Change of Gard in punjab a report : पंजाब में बदलाव पर दैनिक हिन्दुस्तान के 21 सितंबर 2021 का संपादकीय कांग्रेस के लिए सतर्कता बरतने का संदेश देता है

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पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव से बमुश्किल छह महीने पहले नेतृत्व परिवर्तन न केवल चैंकाता है, बल्कि एक खास तरह के राजनीतिक चरित्र को भी सामने रखता है।

कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे कद्दावर नेता, जिन्होंने भाजपा के विजय रथ को कम से कम पंजाब में थामे रखा था और जो कांग्रेस को गौरव के कुछ पल नसीब कराते थे, वह अचानक अप्रिय कैसे हो गए? चार साल उन पर कांग्रेस को पूरा विश्वास रहा और जब उनका कार्यकाल अंतिम छमाही में पहुंचा, तो उन्हें पद से विदा करने का इंतजाम कर दिया गया।

क्या पंजाब में सत्ता परिवर्तन केवल चुनावी हार के डर की वजह से हुआ है? काश! हार का यह भय हमारी राजनीतिक पार्टियों को हर दिन सताता, तो चुनाव की दहलीज पर पहुंचकर नेतृत्व परिवर्तन की जल्दी नहीं मचती। पंजाब में फिर दिख गया कि सत्तासेवी राजनीति अपने स्वभाव में कितनी निर्मम होती है। कल तक कैप्टन कांग्रेस के लिए नायक हुआ करते थे और आज चरणजीत सिंह चन्नी से उम्मीदें हैं। सत्तासेवी राजनीति न तो कैप्टन के प्रति उदार थी और न चन्नी पर अनायास मेहरबान हो जाएगी।

सोमवार को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही चरणजीत सिंह चन्नी पुरजोर ढंग से सक्रिय हो गए, क्योंकि उनके पास समय कम है। बमुश्किल चार महीनों में वे तमाम काम करने हैं, जो अमरिंदर अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में नहीं कर पाए। उन्होंने सत्ता संभालते ही किसानों को लुभाने का प्रयास सबसे पहले किया है। केंद्र सरकार से तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग दोहरा दी है।

पंजाब में चुनाव जीतने के लिए किसानों को खुश रखना सबसे जरूरी है, यह काम कैप्टन अमरिंदर सिंह अपने ढंग से कर रहे थे, लेकिन इस मोर्चे पर उनकी लोकप्रियता पिछले महीनों में कम हुई थी। यह भाव किसानों में आने लगा था कि कैप्टन किसानों की मांग से किसी तरह से पिंड छुड़ाना चाहते हैं।

अब यह देखने वाली बात होगी कि कैप्टन के किन कामों को कांग्रेस गलत मानती है या बदलती है। चन्नी ने बता दिया है कि उन्हें हाईकमान की ओर से 18 मुद्दों की सूची मिली है, जिन्हें वह अपने बाकी कार्यकाल में ही पूरा करेंगे। मुख्यमंत्री बनते ही चन्नी ने राज्य में किसानों के बकाया पानी व बिजली बिल माफ करने का बड़ा एलान किया है, लेकिन क्या यही काम कुछ पहले कांग्रेस कैप्टन से नहीं करा सकती थी?

बहरहाल, कांग्रेस हाईकमान को बदलाव के अपने फैसले का सम्मान रखने के लिए बहुत कुछ करना होगा। बड़बोलापन आज की राजनीति का अहम हिस्सा है। चन्नी ने भी कुछ आकर्षक संवाद कहे हैं, जैसे किसान डूबा, तो देश डूबेगा, किसान पर मैं कोई आंच नहीं आने दूंगा।

अगर किसानों पर आंच आई, तो गर्दन पेश कर दूंगा। ऐसी ही भाषा के लिए कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू को भी जाना जाता है, लेकिन क्या ऐसी भाषा के बल पर सरकार चलाते हुए चुनाव में जीत हासिल हो सकती है?

बेशक, उपलब्ध विकल्पों के बीच से कांग्रेस का यह चयन प्रशंसनीय है और राजनीतिक रूप से विपक्षी दलों में पैदा बेचैनी साफ संकेत कर रही है कि तीर निशाने की ओर गया है।

यह तीर तभी निशाने पर लगेगा और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार तभी बची रह पाएगी, जब पार्टी के दिग्गज नेता एक-दूसरे की टांग पर फोकस करने के बजाय कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे।

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