BJP : चौतरफा बजा भाजपा का डंका

प्रमोद भार्गव

बिहार और मध्य प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान ऐसा लग रहा था कि बिहार में सत्ता विरोधी लहर है और मध्य प्रदेश की जनता बिकाऊ के मुद्दे पर शिवराज और सिंधिया को सबक सिखाने के मूड में है। मतदान बाद आए चुनावी सर्वेक्षण भी इन्हीं अटकलों की पुष्टि कर रहे थे। लेकिन परिणामों ने सब अटकलों पर विराम लगाते हुए देश को जता दिया कि फिलहाल भाजपा पर ही भरोसा किया जाना देशहित में है। मतदाता की इसी राष्ट्रीय सोच के चलते राजग ने बिहार में जीत का परचम फहराया, बल्कि मध्य प्रदेश समेत गुजरात, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, मणिपुर और कर्नाटक में भी जीत का डंका बजा दिया। हालांकि हरियाणा, छत्तीसगढ़, ओडीसा और नागालैंड में उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा।

इन परिणामों से यह साबित हुआ कि आमसभाओं में उमड़ी भीड़ देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि विजय किसके खाते में जा रही है। तेजस्वी यादव और कमलनाथ की सभाओं में बहुत भीड़ उमड़ी थी, लेकिन वोट में नहीं बदली। हालांकि ज्यादातर भाजपा के पक्ष में रहे इन देशव्यापी परिणामों के पीछे उसकी कुशल रणनीति और जी तोड़ मेहनत रही है। इसलिए इतने बड़े फेरबदल का नजदीकी से अंदाजा न तो राजनीतिक दल और विश्लेषक लगा पाए और न ही चुनावी सर्वेक्षण। इन नतीजों से यह भी तय हुआ कि कोरोना संकट में झेले दंश को जनता ने प्राकृतिक आपदा मानते हुए सत्तारूढ़ दलों को दोषी नहीं माना।

भाजपा की बड़ी खूबी है कि वह किसी भी चुनाव में जीत आसान नहीं मानती। इसलिए प्रत्येक चुनाव रणनीति और संसाधनों के साथ लड़ती है। कठिन परिश्रम भी करती है। इसलिए परिणाम उसके पक्ष में जाते हैं। हारे हुए दल जीत का ठीकरा वोटिंग मशीनों या फिर मुस्लिम विरोधी जनमत बना लेना मानते हैं। जबकि हर दल को अपनी पार्टी के एजेंडे के अनुरूप रणनीति बनाने का संवैधानिक अधिकार है। बिहार में तेजस्वी का जो महागठबंधन मैदान में था उसकी रणनीति में भी मुस्लिम तुष्टिकरण समाविष्ट था। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस महागठबंधन की भागीदार थी। लेकिन अपने हिस्से में 243 में 70 सीटें लेने के बावजूद वह उम्मीद के मुताबिक जीत दर्ज नहीं करा पाई। 9.4 प्रतिशत वोट हासिल कर कांग्रेस बमुश्किल चार सीटें हीं जीत पाई। इतनी बडी पार्टी का यह हश्र देखकर सवाल उठता है कि यदि कांग्रेस की सीटें कम कर दी जातीं तो उसका लाभ राजद को मिलता।

यह पहली बार नहीं है, कांग्रेस का बिहार में प्रदर्शन लगातार खराब हो रहा है। बावजूद कांग्रेस अपने गिरेबान में झांकना नहीं चाहती। कांग्रेस की इस दुर्गति का कारण बिहार में पार्टी का कोई बड़ा चेहरा मतदाताओं के सामने नहीं होना भी है। सोनिया, राहुल और प्रियंका में से किसी ने भी बिहार में प्रचार करना मुनासिब नहीं समझा। इस कारण समूचे राज्य में कांग्रेस ज्यादातर सीटों पर सीधे मुकाबले में पीछे रही। इसका एक कारण यह भी रहा कि कांग्रेस के पास मजबूत, स्वच्छ व जुझारू छवि वाले 70 प्रत्याशी तलाशने में भी दिक्कत आई। इसकी एक वजह कांग्रेस के अखिल भारतीय व राज्य स्तर पर संगठन का कमजोर होना भी रहा। कांग्रेस ने स्वयं को नहीं संभाला तो अगले चुनावों में उसे गठबंधनों में भागीदारी में भी कठिनाई आएगी।

