करने लगे थे।

लेकिन लालू ने अपनी हारों से कुछ नहीं सीखा है। समीकरण की राजनीति पर उनकी अटूट आस्था है। मुस्लिम-यादव समीकरण की हार के बाद वे कभी मुस्लिम-यादव-राजपूत समीकरण बैठाते हैं, तो कभी मुस्लिम-यादव-राजपूत-पासवान समीकरण बैठाते हैं। लेकिन समीकरण उनको कभी नहीं जीतने देता। इस बार उन्होंने एक नया समीकरण अपनाया, लेकिन वह भी कुछ काम नहीं आया। इससे बेहतर तो पिछला विधानसभा चुनाव था, जिसमें लालू अनुपस्थित थे और उनके बेटे ने किसी समीकरण का महिमागान नहीं किया था।

साभार : देशबन्धु

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