इसके उलट जो वामपंथी दल अस्तित्व के संकट से जूझ रहे थे उन्होंने महागठबंधन का हिस्सा बनकर पुर्नजीवन प्राप्त कर लिया है। जबकि ढाई दशक से वामपंथियों की हालत पतली थी। महागठबंधन को जो 111 सीटें मिली हैं, उनमें 19 वामपंथियों की हैं। 1995 में वामपंथी विधायकों की बिहार विधानसभा में संख्या 35 थी। उसके बाद अब उनके दिन बदले हैं। अब भाकपा और माकपा को न केवल बिहार में राजनैतिक जमीन के विस्तार में सुविधा होगी, बल्कि पश्चिम बंगाल में भी इन्हें प्रोत्साहन मिलेगा। दरअसल इस चुनाव से पहले तक ये दल बिखरे हुए थे। इसबार तेजस्वी की अगुआई में संजीवनी मिल गई है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में बने रहने के लिए यदि ये दल वर्ग संघर्ष से जुड़ी परंपरागत लडाई में बदलाव नहीं लाते हैं तो इनकी यह जमीन फिर खिसक सकती है। क्योंकि अब देश अलगाववादियों और मुस्लिम तुष्टिकरण जैसी कुटिल राजनीति को पसंद नहीं करता।

महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने का काम औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी किया है। सीमांचल की पांच सीटों पर इस पार्टी ने विजय प्राप्त की है। ये वह सीटें हैं जो राजद और कांग्रेस की परंपरागत सीटें रही हैं। दरअसल बिहार में कुल 32 सीटें ऐसी हैं जिनपर मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है। 2015 में इन सीटों में से 7 भाजपा, 8 जदयू, 8 कांग्रेस और राजद ने 7 सीटें जती थीं। इसबार औवेसी के गठबंधन में शामिल बसपा भी एक सीट जीतने में सफल रही है। मायावती के औवेसी जैसे कटृटर चरमपंथी के साथ आने से लगता है, उनका जातीय जनाधार लगातार खिसक रहा है।

2019 के लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में भाजपा को न केवल बड़ी सफलता मिली बल्कि गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बनने का अवसर भी मिल गया है। अब अगले छह माह के भीतर होने वाले पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडू विधानसभा चुनाव में भाजपा अपने काम, मोदी के नाम, राष्ट्रवाद, राम मंदिर और वैश्विक दुनिया में भारत की बढ़ती अहमियत के बूते प्रचार करेगी। यानि उसके पास मतदाता को लुभाने के ठोस आधार हैं। साथ ही भाजपा छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन भी करेगी। ऐसा उसने बिहार में ‘विकासशील इंसान पार्टी’ के साथ करके अच्छे परिणाम हासिल किए हैं। भाजपा की यह रणनीति उसे अहिंदी राज्यों में जीत का पर्याय बन सकती है।

वैसे, बिहार में भाजपा नीतीेश कुमार को आगे करके चुनावी संग्राम में उतरी जरूर थी, लेकिन जुदा रणनीति अपनाने में भी उसने कोई संकोच नहीं किया। यही वजह थी कि चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी राजग का हिस्सा रहने के बावजूद बिहार में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ी। जाहिर है, चिराग ने ‘एकला चलो रे’ की नीति अपनाकर भाजपा को दोहरा लाभ पहुंचाया। इसी कारण भाजपा ने 74 सीटें जीती। नीतीश से नाराज पिछड़े, दलित और महादलित मतदाता चिराग के साथ हो लिए। चिराग ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार मैदान में न उतारे होते तो जदयू सीटें जीतने वाली सबसे बड़ी पार्टी होती। इसी शिकस्त के चलते विराग खुद को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हनुमान कह रहे हैं। लोजपा ने 5.63 मत प्राप्त करके जदयू और राजद दोनों को ही हानि पहुंचाकर भाजपा को बिहार में बड़ी ताकत बना दिया है। बहरहाल भाजपा जिस तरह की ठोस रणनीति बनाकर चुनावी संग्रामों में उतर रही है, उसका लाभ उसे आगे भी मिलेगा। यही रणनीति रही तो वह पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के राज्यों में भी अपनी जीत का परचम फहराती दिखाई देगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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